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गाँव बरेवाँ - निर्मल ग्राम खिताब बचाने की जद्दोजहद


.बीती 26 मई को मोदी शासनकाल ने अपने दो साल पूरे किये। दो साल पूरे करने से पहले स्वच्छता पखवाड़ा मनाया। गाँवों को ‘राष्ट्रीय निर्मल गाँव पुरस्कार’ बाँटने के बाद अब सरकार ने शहरों की स्वच्छता रैंकिंग करने की तैयारी कर ली है। ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ का एक चरण पूरा हो चुका है। दूसरे चरण की तैयारी चल रही है। रैंकिंग और पुरस्कार बाँटने के काम पर सरकार बड़ी रकम खर्च कर रही है।

स्वच्छ भारत मिशन के विज्ञापन व प्रचार पर पैसा बहा रही है। आयोजन कर शासन-प्रशासन अपनी पीठ खुद ठोक रहे हैं; जबकि सच्चाई यह है कि पुरस्कार बाँटने के बाद किसी ने पलटकर नहीं देखा कि जिन गाँवों को ‘राष्ट्रीय निर्मल गाँव पुरस्कार’ से नवाजा गया है, उनका सूरते-हाल अब क्या है। उप्र राज्य मिर्जापुर जिला इसका जीता-जागता प्रमाण है।

आईना दिखाता बरेवाँ


स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता प्रदीप शुक्ल की मानें, तो ‘राष्ट्रीय निर्मल गाँव पुरस्कार’ एक ऐसा ढोल है, जिसकी तेज आवाज में मलीनता का सच छिपाने की कोशिश हो रही है। प्रदीप बताते हैं कि मिर्जापुर जिले के अब तक कई दर्जन गाँवों को इस पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। जिले के सीखड़ विकास खण्ड को निर्मल विकास खण्ड घोषित कर दिया गया है। नारायनपुर विकास खण्ड को घोषित करने की तैयारी है।

चर्चा यह भी है कि पूरे मिर्जापुर जिले को ही निर्मल जनपद घोषित करने की तैयारी चल रही है। सचमुच अच्छा होता, यदि मिर्जापुर निर्मल जनपद हो जाता। किन्तु सरकारी निर्मलता कुछ और है और जमीनी हकीकत कुछ और।
प्रमाण के तौर पर प्रदीप नरायनपुर विकासखण्ड के गाँव बरेवाँ का आईना दिखाते हैं। बरेवाँ, खुद प्रदीप शुक्ल का पैतृक गाँव है।

लाल ईंट के काले कारोबार ने छीनी निर्मलता


बरेवाँ, सरकार की ओर से ‘राष्ट्रीय निर्मल गाँव पुरस्कार’ प्राप्त गाँव है। बरेवाँ को वर्ष-2006 में राष्ट्रीय निर्मल गाँव पुरस्कार के लिये चुना गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम जी के हाथों पुरस्कार पाकर गाँव समाचार माध्यमों की सुर्खी बना था।

बरेवाँ गाँव, मिर्जापुर-वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग-7 से सटा लगभग ढाई हजार आबादी वाला गाँव है। प्रदीप कहते हैं कि आज की हकीकत पुरस्कार से जुदा है। गाँव बरेवाँ की सीमा पर ईंट भट्ठे हैं। भट्ठों के सैकड़ों कामगारों के लिये कोई शौचालय नहीं है। वे खुले में ही शौच जाते हैं। भट्ठों की चिमनियाँ से उगलते जहरीले धुएँ की झांई गाँव की छतों और ग्रामवासियों के फेफड़ों में जमने का सिलसिला जारी है। पूरा गाँव जहरीली गैस, मिट्टी और राबिस के धुँधली चादर से ढका हुआ है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति, फसल, बाग-बागीचों और मवेशियों की जो बर्बादी है, सो अलग। दुर्योगवश उक्त चिमनियों में दो उसी ग्राम प्रधान की हैं, जिसने बरेवँ गाँव की तरफ से वर्ष 2006 में महामहिम राष्ट्रपति के हाथों ‘राष्ट्रीय निर्मल गाँव पुरस्कार’ प्राप्त किया था।

