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नोटिस बोर्ड

भगीरथ प्रयास सम्मान

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इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)

भगीरथ प्रयास सम्मान की स्थापना वर्ष 2014 में की गई थी। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना है जो नदियों के संरक्षण को लेकर काम कर रहे हैं। इंटेक, सैनड्रप, टॉक्सिक्स लिंक, पीस इंस्टीट्यूट चैरिटेबल ट्रस्ट और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया द्वारा संयुक्त रूप से यह सम्मान दिया जाता है। असल में पानी के संरक्षण को लेकर काम करने वालों को तो कई तरह के पुरस्कार दिये जाते हैं लेकिन नदियों पर काम करने वालों को पुरस्कार नहीं दिया जाता था। पेयजल के लिये नदी की दिशा मोड़ने, भूगर्भ और सतही पानी के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल, उद्योगों और शहरी इस्तेमाल के लिये बेतहाशा पानी के इस्तेमाल के कारण भारत की नदियों पर बहुत प्रभाव पड़ा है। इससे जैव विविधता भी प्रभावित हुई है। देश में 14 बड़ी, 42 मध्यम और 55 छोटी नदियाँ हैं।

नदियों को बचाने के प्रयास के तहत इंटेक, सैनड्रप, टॉक्सिक्स लिंक, पीस इंस्टीट्यूट चैरिटेबल ट्रस्ट और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया ने वर्ष 2014 में इण्डिया रीवर्स वीक शुरू किया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य था नदियों को लेकर काम करने वाले लोगों और संस्थाअों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना और नदियों को बचाने के लिये नीतियों पर काम करना।

सम्भवतः यह अपने तरह का एक मात्र कार्यक्रम है जिसमें नदियों को बचाने के मुद्दे पर काम किया जाता है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य नदियों को बचाने की दिशा में किये जा रहे स्थानीय प्रयासों को पहचानकर उन्हें प्रोत्साहित करना भी है।

एक्सक्रीटा फ्लो डायग्राम बनाने की ट्रेनिंग

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इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)

दिनांक- 07-08 सितम्बर 2016
स्थान- विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र, नई दिल्ली
भाषा- अंग्रेजी


सेंटर अॉफ साइंस एंड एनवायरमेंट बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन से ग्रांट प्राप्त और दूसरे सेक्टरों के लोगों के लिये “एक्स्क्रीटा फ्लो डायग्राम (शिट फ्लो डायग्राम) की तैयारी” पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिये 20 सीटें हैं और प्रतिभागियों का चयन पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर किया जाएगा। कार्यक्रम की पूरी जानकारी निम्नलिखित वेबसाइट से प्राप्त की जा सकती है -

http://cseindia.org

उद्देश्य


शहरों में स्वच्छता के लिये योजना तैयार करने में शिट फ्लो डायग्राम एक महत्त्वपूर्ण साधन बनकर उभर रहा है। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य एएफडी प्रमोशन इनिशिएटिव द्वारा तैयार किये गए इस साधन से प्रतिभागियों को लैस करना है।

फोटोग्राफी पर 5 दिवसीय वर्कशॉप

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इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)

स्थान - सम्भावना इंस्टीट्यूट, कांगड़ा
तारीख - 1-5 अक्टूबर 2016


समाजिक मुद्दों पर काम कर रहे फोटोग्राफरों, कार्यकर्ताअों और शोधकर्ताअों के लिये सम्भावना इंस्टीट्यूट 1-5 अक्टूबर 2016 तक 5 दिवसीय फोटोग्राफी कार्यशाला (वर्कशॉप) आयोजित करने जा रहा है। कार्यशाला का उद्देश्य सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग और दस्तावेजीकरण को नई विजुअल मीडिया द्वारा प्रभावी तरीके से पेश करने की तकनीक सिखाना है ताकि प्रभावित लोगों, आम आदमी, नीति निर्माताओं, राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों तक इसे प्रभावशाली तरीके से पहुँचाया जा सके।

कार्यशाला का फोकस तकनीक/रणनीति और परिप्रेक्ष्य पर होगा। इसमें हिस्सा लेने वालों के लिये कई तरह के लेक्चर, सामूहिक संवाद, मैराथन सत्र होंगे जिसमें प्रतिभागियों और विशेषज्ञों के बीच सीधा संवाद होगा। फोटोग्राफरों पर वीडियो डॉक्यूमेंट्री और फोटोग्राफी अप्रोच कार्यशाला का हिस्सा होंगे।

