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नर्मदा

अमरकण्टक का कोटि तीर्थ कुंडअमरकण्टक का कोटि तीर्थ कुंड नर्मदा हमारी प्राचीन संस्कृति की ही नैहर नहीं है, बल्कि वह दक्षीण भारत और उत्तर भारत, द्रविड़ संस्कृति और आर्य संस्कृति को जोड़नेवाली एक कड़ी भी है। यही नहीं, हमारे आदिवासी भाइयों की संस्कृति भी इसी के आसपास विकसित हुई है। उन्होंने हजारों साल तक इसके तट पर राज्य किया है और जगह-जगह पर अपने दुर्ग खड़े किये हैं, जिनके खंडहर अब भी उनके पुराने वैभव की याद दिलाते हैं।

नर्म का अर्थ है ‘क्रीडा’। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बड़े तैराक भी इसके जल में आनंदपूर्वक क्रीडा कर सकते हैं, इसलिए इसे ‘नर्मदा’ कहते है। और यह उछलती-कूदती, छलांगें मारती रेव जाती है, इसलिए इसका नाम ‘रेवा’ भी है।

नर्मदा अमरकण्टक से निकलती है। सोहागपुर तहसील में विन्ध्य और सतपुड़ा पहाड़ों में अमरकण्टक नाम का एक छोटा सा गांव है। उसी के पास से नर्मदा एक गोमुख से निकलती है।

यहां पर एक छोटा सा कुंड बना दिया गया है। और आसपास कई छोटे-बड़े मंदिर खड़े कर दिये गए हैं। कहते हैं, किसी जमाने में यहां पर मेकल, व्यास, भृगु और कपिल आदि ऋषियों ने ओर स्वयं भगवान शंकर ने तपस्या की थी। यह स्थान समुद्र की सतह से कोई तीन हजार फुट से अधिक ऊंचा है।

अमरकण्टक से निकलकर नर्मदा विन्ध्य और सतपुड़ा के बीच से होकर भड़ोंच के पास खम्भात की खाड़ी में अरब सागर से जा मिलती है। अमरकण्टक से भड़ोंच तक नर्मदा को कोई तेरह सौ कि.मी. की यात्रा करनी पड़ती है। परिक्रमा करनेवालों के लिए यह लंबाई दोनों तरफ मिलकर लगभग तीन हजार कि.मी. से अधिक हो जाती है। बीच में कोई चार सौ छोटे बड़े गांव दोनों तटों पर मिलाकर पड़ते हैं।

लोगों की राय है कि भारत की सबसे पुरानी संस्कृति का विकास नर्मदा के किनारे पर ही हुआ। कहते हैं, सारा संसार जब जल में मग्न हो गया, तब जो स्थान बचा था, वह था मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम। यह आश्रम नर्मदा के तट पर ऊंकारेश्वर में है। इसके अलावा मौजूदा महेश्वर के आसपास जो खुदाई हुई है, उसमें पाई गई हजारों वर्ष पुरानी चीजें भी इस बात को सिद्ध करती हैं।

नर्मदा के किनारे बहुत से स्थानों पर सुगंधित भस्म के टीले आज भी पाये जाते हैं। इससे यह अनुमान किया जाता है कि यहां बहुत से यज्ञ हुए थे, जिनका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है।

नर्मदा एक पहाड़ी नदी है। कई स्थानों पर इसकी धारा बड़ी ऊंचाई से गिरती है। उसके पाट के बीच में भी अनेक स्थानों पर बड़ी-बड़ी चट्टाने आ गई हैं, जिनसे उसकी गहराई कम हो गई है। इस कारण नदी में नावें नहीं चल सकती। इसी तरह उसका प्रवाह बहुत नीचा होने और आसपास का प्रदेश पहाड़ी होने के कारण इसके पानी से सिंचाई का काम भी नहीं लिया जा सकता।

नर्मदा का उदगम होने से अमरकण्टक का एक बड़ी तीर्थ है। गांव बहुत छोटा है। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई की बनवाई एक बड़ी धर्मशाला यहां है। चारों ओर बियाबान जंगल है, जिसमें जानवरों का डर सदा बना रहता है। पछवा हवा जोर से चलती रहती है। जाड़े के दिनों में कंडक बहुत रहती है। लगभग 3000 फुट से भी अधिक की ऊंचाई पर होने के कारण गरमी के दिनों में बड़ा आनंद रहता है।

