प्रयास. . . . .
तालाब, आहर, हरियाली लाकर एक नया इतिहास रचते दलित
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चौथी दुनिया
बंजर भूमि में आई बहारगया जिले के अतरी प्रखंड के नरावट पंचायत के 120 दलित परिवार अपने श्रम के दान से जगह-जगह तालाब, आहर, हरियाली लाकर एक नया इतिहास लिख रहे हैं। 2006 में जब गया शहर में पेयजल का संकट आया तब वे ‘मगध जल जमात’ के अपील पर शहर के प्राचीन तालाबों के खुदाई-सफाई के लिए गाँव के 108 दलित करीब 50 किलोमीटर पैदल चलकर गया पहुँचे। 8-10 दिन की कड़ी मेहनत से शहर के पौराणिक सरयू तालाब की खुदाई की। इस दौरान उन्होंने खाना-खुराकी की व्यवस्था खुद ही की। जल जंगल जमीन के लिए उनकी मेहनत और सेवा हमेशा हाजिर रहती है। नक्सली इलाके का यह गाँव अपने किसी घर में ताला नइस खबर के स्रोत का लिंक:
कहानी लदुना के पानी की...
पूरे देश-प्रदेश की भांति मंदसौर जिले ने भी पानी के गंभीर संकट को भोगा है, परन्तु इस ऐतिहासिक जिले के समाज ने जल संघर्ष की प्रक्रिया में नये-नये मुकाम हासिल करके अपनी विशेषता को सिद्ध कर दिया है। सूखे – अकाल के दौर में मंदसौर में दो सौ से ज्यादा जल संरक्षण की संरचनाओं का जनभागीदारी से निर्माण किया गया। जबकि एक हजार से ज्यादा जल स्रोतों का जीर्णोद्धार हुआ। करोड़ो रुपये का श्रमदान भी हुआ और पानी की कमी ने पानी की अद्भुद कहानी रची है। मूलतः इस गाँव की जलापूर्ति का सबसे बड़ा साधन पास का ही लदुना तालाब रही है। परन्तु यहां जल संकट ने उस वक्त भीषण रूप अख्तियार कर लिया जब यगांववासियों द्वारा खुद जल आपूर्ति की मिसाल
Source:
www.downtoearth.org.in
खुद ही किया प्रबंध
पानी के अभाव ने उड़ीसा के एक गांव को पानी का प्रबंधन करना सिखाया
करीब 30 साल की गुलाब कुंजु उन दिनों को याद करती हैं जब अपनी प्यास बुझाने के लिए दूध पीना पड़ा क्योंकि उनके यहां पानी का अभाव था। उनके गांव धौराड़ा के चार बस्तियों में बसे 120 से ज्यादा परिवारों की जरूतों की पूर्ति के लिए सिर्फ तीन हैंडपंप थे। उनकी बस्ती के बाहरी इलाके में स्थित निकटतम हैंडपंप से पानी लाने के लिए दिन में कई बार चक्कर लगाना पड़ता था।
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महिलाओं ने बदला पानपाट
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पंचायत परिवार (मई-जून 2003)पानपाट गाँव का 35 वर्षीय युवक ऊदल कभी अपने गांव के पानी संकट को भुला नहीं पाएगा। पानी की कमी के चलते गांव वाले दो-दो, तीन-तीन किमी दूर से बैलगाड़ियों पर ड्रम बांध कर लाते हैं। एक दिन ड्रम उतारते समय पानी से भरा लोहे का (200 लीटर वाला) ड्रम उसके
अब तोरणी जैसे गाँव ही होंगे नए तीर्थ!
देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने भाखड़ा-नांगल
बांध और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर जैसी जगहों को आधुनिक तीर्थ कहा था। इक्कीसवीं सदी में वैज्ञानिक डॉ. कलाम की इन यात्रा का संदेश भी साफ है- यहाँ मिसाइलमैन का वास्ता मिसाइल की सी गति से नहीं पड़ने वाला, जिनके वे धुरंधर खिलाड़ी रहे हैं। यहाँ उनका रास्ता छोटी-छोटी जल संरचनाएँ रोकेंगी और उनसे कहेंगी, यह वक्त थोड़ा थमने
का भी है....!
