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वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य को सीधा खतरा


भारतीय आसमान में प्रदूषण की यह पट्टी मुख्य रूप से देश में पारम्परिक तौर पर आग के लिये लकड़ियों का इस्तेमाल, कोयला की भट्टियों, कारों और फैक्टरियों से निकलने वाले धुएँ के कारण ही है। चीन इन सब कारकों पर काबू पाने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है जबकि भारत में प्रदूषण को नियंत्रण करने वाले कानून तो हैं लेकिन इसके खिलाफ चीन की तरह लोगों के बीच मुहिम बनता नहीं दिखा रहा है।

देश का पर्यावरण दिनोंदिन प्रदूषित होता जा रहा है। हमारे चारों तरफ के उपयोगी पदार्थ मसलन पानी, हवा, जमीन आदि प्रदूषण के चपेट में हैं। पानी और खाद्य पदार्थ के मामले में तो आदमी काफी छानबीन कर सकता है। लेकिन प्रदूषित वायु तो न चाहते हुए भी हमारे साँसों में जहर घोल रहा है।

वायु प्रदूषण का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। इससे बहुत सारी बीमारियाँ फैल रही हैं। इसकी वजह से लोग साँस सम्बन्धित बीमारी जैसे दमा, टीबी, दिल की बीमारी और कैंसर का भी सबब बन रहा है। इससे बचने के लिये लोग डॉक्टर के पास जा रहे हैं और फिर धीरे-धीरे उनका शरीर दवाओं का अभ्यस्त होता जा रहा है, क्योंकि बीमारी का मूल जड़ प्रदूषण से तो उन्हें निजात मिल नहीं रहा।

साँस सम्बन्धित बीमारी बच्चों में ज्यादा पाई जा रही हैं, जिसकी वजह से उनके मृत्यु दर में साल-दर-साल इजाफा होता जा रहा है। वैसे साँस की बीमारी से मरने वालों में उम्रदराज लोगों की संख्या भी कम नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2014 में प्रदूषण की वजह से अकाल मौत मरने वाले लोगों की संख्या दुनिया भर में करीब 70 लाख, इस मामले में भारत पहले पायदान पर खड़ा था।

दूसरे देशों की तुलना में सिर्फ अस्थमा जैसी बीमारी से भारत में मरने वाले मरीजों की संख्या बहुत अधिक थी। वैसे चीन भी इस मामले में भारत का हम कदम साबित हो रहा था। दिसम्बर 2013 में प्रदूषण की वजह से चीन में 5 लाख लोगों की मौत हुई है। इसी तरह इस दरमियान यूरोप में तकरीबन साढ़े चार लाख हवा के प्रदूषण की वजह से अपनी जान गवाँ चुके हैं।

एक संयुक्त अध्ययन में इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि प्रदूषण की वजह से विश्व अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष 5 खरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। प्रदूषण की वजह से उत्पादकता में कमी और लोगों के जीवन स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। विकासशील देशों में तो समस्या और भी गम्भीर है। ऐसे मुल्कों में सबसे अधिक प्रभावित पाँच साल से कम उम्र के बच्चे हैं। प्रदूषण का नकारात्मक असर कृषि पर भी पड़ रहा है।

वायु प्रदूषण बहुत तेजी से फैल रहा है। लेकिन हमारे देश के विशेषज्ञ जैसे हाथ-पर-हाथ रखे बैठे हैं। किसी देश के बादलों का एक स्याह गुब्बारा लम्बे समय से लगातार मँडरा रहा हो तो उस देश के नागरिकों और वैज्ञानिकों को क्या करना चाहिए? खासतौर पर तब जब उसका पड़ोसी चीन निश्चित कार्यक्रम बनाकर इस गुब्बारा से छुटकारा पा चुका हो?

चीन ने प्रदूषण के खिलाफ एक सुदृढ़ राष्ट्रीय कार्यक्रम अपनाया, जिसमें लोगों की बड़ी भारी भागीदारी रही। इस तरह चीन ने अपने आसमान में मँडराने वाले स्याह बादलों से छुटकारा पा लिया है, जबकि भारत बदस्तूर उन काले बादलों की छाया में साँस ले रहा है और इसकी वजह से लोगों के फेफड़ों की साँसे अटकने लगी हैं।

दुनिया के पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और भारत जैसे स्थानों और वहाँ लगभग हर समय मौजूद रहने वाला प्रदूषण देखना बहुत हैरान कर देने वाला है। लेकिन चीन ने कड़े कानून बनाकर 2015 में ही वायु प्रदूषण से निजात पा लिया।

सवाल उठता है कि चीन से अचानक वायु प्रदूषण विलुप्त कैसे हो गया? दरअसल, चीन सरकार ने अपने देश में कोयला वाली प्लांटों को बन्द करने, राष्ट्रीय छुट्टी के दिनों में देश के प्रमुख शहरों की सड़कों पर कार लेकर न निकलने समेत प्रदूषण पर नियंत्रण करने के लिये कई आदेश जारी किये हैं।

हम देख सकते हैं कि कैसे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली चीजों को हम व्यवस्थित तरीके से रोक सकते हैं। चीन वायु प्रदूषण के खिलाफ एक राष्ट्रीय कार्यक्रम अपनाकर अपने ऊपर हर वक्त मँडराने वाले काले गुब्बारे से निजात पा चुका है, लेकिन भारत में इसे लेकर अभी तक कोई गम्भीर पहल नहीं हुई, शिवाय इसके दिल्ली में मजाकिया आड इवेन लागू हुआ।

