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भोज देवकृत-जलमंगल

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भोज देवकृत-जलमंगल
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे मोती मानुस चून।।

पानी के विषय में रहीम का यह दोहा सुप्रसिद्ध है। पानी न हो तो मोती की आब नहीं रहती, मानव का मान नहीं रहता और आटे में लोच नहीं आता और न वह खाने में उपयोगी हो पाता है। अलंकार कौस्तुभ में पानी की विशेषताओं के साथ उसकी नीचता की ओर भी संकेत किया गया है। पानी में शीतलता उसका सहज गुण है, स्वच्छता भी उसमें स्वभाव से ही होती है। उसकी पवित्रता के बारे में क्या कहें। इतनी पवित्रता कि उसके स्पर्श से अन्य भी पवित्र हो जाएँ। इससे बढ़कर उसकी प्रशंसा क्या हो सकती है कि वह शरीरधारियों का प्राण है। परन्तु वह नीचे पथ (नीचे) की ओर जाता है और कोई उसे रोक भी नहीं पाता।

शैत्यं नाम गुणस्तवैव सहजः स्वाभाविकी स्वच्छता, किं ब्रूमः शुचितां भवन्ति शुचयः स्पर्शेन यस्यापरे। किं वाSतः परमुच्यते स्तुतिपदं यज्जीवनं देहिनां, त्वं चेन्नीचपथेन गच्छसि पयः कस्त्वां निरोद्धुं क्षमः।।

हे जल! तुझसे कमल, कमल से ब्रह्म, उस ब्रह्माण्ड के निर्माता से यह विश्व, उससे यह समस्त जड़ चेतन और उनसे भिन्न जो कुछ है उस सबका मूल इस प्रकार पानी ही है। हे जल!धिक्कार है तुझे कि तू चुपचाप जालियों मे से होकर चोर के समान भाग निकलता है और ऐसे विवश प्राणी बाँधे-पकड़े जाते हैं जो केवल तेरी ही शरण में रहते हैं और एकमात्र तू ही जिनका सहारा है।

अब्जं त्वज्जमथाब्जभूस्तान इदं ब्रह्माण्डमण्डात् पुन- र्विश्वं स्थावरजंगमं तदितरत्वन्मूलमित्थं पयः। धिकत्वां चोर इव प्रयासि निभृतं निर्गत्य जालानतरै- र्बध्यन्ते विवशास्त्वदेकशरणास्त्वामाश्रिता जन्तवः।।

इस प्राचीन साहित्य में जलविषयक अनेक सूक्तियाँ युगों से रसिकों का मन मोहती रही है। परन्तु इन श्लोकों से पानी की जो विशेषताएँ प्रकट होती हैं, वे हैं- शीतलता, स्वच्छता, पवित्रता, प्राणाधारतत्व, जड़ चेतन का आधार और नीचे की ओर बहना। ये सब तो हैं परन्तु जल के स्त्रोत कौन-कौन से होते हैं। प्रत्येक प्रकार के जल की अपनी-अपनी विशेषता होती है। उन विभिन्न प्रकार के जलों की क्या-क्या विशेषताएँ हैं। यह सब ज्ञात होता है, राजा भोज की जलमंगल पुस्तक से। यह पुस्तक नीति तथा धर्म के अनुसार वैद्यक का ग्रन्थ है। इसमें जल की उत्पत्ति, जल के भेदोपभेद के साथ ही जल के गुण बताये गये हैं। विभिन्न प्रकार के जलों के गुण यहाँ संक्षेप में बताये गये हैं। वे जल गुण बहुधा वैद्यक की दृष्टि से हैं। वात, पित्त, कफ आधारभूत हैं। और रोगों के अन्य प्रकार भी हैं। विभिन्न जलों से इनमें क्या लाभ-हानि होती है, इसकी सूचना इस पुस्तक में दी गयी है। विभिन्न आकाश, पृथ्वी, भूगर्भ, पर्वत, नदी, झरने, मैदान, वन, तालाब इत्यादि के जलों की विशेषताएँ इसमें बतायी गयी हैं।



ऐसे जलों की सूची निम्नानुसार है- मधुर जल, क्षार, जल, सरोवर, तडाग, शौण्ड, निर्झर, भूमि फोड़कर निकलने वाला, वापी, कमल, नदी, अन्तरिक्ष, पल्लव, हंस, हिम, पुष्प, ओले, जामुन, चन्द्रकान्तमणि, नारियल, सेमल, केले, गूलर, सुपारी, ताल, समुद्र, दलदल, जंगल, शीतल, उष्ण, उबला, उबालकर ठंड किया पानी, विभिन्न ऋतुओं में गर्म पानी, रात में, भोजन समय में, खदिर जल, व्रजोदक, नाक से पीना, आँखों पर पानी छिटकना, आकाशगंगा, गंगा, भागीरथी, यमुना, नर्मदा, कोटर, श्रीपर्वत, केदार, तुंगभद्रा, पिनाकिनी, वंजरा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, कौल्य, मुखरी (कलकल कर बहती), सुवर्णमुखरी, सरस्वती, अंतरिक्ष, बह्नि नदी, भवनाशिनी, बाहुदा, करतोया, शरावती, नेत्रावती, चन्द्रभागा, सरयू, भीमरथी, विपाशा, वितस्ता, शुण्डी, मरीच, चर्मघट, मण्मयपात्र, लोहभाण्ड आदि के जलों की विशेषताएँ इसमें वर्णित हैं। पृथ्वी की मिट्टी के रंग के अनुसार भी जल के गुण होते हैं। इस प्रकार इस विवरण से ज्ञात होता है कि हर प्रकार के जल की अपनी निजी विशेषता है। वह अन्य जल से सर्वथा भिन्न होता है। उसके स्नान-पान से शरीर पर सर्वथा भिन्न-भिन्न प्रभाव होता है। अतः तदनुसार उनका सेवन होना चाहिए। तभी व्यक्ति स्वास्थ्य के प्रति सावधान रह सकता है। स्वास्थ्य के प्रति सम्यक् सावधानी के लिए इस पुस्तक में वर्णित तथ्यों के प्रति व्यक्ति को सावधान रहना चाहिए। तभी वह पूर्णतया स्वस्थ रह सकता है। इस पुस्तक से ही यह भी ज्ञात होता है कि जल भी औषधि है। उसके विधिवत् सेवन से व्यक्ति स्वस्थ रह सकता है।