मीडिया कॉन्क्लेव 2016 (Media Conclave 2016)


कान्हा मीडिया कॉन्क्लेव का विकास के मुद्दों पर औपचारिक और अनौपचारिक संवाद की प्रक्रिया को बढ़ावा देगा। कान्हा मीडिया कॉन्क्लेव में जिन प्रमुख वक्ताओं ने मुख्य वक्तव्य के लिए अपनी सहमति दी है उनमें सर्वोच्च न्यायलय के वकील प्रशांत भूषण, खेती के मामलों के जनपैरवीकार देविंदर शर्मा, सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वार्यमेंट के ​उपनिदेशक चंद्रभूषण, जैसलमेर के रामगढ़ गांव में रहने वाले किसान चतरसिंह जाम और पर्यावरणीय मुद्दों पर जमीनी काम करने वाले राजस्थान के ही लक्ष्मण सिंह हैं। इसके अलावा संवाद की इस प्रक्रिया में संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों का एक बड़ा समूह शामिल है, जिनकी सक्रिय भूमिका के कारण ही यह आयोजन महत्वपूर्ण हो पाता है।

 

 

( एजेंडा निम्नलिखित है, एजेंडा पर अभी काम चल रहा हैं, इसके वक्ताओं में और नाम जुड़ेंगे। आपके कुछ सुझाव हों तो आयोजक टीम को बताएं)  

 

विकास संवाद के साथियों के नंबर...

 

केन्द्र किसी भी सूरत में बनाएगा केन-बेतवा लिंक

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इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)

अरण्या ईको, इंडियन सोशल रिस्पांसबिलिटी नेटवर्क और डिवाइन इंटरनेशनल फाउंडेशन की संयुक्त रूप से आयोजित कार्यक्रम ‘डायलॉग आन रीवर इंटर-लिंकिंग’ में कई वक्ताअों ने नदी जोड़ परियोजना और खासकर केन-बेतवा लिंक पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये। कुछ वक्ताओं ने यह भी कहा कि नदी जोड़ परियोजना की जगह दूसरी कम खर्चीली और दीर्घावधि परिणाम वाली परियोजनाओं पर काम किया जा सकता है। केन्द्र सरकार ने फिर एक बार केन-बेतवा लिंक परियोजना को किसी भी कीमत पर पूरा करने की प्रतिबद्धता दुहराई और आश्वासन दिया कि इससे वन्यजीवों और पर्यावरण को बहुत नुकसान नहीं होगा।

06 अगस्त 2016 शनिवार को अरण्या ईको, इंडियन सोशल रिस्पांसबिलिटी नेटवर्क और डिवाइन इंटरनेशनल फाउंडेशन की संयुक्त रूप से आयोजित कार्यक्रम ‘डायलॉग आन रीवर इंटर-लिंकिंग’ में कई वक्ताअों ने नदी जोड़ परियोजना और खासकर केन-बेतवा लिंक पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये। कुछ वक्ताओं ने यह भी कहा कि नदी जोड़ परियोजना की जगह दूसरी कम खर्चीली और दीर्घावधि परिणाम वाली परियोजनाओं पर काम किया जा सकता है।

नदी जोड़ योजना : एक संवाद


नदी जोड़ योजना
तिथिः 06 अगस्‍त 2016
सायं काल 3:00 बजे, हाईटी
सायं काल 4:00 बजे, कार्यक्रम की शुरुआत
स्थानः कान्स्टीट्यूशन क्‍लब, रफी मार्ग, नई दिल्‍ली


. भारत जल और भूमि संसाधनों से सम्पन्न देश है। विश्व में भारत की भूमि 2.5 प्रतिशत है, जल संसाधन वैश्विक उपलब्धता का 4 प्रतिशत है और जनसंख्या 17 प्रतिशत है। उपलब्ध क्षेत्र 165 मिलियन हेक्टेयर है जो दुनिया में दूसरा सबसे अधिक क्षेत्र है, उसी तरह जैसे भारत का स्थान जनसंख्या के मामले में भी दुनिया में दूसरा है। नब्बे के दशक में भारत में 65 प्रतिशत किसान और कृषि मजदूर थे जिससे स्पष्ट होता है कि हमारा देश कृषि यानि जमीन और जल पर निर्भर रहा है। इसलिए इस बात को शुरुआत से ही माना जाता रहा है कि देश के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिये जल संसाधनों का विकास अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

