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घाघ और भड्डरी

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घाघ का जीवन वृत्त



हिन्दी के लोक कवियों में घाघ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। घाघ लोक जीवन में अपनी कहावतों के लिए प्रसिद्ध हैं। घाघ की भांति भड्डरी और डाक लोक कवि हैं किन्तु घाघ के समान उनकी प्रसिद्धि नहीं है। जिस प्रकार ग्राम्य समाज में ‘इसुरी’ अपनी ‘फाग’ के लिए, विसराम अपने ‘बिरहों’ के लिए प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार घाघ अपनी कहावतों के लिए विख्यात हैं। इनकी प्रसिद्धि के कारण ही कालान्तर में दूसरे लोगों द्वारा रचित कहावतों के साथ भी घाघ का नाम जुड़ गया। मध्यकालीन अन्य कवियों की भांति घाघ का जीवनवृत्त भी अज्ञात है। विभिन्न विद्वानों ने उन्हें अपने-अपने क्षेत्र का निवासी सिद्ध करने की चेष्टा है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में घाघ के सम्बन्ध में सर्वप्रथम ‘शिवसिंह सरोज’ में उल्लेख मिलता है। इसमें “कान्यकुब्ज अंतर्वेद वाले” कवि के रूप में उनकी चर्चा है।1 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने घाघ का केवल नामोल्लेख किया है।2 ‘हिन्दी शब्द सागर’ के अनुसार “घाघ गोंडे के रहने वाले एक बड़े चतुर और अनुभवी व्यक्ति का नाम है जिसकी कही हुई बहुत सी कहावतें उत्तरी भारत में प्रसिद्ध हैं। खेती-बारी, ऋतु-काल तथा लग्न-मुहूर्त आदि के सम्बन्ध में इनकी विलक्षण उक्तियाँ किसान तथा साधारण लोग बहुत कहते हैं।”3 श्रीयुत पीर मुहम्मद यूनिस ने घाघ की कहावतों की भाषा के आधार पर उन्हें चम्पारन (बिहार) और मुजफ्फरपुर जिले की उत्तरी सीमा पर स्थित औरेयागढ़ अथवा बैरगनिया अथवा कुड़वा चैनपुर के समीप के किसी गाँव में उत्पन्न माना है।4 राय बहादुर मुकुन्द लाल गुप्त ‘विशारद’ ने ‘कृषि रत्नावली’ में उन्हें कानपुर जिला अन्तर्गत किसी ग्राम का निवासी ठहराया है।1 श्री दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ने घाघ का जन्म छपरा जिले में माना है।2 पं. राम नरेश त्रिपाठी ने ‘कविता कौमुदी’ भाग एक और ‘घाघ और घाघ और भड्डरी’ नामक पुस्तक में उन्हें कन्नौज का निवासी माना है।3 घाघ की अधिकांश कहावतों की भाषा भोजपुरी है। डॉ. ग्रियर्सन ने भी ‘पीजेन्ट लाइफ आफ बिहार’ में घाघ की कविताओं का भोजपुरी पाठ प्रस्तुत किया है।4 इस आधार पर इस धारणा को बल मिलता है कि घाघ का जन्म स्थान बिहार का छपरा था। वहां से ये कन्नौज गये। इस सम्बन्ध में जनश्रुति मिलती है कि घाघ की उनकी पतोहू से अनबन रहती थी। घाघ जो उक्तियाँ कहते थे लोग उन्हें उनकी पोतहु के पास पहुँचा देते थे और वह उसके विपरीत कहावत कहती थी जिसे लोग घाघ के पास लाते थे। कहा जाता है कि अपनी पतोहू से खिन्न होकर वे छपरा छोड़कर कन्नौज चले गये। किन्तु यह मत अधिक विश्वसनीय नहीं प्रतीत होता क्योंकि ऐसी सामान्य बात पर कोई अपना जन्म स्थान छोड़कर अन्यत्र क्यों जायेगा? कहा जाता है कि कन्नौज में घाघ की ससुराल थी। ऐसा अनुमान है कि घाघ जीविकोपार्जन के लिए छपरा छोड़कर अपनी ससुराल कन्नौज गये होंगे और वहीं बस गये होंगे। रीतिकालीन कवि बिहारी से सम्बन्धित भी ऐसी घटना है। वे अपना जन्म स्थान ग्वालियर (बसुका गोविन्दपुर) छोड़कर अपनी ससुराल मथुरा में रहने लगे थे-