नर्मदा जहां से निकलती है, वहां एक छोटा सा कुण्ड बना हुआ है। कहते हैं, नागपुर के किसी भोंसले राजा ने इसे बनवाया था। कुण्ड के चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं। इसके आसपास बने हुए मंदिरों में दो नर्मदा के, दो गौरी शंकर के, एक श्रीरामचंद्र का, एक मुरली-मनोहर का और दूसरे कई देवी-देवताओं के हैं।

अमरकण्टक में हर साल महाशिवरात्रि पर मेला लगता है। उस समय हजारों यात्री आते हें, कुण्ड में स्नान करते हैं और शंकर की तथा नर्मदा की पूजा करते हैं। यहां पर पर्वत बहुत ही रमणीय है। जड़ी-बूटियों और फूल-फलों का भण्डार है।

यहीं से नर्मदा की पावन यात्रा प्रारंभ होती है। सबसे पहला महत्व का स्थान आता है मंडला, जो अमरकण्टक से कोई 295 कि.मी. की दूरी पर नर्मदा के उत्तरी तट पर बसा है। यहां पर नर्मदा का दृश्य बहुत सुन्दर है। तीर पर सुन्दर घाट बने हुए हैं और उनके ऊपर कई मंदिर।

नर्मदा के किनारे एक पुराना किला है, जिसे गढ़-मण्डला के राजा नरेन्द्र शाह ने सन 1680 के आसपास बनवाया था और मण्डला को अपनी राजधानी बना दिया था। किला अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। उसके अंदर राजेश्वरी का मन्दिर है, जिसमें दूसरे देवताओं के साथ एक मूर्ति सहस्रार्जुन की है। कुछ लोगों का कहना है कि यह मण्डला ही प्राचीन माहिष्मती है और भगवान शंकराचार्य का मण्डन मिश्र से यहीं पर शास्त्रार्थ हुआ था, परन्तु इस विषय में सब एक राय नहीं हैं।

मण्डला के पास पहाड़ियां हैं, जिनके कारण नर्मदा की धारा सैकड़ों छोटी-छोटी धाराओं में बंट गई है। इसलिए इस स्थान का नाम ‘सहस्रधारा’ हो गया है। कहते हैं, यहां पर राजा सहस्रबाहु ने अपनी हजार भुजाओं से नर्मदा के प्रवाह को रोकने का प्रयत्न किया था। सहस्रधारा का दृश्य बहुत सुन्दर है।

मण्डला के बाद दूसरा सुन्दर स्थान है भेड़ा-घाट ।

माहिष्मति का अहिलेश्वर मंदिरमाहिष्मति का अहिलेश्वर मंदिर यह जबलपुर से 19 कि.मी. पर है। वहां तक पक्की सड़क है। जबलपुर से इटारसी जानेवाली रेलवे लाइन पर इसी नाम का रेलवे स्टेशन है। वहां से यह स्थान साढ़े चार कि.मी. पड़ता है। किसी जमाने में भृगु ऋषि ने यहां पर तप किया था। उत्तर की ओर से वामन गंगा नाम की एक छोटी नदी नर्मदा में मिलती है। इस संगम (भेड़ा) के कारण ही इस स्थान को ‘भेड़ा-घाट’ कहते हैं।

भेड़ा-घाट से थोड़ी दूर पर नर्मदा का एक प्रपात है। इसे ‘धुआंधार’ कहते हैं। यहां नर्मदा की धारा कोई 40 फुट ऊपर से बड़ी तेजी से नीचे गिरती है। जल के कण दूर से धुएं के समान दीखते हैं। इसी से इसे ‘धुआंधार’ कहते हैं।

धुआंधार के बाद साढ़े तीन कि.मी. तक नर्मदा का प्रवाह सफेद संगमरमर की चट्रानों के बीच से गुजरता है। दोनों ओर सौ-सौ फुट से भी अधिक ऊंची सफेद दीवारें खड़ी हैं और इठलाती हुई नर्मदा उनके बीच से होकर निकलती है। चांदनी रात में यह दृश्य बड़ा ही आकर्षक लगता है। एक जगह पर तो ये चट्रटाने इतनी पास आ जाती हैं कि बन्दर बड़ी आसानी से इधर से उधर कूद सकते हैं। इसलिए इस जगह को ‘बन्दर-कूदनी’ कहते हैं। हमारे देश के बहुत ही सुन्दर स्थानों में से यह एक है।