दुनिया में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं। अगर विश्व की आबादी बढ़कर 25 अरब हो जाएगी तो भी उपलब्ध पानी पर्याप्त होगा। भारत में कुल उपलब्ध पानी 16500 लाख की आबादी के लिये पर्याप्त है (1500 घन मीटर/प्रति व्यक्ति/प्रतिवर्ष)।

इंटरनेशनल रिवर सिम्पोजियम- सब्सिडी के साथ आवेदन तिथि 31 जुलाई


इंटरनेशनल रिवर सिम्पोजियम

तिथिः 12-14 सितम्बर 2016
स्थानः नई दिल्ली


.पहले आओ पहले पाओ! जी हाँ, ​नदियों को लेकर आयोजित होने जा रही अन्तरराष्ट्रीय नदी संगोष्ठी (International Rivers Symposium) के लिये ​छूट के साथ प्रारम्भिक पंजीयन की अंतिम ​तिथि​ 31 जुलाई है। संगोष्ठी में हिस्सा लेने वाले भारतीय प्रतिनिधियों को विशेष सब्सिडी के तहत पंजीयन की फीस में 75 प्रतिशत तक की छूट के लिये आवेदन करने का मौका दिया जा रहा है। इस वर्ष यह संगोष्ठी 12-14 सितम्बर तक नई दिल्ली में आयोजित होगी।

इस बार के कार्यक्रम का थीम है-विश्व की विशाल नदियां : साझा लाभ के लिये प्रबंधन।

इस अनोखे और वृहत कार्यक्रम, प्रमुख वक्ताअों, विशेष सत्र, सोशल इवेंट्स और हिमालयी क्षेत्रों में टूर का हिस्सा बनिए।

विकास का नाकाम मॉडल

Source: 
विकास संवाद

दसवाँ राष्‍ट्रीय मीडिया विमर्श


स्थान : कान्‍हा, मध्य प्रदेश
तारीख : 13-14-15 अगस्‍त, 2016


“लोगों के बीच जाइए। उनके साथ रहिए। उनसे सीखिए। उन्‍हें स्‍नेह दीजिए।
शुरू करें वहाँ से जो वे जानते हैं। निर्माण उन चीजों से करें जो उनके पास है।
लेकिन नेतृत्‍व ऐसा हो कि जब काम पूरा हो तो लोग कहें, ‘ये हमने बनाया है।”


हमारे बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो हमें सही रास्‍ता दिखा रहे हैं। जैसे जैसलमेर के रामगढ़ को पानीदार बनाने का समाज केन्द्रित मॉडल। वहाँ इस सूखे और 51 डिग्री तापमान में भी उनके गाँव में पशु-पक्षियों के लिये भी पानी है। इसी तरह उत्‍तराखण्ड में हुई पहल ने दिखा दिया है कि अगर जंगलों को सहेजने का जिम्‍मा स्‍थानीय समाज ले ले तो न जंगलों में आग लगेगी और न कहीं पानी की कमी होगी। ये लोग असल में विकास के नाम पर चल रही उस भेड़चाल को चुनौती दे रहे हैं, जिसमें एक छायादार, घना पेड़, बहती नदी और लहलहाते खेत का कोई मोल नहीं, क्‍योंकि ‘बाजारवादी विकासोन्‍मुखी सिद्धान्त’ में इनका दोहन की विकास दर तय करता है। विकास और नियोजन को लेकर पाँचवीं और छठी शताब्‍दी के चीनी दार्शनिक लाओ त्‍सू की यह परिकल्‍पना 20वीं शताब्‍दी में भारत सहित दुनिया के किसी भी देश के विकास मॉडल में नजर नहीं आती। जिन परिणामों की प्राप्‍ति के लिये विकास के ये मॉडल बनाए गए, वे फिलहाल अपेक्षित परिणाम देने में नाकाम हैं। इसके दर्जनों उदाहरण हमारे सामने हैं।