जनमु ग्वालियर जानियै खण्ड बुन्देले बाल।
तरूनाई आई सुधर बसि मथुरा ससुराल।।


जन्म काल

घाघ का जन्मकाल भी निर्विवाद नहीं है। शिवसिंह सेंगर ने उनकी स्थिति सं. 1753 वि. के उपरान्त माना है।5 इसी आधार पर मिश्रबन्धुओं ने उनका जन्म सं. 1753 वि. और कविता काल सं. 1780 वि. माना है।1 ‘भारतीय चरिताम्बुधि’ में इनका जन्म सन् 1696 ई. बताया जाता है।2 पं. राम नरेश त्रिपाठी ने घाघ का जन्म सं. 1753 वि. माना है।3 यही मत आज सर्वाधिक मान्य है।

घाघ के नाम के विषय में भी निश्चित रूप से कुछ ज्ञात नहीं है। घाघ उनका मूल नाम था या उपनाम था इसका पता नहीं चलता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र-बिहार, बंगाल एवं असम प्रदेश में डाक नामक कवि की कृषि सम्बन्धी कहावतें मिलती हैं जिनके आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि डाक और घाघ एक ही थे। घाघ की जाति के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। कतिपय विद्वानों ने इन्हें ‘ग्वाला’ माना है।4 किन्तु श्री रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी खोज के आधार पर इन्हें ब्राह्मण (देवकली दुबे) माना है। उनके अनुसार घाघ कन्नौज के चौधरी सराय के निवासी थे। कहा जाता है कि घाघ हुमायूँ के दरबार में भी गये थे। हुमायूँ के बाद उनका सम्बन्ध अकबर से भी रहा। अकबर गुणज्ञ था और विभिन्न क्षेत्रों के लब्धप्रतिष्ठि विद्वानों का सम्मान करता था। घाघ की प्रतिभा से अकबर भी प्रभावित हुआ था और उपहार स्वरूप उसने उन्हें प्रचुर धनराशि और कन्नौज के पास की भूमि दी थी, जिस पर उन्होंने गाँव बसाया था जिसका नाम रखा ‘अकबराबाद सराय घाघ’। सरकारी कागजों में आज भी उस गाँव का नाम ‘सराय घाघ’ है। यह कन्नौज स्टेशन से लगभग एक मील पश्चिम में है। अकबर ने घाघ को ‘चौधरी’ की भी उपाधि दी थी। इसीलिए घाघ के कुटुम्बी अभी तक अपने को चौधरी कहते हैं। ‘सराय घाघ’ का दूसरा नाम ‘चौधरी सराय’ भी है।5 घाघ की पत्नी का नाम किसी भी स्रोत से ज्ञात नहीं है किन्तु इनके दो पुत्र-मार्कण्डेय दुबे और धीरधर दुबे हुए। इन दोनों पुत्रों के खानदान में दुबे लोगों के बीस पच्चीस घर अब उसी बस्ती में हैं। मार्कण्डेय के खानदान में बच्चूलाल दुबे, विष्णु स्वरूप दुबे तथा धीरधर दुबे के खानदान में रामचरण दुबे और कृष्ण दुबे वर्तमान हैं। ये लोग घाघ की सातवीं-आठवीं पीढ़ी में अपने को बताते हैं। ये लोग कभी दान नहीं लेते हैं। इनका कथन है कि घाघ अपने धार्मिक विश्वासों के बड़े कट्टर थे और इसी कारण उनको अंत में मुगल दरबार से हटना पड़ा था तथा उनकी जमीनदारी का अधिकांश भाग जब्त हो गया था।

