आदिवासी औरतों ने खोदा कुआँ

Submitted by RuralWater on Sun, 06/05/2016 - 10:31
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विश्व पर्यावरण दिवस, 05 जून 2016 पर विशेष


औरतों के अपने दम पर कुआँ खोदने की बात का पुरुषों ने विरोध किया और यहाँ तक कहा कि ये काम आसान नहीं है। मिट्टी तक तो खोद लेंगी पर जब धरती में नीचे चट्टानें आएँगी, तब क्या करेंगी। पुरुषों के लिये ही यह काम कठिन होता है तो ऐसे में घाघरा पल्टन यह काम कैसे करेगी। हर घर के पुरुषों ने अपने–अपने घरों की औरतों को रोकने की कोशिश की पर कोई औरत नहीं रुकी। उन्होंने तय कर लिया था, वही किया। कुएँ की खुदाई शुरू हुई। पाँच हाथ फिर दस हाथ। बीस औरतें हर दिन अपने घरों के काम जल्दी निपटाकर आ पहुँचती और शाम होने तक गीत गाते, एक दूसरे का उत्साह बढ़ाते काम करती रहतीं। इन आदिवासी औरतों ने हमारे सामने एक बड़ी नजीर पेश की है कि अब हमें अपने पर्यावरण और पानी जैसे जरूरी मसलों के लिये सरकारों की ओर मुँह ताकने की जगह खुद आगे-आगे बढ़कर पहल करनी होगी। पानी के लिये जहाँ देश के तमाम इलाकों में हाहाकार मचा है, हर तरफ एक ही तरह की तस्वीर है। किल्लत, किल्लत और किल्लत।

टैंकर के पीछे भागते सैंकड़ों लोग, सिर पर बर्तन लिये महिलाओं का पानी के लिये जद्दोजहद करना। लेकिन इन्हीं तमाम तस्वीरों में एक और तस्वीर है, जिसकी असलियत जानने के बाद आपको सुकून मिलेगा। महिलाओं को अबला समझने वाली सोच उस समय शर्मसार हो गई, जब इलाके में चमत्कार हो गया। “गाँव में पानी तो इंद्र देव की मेहरबानी से ही आ पाएगा” ये सोच रखने वाला समाज उस वक्त भौंचक्का खड़ा देख रहा था, जब चट्टानों के बीच में से पानी की धारा फूट पड़ी और जिन्हें अबला समझा जा रहा था वो हाथ में कुदाल, गेंती, फावड़ा लेकर खुशी से नाच रही थीं। ये इन औरतों की इच्छाशक्ति, जी तोड़ मेहनत और कुछ करने का जुनून ही था, जिसने पानी की समस्या से जूझ रहे इलाके को पानी की सौगात दे डाली।

मध्य प्रदेश में खंडवा जिले के खालवा विकासखण्ड का लंगोटी गाँव। यह इलाका निमाड़ कहलाता है और यहाँ पानी की कमी सदियों पुरानी रही है। इस गाँव में 80 फीसदी आबादी कोरकू जनजाति की है। करीब दो हजार लोगों की बस्ती में पीने तक का पानी नहीं। गाँव के दोनों सरकारी हैण्डपम्प सूख गए। गाँव घड़े–घड़े पानी को मोहताज। सरकारी अफसरों से मदद के लिये कहा पर कुछ नहीं हुआ। पंचायत ने भी हाथ खड़े कर दिये।

पानी की किल्लत औरतों के लिये कोई एक–दो दिन की बात नहीं थी, गाँव में पानी खत्म हो गया तो औरतों को सिर पर मटका रखकर दो से ढाई किमी दूर खेतों पर बने कुओं और ट्यूबवेल से पानी लाना पड़ रहा था। और वहाँ भी कहाँ आसान था। कभी बिजली नहीं तो कभी खेत मालिक की मर्जी।

