सावधान अब और भी घातक हो सकता है डेंगू

Author: 
राकेश रंजन

एडीज एजिप्टीएडीज एजिप्टी (फोटो साभार - विकिपीडिया)यदि आपके पति डेंगू से ग्रसित हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि यह आपको भी प्रभावित कर सकता है। जी हाँ ऐसा सम्भव है। पिछले दिनों ब्रिटेन में जब डेंगू से ग्रसित इटैलियन आदमी के सीमेन का परीक्षण किया गया तो उसमें डेंगू के वायरस पाये गए। डेंगू के मरीज के सीमेन में इस बीमारी के वायरस पाये जाने की विश्व में यह पहली घटना है।

66 प्रतिबन्धित कीटनाशक भारत में हो रहे हैं प्रयोग

Source: 
अमर उजाला, 5 मई 2018

कीटनाशक का छिड़काव करता किसानकीटनाशक का छिड़काव करता किसान नई दिल्ली। खेती एवं पर्यावरण पर दुष्प्रभाव डालने वाले कई कीटनाशकों का प्रयोग भारत में किया जाता है जबकि दुनिया में कई देशों ने उन्हें प्रतिबन्धित किया है। कृषि मंत्रालय ने इस हकीकत का खुलासा एक पर्यावरण कार्यकर्ता द्वारा लिखे गये पत्र के जवाब में किया है। उसने बताया है कि ऐसे 66 कीटनाशक हैं जिन पर विभिन्न देशों में रोक है पर भारत में उनका प्रयोग किया जाता है।

मंत्रालय ने ग्रेटर नोएडा के विक्रान्त तोंगड़ के पत्र के जवाब में कहा है कि कीटनाशक के प्रयोग का निर्णय और अनुमति देश की कृषि-पर्यावरण स्थितियों, फसल के पैटर्न, भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और साक्षरता के स्तरों पर तय की जाती है।

सरकार समय-समय पर इस मामले में संज्ञान लेकर कीटनाशको के प्रभाव पर पुनर्विचार करती है। इसके लिये खासतौर पर एक विशेषज्ञ समिति गठित है जिसकी सिफारिशों पर देश में 28 कीटनाशकों के निर्यात, निर्माण और प्रयोग पर रोक लगाई जा चुकी है। इसके अलावा तीन अन्य कीटनाशकों पर रोक लगाई गई थी जिनकी सामग्री से देश में निर्माण कराया जाता था।

मंत्रालय कीटनाशकों के प्रति किसानों को कर रहा जागरूक

जीवन में जहर घोलता पानी

Author: 
केसर सिंह

फ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाईफ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाई हाल में जल-गुणवत्ता के मुद्दे पर हुई एक कॉन्फ्रेंस में हैदराबाद जाना हुआ। जहाँ नलगौंडा से कुछ बच्चे और बुजुर्ग भी आए थे। उनमें से कई दिव्यांग थे, वजह फ्लोरोसिस नामक बीमारी। पानी में फ्लोराइड की अधिक मौजूदगी से फ्लोरोसिस बीमारी होती है। तेलंगाना के पूरे नालगौंडा जिले के भूजल में फ्लोराइड है।

पेयजल की लाइनों में कैल्शियम

Source: 
दैनिक जागरण, 23 अप्रैल, 2018

दून में वर्षों पुरानी पेयजल लाइनों में कैल्शियम जमने से पानी की डिलीवरी कम हो गई है। कैल्शियम के जमाव से पाइप लाइन की रेडियस कम हो गई है, ऐसे में पानी का प्रेशर बढ़ने पर ये बार-बार क्षतिग्रस्त हो रही हैं और शहरवासियों को पानी के लिये संघर्ष करना पड़ रहा है। जल संस्थान द्वारा पाइप लाइनों से कैल्शियम हटाने के लिये कई योजनाएँ बनाई गईं, लेकिन कामयाब नहीं रहीं। हाल ही में एक कम्पनी ने दावा किया था कि वह इलेक्ट्रोड कैल्शिनेशन के जरिए पाइप लाइनों से कैल्शियम हटाएगी, लेकिन कम्पनी का दावा ट्रायल में ही फेल हो गया। बढ़ता कैल्शियम, घटता प्रेशर

दरअसल दून के पानी में कैल्शियम की मात्रा बहुत ज्यादा है। इसके कारण अक्सर पाइपलाइनों में कैल्शियम जम जाता है और इसके कारण पानी की सप्लाई कम हो जाती है। पाइपों की रेडियस लगातार कम होती जाती है और पानी की पर्याप्तता के बाद भी लोगों को पानी नहीं मिल पाता।