हकीकत यह है कि अपने ऊपर मँडराने वाले काले गुब्बारे से छुटकारा पाने के लिये देर-सवेर भारत को चीन के नक्शे कदम पर चलना ही होगा, और चलने में कुछ हर्ज भी नहीं है। यह देखना और समझना दिलचस्प होगा कि आखिर चीन अपने ऊपर मँडराने वाले स्याह गुब्बारे को लेकर इतना संजीदा क्यों हुआ और कौन से तरीकों को अपनाकर इससे छुटकारा हासिल करने में सफल हुआ है।

बीजिंग समेत चीन के तकरीबन आधे दर्जन शहरों में बड़ी संख्या में बच्चे साँस की भयंकर तकलीफों से जूझते हुए जवान हो रहे थे। इसकी पहचान करते ही चीन पूरी तरह सतर्क हो गया और प्रदूषण के खिलाफ जंग की घोषणा कर दी और इसकी मुनादी लगातार करता रहा। इस जंग के दुश्मन वे छोटे-छोटे कण थे जो अगणित कारों, कोयले से संचालित बिजली निर्माण करने वाले केन्द्रों और स्टील प्लांटों से निकलते थे। यही कण आबोहवा को जहरीले गुब्बारे में तब्दील कर रहे थे।

बीजिंग में रेड अलर्ट जारी करके पहले सभी स्कूलों, फैक्टरियों, कंस्ट्रक्शन कम्पनियों को बन्द करने के साथ-साथ शहर में आधी से अधिक कारों को सड़कों से बाहर कर दिया गया। कहा जा सकता है कि प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिये सबसे पहले उन असंख्य और बेतरतीब प्रदूषण केन्द्रों को बन्द किया।

चीन में प्रदूषण को लेकर सख्त कानून पहले से मौजूद था। लेकिन इसका ठीक से पालन नहीं हो रहा था। इन कानूनों का पालन करने और करवाने में लापरवाही बरती जा रही थी। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सिर्फ कानून बना देने से ही समस्या का समाधान नहीं हो जाता है। चीन सही मायने में प्रदूषण के खिलाफ कमरबन्द तब हुआ जब इसे लेकर वहाँ पर रेड अलर्ट घोषित किया गया। यह बीजिंग के लोगों की इच्छाओं के अनुरूप था। बीजिंग के लोग भी समझ चुके थे कि यदि उन्हें अपनी नस्लों को बचाना है तो हर हालत में प्रदूषण को पछाड़ना ही होगा। इसके बाद तो सरकार का तैयार एक्शन के प्लान के मुताबिक चीन के लोगों ने खुद को ढालते हुए वाकई में एक नया इतिहास ही रच दिया।

अब चीन में कोयलों की भट्टियाँ नहीं तपती। एक निश्चित तरीके से कोयले की तमाम भट्टियों को विराम देने के साथ-साथ शहरों में दौड़ने वाली कारों को भी नियंत्रित करने की जुगत बैठाई गई है। एक आपात जैसी स्थिति में खुद को महसूस करते हुए चीनी हुकूमत काम कर रही है और लोगों को अपने साथ कदमताल करने के लिये प्रेरित कर रही है।

चीन के 362 शहरों के वायु की वैज्ञानिक तरीके से जाँच से पता चला है कि वर्ष 2016 के पहले तिमाही में जो परिणाम मिले हैं वो उम्मीद से कहीं अधिक हैं और यदि यह रफ्तार बनी रही तो चीन प्रदूषण पर काबू पाने वालों में जल्द ही अव्वल देश हो जाएगा। चीन के पीएम (पार्टिक्यूलर मैटर, वातावरण में ठोस और द्रव्य के छोटे-छोटे कण) 2.5 में पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष 8.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

बहरहाल चीन के ऊपर धुआँ तो छँटता जा रहा है लेकिन हिंदुस्तान का आसमान अभी भी इसके गिरफ्त में है। विभिन्न चरणों में सेटेलाइट से ली गई तस्वीरें भी इस बात की तस्दीक कर रही हैं कि भारत के समुद्री और हिमालयी क्षेत्रों के ऊपर भूरे रंग का गुब्बारा लगातार दिखाई दे रहा है। भारत के ऊपर बनने वाले बादलों की इस पट्टी के बारे में नासा ने भी जानकारी दी है। नासा का तो यहाँ तक कहना है कि यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया और इसे हटाने का कोई ठोस उपाय नहीं किया गया तो स्थिति हाथ से निकल सकती है। हिमालय के ईद-गिर्द के इलाके तो बुरी तरह से इसकी चपेट में हैं। हर वर्ष जनवरी और मार्च महीने के बीच तो यह भारतीय आसमान के ऊपर स्पष्ट तौर पर अपनी मौजूदगी दर्शाता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि भारतीय आसमान में प्रदूषण की यह पट्टी मुख्य रूप से देश में पारम्परिक तौर पर आग के लिये लकड़ियों का इस्तेमाल, कोयला की भट्टियों, कारों और फैक्टरियों से निकलने वाले धुएँ के कारण ही है। चीन इन सब कारकों पर काबू पाने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है जबकि भारत में प्रदूषण को नियंत्रण करने वाले कानून तो हैं लेकिन इसके खिलाफ चीन की तरह लोगों के बीच मुहिम बनता नहीं दिखा रहा है।

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक पर भारत 180 देशों में 141 पायदान पर खड़ा था। इस स्थिति से असन्तुष्ट होकर वर्ष 2015 में भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने वन और मौसम परिवर्तन विभाग के साथ मिलकर राष्ट्रीय हवा गुणवत्ता सूचकांक जारी किया है। इसमें आम लोगों को संलग्न करते हुए पर्यावरण की बेहतरी के बारे में कुछ कारगर कदम उठाने की बात तो की गई है।

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