खंडवा जिले के लोगों ने ‘गति के गुरूर’ को तोड़ा है! उन्होंने पानी के वेग को वश में कर लिया है। बादलों से बरसा पानी अब इस जिले की जमीन पर इठलाता, बलखाता और सरपट दौड़ता नजर नहीं आता। अब पानी की लगाम यहाँ के उन लोगों के हाथों में हैं, जो गाँवों में रहते हैं और उनमें से भी अधिकतर पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते। ये लोग कभी सरपट भागते पानी के कान उमेठकर उसे कुंडी या कुएँ की दिशा दिखा देते हैं तो कभी उसे पुचकारकर पोखर में उतार देते हैं। सौ बात की एक बात तो यह है कि इन लोगों ने पानी के बहाव को वश में कर लिया है यहाँ। वरना पानी अब नदी-नालों के जरिए समुद्र का रास्ता नहीं नापता।
आओ जाने अपना पानी अभियान
वाटर सेंपल लेते बच्चेअभियान में निकले चौंकाने वाले तथ्य वर्ल्र्ड एन्वायरन्मेंट फेडरेशन, अमेरिका और इंटरनेशनल वॉटर एसोसिएशन, नीदरलैण्ड के सहयोग से विश्वभर में चलाए जा रहे पानी जांच अभियान में भारत से नीर फाउंडेशन भी इसका हिस्सा बना। इस अभियान के तहत प्रत्येक वर्ष 18 सितम्बर को वर्ल्र्ड वाटर मानिटिरिंग डे मनाया जाता है। इसके तहत प्रत्येक वर्ष दुनियाभर के देशों से गैर-सरकारी संगठनों व समूहों का चयन करके उनको वाटर टैस्ट करने की किट उपलब्ध कराई जाती हैं। इन किटों के माध्यम से सामाजिक संगठन अथवा समूह द्वारा अपने देश के प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित जल स्रोतों के पानी का परीक्षण किया जाता है। यह कार्य इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसमें स्कूली बच्चों की भागीदारी अधिक होती है।
मलगांव से मालदार गांव बनने की कहानी
वेब/संगठन:
visfot.com
देवस्थान के चबूतरे पर एकत्र मलगांववासी
दुनिया के बड़े बड़े दादा लोग दुनिया के पर्यावरण को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं. इन कोशिशों से बहुत दूर मध्य प्रदेश के खण्डवा में एक गांव ने पर्यावरण के नाम पर तो नहीं लेकिन लगातार पड़ रहे सूखे और मंहगी होती जिंदगी से पीछा छुड़ाने के लिए प्राकृतिक खेती और नैसर्गिक जीवन को अपना आधार बना लिया. अब मलगांव पर कोई संकट नहीं है. सूखे के बीच उन्होंने प्राकृतिक तरीकों से अपनी जिंदगी तर कर ली है.प्रशासन को नसीहत मिली
दिसंबर 2001 में केंद्रीय भूजल प्रशासन ने आवास कल्याण संघों के लिए वर्षाजल संग्रहण पर कार्यशालाएं आयोजित की। प्रशासन ने सूचना जारी की कि 31 दिसंबर 2001 तक जिन ट्यूबवेल के मालिकों ने जल संग्रहण का अमल नही किया है, उनके ट्यूबवेलों को जब्त कर लिया जाएगा और इसी कारण इसके अमल को सहज बनाने के लिए इन कार्यशाओं के आयोजन किये गए हैं।
लेकिन इसका करारा झटका लगा। इन आवासियों ने इस पर गुस्सा जताया, जिन्हें महसूस हुआ कि उन्हें गलत निशाना बनाया जा रहा है और दण्डित किया जा रहा है, क्योंकि यह पाबंदी पूरे दिल्ली वासियों पर नही लगाई जा रही है। इससे बड़ी बात कि कई समृद्ध और गैर-प्राधिकृत कॉलोनियां भी इस कानून के दायरे से बाहर हैं।
लेकिन इसका करारा झटका लगा। इन आवासियों ने इस पर गुस्सा जताया, जिन्हें महसूस हुआ कि उन्हें गलत निशाना बनाया जा रहा है और दण्डित किया जा रहा है, क्योंकि यह पाबंदी पूरे दिल्ली वासियों पर नही लगाई जा रही है। इससे बड़ी बात कि कई समृद्ध और गैर-प्राधिकृत कॉलोनियां भी इस कानून के दायरे से बाहर हैं।
जल जागरूकता बढ़ाने के प्रयास
उदयपुर जिले में जल बिरादरी की ताकत बढ़ रही है। यहां के 80 गांव उदयपुर आधारित एक गैर सरकारी संगठन `झील संरक्षण समिति´ (जेएसएस) के साथ जुड़ गए हैं और ये वर्षाजल प्रबंधन को लेकर लोगों में जागरूता बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं।
समृद्धि की एक और मिसाल
कर्नाटक स्थित बायफ डेवपलमेंट रिसर्च फाउंडेशन (बायफ) ने एक अनोखा मॉडल विकसित किया है। जिसे खेत तालाब नेटवर्क के नाम से जाना जाता है। खेत तालाबों का विभिन्न उद्देश्यों से उपयोग किया जाता है। इनमें खेती और मछली पालन का काम होता है। इसमें फसल और मछली पानी के अलावा सिंचाई से लेकर छोटे-छोटे उद्यमों तक की पानी की जरूरतें पूरी होती हैं। अभी हाल के जल पंढाल विकास काय्रक्रमों में वर्षाजल संग्रहण करने के लिए खेत- तालाब के निर्माण को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है। इसके तहत फाउंडेशन ने एक जलपंढाल विकास परियोजना में मिट्टी व जल संरक्षण तथा पानी का उपयोग करने के लिए खेत-तालाब नेटवर्क बना लिया है।