एक समय अमेरिका के चार बड़े निवेश बैंकों में शुमार रहे लेहमैन ब्रदर्स के 2008 में दिवालिया होने के बाद अब बारी भारतीय स्‍टेट बैंक और उसके अधीनस्‍थ बैंकों की है, जिन पर 5 लाख करोड़ रुपए से ज्‍यादा का डूबत खाते का ऋण है। दुनिया में भारत अकेला देश नहीं, जिसका विकास मॉडल फेल हुआ है। ग्रीस का दिवालिया हो जाना और भयंकर मंदी में उलझे यूरोपीय संघ के कुछ और देशों, चीन, ब्राजील, तुर्की और मलेशिया में भी विकास के भूमण्डलीकृत मॉडल की नाकामी साफ झलकने लगी है।

नर्मदा जल जमीन हक सत्याग्रह की तैयारी शुरू


50 हजार परिवारों के पुनर्वास का कार्य अभी भी अधूरा है। 14 हजार परिवारों को गुजरात और महाराष्ट्र में बसाया गया है, लेकिन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के पहाड़ी आदिवासी क्षेत्रों के करीब 1500 परिवार तथा मैदानी मध्य प्रदेश के करीब 45 हजार परिवारों को अभी बसाना बाकी है। सरदार सरोवर में जैसे ही गेट लगेगा, एक धर्मपुरी नगर, 244 गाँवों के बाशिन्दों के घर, खेत, खलिहान... सब डूब जाएँगे। उन्होंने 30 जुलाई से नर्मदा के जल और जमीन के हुकूक के लिये सत्याग्रह करना तय किया है। इसकी तैयारी के लिये वे 13 जुलाई से 15 जुलाई तक नर्मदा परिक्रमा भी कर रहे हैं और 21 से 23 जुलाई को नर्मदा किनारे वाहन यात्रा भी। 19 से 22 जुलाई के बीच का कार्यक्रम भी तैयार किया जा रहा है।

उनकी चिन्ता


नर्मदा घाटी दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति है। हरदूद जैसे शहर के उजड़ने से वे डर गए हैं। उन्हें चिन्ता है कि 30 बड़े और 135 छोटे मझोले बाँधों के कारण आगे चलकर नर्मदा नदी तालाबों में तब्दील हो जाएगी। इससे लोगों के साथ-साथ नर्मदा घाटी की उपजाऊ खेती, फलदाई वानिकी, मन्दिर, मस्जिद, पाठशाला, कारीगरी, व्यापार और नर्मदा की संस्कृति का नाश होगा।

ग्रामीण पत्रकारिता उद्यमिता संस्थान की अवधारणा पर चर्चा हेतु आमंत्रण


1 से 3 जुलाई 2016, नया रायपुर

प्रिय साथी,
. मित्र प्रदीप शर्मा बताते हैं कि ग्राम वह इकाई है जहाँ मानव श्रम और बुद्धि का व्यक्तिगत एवं सामूहिक समृद्धि के लिये प्रकृति के जल, थल और अग्नि में सफल सामूहिक नियोजन होता है। खेती में जल और थल का उपयोग होता है और कुटीर उद्योग में अग्नि का।

प्रकृति में जल, थल और अग्नि के अलावा वायु और आकाश भी समाहित है पर ग्राम के स्तर पर इनका अब तक अधिक उपयोग नहीं हुआ है। आपसी बातचीत के लिये वायु का उपयोग तो होता है पर इसे और बेहतर किया जा सकता है एक बेहतर समाज बनाने के लिये। सीजीनेट स्वर और बुल्टू रेडियो इसी दिशा के प्रयोग हैं जिससे संवाद की बेहतरी से जीवन के सभी अंगों में सुधार लाया जा सके।

संवाद के लिये प्राकृतिक माध्यम या मीडिया यानि हवा का प्रयोग मनुष्य शुरू से करता रहा है। इसमें धीरे-धीरे ढोल जैसे यंत्र जुड़े जो उसकी कार्यक्षमता को बढाने में उपयोग में लाए जाते रहे। पर ढोल का स्थान जब रेडियो के ट्रांसमीटर जैसे यंत्रों ने लिया तब उसकी मालकियत बहुत से कुछ लोगों तक सीमित हो गयी।