भेड़ा-घाट में एक छोटी सी पहाड़ी पर गौरीशंकर मंदिर है। इसे ‘चौसठ योगिनियों का मंदिर’ भी कहते हैं। इस पहाड़ी के दोनों ओर नर्मदा बहती है। त्रिपुरी के महाराज कर्ण देव की महारानी अल्हणा देवी ने सन 1955-56 में यहीं मंदिर बनवाया था। अब उसकी हालत अच्छी नहीं है। योगिनियों की मूर्तियां भी खंडित हैं।

भेड़ा-घाट के बाद दूसरे सुन्दर स्थान हैं- ब्रहाण घाट, रामघाट, सूर्यकुंड और होशंगाबाद। ब्राहाण-घाट से थोड़ी दूर पर नर्मदा की दो धारांए हो गई हैं। वहां बीच में एक छोटा सा द्वीप बन गया है, जिसकी शोभा देखती ही बनती है। कुछ आगे जाकर धारा एक छोटी सी पहाड़ी पर से गिरती है और वहां कई धाराओं में बंट जाती है। इसी कारण इस स्थान को ‘सप्त धारा’ कहते हैं। इन धाराओं के नीचे बहुत बड़े-बड़े और गहरे कुंड बन गये हैं। इनके नाम भीम, अर्जुन और ब्रहादेव आदि के नाम पर पड़ गये हैं। कहते हैं, ब्रहादेव ने यहां यज्ञ किया था।

यहां से कुछ दूरी पर नर्मदा के दक्षीण तट पर रानी दुर्गावती का बनवाया हुआ विशाल घाट और एक शिव मंदिर है। इसी के पास अपने दोनों दांतों पर पृथ्वी को धारण किये वराह भगवान की एक मूर्ति है। सांडिया में शांडिल्य ऋषि ने अपनी पत्नी सहित वर्षो तक तप किया था। कई बड़े-बड़े यज्ञ किये थे। सांडिया से साढ़े आठ कि.मी. आगे नर्मदा के दक्षीणी तट पर माछा ग्राम के पास कुब्जा नदी का संगम है।

इसे ‘रामघाट’ कहते हैं। अयोध्या के राजा रंतिदेव ने प्राचीन काल में यहां पर महान बिल्व-यज्ञ किया था। इस यज्ञ से एक विशाल ज्योति प्रकट हुई थी। तब से इसका नाम ‘बिल्वाम्रक तीर्थ’ हो गया।

कुछ दूरी पर सूर्य कुंड तीर्थ है। कहा जाता है कि यहां भगवान सूर्य नारायण ने अंधकासुर को मारा था।

बांदरा भान में तबा नाम की नदी नर्मदा में मिलती है। यहां पर प्रयाग के त्रिवेणी संगम की याद आ जाती है। कहा जाता है, जहां राजा वैश वानर ने तप किया था। बांदरा भान ने नौ कि.मी. पर दक्षीण तट पर होशंगाबाद नगर है। कहते हैं, मालवा के सुलतान होशंगशाह ने इसे बसाया था। यहां पहले जो गांव था, उसका नाम ‘नर्मदापुर’ था। यहां पर सुन्दर पक्के घाट बने हैं। पास में एक धर्मशाला और नर्मदा का मंदिर है।

इसके बाद मेल घाट सांडिया और नेमावर के पास पहुंच जाते हैं। मेल घाट जामनेर नदी के संगम पर है। यहां आत्माराम बाबा नामक एक संत पुरुष की समाधि है। उनकी पुण्यतिथि पर यहां हर साल मेला लगता है।

नेमावर में सिद्धेश्वर महादेव का एक सुन्दर प्राचीन मन्दिर है। कला का यह एक देखने योग्य नमूना है। नेमावर नर्मदा की यात्रा का बीच का पड़ाव है। इसलिए इसे ‘नाभि स्थान’ भी कहते हैं। यहां से भड़ोंच और अमरकण्टक समान दूरी पर है।

