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नेतृत्व और निष्ठा का संकट

Author: 
सुष्मिता सेनगुप्ता
Source: 
डाउन टू अर्थ, मार्च 2017

अन्ना हजारेअन्ना हजारेएक तरफ विफल होता सुखोमाजरी है तो दूसरी तरफ रालेगण सिद्धि की आदर्श गाँव की छवि पर सवालिया निशान लग रहे हैं। जल संचयन, सम्भरण व संरक्षण की मिसाल रहे अन्ना हजारे के इस गाँव में टैंकरों से पानी की आपूर्ति भावी संकट का संकेत है? अन्ना हजारे ने जल संचयन के लिये विख्यात गाँवों की चुनौतियों के बारे में सुष्मिता सेनगुप्ता के साथ विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इसके प्रमुख अंश :

सरकार ने अनेक परियोजनाओं में आपकी सोच को अंगीकार किया, उन पर अमल लिया लेकिन बाकी परियोजनाएँ रालेगण सिद्धि जितनी सफल नहीं रही हैं। ऐसा क्यों?
इस तरह की किसी भी योजना, परियोजना के सफल होने के लिये जरूरी है कि हमारे पास मजबूत नेतृत्व हो, एक मजबूत नेता हो। रालेगण सिद्धि प्रयोग सफल हुआ क्योंकि वहाँ आन्दोलन की अगुवाई करने के लिये सही नेतृत्व रहा। गाँव वालों की पूरी आस्था व निष्ठा इस तरह के नेता में होनी चाहिए। इसके लिये नेता को निःस्वार्थ भाव से काम करना चाहिए, वह भ्रष्ट नहीं हो और अपने जीवन में अच्छे सिद्धान्तों का पालन करने वाला हो। रालेगण सिद्धि जैसे प्रयोगों के लिये नागरिकों को जल संचयन से लेकर सामाजिक सुधारओं व आजीविका कमाने के लिये विभिन्न पहलुओं पर काम करना पड़ता है। ऐसे प्रयोगों की भारी आलोचना भी हो सकती है। ऐसी परियोजना के नेता में आलोचनाओं का सामना करने का साहस होना चाहिए।

पिछली गर्मियों में रालेगण सिद्धि गाँव में भी टैंकरों से जल आपूर्ति की गई। अपनी नियमित जलापूर्ति बनाए रखने या जल संचयन के लिहाज से रालेगण सिद्धि की राह कहाँ गलत रही है?
हमारा जो क्षेत्र है वहाँ सालाना वर्ष 400-500 मिलीमीटर होती है। हम महाराष्ट्र राज्य के कम वर्षा वाले इलाके में रहते हैं। जल संरक्षण व संचयन के लिये जो ढाँचा खड़ा किया गया, वह इसी तरह कठोर पथरीली जमीन में है। जल संचयन के विभिन्न माध्यमों से जो वर्षाजल इकट्ठा होता है या जमीन में जाता है, वह इस पथरीली जमीन में कुछ दरारों के जरिए ही पहुँचता है। इस तरह इकट्ठा हुआ जल कहीं-कहीं जमीन स्तर से लगभग 30-60 मीटर नीचे है।

हाल ही में क्या हुआ कि बाँधों, चेकडैम और जल संरक्षण के अन्य माध्यमों से जो भी पानी जमीन में पहुँचता है, उसे बोरवेल के जरिए बाहर निकाल लिया जाता है। यही कारण है कि पेयजल के लिये लगाए गए सारे हैण्डपम्प बेकार हो गए हैं। अब उनमें पानी नहीं आता। फसल उत्पादन बनाए रखने के लिये किसानों ने गहरे बोरवेल खोदे या उनको गहरा किया। कई जगह तो 150 मीटर तक। बीते एक दशक में हमारे गाँव के जल संचयन व जल सम्भरण वाले इलाकों में ही इस तरह के 200 गहरे बोरवेल खोदे गए हैं। हमें अपनी जल संरक्षण प्रणालियों से कोई फायदा नहीं हो रहा है। गहरे बोरवेल खोदने का गाँव वालों को कोई फायदा नहीं हुआ। खासकर हाल ही के सूखे में। इसीलिये टैंकर मँगवाए गए। पिछले साल मानसून से पहले हमने जल सम्भरण इलाकों में लगभग 150 बोरवेलों को सील कर दिया जबकि 50 बोरवेल जल्द ही सील किये जाएँगे। इन 150 बोरवेल सील करने के बाद ही पिछले साल मानसून के बाद खुले कुओं में पानी आ गया।