निर्देशों की अनदेखी करती चिमनियाँ


बरेवाँ गाँव एवं उसके आसपास लगी ईंट भट्ठे की चिमनियाँप्रमाण के तौर पर प्रदीप बरेवाँ का सेटेलाइट नक्शा दिखाते हैं। नक्शे में गाँव के उत्तर, पूर्व तथा पश्चिमोत्तर दिशाओं में लगे ईंट भट्ठा के बड़े-बड़े गड्ढे और दर्जनों चिमनियाँ दिखाते हैं। दर्जनों चिमनियाँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं। आबादी के पास ईंट भट्ठों का इतना बड़ा जमावड़ा उत्तर प्रदेश शासन के उस दिशा-निर्देश के बावजूद है, जिसके तहत आबादी के एक किलोमीटर के भीतर ईंट भट्ठा चिमनियों की स्थापना पर मनाही है। यह राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के निर्देशों की अनदेखी का भी मामला है।

न आवेदन, न अनुमति


यह सब मिर्जापुर प्रशासन की निगाह में है, लेकिन कागज पर नहीं है। भट्ठा मालिकों द्वारा मिट्टी खनन अनुमति हेतु न कोई आवेदन किया गया है और न ही कोई अनुमति दी गई है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि यह स्थिति सिर्फ बरेवाँ गाँव के ईंट भट्ठों न होकर, पूरे मिर्जापुर जिले के सभी ईंट भट्ठों की है। इसका खुलासा प्रदीप शुक्ल द्वारा आर टी आई के माध्यम से माँगी गई जानकारी के जवाब में हुआ।

आरटीआई से हुआ खुलासा


प्रदीप द्वारा जिलाधिकारी कार्यालय को आवेदन प्रेषित कर मिर्जापुर जिले में ईंट भट्ठे के मिट्टी खनन हेतु व्यावसायियों के आवेदन पत्र तथा उनको जारी अनुज्ञा पत्र की जानकारी माँगी गई थी। प्राप्त जवाब में खनन अधिकारी ने सूचित किया कि मिट्टी खनन की स्वीकृति हेतु न तो कोई आवेदन-पत्र प्राप्त हुआ है और न ही कोई अनुज्ञा पत्र ही जारी हुआ है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सूचना दी कि वर्ष 2015-16 में मिर्जापुर जिले किसी ईंट भट्ठे को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया है।

खनन विभाग द्वारा दी जानकारी में सात अवैध भट्ठे मालिकों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने की बात कही गई है। प्रदीप कहते हैं कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गई, लेकिन भट्ठे तो जारी हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अवैध हैं, फिर भी क्यों और किसकी शह पर चल रहे हैं मिर्जापुर जिले में ईंट भट्ठे? शासन-प्रशासन को न अपने दिये पुरस्कार की शान की चिन्ता है और न अवैध ईंट कारोबार के चलते होने वाले राजस्व नुकसान की; क्या होगा?

बरेवाँ का खिताब बचाने की जद्दोजहद में प्रदीप


.सजग कार्यकर्ता प्रदीप शुक्ल ने जिलाधिकारी एवं उन सभी अधिकारियों को चिट्ठी लिख बरेवाँ की निर्मलता बचाने और अवैध भट्ठों के मामले की जाँच कर तत्काल कार्रवाई की माँग की है, जो इससे सम्बन्धित हैं। जिलाधिकारी को सम्बोधित पत्र में प्रदीप ने खनन अधिकारी और प्रदूषण अधिकारी से प्राप्त सूचना के आधार पर सवाल खड़ा किया है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर हो रहे अवैध कारोबार के बावजूद प्रशासन चुप क्यों है?

प्रदीप को उम्मीद है कि गाँव की गुहार सुन प्रशासन चेतेगा और बरेवाँ के निर्मल ग्राम खिताब को झूठ होने से बचा लेगा।

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