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उपेक्षित पीड़ित और उनका संघर्ष

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डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक 'दुइ पाटन के बीच में'
एक ओर कोसी के थपेड़ों से बचने वाले इलाकों के लोगों के मन में जहाँ खासा जोश-खरोश था वहीं दूसरी ओर वह किसान जिनकी जमीनों का निर्माण कार्यों के लिये अस्थाई अधिग्रहण हुआ था और वह लोग जिनकी जमीनों पर से होकर तटबन्धों को गुजरना था, थोड़े बहुत मुआवजे की उम्मीद में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। उनकी दौड़-धूप इस जुम्मे से उस जुम्मे तक और इस दरवाजे से उस चैखट तक निर्बाध गति से चल रही थी। सरकार ने अपनी तरफ से जरूर ऐसा वायदा किया था कि इस तरह के सारे मुआवजों का भुगतान 31 मार्च 1955 के पहले कर दिया जायेगा। इस आशय का एक बयान ललित नारायण मिश्र ने 14 जनवरी 1955 को सुपौल में दिया था। इस समय सीमा को बाद में बढ़ा कर 15 अप्रैल कर दिया गया जिस पर जयप्रकाश नारायण ने कड़ी आपत्ति की थी और कहा था कि किसान रुपयों के अभाव में अगली फसल की योजना नहीं बना सकते।

तटबन्धों के बीच कोई नहीं रहना चाहता


पश्चिमी तटबन्ध पर मधेपुर (अब मधुबनी जिला) के आसपास तो एक आन्दोलन ही खड़ा हो गया। मूल योजना के अनुसार पश्चिमी तटबन्ध मधेपुर से मटरस होते हुये झमटा तक जाने वाला था जबकि स्थानीय लोगों की मांग थी कि यह मटरस से करहारा होते हुये झमटा तक जाये (चित्र 3.4)। उनका मानना था कि इस रास्ते से तटबन्ध की लम्बाई कम होगी, उसको बनाने में कम खर्च आयेगा और पश्चिमी तटबन्ध तथा नदी के बीच फंसने वाले गाँवों की संख्या भी कम होगी। उन्होंने प्रशासन को यह भी याद दिलाया कि जब 1954 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस क्षेत्र में आये थे तब उन्होंने आश्वासन दिया था कि जहाँ तक संभव हो सकेगा, सरकार उन सभी गाँवों को बचाने की कोशिश करेगी जिन्हें बचाया जा सकता है।

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