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ग्रामीण आबादी के लिये अनूठा वाटर प्यूरीफायर (Innovative Water Purifier for Rural Population)

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, नई दिल्ली, 08 नवम्बर, 2017


भारतीय शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सोलर वाटर प्यूरीफायर बनाया है, जो ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने में मददगार हो सकता है। महाराष्ट्र के फलटण में स्थित निम्बकर कृषि अनुसंधान संस्थान (एनएआरआई) के शोधकर्ताओं ने सौर ऊर्जा पर आधारित एक नया सोलर वाटर प्यूरीफायर (एसडब्ल्यूपी) विकसित किया है। इसकी खासियत यह है कि सौर ऊर्जा से संचालित होने के बावजूद इस तकनीक में सोलर पैनल या फिर बैटरी का उपयोग नहीं किया गया है।

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पानी को साफ करने की यह रणनीति दो चरणों पर आधारित है। पहले चरण में किसी जलस्रोत से प्राप्त पानी को कई परतों में तह किए गए साफ सूती कपड़े से छान लिया जाता है। ऐसा करने से पानी से पार्टीकुलेट मैटर अलग हो जाते हैं। दूसरे चरण में तीन लीटर क्षमता वाली काँच की चार ट्यूबों का उपयोग किया जाता है, जो एक चैनल में लगे पात्र से जुड़ी रहती हैं। पात्र की मदद से काँच की ट्यूबों में पानी भरकर खुले स्थान में रख दिया जाता है। लगातार सूर्य की रोशनी के सम्पर्क में रहने से पानी गर्म हो जाता है और काँच की नलियों में संचित होने के कारण ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती। इस कारण ट्यूबों में भरे पानी का तापमान लम्बे समय तक स्थिर बना रहता है। एक बार पानी गर्म हो जाए तो उसे देर तक गर्म बनाए रखा जा सकता है और उसमें मौजूद बैक्टीरिया निष्क्रिय हो जाते हैं। इस तरह एक सामान्य सोलर वाटर प्यूरीफायर से प्रतिदिन करीब 15 लीटर सुरक्षित पेयजल मिल जाता है।

बाढ़ भी बिगाड़ देती है भूजल की सेहत

Source: 
दैनिक जागरण, 07 नवम्बर, 2017

बाढ़ से प्रदूषित भूजलबाढ़ से प्रदूषित भूजलएक नए अध्ययन में सामने आया है कि प्रदूषण की शिकार नदियों में आने वाली बाढ़ के कारण भूजल के भी प्रदूषित होने का खतरा बढ़ जाता है और यह हमारे इस्तेमाल के लिये असुरक्षित हो जाता है। दिसम्बर 2015 में जब चेन्नई बाढ़ की आपदा का सामना कर रही थी तब अन्ना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम अड्यार नदी के किनारे भूजल के सैम्पल एकत्र कर रही थी ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस इलाके में जमीन के अन्दर का पानी मानव इस्तेमाल के लिये फिट है।

पाँच महीनों के दौरान लिये गए सैम्पल


शोधकर्ताओं ने दिसम्बर 2015 से अप्रैल 2016 के बीच 17 ठिकानों से भूजल के नमूने एकत्र किये। यही बाढ़ और उसके बाद का समय था। वैज्ञानिकों ने नमूनों का परीक्षण नमक, भारी धातु सान्द्रता के साथ-साथ एंटी बायोटिक तत्वों की उपलब्धता का स्तर जानने के लिये किया। अन्ना यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आॅफ जियोलाजी के प्रोफेसर लक्ष्मणन इलांगो ने कहा, हम जानना चाहते थे कि चेन्नई शहर में जमीन के पानी की गुणवत्ता का स्तर उतना ही है या नहीं जितना कि बाढ़ या उसके बाद के समय के लिये भारतीय मानक ब्यूरो ने निर्धारित किया है।

गोमती के जल, तलछटों और जलीय पादपों में भारी धातुओं का स्तर चिंताजनक (Heavy metal pollution in Gomti)

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 01 नवम्बर, 2017

लखनऊ में गोमती नदी प्रदूषण के कारण काफी समय से सुर्खियों में बनी हुई है। अब वैज्ञानिकों ने अपने शोध से गोमती के जल में हानिकारक भारी धातुओं के होने की पुष्टि की है। पहली बार गोमती में आर्सेनिक की उपस्थिति का भी पता चला है।

गोमती नदी भारी धातुओं का मतलब ऐसी धातुओं से होता है जिनका घनत्व 5 से अधिक होता है और जिनकी अत्यधिक सूक्ष्म मात्रा का भी पर्यावरण पर खासा असर पड़ता है। इनका निर्धारित सान्द्रण सीमा से अधिक पाया जाना वनस्पतियों, जीवों एवं मानव स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। साथ ही ये जल और मृदा के धात्विक प्रदूषण का भी कारण बनती हैं। भारी धातुओं में कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, मरकरी, मैगनीज, मोलिब्डिनम, निकिल, लेड, टिन तथा जिंक शामिल हैं।

बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग, झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, राँची के पर्यावरण विज्ञान केंद्र तथा भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने सम्मिलित रूप से गोमती के पारिस्थितिक तंत्र में भारी धातुओं की सांद्रता का एकीकृत मूल्यांकन किया है। अभी तक गोमती के जल तथा उसकी तलहटी में बैठे तलछटों और प्राकृतिक रूप से मिलने वाले जलीय पादपों पर कोई व्यापक अध्ययन नहीं किया गया था। इस शोध के परिणाम हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका करेंट साइंस में प्रकाशित हुए हैं।

खाने से पहले की छोटी-छोटी लेकिन मोटी बातें

Author: 
मनीष अग्रहरि
Source: 
विज्ञान प्रगति, अक्टूबर 2017

इन दिनों फलों, सब्जियों, पशु उत्पादों और डेयरी समेत अन्य खाद्य उत्पादों को रोगों व कीटों से बचाने के लिये भारी मात्रा में पेस्टीसाइड का उपयोग किया जाता है अथवा उनको पकाने, बढ़ाने, चमकाने वाले बहुसंख्यक हानिकारक रसायनों का उपयोग किया जाता है। इन रसायनों का रेजीडुअल इफेक्ट (अवशेष प्रभाव) काफी लम्बे समय तक कायम रहता है। यदि खाद्य उत्पादों को सावधानी से उपयोग न किया गया तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचना तय है।

जहर से कम नहीं है प्लास्टिक कचरा (Poison of plastic waste)


हमारे यहाँ यह समस्या खासकर इसलिये और भयावह शक्ल अख्तियार कर चुकी है क्योंकि देश में जारी स्वच्छता अभियान के बावजूद प्लास्टिक युक्त कचरे से क्या गाँव, क्या कस्बा, क्या नगर-महानगर, यहाँ तक कि इससे देश की राजधानी तक अछूती नहीं है। इस मामले में देश की राजधानी की हालत और बदतर है। असलियत में यहाँ जगह-जगह प्लस्टिक बैग बिखरे पड़े रहते हैं। यहाँ इसलिये इस खतरे को किसी भी कीमत पर दरगुजर नहीं किया जा सकता।

लखनऊ के बीकेटी से निकली रेठ नदी का पानी जानलेवा (Reth River's Water Became Black)

Author: 
आशीष तिवारी

बाराबंकी के पास कुछ इस कदर गन्दी हो चुकी है रेठ नदीबाराबंकी के पास कुछ इस कदर गन्दी हो चुकी है रेठ नदीलखनऊ के बक्शी का तालाब से निकली रेठ नदी का पानी जलजीव व मनुष्य के लिये घातक है। इस बात का खुलासा नदी के पानी के कुछ दिन पहले लिये गए नमूने की जाँच रिपोर्ट में हुआ है। यह नमूना कुर्सी थाना के अगासड़ में संचालित हो रहे यांत्रिक स्लाटर हाउस अमरून फूड प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर लिया गया था। यह नदी जिले से गुजरे वाली गोमती नदी में समाहित हो जाती है। हैरानी की बात तो यह है कि जिला प्रशासन ने नदी के पानी के शुद्धिकरण व उसकी वजहों तक जाकर रोकने के बजाय पूरी रिपोर्ट शासन को भेजकर चुप्पी साध ली है। अब इसको लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। क्योंकि यह एक ऐसी नदी है जो बाराबंकी की पहचान के तौर पर जानी जाती है।

इलाके के लोगों का कहना है कि चूँकि इस नदी की लम्बाई ज्यादा नहीं है ऐसे में अगर प्रशासन चाहे तो इस नदी को बचाने के लिये बेहतर प्रयास कर सकती है। लेकिन न तो प्रशासन की ओर से कुछ हो रहा है और न ही स्थानीय नेताओं की ओर से। जल संरक्षण को लेकर काम करने वालों ने जरूर नदी के प्रदूषित हो रहे पानी और खो रही नदी के अस्तित्व पर आगे आने की बात कहीं लेकिन अभी तक उसका कोई खास असर नहीं दिखा।

क्या कहा गया है रिपोर्ट में

रास्ते का पत्थर - किस्मत ने हमें बना दिया

Author: 
धीरज मिश्रा
Source: 
प्रयुक्ति, 01 अक्टूबर, 2017

1414 में मुगल शासक गयासुद्दीन तुगलक यहाँ रहा करते थे। आज इस धरोहर की एक दीवार विदेशी पर्यटक के लिये पर्यटन स्थल बन चुकी है। वहीं इसके पीछे पहाड़ियों पर बसा है तुगलकाबाद गाँव, जिसने दिल्ली की राजनीति में तीन विधायक व एक सांसद दिये हैं। रामवीर सिंह बिधूड़ी से लेकर रामसिंह बिधूड़ी व मौजूदा विधायक सही राम इसी गाँव से हैं। गाँव से तीन बड़े राजनेता होने के बावजूद ग्रामीणों को पीने का पानी नहीं मिलना गम्भीर सवाल खड़े कर रहा है। सांसद ग्राम योजना के तहत दक्षिणी दिल्ली से सांसद रमेश बिधूड़ी ने भाटी गाँव गोद लिया, लेकिन सांसद को अपने गाँव में पानी की समस्या दिखाई नहीं देती। आम आदमी पार्टी से विधायक सही राम, जिनकी पार्टी लोगों को फ्री में पानी पिलाने का वादा कर रही थी, लेकिन विधायक के क्षेत्र में आने वाले गाँव में लोगों को फ्री में पानी तो दूर पीने लायक भी नहीं मिलता है।

