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उधारी की सांस लेता विकसित विश्व

मार्टिन खोर

पश्चिमी मीडिया पर्यावरण संबंधी समझौतों में हो रही देरी के लिए अकारण ही विकाशशील देशों को दोषी ठहरा रहा है। पिछले दिनों फाइनेंशियल टाइम्स ने अपने मुखपृष्ठ पर छपे लेख का शीर्षक दिया था 'भारत ने एक दशक तक उत्सर्जन में कमी से इंकार कर ग्रीन एजेंडा ठुकराया।'

विकासशील देशों से उत्सर्जन में कमी का आश्वासन लेना तब तक न्यायोचित नहीं होगा जब तक कि उन्हें उत्पादन की प्रणाली बदलने हेतु तकनीक व धन की उपलब्धता सुनिश्चित न करवा दी जाए। वैसे भी विकसित देशों की यह ऐतिहासिक जवाबदेही है कि वे विकासशील देशों की मदद करें क्योंकि विकसित देश उपलब्ध अधिकांश 'वायुमंडलीय स्थान' पर अपना कब्जा जमा चुके हैं। वैसे भी वातावरण में अब इतनी क्षमता नहीं बची है कि वह अतिरिक्त कार्बन डाईऑक्साइड या जलवायु के लिए खतरनाक अन्य गैसों को अपने में समाहित कर सके।

कोपेनहेगन में होने वाली 'वैश्विक समझौते' को लेकर मूल प्रश्न तो यही है कि किस तरह विकसित व विकासशील देशों में उत्सर्जन में कमी का न्यायोचित बंटवारा किया जाए। विकसित देशों का प्रस्ताव है कि वर्ष 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के वैश्विक उत्सर्जन में 50 प्रतिशत (यानि वर्ष 1990 में 38 अरब टन से घटाकर 2050 में 19.3 अरब टन) की कमी की जाए। विकसित देश अपने उत्सर्जन 18.3 अरब को 3.6 अरब टन तक लाकर 80 प्रतिशत की कटौती को तैयार हैं। इसके बाद विकासशील देशों के द्वारा किए जा रहे 20 अरब टन उत्सर्जन को 20 प्रतिशत घटाकर 15.7 अरब टन पर लाना होगा। दूसरी ओर अनुमान है कि इस दौरान विकासशील देशों की आबादी दुगनी हो जाएगी। इस अवस्था में यह कटौती करीब 60 प्रतिशत की होगी। चूंकि विकसित देशों में जनसंख्या स्थिर बनी रहेगी अतएव उनके द्वारा प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन में यथास्थिति बने रहने की उम्मीद है। गैसों के इस खतरनाक स्तर पर पहुंचने के बाद वैश्विक तापमान में औसतन 2 डिग्री सेल्सियस की वृध्दि होगी जिसके अनर्थकारी परिणाम निकलेंगे।

आवश्यकता इस बात की है कि वातावरण में ग्रीन हाऊस गैसों को प्रति दस लाख के 450वें हिस्से तक सीमित रखना होगा। वैसे आदर्श स्थिति को पाने के लिए आवश्यक है कि उत्सर्जन में सन् 2050 तक 1990 के स्तर की तुलना में 50 से 85 प्रतिशत तक की कटौती की जाए।

कोपेनहेगन में होने वाली 'वैश्विक समझौते' को लेकर मूल प्रश्न तो यही है कि किस तरह विकसित व विकासशील देशों में उत्सर्जन में कमी का न्यायोचित बंटवारा किया जाए। विकसित देशों का प्रस्ताव है कि वर्ष 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के वैश्विक उत्सर्जन में 50 प्रतिशत (यानि वर्ष 1990 में 38 अरब टन से घटाकर 2050 में 19.3 अरब टन) की कमी की जाए। विकसित देश अपने उत्सर्जन 18.3 अरब को 3.6 अरब टन तक लाकर 80 प्रतिशत की कटौती को तैयार हैं। इसके बाद विकासशील देशों के द्वारा किए जा रहे 20 अरब टन उत्सर्जन को 20 प्रतिशत घटाकर 15.7 अरब टन पर लाना होगा। दूसरी ओर अनुमान है कि इस दौरान विकासशील देशों की आबादी दुगनी हो जाएगी। इस अवस्था में यह कटौती करीब 60 प्रतिशत की होगी। चूंकि विकसित देशों में जनसंख्या स्थिर बनी रहेगी अतएव उनके द्वारा प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन में यथास्थिति बने रहने की उम्मीद है।