क्या पहली बार गाँव टैंकरों के पानी पर निर्भर हो रहा है? या ऐसा पहले भी हुआ है?
हाँ, पहली बार टैंकरों से पानी मँगवाया गया है। लेकिन हमारे भूजल में गिरावट का कारण तो एक दशक पहले ही शुरू हो चुका था।

किसान निजी बोरवेल का इस्तेमाल कब से कर रहे हैं? बीते पाँच दस साल में इस तरह के बोरवेल की संख्या में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है?
हमारे पास इसका कोई रिकॉर्ड तो उपलब्ध नहीं है कि बीते पाँच या दस साल में बोरवेल की संख्या कितनी बढ़ी है। गहरे बोरवेल उस पानी को बहुत शीघ्र खींच लेते हैं जो कि वर्षा में जमीन में पहुँचता है। बीते दस साल में गाँव के विभिन्न जल संचयन परियोजना क्षेत्रों में इस तरह के बोरवेल लगे हैं। रालेगण सिद्धि के जल सम्भरण क्षेत्रों में ही इस तरह के लगभग 200 बोरवेल हैं। पिछली गर्मियों में जब टैंकर हमारे गाँव में आने शुरू हुए तो हमारा ध्यान इस तरफ गया। ग्रामसभा ने इसके कारणों, इसकी जड़ों की तलाश करनी शुरू की है।

क्या संस्थागत प्रणाली में किसी तरह का बदलाव आया है, जैसे ग्राम सभा सदस्यों की सहमति से सरपंच चुनने के बजाय ग्राम पंचायत में चुनाव की शुरुआत?
ग्रामसभा का गठन गाँव के 18 साल व इससे अधिक उम्र के लोग करते हैं। आज भी ग्रामसभा एक निकाय है जो कि ग्राम पंचायत व सरपंच के कामकाज पर निगरानी रखती है। हाँ, आजकल पंचायत चुनाव होते हैं और ग्रामसभा केवल आम सहमति से सरपंच नहीं चुन सकती, गाँव वाले सरपंच चुनने के लिये वोट डालते हैं। साल 2003 में एक कानून पारित किया गया था जिसके तहत किसी भी ग्राम पंचायत द्वारा विकास कोष के खर्च के लिये ग्रामसभा की अनुमति लेनी अनिवार्य कर दी गई। अगर सरपंच इसका पालन नहीं करता तो ग्रामसभा के पास अधिकार है कि वह इसको लेकर जिला परिषद के मुख्य कार्याधिकारी या सीईओ को लिखे। सीईओ शिकायत के 30 दिनों के भीतर जाँच करेगा और अपनी रपट जिला आयुक्त को देगा, जिसके पास सरपंच के विरुद्ध कार्रवाई का अधिकार है। मैं इस कानून को लाने के लिये पाँच छह साल लड़ा।

योजनाओं की बात की जाये तो ग्रामीण विकास के तहत बहुत-सी और योजनाएँ शुरू की गई हैं। जैसे कि मनरेगा, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना व कपिलधारा योजना आदि… आपको क्या लगता है कि गाँव इस धनराशि के साथ प्रभावी जल संरक्षण ढाँचा विकसित कर पा रहे हैं?
मनरेगा में मेरी कोई निष्ठा नहीं है, जिसकी शुरुआत हमारे राज्य महाराष्ट्र में की गई थी। ऐसा इसलिये क्योंकि इस योजना में बहुत अधिक राजनैतिक हस्तक्षेप है। इस योजना के तहत खर्च किये जाने वाले धन और उसके बदले होने वाले काम में विसंगतियाँ हैं। यही नहीं, इस तरह किया जाने वाला काम तकनीकी रूप से भी सार्थक नजर नहीं आता। इस योजना के परिणाम पर निगरानी की कोई योजना नहीं है। मान लो सरपंच भ्रष्ट हो गया तो इस योजना के धन का इस्तेमाल कहीं और किया जा सकता है।

