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अब कोसी तटबन्धों और कोसी पीड़ितों के साथ धक्का-मुक्की

Source: 
डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक 'दुइ पाटन के बीच में'

कोसी प्रोजेक्ट के इंजीनियरों के लिए तटबन्ध का अलाइनमेन्ट अब तक सिरदर्द बन चुका था। जो जहाँ फंसा हुआ था उसी के हिसाब से उसकी अपेक्षाएं थीं और हर गाँव के बाशिन्दे यही चाहते थे कि उनका गाँव किसी तरह से तटबन्ध के बाहर आ जाये और वह नदी की मार झेलने से बच जायें। यह तटबन्ध पहले मधेपुर से होकर गुजरने वाला था और तब यह प्रस्ताव किया गया था कि इसे थोड़ा पूरब की ओर ठेल दिया जाय। इसी के साथ कुरसों समेत कई गाँवों से यह मांग आई कि तटबन्ध को अगर पूरब की ओर ठेलना ही है तो इसे थोड़ा और धक्का दिया जाय ताकि यह गाँव भी बाहर आ जायें।

इसके बाद तो वहाँ धरना, जलूस, प्रदर्शन और सत्याग्रह का तांता लग गया कि मटरस के दक्षिण तटबन्ध का अलाइनमेन्ट बदल दिया जाय। जनवरी 1956 आते-आते वहाँ स्थिति बहुत ही विस्पफोटक और तनावपूर्ण हो गई। प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर दबाव बनाया कि तटबन्ध के मूल अलाइनमेन्ट को बरकरार रखा जाय। अपने सारे कागजात के साथ प्रदर्शनकारियों का एक जत्था 24 जनवरी 1956 को कोसी प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर और प्रशासक से मिलने के लिये पटना गया। इस मुलाकात में इन प्रदर्शनकारियों को पहली बार पता लगा कि कोसी नदी का सारा का सारा पानी कोसी के दोनों तटबन्धों के ही बीच से होकर बहाया जायेगा। अब तक बहुत से लोगों का यही ख्याल था कि कोसी के पानी को बहुत सी धाराओं में बहा कर पूरे इलाके पर फैला दिया जायेगा। इन लोगों ने प्रशासक को बताया कि अगर प्रस्तावित बराज के नीचे सारा का सारा पानी तटबन्धों के बीच होकर बहा दिया जायेगा तो पश्चिमी तटबन्ध के पास के इलाकों में बाढ़ की स्थिति बहुत बिगड़ जायेगी और आस-पास के बहुत से गाँव डूब जायेंगे। उनका कहना था कि तटबन्धों के बीच की जमीन समतल नहीं है, ऊबड़-खाबड़ है और पश्चिमी तटबन्ध की ओर झुकी हुई है। नदी का पूरा पानी तटबन्धों के बीच आने पर पहले यही पश्चिम वाला इलाका डूबेगा और इसके बाद ही बचा खुचा पानी बाकी इलाके पर फैलेगा। यही बात 1941 में सर क्लॉड इंगलिस ने भी कही थी अतः यह कहना कि इंजीनियर लोग इस तथ्य से अनजान थे, ठीक नहीं होगा। अधिकारियों के पास ग्रामीणों की इस बात का कोई जवाब नहीं था। उनका बस इतना ही कहना था कि जो कुछ भी किया जा रहा है वह विशेषज्ञों की सलाह पर हो रहा है और उन्हीं का फैसला अन्तिम माना जायेगा। ऐसा करने के लिए सरकार के पास अब पूना प्रयोगशाला का प्रमाण-पत्र भी था।

सरकार ने एक प्रेस विज्ञप्ति (13 मार्च 1956) के माध्यम से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुये कहा कि, ‘‘...तटबन्ध के नक्शे को यथा संभव पूरब तक ले जाने की कोशिश की गई फिर भी घनी आबादी वाले दो गाँव मटरस और तरडीहा तटबन्ध के भू-भाग की ओर यानी पीछे नहीं रखे जा सके। कुछ लोगों के निवेदन पर राज्य सरकार ने उस क्षेत्र का पुनः निरीक्षण करने के लिये कोसी योजना के मुख्य प्रशासक से अनुरोध किया। उन्होंने निरीक्षण किया और इस बात की पुष्टि की कि कोई परिवर्तन संभव नहीं है। तटबन्ध को खींच कर और पूरब भी ले जाने से वह कोसी की जीवित धाराओं के रुख पर पड़ जायेगा और परिवर्तित परिस्थिति में तटबन्ध के ठोस बने रहने की शायद ही कोई संभावना थी।’’