महिलाओं के परिश्रम और लगन से खोदा गया कुआँएक खेत पर बने ट्यूबवेल से तो वही औरतें पानी भर पाती, जो हर साल ट्यूबवेल मालिक सूरज बघेल को बिजली के खर्चे के सौ रुपए दे सके। 2011 के बाद से ही पानी को लेकर परेशानी बढ़ गई थीं और इस परेशानी का सारा बोझ गाँव की औरतों पर आ गया। कई बार औरतों को खाली बर्तन लेकर वापस आना पड़ता था। पानी की परेशानी हर दिन बढ़ती जा रही थी।

औरतें अपने घर में मर्दों से पानी को लेकर कुछ करने की मिन्नत करती रहती थीं। मगर हर घर में यह आवाज जैसे उठती थी, वैसे ही खामोश हो जाती थी। फिर नई सुबह के साथ वही पानी के लिये जिल्लत और मशक्कत का सामना करना पड़ता था।

तब इन्होंने खुद धरती का सीना चीरकर न सिर्फ पानी निकाला बल्कि हमारे पूरे सभ्य समाज को अनपढ़ और पिछड़ी समझी जाने वाली इन आदिवासी औरतों का यह सन्देश भी है। इन्होंने अपना कुआँ खुद खोदने के लिये जीतोड़ मेहनत तो की ही। बाद में जब चट्टान तोड़ना जरूरी था तो इन मजदूर औरतों ने अपना पेट काटकर आठ हजार रुपए इकट्ठे किये और उनसे कुएँ को गहरा भी कराया।

दरअसल इनके कुएँ में 25 फीट तक खुदाई के बाद काम रुका हुआ था। चट्टान तोड़ने के लिये ब्लास्ट जरूरी था। थोड़ी सी पानी की आव से गाँव की पूर्ति सम्भव नहीं थी। लिहाजा सरकार से ब्लास्ट करने की गुहार की।

कई बार जिला पंचायत तक गए पर कोई हल नहीं निकला। तब खुद इन मजदूर औरतों ने ही अपने पेट काटकर समूह में आठ हजार रुपए इकट्ठे किये और चार–चार हजार की लागत से दो बार ब्लास्ट कराया। इससे अब पर्याप्त पानी आ गया है। इसका मलबा खुद औरतें ही हटा रही हैं। थोड़े ही दिनों में इसका पानी अब पूरे गाँव को मिलने लगेगा। अब तो औरतों के चेहरे की चमक और उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है।

कुआँ खोदे जाने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। पानी के लिये पंचायत, सरकार और समाज हर तरफ से निराशा के बाद भी इन अपढ़ औरतों ने हार नहीं मानी। एक दिन सब औरतें बैठीं और मिलकर गाँव में पानी की किल्लत का उपाय सोचने लगी। उन्हें लगा कि समस्या का पार पाना है तो सबको साथ मिलकर कोई रास्ता निकालना होगा।

आनन–फानन में योजना बनी कि हम दूर कुएँ तक नहीं जाएँगी, बल्कि कुएँ को ही गाँव में ले आएँगी। बीस औरतें कमर कसकर तैयार हो गईं। पर कुआँ खुदेगा कहाँ। इस पर बात चल ही रही थी कि किसी ने कहा कि यदि गंगा बाई और उसकी जेठानी रामकली बाई की जमीन के बीच कुआँ खोदा जाएगा तो अच्छा पानी निकल सकेगा। पर यह जमीन तो उनकी निजी है।

कुएँ में ब्लास्ट करने के बाद मलबा साफ करती औरतेंबैठक में मौजूद गंगा बाई ने आगे बढ़कर कहा कि गाँव को पानी मिले तो वे अपने हिस्से की जमीन छोड़ने को तैयार हैं। रामकली बाई भी गंगा बाई की तरह अपने हिस्से की जमीन देने को तैयार हुई। इस तरह दोनों की आधी–आधी जमीन पर कुआँ बनना तय हुआ। बात यह भी उठी कि वे पानी आने तक कुएँ की खुदाई करेंगी।