प्राचीन महापुरूषों की भांति घाघ के सम्बन्ध में भी अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि घाघ बचपन से ही ‘कृषि विषयक’ समस्याओं के निदान में दक्ष थे। छोटी उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी थी कि दूर-दूर से लोग अपनी खेती सम्बन्धी समस्याओं को लेकर उनका समाधान निकालने के लिए घाघ के पास आया करते थे। किंवदन्ती है कि एक व्यक्ति जिसके पास कृषि कार्य के लिए पर्याप्त भूमि थी किन्तु उसमें उपज इतनी कम होती थी कि उसका परिवार भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहता था, घाघ की गुणज्ञता को सुनकर वह उनके पास आया। उस समय घाघ हमउम्र के बच्चों के साथ खेल रहे थे। जब उस व्यक्ति ने अपनी समस्या सुनाई तो घाघ सहज ही बोल उठे-

आधा खेत बटैया देके, ऊँची दीह किआरी।
जो तोर लइका भूखे मरिहें, घघवे दीह गारी।।


कहा जाता है कि घाघ के कथनानुसार कार्य करने पर वह किसान धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

घाघ के सम्बन्ध में जनश्रुति है कि उनकी अपनी पुत्रवधू से नहीं पटती थी। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि इसी कारण घाघ अपना मूल निवास छपरा छोड़कर कन्नौज चले गये थे। घाघ जो कहावतें कहते थे उनकी पुत्रवधू उसके विपरीत दूसरी कहावत बनाकर कहती थी। पं. राम नरेश त्रिपाठी ने घाघ और उनकी पुत्रवधू की इस प्रकार नोंकझोंक से सम्बन्धित कतिपय कहावतें प्रस्तुत की हैं1 जो इस प्रकार हैं-

घाघ-

मुये चाम से चाम कटावै, भुइँ सँकरी माँ सोवै।
घाघ कहैं ये तीनों भकुवा उढ़रि जाइँ पै रोवै।।


पुत्र वधू-

दाम देइ के चाम कटावै, नींद लागि जब सोवै।
काम के मारे उढ़रि गई जब समुझि आइ तब रोवै।।


घाघ -

तरून तिया होइ अँगने सोवै रन में चढ़ि के छत्री रोवै।
साँझे सतुवा करै बियारी घाघ मरै उनकर महतारी।।


पुत्रवधू -

पतिव्रता होइ अँगने सोवै बिना अन्न के छत्री रोवै।
भूख लागि जब करै बियारी मरै घाघ ही कै महतारी।।


घाघ –

बिन गौने ससुरारी जाय बिना माघ घिउ खींचरि खाय।
बिन वर्षा के पहनै पउवा घाघ कहैं ये तीनों कउवा।।


पुत्रवधू –

काम परे ससुरारी जाय मन चाहे घिउ खींचरि खाय।
करै जोग तो पहिरै पउवा कहै पतोहू घाघै कउवा।।


घाघ और लालबुझक्कड़ की परस्पर लागडाँट सम्बन्धी जनश्रुति भी लोक जीवन में प्रचलित है। कहा जाता है कि घाघ का निवास स्थान गंगा नदी के एक किनारे था और उसके ठीक दूसरी ओर लालबुझक्कड़ का गाँव था। घाघ की प्रसिद्धि से लालबुझक्कड़ को ईर्ष्या होने लगी थी ओर वे भी लोगों की विभिन्न समस्याओं का अपने ढंग से निदान करने लगे थे। लालबुझक्कड़ का मूल नाम लाल था लेकिन विभिन्न समस्याओं का अनुमान के आधार पर हल निकालने के कारण लोग उन्हें ‘बुझक्कड़’ कहने लगे। घाघ और लालबुझक्कड़ की परस्पर प्रतिद्वंद्विता की बात तर्कसंगत नहीं प्रतीत होती है क्योंकि घाघ का सम्बन्ध कहावतों से है जबकि लालबुझक्कड़ का सम्बन्ध ‘बुझौवल’ से है। बुझौवल कहावत की ही भांति लोक प्रचलित काव्य विधा है। लालबुझक्कड़ से सम्बन्धित जो भी बुझौवल लोकजीवन में मिलती हैं वे तर्कहीन और हास्यास्पद हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत हैं- एक बार उनके गाँव वालों को वर्षा के कारण गीली जमीन पर हाथी के पैरों के निशान दिखाई दिये। वे लोग उनके पास इसके बारे में जानने के लिए पहुँचे लालबुझक्कड़ मुस्कुराते हुए बोले-