सरकारी पदाधिकारियों के अतिरिक्त ललित नारायण मिश्र जैसे प्रभावशाली और उभरते हुये राजनीतिज्ञों ने भी तटबन्धों के बीच फंसने वाले लोगों का हौसला बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मिश्र ने कहा कि, ‘‘ ...अन्य क्षेत्रों की भांति कोसी क्षेत्र के किसान भी एक-एक इंच भूमि के लिये अपना खून बहाने को तैयार रहते हैं। इस क्षेत्र के किसानों ने पहले तो जमीनें देना स्वीकार नहीं किया और कहा कि यदि बलपूर्वक जमीन ली जायेगी तो खून की नदियाँ बह जायेंगी। ... लेकिन कार्यकर्ताओं ने हिम्मत नहीं हारी और यह समझाना जारी रखा कि इससे बांध के बाहर के अगणित लोगों का हित होगा। झिटकी और बनगामा के किसानों ने तटबन्ध का महत्व समझ लिया और उन्होंने अपनी जमीन देकर जो उदाहरण उपस्थित किया उसका अन्य गाँवों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा और लोगों ने अपने घर तथा बाग भी दे डाले।’’ यह लेकिन सच नहीं था। देखें बॉक्स-यह तो एक दम गलत बात है...।

तटबन्ध के अलाइनमेन्ट के विवाद को बढ़ता देख कर कोसी प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर के॰ वी॰ एकाम्बरम ने सुझाव दिया कि नदी के थपेड़ों से मटरस और तरडीहा को बचाने के मसले को केन्द्रीय जल और विद्युत आयोग पर छोड़ दिया जाय। बिना पूरी तहकीकात किये यह मुमकिन है कि नफा नुकसान में बदल जाये। पश्चिमी तटबन्ध को नवादा तक बढ़ाने के बजाय उसे मधेपुर से दो किलामीटर पहले एक तालाब तक ले जाकर छोड़ दिया जाये। यह फैसला इसलिए किया गया कि तटबन्ध के निर्माण के बाद आसपास के गाँवों को सुरक्षित करना जरूरी था। यह भी तय किया गया कि तटबन्ध को झमटा तक तो ले ही जाना पड़ेगा। उन्होंने यह भी प्रस्ताव किया कि मधेपुर के नीचे जमीन की सतह का गहन अध्ययन किया जाय और यह कोशिश की जाय कि आने वाले दो तीन महीनों के अन्दर नये नक्शे प्रकाशित कर दिये जायें। आगे के सुरक्षा कार्यों के लिये दरभंगा के जिलाधीश के सहयोग से एक नई योजना बनाई जाये। इस इलाके के लोग कोसी के पश्चिमवर्ती विस्थापन के कारण पहले से ही भारी बाढ़ों का सामना कर रहे थे और अगर पश्चिमी तटबन्ध के निर्माण से यहां हालात पहले से बदतर होने वाले हों तो इसकी व्यवस्था पहले से ही होनी चाहिये, ऐसा एकाम्बरम साहब का मानना था। तरडीहा बड़ी मुश्किल से तटबंध के बाहर निकल पाया। देखें बॉक्स- मौत के दरवाजे पर खड़ा आदमी अपने बचाव के लिये कुछ भी करेगा।

तटबन्ध पीड़ितों के लिये पुनर्वास तो एक लम्बी लड़ाई का मुद्दा था मगर उन्हें पहले तो तटबन्ध के दानव द्वारा समेट ली गई अपनी जमीन की लड़ाई के लिये कमर कसनी थी। 12 सितम्बर 1956 को राम सेवक ठाकुर की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधि मण्डल टी॰ पी॰ सिंह और हरिनाथ मिश्र से यह बताने के लिये मिला कि इस तरह से गाँवों में 15 घर, जिनकी मालियत 4 लाख थी, कट कर नदी में समा गये हैं। प्रतिनिधि मण्डल ने इन लोगों से यह भी कहा कि कोसी के पश्चिमी तटबन्ध को रजुआही से लेकर करहारा के बीच में सीधा मिला दिया जाय। ऐसा करने से मटरस, बिशनपुर, कपछुआ, कलुआ, तरडीहा, बोचही, अजरकबे पौनी, भावर, कुसहा, सिपराहा, असमा, नवादा, ठेंगरा, कुरसौ, भीमपुर, सरौनी, रुपौली, और चुन्नी आदि गाँव तटबन्ध के बाहर निकल जायेंगे। इन सभी गाँवों की जनसंख्या 32,000 और इनका रकबा 31,000 एकड़ था।

तटबन्ध का अलाइनमेन्ट बदले बिना ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं था और यह परिवर्तन करना पड़ा। तरडीहा तो जैसे-तैसे पश्चिमी तटबंध के बाहर चला गया मगर मटरस हमेशा के लिए तटबन्धों के बीच कैद हो गया। मटरस के 1955-56 के संघर्ष की कहानियाँ सुनाने वाले सौभाग्य से अभी हमारे बीच मौजूद हैं। देखें बॉक्स-हमारी मदद किसी ने नहीं की...।