नेमावर और ॐकारेश्वर के बीच धायड़ी कुण्ड नर्मदा का सबसे बड़ा जल-प्रपात है। 50 फुट की ऊंचाई से यहां नर्मदा का जल एक कुण्ड में गिरता है। जल के साथ-साथ इस कुण्ड में छोटे-बड़े पत्थर भी गिरते रहते हैं। वे घुट-घुटकर सुन्दर, चिकने, चमकीले शिवलिंग बन जाते हैं। सारे देश में शंकर के जितने भी मन्दिर बनते हैं, उनके लिए शिवलिंग अक्सर यहीं से जाते हैं। मध्य रेलवे के बीच स्टेशन से यह स्थान कोई 20 मील है। यहीं पुनासा की जल विद्युत-योजना का बांध तबा नदी पर बना है।

अब हम नर्मदा के तट पर बसे ऊंकारेश्वर नामक स्थान पर आ पहुंचे, जो प्राकृतिक सौंदर्य, इतिहास और साधना की दृष्टि से रेवा-तीर पर सबसे महान और पवित्र माना जाता है। यह पश्चिम रेलवे की छोटी लाइन पर इन्दौर और खंडवा के बीच ऊंकारेश्वर-रोड नामक रेलवे स्टेशन से 11 कि.मी. पर है। पक्की डामर की सड़क है। इन्दौर, खण्डवा, ऊंकारेश्वर-रोड और सनावद से रोज मोटरें जाती हैं।

ऊंकारेश्वर एक प्राचीन तीर्थ है। यहां नर्मदा के बीच में एक टापू है, या यों कहिये कि एक विशाल ऊंची पहाड़ी है, जिसके दोनों ओर से नर्मदा की धाराएं बहती हैं। टेकड़ी के दक्षीणी ढाल पर ऊंकारेश्वर का मन्दिर है। दक्षीणवाली धारा के दोनों ओर बगस्ती है। दक्षीण वाली बस्ती का नाम है। ‘विष्णुपुरी’ और उत्तरवाली बस्ती का नाम है ‘शव-पुरी’। यह द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक है। दक्षीण तट पर अमरेश्वर का सुन्दर मन्दिर है। मन्दिर अति प्राचीन है। नीचे एक धारा दक्षीण से आकर नर्मदा में एक गोमुख से होकर गिरती है। इसे ‘कपिल धारा संगम’ कहते हैं। कपिल-धारा के पूर्व में भी कुछ बस्ती है। उसका नाम ब्रहापुरी है।

विष्णुपुरी के पश्चिम में कुछ दूरी पर मार्कण्डेयशिला नाम की चट्रटान है। श्रद्धालु यात्री इस पर आकर लेटते हैं। उनका विचार है कि ऐसा करने से यमपुर की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है। इसी के समीप पहाड़ी पर मार्कण्डेय ऋषि का मन्दिर है और पास में श्री मामानंद चैतन्य का आश्रम है। विष्णुपुरी से शिवपुरी तक नाव से जाते हैं। शिवपुरी में एक पक्के घाट के पास जाकर नाव लगती है। इसे ‘कोटि-तीर्थ’ अथवा ‘चक्र-तीर्थ’ कहते हैं। इस घाट ऊपर ही पहाड़ी की ढाल पर ऊंकारेश्वर का मन्दिर है। टापू को ‘मान्धाता’ कहते हैं। कहा जाता है कि ईक्ष्वाकु वंश के प्रतापी महाराज मांधाता ने यहां भगवान शंकर की आराधना की थी। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान ने यह स्वीकार किया था कि वह भक्तों के कल्याण के लिए सदा यहां निवास करेंगे। ऊंकारेश्वर की स्थापना तभी से हुई है। एक और भी चमत्कार भरी बात है। इस पहाड़ी का आकार ॐ जैसा है।