लालबुझक्कड़ बूझते और न बूझै कोय।
पैर में चक्की बांध के हरिना कूदा होय।।


घाघ का समय हुमायूँ और अकबर का शासन काल था। पं. रामनरेश त्रिपाठी का अनुमान है कि अकबर के सिंहासनारूढ़ होने के समय घाघ की उम्र पचास से अधिक रही होगी। अकबर की राज्यारोहण तिथि 1556 ई. है। इस प्रकार घाघ की मृत्यु इसके बाद ही किसी समय हुई होगी। इनकी मृत्यु के बारे में जनश्रुति है कि घाघ ने ज्योतिष विद्या के आधार पर यह जान लिया था कि उनकी मृत्यु तालाब में नहाते समय होगी। इसीलिए घाघ कभी नदी या सरोवर में स्नान करने नहीं जाते थे। दैवयोग से एक दिन मित्रों के कहने पर उनके साथ तालाब में नहाने गये। वहाँ पानी में डुबकी लगाते समय उनकी चोटी जाठ (तालाब के बीच में गड़ा हुआ लकड़ी का लट्ठा) में फँस गई जिससे उनकी मृत्यु हो गई।1 मरते समय उन्होंने कहा था-

जानत रहा घाघ निर्बुद्धी।
आवै काल विनासै बुद्धी।।

भड्डरी का जीवन वृत्त

घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृत्त भी निर्विवाद नहीं है। भड्डरी कौन थे, किस प्रान्त के थे और किस भाषा में उन्होने कहावतों का सृजन किया, यह आज भी विद्वानों में चर्चा का विषय है। भड्डरी के जन्म के सम्बन्ध में ग्रामीण अंचलों में अनेक किंवदन्तियाँ प्राप्त होती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि काशी में एक ज्योतिषी रहते थे। एक बार उन्होंने ज्योतिष गणना से यह देखा कि ऐसा शुभ मुहूर्त आने वाला है जिसमें गर्भाधान होने पर बड़ा ही विद्वान और यशस्वी पुत्र पैदा होगा। ऐसा विचार कर ज्योतिषी ने काशी से अपने पैतृक निवास के लिए प्रस्थान किया।

काशी से उनका घर काफी दूर था जिसकी वजह से वि निश्चित अवधि तक अपने घर नहीं पहुँच पाये और उन्हें रास्ते में अहीर के घर रात बितानी पड़ी। अहीर की युवती कन्या उनके लिए भोजन बनाने बैठी तो उनका उदास चेहरा देखकर पूछा कि आप इतने उदास क्यों हैं? ज्योतिषी जी ने कुछ इधर-उधर टालने के बाद सच्चाई से उसे अवगत कराया। उस युवती के मन में इस पुत्र को पाने की इच्छा जागृत हुई। उन दोनों की इच्छा का परिणाम भड्डरी के जन्म के रूप में हुआ। श्री वीएन मेहता ने अपनी पुस्तक ‘युक्त प्रान्त की कृषि सम्बन्धित कहावतें’ में इस कथा को थोड़े परिवर्तित रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार –“भड्डरी के विषय में ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर की एक बड़ी ही मनोहर कहानी कही जाती हैं।” एक समय, जब कि वे तीर्थ-यात्रा में थे, उनको मालूम हुआ कि अमुक दिन का उत्पन्न हुआ बच्चा गणित और फलित ज्योतिष का बहुत बड़ा पण्डित होगा। उन्हों स्वयं ही ऐसे पुत्र के पिता होने की उत्सुकता हुई और उन्होंने अपने घर उज्जैन के लिए प्रस्थान किया परन्तु उज्जैन इतना दूर था कि वे उस शुभ-दिन तक वहां न पहुँच सके। अतएव रास्ते के एक गाँव में एक गड़रिये की कन्या से विवाह कर लिया। उस स्त्री से उनको एक पुत्र हुआ जो ब्राह्मणों की भाँति शिक्षा न पाने पर भी स्वभावतः बहुत बड़ा ज्योतिषी हुआ। आज सभी नक्षत्र-संबंधी कहावतों के वक्ता भड्डरी या भड्डली कहे जाते हैं।” भड्डरी को वराहमिहिर का पुत्र मानना तर्कसंगत नहीं है क्योंकि वराहमिहिर का समय ‘पंचसिद्धान्तिका’ के अनुसार शक 427 या सन् 505 ई. के लगभग है। भड्डरी की कहावतों की भाषा उस युग की नहीं हो सकती, यह निश्चित है।