जल संसाधन संरक्षण एवं विकास

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

जल एक बहुमूल्य संसाधन है। यह कहीं विकास का तो कहीं विनाश का कारक बनता है। जनसंख्या वृद्धि एवं भावी आवश्यकता को देखते हुए जल के एक-एक बूँद की उपयोगिता बढ़ गयी है। अत: जनसंख्या दबाव तथा आवश्यकतानुसार जल संसाधन का उचित उपयोग करने का योजनानुसार लक्ष्य रखा गया है। जल संरक्षण एवं विकास वर्षा की बूँद का पृथ्वी पर गिरने के साथ ही करना चाहिए। इस हेतु नदी मार्गों पर बांधों एवं जलाशयों का निर्माण करना होगा ताकि भविष्य में हमें पीने को शुद्ध पेयजल, सिंचाई, मत्स्यपालन एवं औद्योगिक कार्यों हेतु जल उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही बाढ़ों से मुक्ति मिल सके एवं कम वर्षा, नीचे जल स्तर, सूखा ग्रस्त एवं अकालग्रस्त क्षेत्रों में नहरों आदि में जल की पूर्ति हो सके।

जल संसाधन की वर्तमान समस्याएँ :


जल का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण स्रोत मानसूनी वर्षा है। ऊपरी महानदी बेसिन में मानसूनी से वर्षा होती है। इस कारण वर्षा की अनियमितता, अनिश्चितता एवं असमान वितरण पाई जाती है। इस असमानता को दूर करने के लिये बेसिन में जल संसाधन संरक्षण की आवश्यकता है।

जल संरक्षण :


जल एक प्राकृतिक उपहार है, जिसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जाना चाहिए। ऊपरी महानदी बेसिन में जल का मुख्य स्रोत सतही एवं भूमिगत जल है। सतही जल में नदियाँ, नहरें एवं जलाशय है जबकि भूमिगत जल में कुआँ एवं नलकूप प्रमुख है। इन जल संग्राहकों से जल संग्रह कर 96.99 प्रतिशत भाग में सिंचाई किया जाता है एवं शेष 3.01 प्रतिशत जल का उपयोग औद्योगिक एवं अन्य कार्यों हेतु होता है।

पोल्ट्री फार्मिंग में एंटीबायोटिक - खतरे ही खतरे (Antibiotic in poultry farming is dangerous)

Author: 
प्रियंका त्रिपाठी, रैना हासन, श्रेया वर्मा, अमित खुराना, मौना नागराजू, राजेश्वरी सिन्हा
Source: 
डाउन टू अर्थ, सितम्बर 2017

सीएसई के शोध में न सिर्फ पोल्ट्री फार्म के अपशिष्ट में एबीआर बैक्टीरिया की भारी मात्रा पाई गई बल्कि फार्म की मिट्टी एवं उसके आस-पास की कृषि भूमि में भी ऐसा ही देखने को मिला। ई. कोलाई के 62 नमूने मल्टी ड्रग रजिस्टेंट थे। हर छठा ई कोलाई नमूना परीक्षण के लिये प्रयोग में लाये गए 13 में से 12 एंटीबायोटिक प्रतिरोधी था। यहाँ तक कि दो ई कोलाई के नमूनों में 13 एंटीबायोटिक के विरुद्ध प्रतिरोधी क्षमता थी। ठीक इसी प्रकार, के निमोनिये के 92 प्रतिशत नमूने मल्टी ड्रग रजिस्टेंट पाये गए। हरियाणा के कावी गाँव के किसान चांद सिंह कहते हैं कि वह नियमित रूप से मुर्गियों को एनरोसिन और कोलिस्टिन नामक एंटीबायोटिक्स देते हैं। कावी से करीब 150 किलोमीटर दूर सांपका गाँव के एक अन्य किसान रामचंदर भी बताते हैं कि वह सिप्रोफ्लोक्सिसिन और एनरोफ्लोक्सिसिन एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करते हैं। बिना रोकटोक एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से एंटीबायोटिक रजिस्टेंट (एबीआर) बैक्टीरिया का उभार हो रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह बैक्टीरिया एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर मरता नहीं है यानी बीमारी का इलाज नहीं हो पाता। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) का ताजा अध्ययन बताता है कि पोल्ट्री फार्मों में उच्च स्तरीय एबीआर पाई गई है।