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जल के गुण-दोष

Author: 
महेश कुमार मिश्र ‘मधुकर’
‘गरुड़-पुराण’ आचार काण्ड के अनुसार ‘जल’ में निम्नलिखित गुण/दोष पाये जाते हैः

- वर्षा का जल तीनों दोषों (वात-पित्त-कफ) का नाशक, लघु स्वादिष्ट तथा विषापहारक है।
- नदी का जल वातवर्धक, रुक्ष, सरस, मधुर और लघु होता है।
- वापी का जल वात-कफ विनाशक होता है।
- झरने का जल रुचिकर, अग्निदीपक, रुक्ष कफनाशक और लधु होता है।
- कुएँ का जल अग्निदीपक, पित्तवर्धक तथा
- उदिभज (पाताल तोड़ कुआँ) का जल पित्त विनाशक है। यह जल दिन में सूर्य किरण और रात्रि में चन्द्र किरण से सम्पृक्त होकर सभी दोषों से विमुक्त हो जाता है। इसकी तुलना तो आकाश से गिरने वाले जल से ही की जा सकती है।
- गरम जल ज्वर, मेदा-दोष तथा वात और कफ विनाशक है। जल को ठण्डा करने के बाद वह प्राणी के वात-पित्त तथा कफ इन तीनों दोषों का विनाश करता है। किन्तु ‘बासी’ हो जाने पर वहीं जल दोषयुक्त हो जाता है।

कौन-सा जल शुद्ध होता है और कौन-सा अशुद्ध इसके लक्षण ‘स्मृति-ग्रन्थों’ (धर्मशास्त्रों) में निम्न प्रकार से दिए हुए हैः-

शुचि गोतृप्तिकृतोयं प्रकृतिस्थं महीगतम्।
चर्मभाण्डस्थ धाराभिस्तथा यन्त्रोद्धृतं जलम्।।234।।

अर्थात्-जिस जल से गौ की तृप्ति हो सके, वह पृथ्वी पर रखा हुआ निर्मल जल, चर्मपात्र से लगाई हुई धारा का जल और यन्त्र से निकाला हुआ जल – ये सब पवित्र है।

अदुष्टाः सततं धारा वातोद्धूताश्च रेणवः।।239।।

अर्थात्- आकाश से गिरी हुई जलधारा और हवा से उड़ायी हुई धूल – ये सदैव पवित्र होती हैं।

गृहाद्दशगुणं कूपं, कूपाद्दशगुणं तटम्।
तटाद् दशगुणं नद्यां, गंगा संख्या न विद्यते।।390।।

अर्थात्- घर के स्नान की अपेक्षा कुएँ का स्नान दशगुणा फल देता है। कुएँ से दशगुणा फल ‘तट’ (तालाब) में स्नान करने से मिलता है। तट से दशगुणा फल नदी स्नान से मिलता है और गंगा में स्नान करने के फल की तो कोई गिनती ही नहीं है।

स्रवद्यद् ब्राह्मणं तोयं,रहस्यं क्षत्रियं तथा।
वापी कूपे तु वैश्यस्य, शौद्रं भाण्डोदकं तथा।।391।।

अर्थात्- स्रोत (झरने) का जल ‘सर्वश्रेष्ठ’ सरोवर का जल ‘उससे कम श्रेष्ठ’, वापी कूप काजल ‘श्रेष्ठ’ और बर्तन में रखा हुआ जल ‘निकृष्ट’ होता है।

नद्यां तु विद्यमानायां न स्नायादन्य वारिणि।
न स्नायादल्प तोयेषु, विद्यमाने बहूदके।।25।।

सरिद्वरं नदीस्नानं प्रतिस्रोतः स्थितश्चरेत्।
तडागादिषु तोयेषु, स्नायाच्च तदभावतः।।26।।

अर्थात्- नदी के होते हुए इतर जल में स्नान न करें। अधिक जल वाले तीर्थ के होते हुए अल्प जल वाले कूपादि में स्नान न करें। समुद्रवाहिनी नदी में स्रोत के सम्मुख होकर स्नान करें। यदि नदी आदि का अभाव हो तब तालाब आदि के जल में स्नान करना चाहिए।

- हारीत स्मृति

दिवा सूर्यांशुभिस्तप्तं, रात्रौ नक्षत्र मारुतैः।
संध्ययोरप्युभाभ्यां च, पवित्रं सर्वदा जलम् ।।94।।