जलमंङ्गलम-जलवर्ग लक्ष्मीनारायणौ वन्दे युक्तों द्रव्यगुणाविव। यौ सेवन्ते जनास्सम्यगायुरारोग्यवृद्धये।।

द्रव्य और गुण के समान एक साथ मिले हुए लक्ष्मी और नारायण को प्रणाम करता हूँ। आयु तथा आरोग्य की वृद्धि के लिए जिनकी लोग भलीभाँति सेवा या सेवन करते हैं।

विघ्नान्धकारमार्तण्डं प्रज्ञोत्पलनिशाकरम्। ओद्यौघकक्षज्वलनं वन्दे वैनायकं महः।।

विनायक गणेशजी के कान्तिमय उपहार को प्रणाम जो विघ्न के अन्धकार के लिए सूर्य, प्रज्ञा (मेधा) के नीलकमल के लिए चन्द्रमा और पापसमूह की सूखी घास के लिए अग्नि हैं।

शरणं करवाणि शर्मदं ते चरणं वाणि चराचरोपजीव्यम्। करुणामसृणैः कटाक्षपातैः कुरु मामम्ब कृतार्थसार्थवाहम्।।

हे वाणि! जड़-चेतन के जीवन (मूल आधार) आपके शांतिदायक चरणों की शरण में आता हूँ। हे माता! अपनी करुणा-दृष्टि डालकर मेरा जीवन सार्थक कर दें।

प्राणो भवेत् प्राणभृतां तु नीरं तस्माद्विना नश्यति जीवलोकः। तेनैव नित्यं स चराचरं यत् जगत् सजीवं भवति क्षणेन।।

प्राणियों का प्राण तो पानी है। उसके बिना जीव-जगत् नष्ट हो जाता है। उस पानी से ही जड़-चेतन-मय जगत् नित्य या सार्वकालिक हो जाता है और पलभर में वह सजीव हो जाता है।

जल की उत्पत्ति और जल के भेदोपभेद आकाशादनिलस्ततोSग्नरवत् पंथासि तेभ्यो मही, मह्यामोषधयस्ततोSन्नमभवल्लोकस्तु तैर्जीवति। तस्मादद्य हि तस्य संस्थितगुणान् वक्ष्यामि संक्षेपतः त्वैन्द्रं पार्थिकफालकाद्यमिति तत्त्रेधा विधानं ययौ।।

आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और इन सबसे पृथ्वी प्रकट हुई। पृथ्वी पर औषधियाँ (वनस्पतियाँ), उनसे अन्न हुआ। अन्नों से लोक जीवित रहता है। इसलिए अब संक्षेप में उस जल में विद्यमान गुणों को कहता हूँ। वह जल तीन प्रकार का बताया गया है- ऐन्द्र (इन्द्र द्वारा बरसाया गया), पार्थिक (पृथ्वी से प्रकट) और फालक (फल से प्रकट)।

ऐन्द्रं वृष्टिसमद्भवं निगदितं भौमं तु कौपादिकं फालं चापि फलोद्गतं पुनरपि त्रेधात्वयैन्द्रं जलम्। तस्मात् प्रणाभवं महीरुहभवं केदारसम्भूत (क)- मित्येवं संप्रवदन्ति केचन भिषग्वर्यास्तथैकादश।।

वैद्यराज लोगों ने तो ग्यारह प्रकार का जल बतलाया है। परन्तु जल के प्रकार ये हैं- ऐन्द्र जल वह होता है जो वर्षा से होता है, भौम जल कुएँ आदि (भूमि से प्रकट) होता है, फाल जल फल से आता है। वह भी ऐन्द्र जल तीन प्रकार का होता है। प्राण (प्राणियों) से प्रकट, वृक्ष से उत्पन्न और बाँध या (केदार) पर्वत से प्रकट।

कौपं सारसताटाकं शौण्ड-प्रस्त्रवणोद्भवम्। वापी-नदीतोयमिति तत्पुनस्तोयमष्टधा।।

कूप, सरोवर, तडाग, शौण्ड (मदिरा आदि तैयार किया हुआ), प्रस्त्रवण (प्रपात या झरना), बावड़ी और नदी का जल। इस प्रकार जल आठ प्रकार का होता है।

तोयादीनां प्रवक्ष्यामि गुणदोष विचारतः। दिव्यान्तरिक्षनादेयं कौप्यं शौण्डेयसारसम्।। तटाकमौदिभदं शैलं जलमष्टिविधं स्मृतम्।।

अब पानी का गुण-दोष-विचार बताता हूँ। जल आठ प्रकार का बताया जाता है। दिव्य, आन्तरिक्ष (अन्तरिक्ष का), नादेय (नदी का), कौप्य (कुएँ का) शौण्डेय (भाप द्वारा निर्मित), सारस (सरोवर का), तटाक (तड़ाग का) औदिभद् (भूमि से प्रकट), शैल (पर्वत से प्रकट) या पर्वत से उद्भूत।

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