उक्त कथाओं के परिप्रेक्ष्य में इतना स्पष्ट है कि भड्डरी का जन्म कुलीन जाति में नहीं हुआ था। भड्डरी नाम से भी उनके कुलीन जाति का न होने का संकेत मिलता है। कतिपय विद्वानों ने भड्डरी का सम्बन्ध राजस्थान से जोड़ा है क्योंकि राजस्थानी कहावतों में “डंग कहै हे भड्डली” उल्लेख बार-बार आता है। एक कथा के अनुसार मारवाड़ में भड्डली नामक एक स्त्री थी जो ज्योतिषी थी। उसकी जाति आहिर या गड़रिया नहीं, भंगिन बताई गई है। यह भी कहा जाता है कि मारवाड़ में ‘डंक’ नाम के ब्राह्मण कवि थे जिन्होंने इस भंगिन कन्या भड्डली से विवाह कर लिया था। इन दोनों की संतान ‘डाकोत’ कहलाई।

इन जनश्रुतियों के अतिरिक्त भड्डरी के सम्बन्ध में कोई ठोस आधार नहीं प्राप्त होता है, लेकिन इतना अनुमान लगाया जा सकता है कि भड्डरी और भड्डली दो अलग-अलग व्यक्ति एवं नाम हैं क्योंकि दोनों की कहावतों की भाषा में पर्याप्त अन्तर देखने को मिलता है। इसी प्रकार ‘डंक’ और ‘डाक’ के एक होने पर भी विचार किया जाये तो दोनों में काफी समानता दृष्टिगत होती है। श्री दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह का अनुमान है कि बिहार के ‘डाक’ कवि ही राजस्थानी ‘डंग’ है।

भड्डरी से संबंधित एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ये काशी के थे या मारवाड़ के? भड्डरी की कहावतों में भोजपुरी और अवधी के शब्दों की प्रचुरता भी है। यदि इस दृष्टि से देखा जाय तो भड्डरी का काशी के आसपास का होना समीचीन प्रतीत होता है। मारवाड़ के भड्डली निश्चित ही इससे भिन्न प्रतीत होते हैं। वहाँ भड्डली और भड्डली नामक दो अलग-अलग कवि हुए हैं, जिसमें भड्डलि पुरुष हैं और भड्डली स्त्री। इस प्रकार अवधी क्षेत्र के भड्डरी से उन्हें किसी प्रकार भी संबन्धित नहीं माना जा सकता। यह भी सम्भावना है कि भड्डरी की प्रसिद्धि के कारण उनकी अवधी और भोजपुरी कहावतें राजस्थानी भाषा में गढ़ ली गई हों। मारवाड़ में भड्डली पुस्तक ‘भड्डली पुराण’ भी प्रसिद्ध है। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी पुस्तक ‘घाघ और भड्डरी’ में इसका उल्लेख किया है। “घाघ, भड्डरी और डाक को अलग-अलग मानने वालों में प्रसिद्ध विद्वान डॉ. ग्रियर्सन भी प्रमुख हैं। उन्होंने इन तीनों कवियों को अपनी पुस्तक ‘बिहार पीजेंट लाइफ’ में अलग-अलग स्थान दिया है।”

घाघ और भड्डरी की कहावतें लोक जीवन में प्रसिद्ध है। ग्राम्य अंचल में रोजमर्रा की खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान व्यक्ति इन्हीं कहावतों के आधार पर कर लेता है। इनकी कहावतें किसानों के लिए गुरुमंत्र हैं। अवधी और भोजपुरी क्षेत्रों में इनका प्रचार-प्रसार कुछ अधिक ही दिखाई पड़ता है। इनकी कहावतों से इस बात का भी अनुमान लगाया जा सकता है कि घाघ और भड्डरी दोनों समकालीन रहे होंगे क्योंकि ‘घाघ कहै सुनु भड्डरी’ का प्रयोग अनेक विषयक है, वहीं भड्डरी की कहावतों का क्षेत्र वर्षा, नीति और ज्योतिष विषयक। घाघ और भड्डरी की कहावतें आज भी प्रासंगिक हैं। उनमें ज्ञान विज्ञान सम्बन्धी प्रचुर सामग्री है। आज शस्य विज्ञान, पादप प्रजनन, पर्यावरण विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान आदि की दृष्टि से इन कहावतों के अध्ययन की आवश्यकता है।