वास्तव में कोसी प्रोजेक्ट के इंजीनियरों के लिए तटबन्ध का अलाइनमेन्ट अब तक सिरदर्द बन चुका था। जो जहाँ फंसा हुआ था उसी के हिसाब से उसकी अपेक्षाएं थीं और हर गाँव के बाशिन्दे यही चाहते थे कि उनका गाँव किसी तरह से तटबन्ध के बाहर आ जाये और वह नदी की मार झेलने से बच जायें। यह तटबन्ध पहले मधेपुर से होकर गुजरने वाला था और तब यह प्रस्ताव किया गया था कि इसे थोड़ा पूरब की ओर ठेल दिया जाय। इसी के साथ कुरसों समेत कई गाँवों से यह मांग आई कि तटबन्ध को अगर पूरब की ओर ठेलना ही है तो इसे थोड़ा और धक्का दिया जाय ताकि यह गाँव भी बाहर आ जायें जिसके लिये रजुआही से झमटा तब सीधी लाइन खींचने का प्रस्ताव किया गया। फिर प्रस्ताव हुआ कि तटबन्ध को सीधे मजुलिया से झमटा ले जाया जाय ताकि सिकरिया और तरडीहा के चारों ओर रिंग बांध न बनाना पड़े। जैसे ही तरडीहा को बाहर निकालने की बात आई तो मटरस से आवाज उठी कि जब तटबन्ध तरडीहा के पूरब से जायेगा ही तो क्यों न उसे एक धक्का और दिया जाय कि वह मटरस के भी पूरब चला जाये और यह गाँव भी बच जाये और अगर इतना किया जा सकता है तो क्यों न निर्मली के पास मझारी धार का मुंह बन्द कर दिया जाये और तटबन्ध को रसुआर के पास निर्मली रिंग बांध से शुरू किया जाये और उसे अलोला, हटनी, अमाही और बनरझूला होते हुए करहारा लाया जाये। अगर ऐसा किया जा सके तो तरडीहा, मटरस और सिकरिया को रिंग बांध से घेरना नहीं पड़ेगा और कुरसो आदि गाँवों की सुरक्षा अपने आप हो जायेगी। इस तरह जितने मुँह थे उतनी ही बातें थी और हरेक के अपने-अपने सुझाव थे जिसे वह पूरा होता देखना चाहता था। सरकार के इंजीनियर भी शायद इसलिए कि अब तटबन्धों के अलाइनमेन्ट और उनके बीच की दूरी का कोई मतलब ही नहीं बचा था, कभी-कभी ऐसी मांगों को खुद हवा देते थे।

ग्रा॰-भलुआही, पो॰-जनार्दनपुर, जिला-मधुबनी के राजकुमार लालदास (65) बताते हैं कि, ‘‘ तटबन्ध की पहली लाइन मटरस से बाथ और तरडीहा होते हुये रहुआ संग्राम तक की खींची गई थी। इसे बदल दिया गया और इस परिवर्तन के खिलाफ एक आन्दोलन खड़ा हो गया। मेरे पिता जी ने बहुत से दूसरे लोगों के साथ ललित नारायण मिश्र से सम्पर्क किया। उन्होंने बताया कि कोसी प्रोजेक्ट के कुछ उच्च पदाधिकारी कोसी डाक बंगले पर कोसी कन्ट्रोल बोर्ड की गोष्ठी के लिये आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक शिष्टमंडल लेकर वहीं आ जाइये और अपनी समस्यायें इन अधिकारियों को बताइये। तब सारे गाँव वालों ने नक्शे के साथ अपनी समस्याओं को अधिकारियों के पास रखा। स्थानीय इंजीनियरों ने तो हमारे प्रस्ताव का विरोध किया मगर कंवर सेन ने कहा था कि अलाइनमेन्ट में परिवर्तन संभव है। एक्जीक्यूटिव इंजीनियर को हम लोगों का प्रस्ताव कतई पसन्द नहीं था और उसने भरपूर कोशिश की कि कम से कम हमारा घर जरूर तटबन्ध के अलाइनमेन्ट में पड़ जाय। हम लोग इसके खिलाफ उच्च न्यायालय तक गये और जीते भी। हम लोग अपना प्रस्ताव लेकर अनुग्रह नारायण सिंह के पास भी गये मगर उनका मानना था कि पौनी-मधेपुर वाले अलाइनमेन्ट पर बहुत पैसा खर्च हो चुका है अतः अब परिवर्तन की मांग न की जाय मगर काफी समझाने बुझाने के बाद वह राज़ी हो गये थे।’’

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