अर्थात्-दिन में सूर्य की किरणों से तपा हुआ, रात्रि में नक्षत्र और पवन से तथा संध्या के समय इन दोनों से ‘जल’ सदा पवित्र रहता है।

-यम स्मृति

न दुष्येत् संतता धारा, वातोद्धूताश्च रेणवः।
स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च न दुष्यन्ति कदाचन।।

-आपस्तंब स्मृति2/3

अर्थात्- निरंतर बहती हुई जलधारा, पवन द्वारा उड़ायी हुई रेणु, स्त्रियाँ, वृद्ध तथा बालक – ये कभी दूषित नहीं होते।

भासद्वयं श्रावणादि सर्वा नद्यो रजस्वलाः।
तासु स्नानं न कुर्वीत, वर्जयित्वा समुद्रगाः।।5।।

अर्थात्- श्रावण और भाद्रपद, इन दो मासों में नदियाँ ‘रजस्वला’ हो जाती हैं। अतः समुद्र गामिनी नदियों को छोड़कर, शेष किसी भी नदी में इन दो मासो में स्नान न करें।

धनुः सहस्त्राण्यष्टौ तु गतिर्यासां न विद्यते।
न ता नदी शब्द वहा गर्तास्ताः परिकीर्तिताः।।6।।

अर्थात्- जो नदियाँ आठ हजार धनु की दूरी तक नहीं जातीं (बहती), वे नदी शब्द से नहीं बहतीं, इस कारण उन्हें नदी नहीं ‘गर्त’ या गड्ढा कहते हैं।

-कात्यायन स्मृति 10/5-6

उपाकर्मणि चोत्सर्गे प्रेतस्नाने तथैव च ।
चन्द्र सूर्यग्रहे चैव, रजदोषो न विद्यते।।7।।

अर्थात्- उपाकर्म और उत्सर्ग (श्रावणी कर्म) प्रेत के निमित्त (दाह संस्कार के बाद या प्रेत क्रिया के अंतर्गत) चन्द्रमा या सूर्य के ग्रहण काल में नदियों का ‘रजस्वला दोष’ नहीं माना जाता इन परिस्थितियों में नदी स्नान वर्जित नहीं है।

उपाकर्मणि चोत्सर्गे स्नानार्थ ब्रह्मवादिनः।
पिपासू ननु गच्छंति संतुष्टाः स्वशरीरिणः।।8।।

वेदाश्छन्दांसि सर्वाणि ब्रह्माद्याश्च दिवौकसः।
जलार्थिनोSथ पितरो, मरीच्याद्यास्तथर्षयः।।9।।

समागमस्तु तत्रैषां तत्र हत्यादयो मलाः।
नूनं सर्वे क्षयं यन्ति किमुतैकं नदीरजः।।10।।

अर्थात्- उपाकर्म और उत्सर्ग में ब्रह्मवादी जन,पितृगण और मरीचि इत्यादि ऋषिगण वेद, सम्पूर्ण छन्द, ब्रह्मादि देवता इत्यादि उपस्थित रहते हैं। इस समागम से हत्या जैसे पाप धुल जाते हैं। तब फिर नदियों का रजस्वला दोष, क्यों न नष्ट हो जायेगा? अर्थात् उपाकर्म और प्रेत कार्य में नदियों का ‘रजदोष’ नहीं मानना चाहिए।

-कात्यायन स्मृति10/5-6-7-8-9-10

स्वर्धुन्यंभः समानिस्युः सर्वाण्यंभांसि भूतले।
कूपस्थान्यपि सोमार्क ग्रहणे नात्र संशयः।।14।।

अर्थात्- चन्द्र-सूर्य के ग्रहण काल में सम्पूर्ण पृथ्वी के कुओं का जल गंगाजल के समान पवित्र हो जाता है।

-कात्यायन स्मृति- 10/14

भूमिस्थमुदकं शुद्धं शुचि तोयं शिलागतम्।।12।।
वर्ण गन्ध रसैर्दुषटैर्वर्जितं यदि तदभवेत्।।
शुद्धं नदी गतं तोयं सर्व दैव सुखाकरम्।।13।।

अर्थात्- पृथ्वी और चट्टान में संचित जल शुद्ध होता है। यदि जल रंगहीन, गंधहीन तथा अन्य दोषों से रहित हो तो नदी और आकर (खदान) का जल भी शुद्ध होता है।

-शंख स्मृति, अ.-16/12-13

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