पहाड़ी बड़ी रमणीक है। इस पर कई मन्दिर और पवित्र स्थान है। पहाड़ी के ऊपर विशाल मैदान है, जहां से आसपास दूर-दूर तक का प्रदेश बड़ा ही मनोरम दिखाई देता है। जान पड़ता है कि यहां पहले अच्छी बस्ती थी, जिसके चारों ओर दीवार थी। दीवार के कुछ खंडहर और दरवाजे के कुछ खंडहर और दरवाजे अभी तक बचे हुए हैं। अन्दर वाले दरवाजे के पास अष्टभुजा देवी का तथा दूसरे स्थानों पर बहुत ही विशाल सुन्दर मूर्तियां अब भी खड़ी हैं। मैदान के पूर्ववाले भाग में एक बड़ा मन्दिर था, जिसके खंडहरों के रुप में कुछ खम्भे, ओटला, गर्भगृह और छत के कुछ हिस्से ही अब बचे हैं। मन्दिर की छत लगभग पन्द्रह फुट ऊंची होगी और ओटला दस फुट। ओटले के चारों तरफ पांच-पांच फुट ऊंचे सुडौल हाथियों की कतार खुदी हुई है। इनको देखकर कल्पना हो सकती है कि मन्दिर और यह सारी बस्ती जब कभी अपने पूर्ण वैभव में रहे होंगे, कितने वैभवशाली होंगे। इस मन्दिर से कुछ दूरी पर दूसरी धारा के, जिसका नाम कावेरी है, उत्तर तट पर प्रसिद्ध जैनतीर्थ सिद्धवर कूट है। ॐकारेश्वर और अमरेश्वर का यह पुण्य धाम जाने कितने योगियों और ऋषियों का सिद्ध क्षेत्र रहा है। इस टापू में और आसपास कहीं भी चले जाइये, किसी न किसी महापुरुष या ऋषि का नाम उसके साथ जुड़ा हुआ मिलेगा। शंकराचार्य, उनके गुरु गोविन्द पादाचार्य और उनके भी गुरु गौड पादाचार्य यही रहे थे। उनके बाद भी आज तक यह सिद्धों और तपस्वियों का आश्रम स्थान रहा है।

ॐकारेश्वर में वर्ष में दो बार बड़े मेले लगते हैं कीर्तिकी पूर्णिमा पर और महाशिवरात्रि पर। कार्तिकी पूर्णिमा का मेला खास बड़ा होता है।

ॐकारेश्वर के आसपास दोनों तीरों पर बड़ा घना वन है, जिसे ‘सीता का वन’ कहते हैं। लोगों का कहना है कि वाल्मीकि ऋषि का आश्रम यहीं कहीं था।

ॐकारेश्वर से महेश्वर कोई 64 कि.मी. है। इसके बीच दो-तीन स्थान उल्लेखनीय हैं। सबसे पहले रावेट आता है। यहां नर्मदा का पाट इतना उथला है कि आदमी पैरों चलकर उसे पार कर सकता है। किसी जमाने में फौंजें यहीं से नर्मदा को पार करती थी। पेशवाओं की सेनाएं इधर से ही गुजरती थीं। परम प्रतापी पेशवा बाजीराव का उत्तर की यात्रा करते हुए यहीं देहांत हुआ था। रावेट में उनकी समाधि है।

इसके पड़ोस में ससाबरड नामक एक स्थान में रेणुका माता का मन्दिर है। कहते हैं, परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि ऋषि की आज्ञा से अपनी माता का सिर यहीं काटा था और फिर पिता से वरदान लेकर उन्हें जिला भी दिया था।

इसके बाद महेश्वर से पहले नर्मदा के उत्तर तट पर एक कस्बा है मंडलेश्वर।

अनेक विद्धानों का मत है कि मंडन मिश्र का असली स्थान यही है और महेश्वर प्राचीन माहिष्मती है। मण्डलेश्वर से महेश्वर लगभग ८ कि.मी. है। संभव है, माहिष्मती का फैलाव पुराने जमाने में यहां तक रहा हो। भगवान शंकराचार्य अपनी दिग्विजय-यात्रा में जिस रास्ते से आये, उसका वर्णन‘शांकर-दिग्विजय’ में है। यह वर्णन महेश्वर और मण्डलेश्वर की स्थिति से और आसपास के प्रदेश से मिलता है। मण्डलेश्वर में एक पुराना मन्दिर है, जिसमें मण्डन मिश्र, भारती और शंकराचार्य की मूर्तियां हैं, परन्तु इनके नाम दूसरे हैं। भारती का नाम ‘सरस्वती’ है और जिसे शंकराचार्य की मूर्ति बताया जाता है, उसे वहां ‘कार्तिकेय स्वामी’ कहा जाता है परन्तु ये दोनों कार्तिकेय स्वामी और सरस्वती शंकर के मन्दिर में कहीं नहीं देखे गये। इससे साफ है कि वास्तव में यह मण्डन मिश्र का ही स्थान है। मन्दिर का वर्णन भी ‘शांकर-दिग्विजय’ के वर्णन से मिलता जुलता है।