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    ghagh

    घाध और भड्डरी समकालीन नहीं थे।भड्डरी घाघ के पूर्वज थे।उन्हीं के नाम पर उनकी जाति जोशी भड्डरी पड़ी।घाघ भड्डरी ,डाक भडली,सहदेव भाडली ,डंक भाडली सबकी महाबते लगभग एक सी है।सभी कहते ह्रै कि भड्डर का है यही विचार या भड्डरी यह भाखे, भड्डर ऋषि यह सगुन बतावे।
    ड्ल लोगों ने भड्डर ऋषि या भड्डरी ऋषि की जो कोई भृगुनंवंशी ऋषि थे उनके संस्कृत ज्ञान को लोक भाषा में प्रस्तुत किया और उसे लोकप्रिय बनाया।इन्होने इसका उल्ले२ख भी उनके हर कहावत मेंकिया। जो स्वतंत्र कहावत घाघ आदि ने किया वह अपने नाम से किया।संभवतः ये सब समकालीन थे यां एक ही थे क्योंकि सब कहावते एक हैं।
    भड्डरी जाति के इनके बशजों ने इन्ही कहावतों को अपनी जीविका का आधार बनामा । पूरे भारत में डाकोत,जोशी भड्डरी सहदेव भाडली जाति के लोग आज भी गांवमें इनहीं पपूर्वजों की कहावत के आधार पर ज्योतिष और शकुना विचार करते है। शनि का दान लेते है मूल शांति करवाते है।
    यह भड्डरी जोशी डाकोत जाति विमुकत घुमंतू जनजाति में आते हैं और अठारह राज्यों में इन्हें पिछड़ा वर्ग में सरकार ने रखाहै।