कैल्शियम हटाने का ट्रायल फेल

आपके शहर में ऐसे हो रहा है ‘अर्थ’ का अनर्थ

Source: 
दैनिक जागरण, 22 अप्रैल, 2018

ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे से दून भी अछूता नहीं है। यहाँ की नदियों में अब पानी की जगह सूखी धरती पर वाहनों की बाढ़ नजर आती है। देहरादून के तापमान में वृद्धि भी ग्लोबल स्टैंडर्ड से अधिक मापी गई है। स्टैंडर्ड 50 वर्ष में 1 डिग्री सेल्सियस का है, लेकिन दून में 40 वर्ष में ही तापमान में औसत 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे में औसत से अधिक तेजी से बढ़ रहे तापमान की वजह है घटते पेड़ और उनकी जगह उगते कंक्रीट के जंगल। देहरादून की बात करें तो वर्ष 1972 से 1977 तक 5 वर्षों में शहर में गर्मी के तीन महीनों का एवरेज मैक्सिमम तापमान 33.7 डिग्री सेल्सियस और मिनिमम तापमान 19.6 डिग्री सेल्सियस आँका गया था। ठीक 40 साल बाद 2012 से 2017 के बीच 5 वर्ष के तापमान का एवरेज मैक्सिमम 34.6 डिग्री सेल्सियस और मिनिमम तापमान 20.4 डिग्री सेल्सियस रहा। जो 40 वर्ष में लगभग 1 डिग्री बढ़ गया है। बढ़ते तापमान की यह है वजह

पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट इसकी वजह खेती की जमीन पर कंक्रीट के जंगल उगाये जाने को जिम्मेदार मानते हैं। वे कहते हैं कि 40 साल पहले दून वनों का शहर था। चारों ओर जंगल हरे-भरे खेत फैले हुए थे, आज चारों ओर कंक्रीट के जंगल हैं। ऐसे में तापमान तो बढ़ना ही है।

ग्लेशियर जोन ज्यादा सेंसिटिव

एचएनबी गढ़वाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक डॉ. एसपी सती के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग को लेकर दुनिया भर में की जा रही रिसर्च बताती है कि ग्लेशियर और समुद्र तटीय क्षेत्रों में मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है। सभी हिमालयी राज्यों पर भी इसका असर अन्य क्षेत्रों की तुलना में तेजी से पड़ रहा है।

बंगाल की नदियों का अस्तित्व खतरे में

गंगा में ऐसे कई पावर प्लांट कूड़ा डालते हैंगंगा में ऐसे कई पावर प्लांट कूड़ा डालते हैंमानव सभ्यता के विकास में नदियों का बड़ा योगदान है। कमोबेश सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुईं हैं। वजह है जीवन के लिये जल सबसे जरूरी तत्व है और नदियों को जल के अकूत स्रोत के रूप में देखा गया।

भारत में शायद ही कोई राज्य है, जिससे होकर नदियाँ न गुजरती हों। बंगाल की खाड़ी से सटे पश्चिम बंगाल को तो ‘नदीमातृक’ नाम से नवाजा गया है।

प्लास्टिक से परहेज करें

Source: 
दैनिक जागरण, 22 अप्रैल, 2018

जिस प्लास्टिक को हम बड़ी शान से अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए हुए हैं, वही अब हमारी नसों में पैबस्त होकर हमें खोखला, बहुत खोखला करता जा रहा है। रसायन विज्ञान की यह खोज मानवता के लिये धीमा जहर बन चुकी है। रिसाइकिल की पर्याप्त व्यवस्था न होने से यहाँ-वहाँ प्लास्टिक के ढेर जमा हैं। प्राकृतिक रूप से यह सड़नशील नहीं है। सैकड़ों-हजारों वर्षों में इसकी धुर्री-धुर्री भूजल में मिल रही है। जिस पानी को हम पीते हैं, उसमें प्लास्टिक के सूक्ष्म कण मिलने लगे हैं, कई जगह समुद्र के पानी से बने नमक में भी ये प्लास्टिक मिला है। यही प्लास्टिक आगे जाकर हमारी पीढ़ियों को रुग्ण बनाएगा। अब आपको सोचना है कि प्लास्टिक से परहेज करके अपनी पीढ़ियों को बचाना है या उन्हें उनकी किस्मत पर छोड़ देना है। दुनिया भर में प्लास्टिक के बढ़ते खतरे के प्रति आगाह करने के लिये इसे बार 22 अप्रैल को मनाए जा रहे पृथ्वी दिवस की थीम भी यही है, प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करो।
प्लास्टिक बैगप्लास्टिक बैगप्लास्टिक खत्म करने की पहल