इन्दुमती के स्वयंवर के लिए आये हुए अनेक राजाओं में अनूप देश के राजा, माहिष्मती के अधिपति का उल्लेख कालिदास ने ‘रघुवंश’ में किया है। उसमें इन्दुमती की सखी सुनन्दा कहती है, अपने महल की खिड़की में बैठकर रेवा को देखने का आनंद उठाना हो “प्रासाद जालैजैलवेणु रम्याम रेवां मदिप्रेक्षुतु मस्तिकाम:” तो अनूप देश के इस सकल गुणों से विभूषित अनूप देशस्य गुणैरनूनम नरेश को वर लो। महेश्वर से यह वर्णन पूरी तरह मिलता है।

आधुनिक इतिहास में भी महेश्वर का अपना स्थान है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर का नाम सारे देश में विख्यात है। महेश्वर इनकी राजधानी थी। उनके समय से लेकर अबतक यह वस्त्र-कला का एक सुन्दर केन्द्र रहा है। महेश्वर में किला, मन्दिर, अहिल्याबाई का महल, उनकी छत्री और घाट देखने योग्य हैं। घाटों को देखकर तो काशी की याद आ जाती है। सन 1948 में महात्मा गांधी की अस्थियां यहां नर्मदा में विसर्जित की गई थीं।

महेश्वर के सामने नर्मदा के उस पार एक छोटा सा गांव है, जिसका नाम नावड़ाटवड़ी है। ‘वायु पुराण’ में इसे स्वर्ग-द्वीप तीर्थ कहा गया है। यहां शलिवाहन का मन्दिर है। दक्षिण के शालिवाहन या सातवाहन राजाओं ने मिट्रटी में से सिपाही पैदा करके यवनों को नर्मदा पार खदेड़ दिया था। इसलिए नर्मदा के दक्षीण में शालिवाहनशक माना जाता है। अब तो भारत सरकार ने इसे सारे देश के लिए जारी कर दिया है। उसमें तिथि गणना का क्रम कुछ बदल दिया गया है।

महेश्वर से पश्चिम में सहस्रधारा जल-प्रपात है। यहां नर्मदा के बीच में चट्रटानें आ गई हैं, जिनके बीच से गुजरते हुए वहां सैकड़ों छोटी बड़ी धाराएं बन गई हैं। इसका कलकल निनाद दूर-दूर तक सुनाई देता है। इन चट्रटानों के कारण महेश्वर के पास एक कुंड सा बन गया है, जहां अथाह जल भरा रहता है।

महेश्वर से कोई 19 कि.मी. पर खलघाट है। बम्बई-आगरा सड़क यहीं से नर्मदा को एक पुल पर से होकर पार करती है। कहते हैं, प्राचीन काल में ब्राहाजी ने यहां तप किया था। इस स्थान को ‘कपिला तीर्थ’ भी कहते हैं।

कपिला तीर्थ से 12 कि.मी. पश्चिम में धर्मपुरी है। “स्कंद-पुराण” और ‘वायु पुराण’ में इसे महर्षि दधीचि का आश्रम बताया गया है। वृत्रासुर के वध के लिए इन्द्र ने उनसे हडडियों की मांग की थी और महर्षि ने प्रसन्नता के साथ दे दी थीं। उनसे वज्र बनाकर इन्द्र ने वृत्रासुर को मारा था।

धर्मपुरी के पास नर्मदा में एक छोटा सा टापू बन गया है, जहां शंकर का एक सुन्दर मन्दिर है। यहीं नागेश्वर नामक एक स्थान है, जहां पर मालवा के सुलतान बाजबहादुर की प्रेयसी भानुमती के गुरु रहते थे। भानुमती नर्मदा की बड़ी भक्त थी और संगीत में बहुत ही निपुण भी। नर्मदा के तीर पर वह जहां-तहां बैठ जाती और मधुर कण्ठ से गीत गाती भानुमती बहुत ही रुपवती थी। एक बार सुलतान के कानों में उसके संगीत की ध्वनि पड़ गई। वह उस पर गुग्ध हो गया और उसकी तलाश में निकल पड़ा। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते अन्त में उसे पता लग गया। उसने भानुमती से याचना की। मालवा-निमाड़ में भानुमती और बाजबहादुर के प्रेम की कहानियां अब तक सुनी जा सकती हैं। अंत में भानुमती ने बाजबहादुर के प्रेम को स्वीकार कर लिया, परन्तु एक शर्त के साथ। वह नर्मदा को छोड़कर कहीं नहीं जायगी, नर्मदा का ही जल पीयेगी और रोज नर्मदा का दर्शन करेगी। कहते हैं, किसी महात्मा के प्रताप से माण्डव में नर्मदा एकाएक प्रकट हो गई। वहां एक कुण्ड बनवा दिया गया, जिसे रेवा-कुण्ड कहते हैं, और उसी के पास भानुमती का महल भी बनवा दिया गया, जहां से प्रतिदिन वह नर्मदा की धारा का दर्शन किया करती थी। नर्मदा की परिक्रमा करनेवाले धर्मपुरी से रेवा-कुण्ड तक जाते हैं और फिर लौटकर प्रवाह के साथ हो जाते हैं।