सामान्य जमीन की बात की जाये तो गाँव के किसी और जल संचयन ढाँचे की जरूरत नहीं है। इसलिये हम जल सम्भरण के लिये और धन का उपयोग नहीं कर रहे हैं। वर्षाजल को ले जाने वाले नालों को गहरा करने का कुछ काम है जिसके लिये गाँव वाले अपना पैसा लगाते हैं। गाँव वालों ने जलयुक्त शिवार अभियान के तहत खेती तालाब बनाने के लिये आवेदन करना शुरू किया है और वे अपनी जमीन पर कृषि तालाब बना रहे हैं।

सुखोमाजरी अब विफल हो गया है? क्या इसका मतलब यह निकाला जाये कि सभी आदर्श गाँव विफल रहे हैं? इसका क्या कारण हो सकता है?
जैसा मैंने पहले भी कहा कि किसी भी मॉडल के सफल होने या लगातार सफल बने रहने के लिये मजबूत नेता की जरूरत होती है। सुखोमाजरी में किसी दूसरे या दूसरी पीढ़ी के नेता के बारे में नहीं सोचा गया। इसलिये जब नेतृत्व का पहला समूह बाहर हुआ तो इस मशाल को आगे ले जाने वाला कोई नहीं था। अगर हम दूसरा नेता तैयार नहीं करते हैं तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दस साल बाद कोई रालेगण सिद्धि भी बना रहेगा। समाज की जरूरतें बदलती हैं और युवाओं को प्रशिक्षित किये जाने की जरूरत है ताकि वे समय की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अच्छा नेतृत्व दे सकें। आजादी के बाद देश में 6,38,000 गाँव थे। अगर युवाओं को उचित मार्ग निर्देशन मिलता तो हमारा ग्रामीण भारत प्रगति कर जाता। मैंने 15 साल पहले 6000 युवाओं को ग्रामीण विकास का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण कड़ा था और केवल 96 युवा ही उस प्रशिक्षण में सफल रहे या खरे उतरे। वे इस समय कुछ अच्छे गैर लाभकारी संगठन चला रहे हैं या ग्रामीण विकास में समाज की मदद कर रहे हैं।

आपको क्या लगता है कि जल संचयन के इस तरह के मॉडल और उससे जुड़ी आजीविका के विकास की कार्यनीति पर नए सिरे से विचार की जरूरत है?
नहीं, इस तरह के जल संचयन और सम्भरण मॉडल डिजाइन और कार्यनीति में कोई त्रुटि नहीं है। जल सम्भरण विकास मॉडल की सफलता के लिये बस अच्छे नेतृत्व, जल बजटिंग और भूजल निकासी पर उचित नियंत्रण की जरूरत है। यहाँ जल बजटिंग से मतलब है कि जमीन को कितना पानी मिल रहा है, कितना वहाँ जमा हो रहा है… मानसून से पहले और मानसून के बाद… और कितना पानी इस्तेमाल के लिये उपलब्ध है।

यह सब ध्यान रखना जल सम्भरण की सफलता के लिये बहुत जरूरी है। जब हमारे गाँव में पानी के टैंकर आने लगे तो हमने रालेगण सिद्धि गाँव में इसकी प्रक्रिया शुरू की। इसी तरह पीने के पानी के लिये केवल कम गहराई वाले हैण्डपम्पों की अनुमति दी जानी चाहिए। इस तरह के क्षेत्रों में सिंचाई जल के लिये गहरी खुदाई यानी बोरिंग को पूरी तरह प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए और इसके लिये कड़े कानून बनने चाहिए।

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