उजाड़ का फैलाव

देश की लगभग 8000 हेक्टेयर जमीन हर साल बीहड़ बनती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार बीहड़ में सालाना 0.5 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है जिस रफ्तार से भूमि सुधार हो रही है उस हिसाब से सुधार कार्यक्रम पूरा करने में 150 साल लगेंगे, तब तक बीहड़ दुगुने हो जाएंगे। इसका अर्थ यह है कि ऊंची जमीन पूरी तरह बह जाएगी।

बीहड़ों की समस्या केवल भूक्षरण और भूमि विकास की समस्या नहीं है। बहुत पुराने से चंबल घाटी डाकुओं के लिए कुख्यात है जहां उन्हें छिपे रहने को जगह मिलती है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के डाकू पीड़ित बीहड़ क्षेत्र की कुल उत्पादन क्षमता सालाना 30 लाख टन अनाज की है । इसके अलावा फल, लकड़ी, चारा तथा दूसरे कुछ कच्चे माल भी मिलते हैं। इन बीहड़ों को सुधारने और विकास करने की सही योजना के अभाव में देश को सालाना लगभग 157 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। इसके पीछे केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, और भी कई कारण हैं। बीहड़ों को ‘गहरे बीहड़’ की श्रेणी में रखकर बिल्कुल ही खारिज कर दिया गया है क्योंकि उन्हें कभी भी खेती लायक नहीं बनाया जा सकता। लेकिन सुधार में जितनी देर की जाएगी, बीहड़ उतने ही गहरे होते जाएंगे। इसलिए युद्ध स्तर पर उसे सुधारने की सख्त जरूरत है।

पुराने ग्वालियर राज ने इस सारी परिस्थिति का अध्ययन करने के लिए एक आयोग बनाया था। उस आयोग ने वन संवर्धन और भूसंरक्षण की सिफारिश की थी। मुरैना के पुराने बंदोबस्त (1939) संबंधी कागजात से पता चलता है कि 1912 के पिछले बंदोबस्त के बाद बीहड़ का इलाका दुगुना हुआ और 1943 में बाह तहसील क्षेत्र के 21 प्रतिशत भूभाग में फैल गया। भिंड के 1915 के बंदोबस्त तक पिछले 1898 के बंदोबस्त की तुलना में 49 प्रतिशत बीहड़ बढ़ा था। बाद के बंदोबस्तों में ज्यादा सही वर्गीकरण किया गया, इस कारण भी यह वृद्धि कुछ ज्यादा दिखती होगी।

तब आयोग की सिफारिशों के आधार पर भिंड और मुरैना में पानी और कटाव रोकने के लिए 1,200 सुरक्षा बांध बनाए गए और 4,000 बीहड़ को सुधारा गया। एक बीहड़ विभाग भी खोला गया पर योजना कारगर नहीं हो सकी, क्योंकि पर्याप्त धन और कुशल व्यक्ति दोनों की कमी थी। फिर 1945 में भारत सरकार ने एक अमेरिकी भू-संरक्षण विशेषज्ञ को बुलवाया। उसने दो बातें सुझाईं -चराई कम की जाए और मेड़बंदी की जाए। ग्वालियर का मध्य भारत में विलय होने का बाद एक अन्य विशेषज्ञ दल ने भी ऐसे ही सुझाव दिए थे- बीहड़ के निचले इलाकों में कहां खेती लायक चौड़ी जगह निकलती हो वहीं भूमि सुधार का काम किया जाए, सुधरे हिस्से की सुरक्षा की दृष्टि से बचे दर्रों को बारीश के पानी के मार्ग को बदलने में काम में लिया जाए, ऊपरी खेती की जमीन को बीहड़ बनने से बचाया जाए, निचली सुधरी जमीन में भूक्षरण रोकने का पूरा प्रबंध किया जाए।

मध्य- भारत सरकार में 1954 में बीहड़ों के सर्वेक्षण और उनके सुधार की योजना को मंजूरी दी। 1954-55 में काम शुरू हुआ और मुरैना के पास छोंडा में मेड़बंदी और उथले बीहड़ को सुधारने का काम चालू हुआ। उसी दौरान, राज्य के दूसरे स्थानों में भी तरह-तरह की परियोजनाएं शुरू की गईं। भारत सरकार ने केंद्रीय जल व बिजली आयोग के तत्वावधान में बीहड़ के सुधार पर आगे सर्वेक्षण करवाया। मध्य प्रदेश के बीहड़ों का पूरी गंभीरता से किया गया वह आखिरी सर्वेक्षण था। बाद के सारे आकंड़े तो अंदाज के हैं। उस सर्वे का निष्कर्ष था कि प्रति एकड़ 1,250 रुपये से ज्यादा खर्च न आता हो तो सुधार काम महंगा नहीं रहेगा।

बीहड़ों का वर्गीकरण किया गया और दूसरी जगहों पर भी ऐसी परियोजनाएं लागू करने के उपाय तय किए गए। मुख्य काम ये थे- मेड़बंदी की जाए और ऊपरी जमीन में खेती-बाड़ी हो, कमजोर भूमि में हरी पट्टी उगाई जाए, दर्रों के सामने के हिस्से के खड़े कटाव को थोड़ा तिरछा किया जाए, मिट्टी बचाने वाले बांधों का निर्माण करके बीहड़ का सुधार किया जाए ताकि साद को रोका जा सके और साद भरे किनारों का विकास किया जा सके।

सुझावों का तो अंबार लग गया, पर काम की गति रेंगने से ज्यादा नहीं बढ़ पाई। 25 साल की अवधि में 18 परियोजनाओं ने मिलकर मात्र 3,137 हेक्टेयर बीहड़ को सुधारा, जो उसी अवधि में बीहड़ की हुई बढ़ोतरी के मुकाबले नगण्य था।

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