माण्डव के किले में अनेक दर्शनीय स्थान हैं। पुराने जमाने में इसे मण्डप दुर्ग कहते थे। यह बड़ा नगर था। कहते हैं, कोई सात सौ तो जैन मन्दिर ही थे। विद्या का केन्द्र था। मुसलमान सुलतानों के काल में भी उसकी बड़ी शान थी। भगवान रामचन्द्र का एक प्राचीन मन्दिर है, जिसमें श्रीराम की मूर्ति बहुत सुन्दर है।

धर्मपुरी के बाद कुश ऋषि की तपोभूति शुक्लेश्वर, देवों की माता अदिति की तपस्या द्वारा पुन्नत ऋद्धेश्वर और सूर्य-वंश के राजा ब्रहादत्ता की यज्ञ-भूमि ऊकलवाडा होते हुए हम चिरवलदा पहुंचते हैं। यहां महर्षियों (विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्री वसिष्ठ, कश्यप) ने तप किया था। आज के युग में भी यतिवर वासुदेवानन्द सरस्वती की तपश्चर्या का यह साक्षी रहा है। सामने दक्षीण तट पर राजघाट है, जहां सन 1948 में महात्मा गांधी की अस्थियां विसजिर्तत की गई थीं। यहां पर फरवरी में हर साल सर्वोदय-मेला लगता है। यहां से 5 कि.मी. पर दक्षीण में बड़वानी नामक एक सुन्दर कस्बा है, जो स्वराज्य के पहले इसी नाम के एक छोटे से राज्य की राजधानी थी।

बड़वानी के पास सतपुड़ा की पहाड़ियों में एक जैन तीर्थ है, जिसे ‘वावन गजाजी’ कहते हैं। एक पहाड़ी की बगल में संपूर्ण चट्रटान में खुदी यह एक विशाल खड़ी मूर्ति कोई 84 फुट ऊंची है। इसी पहाड़ी के ऊपर एक मन्दिर भी है, जिसकी जैनियों और हिंदुओं में समान रुप से मान्यता है। हिन्दू लोग इसे ‘दत्तात्रेय की पादुका’ कहते हैं। जैन इसे ‘मेघनाद और कुंभकर्ण की तपोभूमि’ मानते हैं। इधर के शिखरों में यह सतपुड़ा का शायद सबसे ऊंचा शिखर है और जब आसमान साफ होता है तो माण्डव यहां से दिखाई देता है।

सतपुड़ा का यह भाग गोवर्धन क्षेत्र भी माना जाता है। यह निमाड़ी गोवंश का घर है। यहां के गाय और बैल खेती के काम के विचार से बहुत अच्छे माने जाते हैं। बड़े बलिष्ठ और पानीदार। यों तो होशंगाबाद से लेकर हिरनफाल तक निमाड़ में अच्छे बैल होते हैं, परन्तु यह भाग विशेष रुप से प्रसिद्ध है। गायों की वह नस्ल दूध देने में इतनी अच्छी नहीं है।

बीजारान में विंध्यवासिनी देवी ने, धर्मराज तीर्थ में धर्मराज ने और हिरनफाल में हिरण्याक्ष ने तप किया था। यहां पर नर्मदा का पाट बहुत ही संकरा है।

कुछ किलोमीटर पश्चिम में बढ़ने पर हापेश्वर की शोभा देखते बनती है। पहाड़ी पर शंकर का एक भव्य और सुन्दर मन्दिर है, जहां से आसपास का दृश्य बड़ा ही मनोहारी लगता है। यहां पर वरुण ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। इस सारे प्रदेश में बड़े-बड़े और दुर्गम वन हैं।