अतएव विकासशील देशों के लिए प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में विकसित देशों में थोड़ा ही कम उत्सर्जन का पैमाना तय करना अन्यायपूर्ण होगा। यदि विकसित देश 100 प्रतिशत की भी कटौती करते हैं तो विकासशील देशों को 52 प्रतिशत कटौती करना पड़ेगी। यदि विकासशील देशों को अपने वर्तमान प्रति व्यक्तिउत्सर्जन को बनाए रखना है तो विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में वर्ष 2050 तक 213 प्रतिशत की कमी करनी होगी।

अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न ने अपनी पुस्तक 'दि ग्लोबल डील' में कार्बन व्यापार हेतु कार्बन डाईऑक्साइड की दर 40 अमेरिकी डालर प्रतिटन बताई है। इस तरह सन् 1880 से 2008 के मध्य विकसित देशों पर करीब 583 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड के रूप में कार्बन ऋण बकाया है। 40 डॉलर प्रति टन के मान से यह कार्बन ऋण करीब 23 खरब डॉलर बैठता है। इस कार्बन ऋण का एक वैश्विक जलवायु कोष बनाकर उसे विकासशील देशों को उनके उत्सर्जन में कमी हेतु उपलब्ध करवाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो विकसित देशों को अपना उत्सर्जन घटाकर न केवल शून्य प्रतिशत पर लाना होगा बल्कि 1990 के उत्सर्जन के स्तर पर आने के लिए 113 प्रतिशत अतिरिक्तग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन को समेटना होगा। विकसित और विकासशील दोनों ही देशों के लिए यह असंभव है।

खतरनाक स्तर को पार न करने के लिए आवश्यक है कि सभी देश आपस में मिलकर उत्सर्जन की मात्रा को (सन् 1800 से 2050 के मध्य के आधार पर) 600 अरब टन यानि कि 2200 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड पर स्थित कर लें।

इसके बाद विश्व की जनसंख्या के औसत के आधार पर विकसित देशों के लिए कार्बन बजट 125 अरब टन और विकासशील देशों के लिए 475 अरब टन निश्चित किया जा सकता है। विकसित देश सन् 1800 से 2008 के मध्य ही 240 अरब टन उत्सर्जन कर इस सीमा को कभी का पार कर अभी तक अपने उचित हिस्से से 81 अरब टन अधिक विषैली गैसों का उत्सर्जन कर चुके हैं। इसके अलावा वर्ष 2009 से 2050 के मध्य वे 85 अरब टन अतिरिक्तगैस उत्सर्जित कर चुके होंगे। इस तरह सन् 1880 से 2050 के मध्य उनका कुल उत्सर्जन 325 अरब टन से भी अधिक हो चुका होगा। वैसे उनका उचित हिस्सा करीब 125 अरब टन होता है अतएव उन पर अभी तक करीबन 200 अरब टन का कार्बन ऋण चढ़ चुका है। वहीं दूसरी ओर कार्बन स्पेस का यदि न्यायोचित आबंटन होता है तो सन् 1880 से 2005 के मध्य विकासशील देशों का हिस्सा 475 अरब टन होता। वर्तमान स्थितियों के परिपेक्ष्य में देखें तो विकसित देशों को तो अभी विकासशील देशों को 200 अरब टन कार्बन के बराबर की क्षतिपूर्ति करना है। यह 733 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड के बराबर होगा।

अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न ने अपनी पुस्तक 'दि ग्लोबल डील' में कार्बन व्यापार हेतु कार्बन डाईऑक्साइड की दर 40 अमेरिकी डालर प्रतिटन बताई है। इस तरह सन् 1880 से 2008 के मध्य विकसित देशों पर करीब 583 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड के रूप में कार्बन ऋण बकाया है। 40 डॉलर प्रति टन के मान से यह कार्बन ऋण करीब 23 खरब डॉलर बैठता है। इस कार्बन ऋण का एक वैश्विक जलवायु कोष बनाकर उसे विकासशील देशों को उनके उत्सर्जन में कमी हेतु उपलब्ध करवाया जा सकता है।

वैसे 23 खरब अमेरिकी डॉलर बहुत अधिक दिखाई पड़ता है परंतु यह विकसित देशों द्वारा मंदी के दौर में अपनी कंपनियों और बैंकों को बेलआउट के रूप में दिए गए 18.3 अरब डॉलर से थोड़ा ही अधिक है। बैंकों को बचाना भी जरूरी है परंतु जलवायु पर पड़ रहे भयंकर संकट से विश्व को मुक्ति दिलाना और भी अधिक आवश्यक है। अगर इस कोष के निर्माण की दिशा में प्रगति होती है तो हम कोपनहेगन में किसी 'वैश्विक समझौते' की उम्मीद कर सकते हैं।

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