SIMILAR TOPIC WISE

Latest

(3)‘जल-माहात्म्य’

Author: 
महेश कुमार मिश्र ‘मधुकर’
शिव-पार्वती के विवाह के समय, जबकि ब्रह्माजी हवन कर रहे थे, अचानक वे कामातुर हो गये। उनके मन में ग्लानि उत्पन्न हुई और वे अपराधबोध से दुखी हो गये। ब्रह्माजी उठकर मण्डप से बाहर निकल आये।

भगवान शिव समझ गये। उन्होंने ब्रह्मा को ‘निष्पाप’ करने के उद्देश्य से अपने पास बुलाया। फिर बोले- ‘पृथ्वी और जल, पापियों के पाप को नष्ट करने में सहायक होते हैं। मैं इनका ‘सार सर्वस्व’ निकालूँगा।’

शिवजी ने पृथ्वी और जल के ‘सारभाग’ को निकाला फिर पृथ्वी को कमण्डलु बनाकर उसमें उस ‘सार’ को रख दिया। तत्पश्चात् ‘पावमान्य सूक्तों’ के द्वारा जल को अभिमंत्रित किया और उसमें तीनों लोकों को पवित्र करने वाली शक्ति का आवाहन किया । फिर कमण्डलु ब्रह्माजी को सौंपते हुए बोले- ‘सुनो!जल मातृदेवी है तथा पृथ्वी की दूसरी माता है। इन दोनों में सृष्टि की उत्पत्ति,स्थिति और विनाश के कारण निहित हैं। इनमें धर्म प्रतिष्ठित है। सनातन यज्ञ इनमें वर्तमान है। इनमें भुक्ति औऱ मुक्ति है। स्थावर औऱ जंगम सभी इनमें ही रहते हैं। जल के स्मरण से मन के पाप, जल की चर्चा करने से वचन के पाप और जल में स्नान करने, इसे पीने तथा इसके द्वारा अभिषेक करने से शरीर के पाप नष्ट हो जाते हैं। यही संसार में अमृत है। इससे अधिक पवित्र कोई भी वस्तु नहीं है। मैंने इसे अभिमंत्रित कर दिया है। इस कमण्डलु को ग्रहण करो।’ इस कमण्डलु के जल का जो कोई स्मरण करेगा या इसके स्तोत्र का पाठ करेगा, उसके सब मनोरथ पूर्ण होंगे। अतः इस कमण्डलु को लो।

पंच-महाभूतों (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी) में ‘जल’ तत्व सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। फिर यह तो उसका ‘सार भाग’ होने के कारण और भी उत्कृष्ट है। ब्रह्माजी ने शिव द्वारा दिया कमण्डलु ग्रहण कर लिया। वे स्वयं तो निष्पाप हो ही गये, आगे चलकर उस कमण्डलु में स्थित ‘सार तत्व गंगा’ के द्वारा तीनों लोक भी पवित्र हुए।

-ब्रह्मपुराण/अ.-72/श्लोक 15-34

पाली 4 व्रत-विधान


(भविष्य पुराण/उत्तर पर्व/अ.-91)

जिन स्त्री-पुरुषों के शरीर से दुर्गन्धयुक्त पसीना निकलता हो और मुख में ‘विरसता’ ज्वर आदि के बाद की कड़वाहट) रहती हो, उन्हें इस ‘व्रत’ को करना चाहिए। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बावड़ी (वापी), कूप (कूएँ), पुष्करिणी (पोखरी) तथा बड़े-बड़े जलाशयों के पास पवित्र होकर जायें और भगवान् वरुण देव को ‘अर्घ्य’ प्रदान करना चाहिए।

‘व्रती’ को चाहिए कि वह ‘तडाग’ (तालाब) के तट पर जाकर फल, पुष्प, वस्त्र, दीप, चन्दन, महावर, सप्तधान्य, बिना अग्नि के स्पर्श के पका हुआ अन्न, तिल, चावल, खजूर, नारिकेल, बिजौरा, नींबू, नारंगी, अंगूर, दाडिम, सुपारी आदि उपचारों से ‘वारुणी सहित वरुणदेव’ की एवं जलाशय की विधिपूर्वक पूजा करे और उन्हें अर्घ्य प्रदान कर इस प्रकार उनकी प्रार्थना करे-

‘वरुणाय नमस्तुभ्यं नमस्ते यादसाम्पते।
अपाम्पते नमस्तेSस्त, रसाना पतये नमः।।
मा क्लेदं मा च दौर्गन्ध्यं, विरस्यं मा मुखSस्तु मे।
वरुणो वारुणी भर्त्ता वरदोSस्तु सदा मम।।

भ.पु./उत्तर पर्व-91/7-8

हे जलचर जीवों के स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। सभी जल एवं जल से उत्पन्न रस द्रव्यों के स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। मेरे शरीर में पसीना, दुर्गन्ध या विरसता आदि मेरे मुख में न हों। वारुणी देवी के स्वामी वरुणदेव! आप मेरे लिए सदा प्रसन्न एवं वरदायक बने रहें।

‘व्रती’ को चाहिए कि इस दिन बिना अग्नि के पके हुए भोजन (फल आदि) का सेवन करे। इस विधि से जो ‘पालीव्रत’ को करता है, वह तत्क्षण सभी पापों से मुक्त हो जाता है। आयु, यश और सौभाग्य प्राप्त करता है, तथा समुद्र के जल की भाँति उसके धन का कभी अन्त (क्षय) नहीं होता।

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
11 + 5 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.