हमारी ही लापरवाही का नतीजा है कि समुद्र में प्लास्टिक कचरा बढ़ रहा है आशंका है कि अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक समुद्र में मछलियों से अधिक प्लास्टिक कचरा नजर आएगा। हालांकि इससे निपटने के प्रयास भी जारी हैं। इसी क्रम में नीदरलैंड ने समुद्र साफ करने की पहल कर दी है।

डेंगू का डंक

Author: 
संतन कुमार पांडेय
Source: 
विज्ञान प्रगति, अप्रैल, 2018

एडीज एजिप्टीएडीज एजिप्टीडेंगू संक्रमण संत्रस्त करने वाला है। इसका नाम सुनते ही सकते में आ जाना पड़ता है। जानकारों के अनुसार इसके नाम का सम्बन्ध स्पेनिश व स्वाहिली से ही है। एक मान्यता है कि स्वाहिली के ‘का-डिंगा-पेपो’ अर्थात पापी प्रदत्त टीसता दर्द जैसे शब्द से डेंगू या डेंगी बना। दूसरी मान्यता है कि स्पेनिश ‘हार्ड टू प्लीज’ या ‘केयरफुल’ से गढ़ा गया क्योंकि डेंगू के मरीज को हड्डियों समेत जोड़ों में हाड़तोड़ दर्द होता है। इसे ‘ब्रेकबोन बुखार’ बुलाते हैं।

सन 1789 में इम्पेरियल कॉलेज प्रेस के दस्तावेज में सर्वप्रथम ‘ब्रेक बोन फीवर’ का उल्लेख डॉ. बेंजामिन रश ने किया था लेकिन सन 1828 के बाद ही डेंगू शब्द प्रचलित हुआ। उष्ण कटिबन्धीय देशों के कोई ढाई अरब लोगों पर इसकी चपेट में आने का खतरा मँडराता है। अखिल विश्व में 39 करोड़ लोग डेंगू से प्रतिवर्ष ग्रस्त होते हैं।

‘इंफेक्शन, जेनेटिक्स एंड इवॉल्यूशन’ नामक पत्रिका के एक खोजपूर्ण लेख में आनुवंशिक अध्ययन के आधार पर ऐसा खुलासा हुआ कि भारत और श्रीलंका में डेंगू के घातक विषाणु नम्बर-तीन और चार यहीं फले-फूले और फैले। इन विषाणुओं के आनुवंशिक बदलाव के कारण डेंगू गम्भीर बीमारी बन गई हालांकि दक्षिण पूर्वी एशिया के दूसरे देशों की तुलना में भारत में इन विषाणुओं की उतनी विपत्तिजनक स्थिति नहीं है पर कभी-कभार भारत के कई हिस्सों में महामारी का रूप अख्तियार करने से नहीं चूकती।

पहाड़ों को भी समझें अपना घर : रस्किन बॉन्ड

Author: 
रस्किन बॉन्ड
Source: 
हिन्दुस्तान, 08 अप्रैल, 2018

मौसम में तपिश बढ़ी नहीं कि पहाड़ याद आने लगते हैं। वहाँ परिवार या दोस्तों के साथ मन कुछ ऐसा बौरा जाता है कि हमें पहाड़ की मर्यादा याद ही नहीं रहती। उस खूबसूरत जगह को हम बदले में प्लास्टिक कचरे का उपहार देकर लौटते हैं। आँखों से होकर दिल में उतरने वाले पहाड़ों को आप अपना घर क्यों नहीं समझते? पहाड़ से कैसे करें प्यार, ‘फुरसत’ के लिये खासतौर से बता रहे हैं मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड

अधिकतर लोग कहते हैं कि पहाड़ों में आकर उनकी सारी थकान दूर हो जाती है। अच्छे मौसम के साथ पहाड़ों का एक फायदा ये भी है कि यहाँ किस मोड़ पर भगवान से मुलाकात हो जाये, कहा नहीं जा सकता। ज्यादातर लोग जो एक बार पहाड़ घूम चुके हैं, दोबारा यहाँ आना चाहते हैं। पहाड़ की सैर सालों तक दिलो-दिमाग में छाई रहती है।