    भड्डर ऋषि

    भड्डर ऋषि भ्रुगुवंशी ऋषि के वंशज ।

    भारतीय संस्कृति में ज्योतिष का बड़ा महत्व रहा है। ज्योतिष ज्ञान से नक्षत्र विज्ञान की उत्पति हुई है। ज्योतिष में ग्रहों व नक्षत्रों की सटीक गणना की पद्धति का विज्ञान भृगु ऋ़षि ने दिया था, जो भृगुसंहिता में दर्ज है। ब्राह्मणों में भृगु ऋषि के वशंज जोशी भड्डरी जाति, जो ज्योतिष विज्ञान के प्राकाण्ड विद्वान हैं और ये जनमानस में बिना किसी पूर्वाग्रह के ज्योतिष ज्ञान, ग्रह नक्षत्र, हिंदू रीति रिवाज से कर्म का प्रतिपादन करते रहे हैं। ज्योतिष कर्म व पुरोहिती के माध्यम से जन का कल्याण कलांतर से करते आये हैं। भृगु महाऋ़षि के वंशज में भड्डरी महाऋ़षि ने भड्डर संहिता की रचना की, जो ज्योतिष ग्रंथ है।
    भड्डरी वंश शनि का दान लेना, प्रेतबाधा का निवारण, ज्योतिष नक्षत्र का ज्ञान यजमानों को देते रहे हैं व उनकी समस्याओं का हल करते रहे हैं। कालांतर से भारत के अनेकों क्षेत्रों में भ्रमण करते हुए आदिवासी क्षेत्रों में भड्डरी जोशी ब्राह्मण, वहां के आदिवासियों को चेला बनाते थे और उनको सही दिशा दिखाते थे। भड्डरी जोशी कलांतर से इसी जीविका से जुड़े रहे हैं। दान—पुण्य पर जिंदा रहने वाले भृगुवंशीय भड्डरी के मन में समाज सेवा का भाव रहा है। जन कल्याण और हिंदू धर्म के अन्य जातियों के साथ भाईचारे की भावना से जुड़े रहे हैं। लेकिन समय के साथ खुद को आधुनिक शिक्षा और तकनीक से जोड़ नहीं पाए, इसीलिए सामाजिक चेतना में पिछड़ने लगे। परंपरा से चली आ रही पुरोहिती धीरे—धीरे कम होने लगी, इस कारण से इनके लिए रोजी—रोटी की समस्या उत्पन्न होने लगी। ​बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से गंगा या दूसरी नदियों के किनारे मल्लाह नौका विहार जैसे अपनी पुस्तैनी काम से उन्हें कोई खास आमदनी नहीं होती हैं, इस वजह से उनके लिए रोजी रोजगार की समस्या के साथ ही वे आधुनिक शिक्षा से भी पिछड़ते गए उन्हें आरक्षण दिया गया ताकी आधुनिक कसमाज की मुख्यधार में जुडत्र सके। इसी तरह ब्राह्मणों में भड्डरी जाति भी उपेक्षित रही है। आजादी के 68 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ये आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं। जोशी भड्डरी उत्तर प्रदेश में शर्मा, जोशी, पाण्डेय इत्यादि टाईटिल यानी सरनेम रखते हैं। वहीं आज आधुनिक शिक्षा से वंचित होने के कारण समाज की मुख्यधारा से कट गए हैं।
    भड्डरी भारत के अन्य राज्यों में डकोत नाम से भी जाने जाते हैं। मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली राज्यों की सरकार इन्हें आरक्षण दे रही है, इस वजह से इनमें आर्थिक व सामाजिक सुधार भी हो रहा है।
    लखनउ या रायबरेली जाये तो यहां पर जोशी टोला नाम से जोशी भड्डरी की कई बस्तियां हैं। यहां पर इस समाज के 95 प्रतिशत लोग बहुत गरीबी में रहते हैं। बीड़ी बनाने जैसा छोटा—मोटा काम करके ये अपनी जीविका चलाते हैं। शहरों में बसी इनकी ये बस्तियां इनकी हकीकत बयां करती है। एक—एक कमरे में दर्जनों लोग रहते हैं। न इनके पास कोई खेती है और न ही इनके पास इतना बड़ा मकान है कि किरायेदार भी रख सके, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ के डालीगंज और हैदरगंज में जोशीटोला बस्ती में अधिकांश लोग भड्डर ब्राह्मण रहते हैं। यहां ये छोटा—मोटा रोजगार धंधा करते हैं। इससे बदतर हालात रायबरेली में जोशियाना का पुल नाम की बस्ती का है। बहते हुए गंदे नाले के आस—पास बसी इनकी बस्ती है, यहां पर पुरखों के जमाने से रहते आ रहे हैं। यहां पर 90 प्रतिशत जोशी भड्डरी अशिक्षित है या बहुत कम पढ़े लिखे हैं। रोजगार का कोई साधन नहीं है, और न ही अपना रोजगार करने के लिए पैसा है। आरक्षण न मिलने के कारण ये सामान्य जाति लोगों के लिए सम्मान भरी जिंदगी व सरकारी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की मांग कर रही है। वहीं पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली वगैरह में राज्य सरकारें सरकारी नौकरी व शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दे रही है।

    भङ्डर ऋषि

    घाध भड्डर ऋषि के वंशज थे ।उन्होने भड़डर श्रृषि के संस्कृत चाषा मं उपलब्ध ज्ञान को लोक भाषा में प्रस्तुत विया।

    भङ्डर ऋषि

    घाध भड्डर ऋषि के वंशज थे ।उन्होने भड़डर श्रृषि के संस्कृत चाषा मं उपलब्ध ज्ञान को लोक भाषा में प्रस्तुत विया।

    भड्डर ऋषि

    घाघ का पूरा नाम घाछ भड्डरी था वे भृगुवंशी भङ्डर ऋषि के वंशज थे । उन्होने भङ्डर ऋषि के कृषि संवंधित शलोको का लोक भाषा में अनुवाद पतुत किया और भङ्डर का है यही विचार आदि कहते हुए ।उन्होंने अपने नाम से भी कहावतें कहीं।

    भोजपुरी भाषा में घाघ की कहावतें

    हमें घाघ कवि की कहावतें जो बारहो मास में "क्या खाना और क्या नहीं खाना चाहिये" पर भोजपुरी भाषा में कही गयी कहावतें मुझे बहुत ही पसंद है।

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