हापेश्वर के बाद उल्लेखनीय तीर्थ है- शूलपाणी। सिंदुरी संगम से घने जंगली और पहाड़ों के बीच से होकर दस-बारह मील चलने पर नर्मदा के दक्षीण तट पर शूलपाणी तीर्थ मिलता है। यहां शूलपाणी का बहुत प्राचीन मन्दिर है। कमलेश्वर, राजराजेश्वर आदि और भी कई मन्दिर हैं। यहीं पास में ब्रहादेव द्वारा स्थापित ब्रहोश्वर लिंग भी बताया जाता है। इसके दक्षीण में शेषशायी भगवान का मन्दिर है। दीर्घपता ऋषि का कुलसहित यहीं उद्धार हुआ बताते हैं। काशिराज चित्रसेन को भी यहीं सिद्धि मिली थी।

गरुड़ेश्वर में भगवान दत्तात्रेय के मन्दिर और यतिवर वासुदेवानंद सरस्वती की समाधि है।

शुक्रतीर्थ, अकतेश्व, कर्नाली, चांदोद, शुकेश्वर, व्यासतीर्थ होते हुए हम अनसूयामाई पहुंचते हैं, जहां अत्री –ऋषि की आज्ञा से देवी श्री अनसूयाजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तप किया था और उससे प्रसन्न होकर ब्रहा, विष्णु, महेश तीनों देवताओं ने यहीं दत्तात्रेय के रुप में उनका पुत्र होना स्वीकार कर जन्म ग्रहण किया था। कंजेठा में शकुन्तला-पुत्र महाराज भरत ने अनेक यज्ञ किये। सीनोर में ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अनेक पवित्र स्थान हैं।

सीनोर के बाद भड़ोंच तक कई छोटे-बड़े गांव, तीर्थ और तपश्चर्या के स्थान हैं। अंगारेश्वर में मंगल ने तप करके अंगारेश्वर की स्थापना की थी। निकोरा में पृथ्वी का उद्धार करने के बाद वराह भगवान ने इस तीर्थ की स्थापना की। लाडवां में कुसुमेश्वर तीर्थ है। मंगलेश्वर में कश्यप कुल में पैदा हुए भार्गव ऋषि ने तप किया था। शुक्रतीर्थ में नर्मदा के बीच टापू में एक विशाल बरगद का पेड़ है। शायद यह संसार में सबसे बड़ा वट-वृक्ष है। यहां महात्मा कबीर ने कुछ समय तक निवास किया था। इसलिए इसे ‘कबीर-वट’ कहते हैं। इसके नीचे हजारों आदमी विश्राम कर सकते हैं।

• इसके बाद कुछ मील चलकर हम भड़ोंच पहुंचते हैं, जहां नर्मदा समुद्र में मिल जाती है। पश्चिम रेलवे का यह एक प्रमुख स्टेशन है। नगर की लम्बाई कोई ५ कि.मी. और चौड़ाई डेढ़ कि.मी. है। यहां पहले एक किला भी था, जिसे सिद्धराज जयसिंह ने बनवाया था। अब तो उसके खण्डहर हैं। भड़ोंच को ‘भृगु-कच्छ’ अथवा ‘भृगु-तीर्थ’ भी कहते हैं। यहां भृगु ऋषि का निवास था। यहीं राजा बलि ने दस अश्वमेध-यज्ञ किये थे। सोमनाथ का मन्दिर भी इसी स्थान पर है। भड़ोंच नगर की पंचकोशी में कोई पचास से ऊपर पवित्र स्थान बताये जाते हैं।

भड़ोंच के सामने के तीर पर समुद्र के निकट विमलेश्वर नामक स्थान है। परिक्रमा करनेवाले यहां से नाव में बैठकर समुद्र द्वारा नर्मदा के उत्तर तट पर लोहारिया गांव के पास उतरते हैं। यह फासला १९ कि.मी. का है।

भारत की नदियों में नर्मदा का अपना महत्व है। न जाने जितनी भूमि को उसने हरा-भरा बनाया है, और उसके किनारे पर बने तीर्थ न जाने कब से अनगिनत नर-नारियों को प्ररेणा देते रहे हैं, आगे भी देते रहेंगे।

माँ नर्मदा के अनेको नाम - नर्मदा, त्रिकूटा, दक्षिनगंगा, सुरसा, कृपा, मन्दाकिनी , रेवा, विपापा, करभा, रज्जन, वायुवाहिनी, बालुवाहिनी, विमला आदि

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