औरतें खुद श्रमदान करेंगी, लेकिन ऐसा न हो जाये कि पानी निकलने के बाद गंगा बाई और रामकली बाई उस कुएँ पर अपना अधिकार समझने लगे। इस पर 50 वर्षीय गंगा बाई और 60 वर्षीय रामकली बाई ने पास के कस्बे में बकायदा सौ रुपए के स्टांप लिखकर शपथ पत्र दिया कि यह कुआँ उनका नहीं होकर पूरे गाँव के लिये होगा।

औरतों के अपने दम पर कुआँ खोदने की बात का पुरुषों ने विरोध किया और यहाँ तक कहा कि ये काम आसान नहीं है। मिट्टी तक तो खोद लेंगी पर जब धरती में नीचे चट्टानें आएँगी, तब क्या करेंगी। पुरुषों के लिये ही यह काम कठिन होता है तो ऐसे में घाघरा पल्टन यह काम कैसे करेगी।

हर घर के पुरुषों ने अपने–अपने घरों की औरतों को रोकने की कोशिश की पर कोई औरत नहीं रुकी। उन्होंने तय कर लिया था, वही किया। कुएँ की खुदाई शुरू हुई। पाँच हाथ फिर दस हाथ। बीस औरतें हर दिन अपने घरों के काम जल्दी निपटाकर आ पहुँचती और शाम होने तक गीत गाते, एक दूसरे का उत्साह बढ़ाते काम करती रहतीं। कुदाली, हथौड़ा, छैनी, सब्बल, सीढ़ी।। जिसके घर में जो था, वही लेकर आती रही।

26 साल की फूलवती अपने हाथों के छाले दिखाते हुए कहती हैं कि इनका दुःख नहीं है, ये तो कल ठीक हो जाएँगे पर हमारे अपने कुएँ में पानी हिलोरे लेगा, इसकी खुशी है। महीना बीत गया पर पानी का नामोनिशान नहीं था। पानी भले ही न हो लेकिन औरतों में उम्मीद बाकी थी। जैसे–जैसे दिन गुजर रहे थे। आदमी उन्हें ताने मारते, पर औरतों ने हार नहीं मानी। चालीसवें दिन औरतों की भी किस्मत जागी। आखिरकार जिद्दी चट्टानों को भी हार माननी पड़ी। कुएँ की तली से जैसे ही एक बड़ी चट्टान टूटी तो पानी की धार ने उन औरतों के फीके चेहरे भी खुशियों के रंग से सराबोर कर दिये। अब तो आदमी उनके साथ जुटने लगे।

कुएँ का पत्थर तोड़ती महिलाएँयह एक बड़े संघर्ष की कहानी है। पंचायत और सरकार की चौखट से बार–बार खाली हाथ लौटने के बाद भी इन आदिवासी औरतों ने कभी हार नहीं मानी। इसी जज्बे से आज उनकी बस्ती पानीदार हो गई है। इन औरतों ने पसीना बोकर धरती का सीना खुद फोड़ा और आखिरकार अपने हिस्से का पानी निकाल ही लिया। इतना ही नहीं जब तली की चट्टान तोड़ने में भी सरकारी नियम आड़े आ गए तो इन्होंने खुद ही उसका रास्ता भी निकाला। इन मजदूर औरतों ने अपने पेट काटकर गाँव की भलाई के लिये आठ हजार रुपए इकट्ठे कर दो बार धमाके से पानी के आड़े आ रही चट्टान को भी छार–छार कर दिया।

निजी जमीन पर कुआँ होने से हम इसका गहरीकरण नहीं करा सकते। हालांकि शपथ पत्र दिया था लेकिन इससे मालिकाना हक नहीं बदलता... सौरभ राठौड़, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत खंडवा

यह काम आसान नहीं था पर औरतों ने कर दिखाया। ब्लास्ट के साथ इसे पाँच फीट तक और खोदा है ताकि पूरे साल इसमें पानी बना रहे... सीमा प्रकाश, स्पंदन सेवा समिति, खंडवा

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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