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क्या सरकारें बड़े बाँधों के दावों और वादों का हिसाब देगी (Will governments account for claims and promises of big dams)

Author: 
विमल भाई

पंचेश्वर बाँध क्षेत्र में वैसी ही स्थिति जौलजीवी और झूलाघाट बाजारों की है। यहाँ के बाजार स्थानीय गाँवों के ग्राहकों से ज्यादा नेपाल से आने-जाने वाले ग्राहकों से ज्यादा चलते हैं। मगर सामाजिक आकलन रिपोर्ट में इनका कोई जिक्र नहीं है। शहरी विस्थापन के लिये, जो टिहरी शहर बसाया गया, वहाँ पर भी 40 प्रतिशत ही पुरानी टिहरी शहर के लोग हैं। शहरी पुनर्वास की स्थिति देखें तो यहाँ भी प्रभावितों ने ग्रामीण विस्थापितों की ही तरह किसी तरीके से बसाने की कोशिश की है। दस साल बाद जमीन मिली। अब मुआवजे तो खत्म हो गए थे। उत्तराखण्ड के टिहरी बाँध से विस्थापितों के पुनर्वास की कहानी बहुत लम्बी है। टिहरी बाँध प्रभावित क्षेत्र में बहुत लोगों की आजीविका नदी व जंगल पर आधारित थी, उनका नदी व जंगल से एक रिश्ता था। एक समाज और संस्कृति का बिखराव विकास की इस परियोजना से देखने को मिला है।

टिहरी बाँध के निर्माण के वक्त जो दावे किये गए थे उतनी बिजली आज तक पैदा नहीं हो पाई है। टिहरी बाँध से जो लाभ मिलने की बात थी वे भी नहीं मिल पाये। टिहरी बाँध में दस पुल डूबे थे, 12 साल बाँध को चालू हुए हो गए। अभी तक जो बदले में पुल बनने थे वे सभी नहीं बन पाये। डोबरा चांटी पुल व चिंयाली सौड़ के पुल नहीं बन पाये। लोगों को आर-पार आने-जाने में बहुत परेशानी होती है।

कुछ किलोमीटर का रास्ता अब दिन भर का हो गया। फिर बाँध बनने के बाद सरकारी आँकड़ों के अनुसार झील के आस-पास के लगभग 40 आंशिक प्रभावित गाँव नीचे धसक रहे हैं। अब धीरे-धीरे नुकसान झेल रहे हैं। उनकी अब कोई सुनवाई नहीं। बाँध के सामने ही मदन नेगी गाँव में मकान लगभग 7 साल पहले धसक गए थे किन्तु आज तक उनका मुआवजा नहीं मिल पाया है।

पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा ने भूकम्प की सम्भावना को देखते हुए अप्रैल 1996 के उपवास में टिहरी बाँध की पुनः समीक्षा की पुरजोर माँग की थी। बाँध के भूकम्पीय खतरे के सन्दर्भ में पुनर्विचार के लिये जो समिति गठित की गई थी, केन्द्र की देवेगौड़ा सरकार ने पुनर्वास के लिये भी डॉ. हनुमंता राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।

डॉ. हनुमंता राव समिति ने जो सुझाव दिये सरकार ने उसके 10 प्रतिशत सुझावों को ही माना, जिसमें से अब तक 10 प्रतिशत भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पाये। 1998 में इन सुझावों को पुनर्वास नीति में जोड़ा गया, किन्तु इसके बाद भी पुनर्वास का काम बहुत धीमी गति से ही चला। वास्तविकता तो यह थी कि टिहरी बाँध के वक्त कोई पुनर्वास नीति बनी ही नहीं थी। सन 1978 से ही लोगों का विस्थापन शुरू हो गया था। बहुगुणाजी के धरना, प्रदर्शनों व लम्बे उपवास के बाद पुनर्वास नीति बननी शुरू हुई। और अन्ततः 1995 में पहली पुनर्वास नीति बन पाई।

वहीं आज उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में प्रस्तावित पंचेश्वर बाँध के मामले में देखें तो आज पंचेश्वर बाँध व रुपालीगाड बाँध परियोजनाओं में कानूनों का पालन नहीं हो रहा है। सन 2014 से पहले कई कानून बने हैं, उनमें पर्यावरण जन-सुनवाई कानून, सामाजिक आकलन जन-सुनवाई कानून, वन अधिकार 2006 कानून। पंचेश्वर के बाँधों की पुनर्वास नीति भी गलत आँकड़ों के आधार पर बनाई गई।

टिहरी में भी डूब क्षेत्र केे काफी गलत सर्वे किये गए थे। टिहरी बाँध चालू होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हुए सर्वे में 1000 नए विस्थापित सामने आये। जिनमें से आधे तो आज भी पुनर्वास का इन्तजार कर रहे हैं। याद रहे कि टिहरी बाँध की गौरव गाथा गाकर बाँध कम्पनी टिहरी जलविद्युत निगम, (टीएचडीसी) उसे और भी कई नए बाँधों के ठेके मिल गए। किन्तु पथरी भाग 1, 2, 3 व 4 हरिद्वार के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले टिहरी बाँध विस्थापितों के मामले 35 वर्षाें से लम्बित है। यहाँ लगभग 40 गाँवों के लोगों को पुनर्वासित किया गया है। यहाँ 70 प्रतिशत विस्थापितों को भूमिधर अधिकार भी नहीं मिल पाया है। मुफ्त बिजली, पीने और सिंचाई का पानी, यातायात, स्वास्थ्य, बैंक, डाकघर, राशन की दुकान, पंचायत घर, मन्दिर, पितश्कुट्टी, सड़क, गुल, नालियाँ आदि भी व्यवस्थित नहीं बन सकी हैं।

ज्यादातर ग्रामीण पुनर्वास स्थलों पर जैसे सुमननगर और शिवालिक नगर में बहुत कम लोग बचे हैं। सुमननगर में पानी की समस्या है, जबकि टिहरी बाँध से दिल्ली की ओर जा रही नहर 500 मीटर दूर है। शिवालिक नगर के विस्थापितों ने अपनी सारी जमीनें बेच दी हैं चूँकि मूलभूत सुविधाएँ नहीं थीं। यहाँ रहने वाले प्रभावित वापस चले गए। यानि समाज पूरी तरह से बिखर गया।

पंचेश्वर बाँध क्षेत्र में वैसी ही स्थिति जौलजीवी और झूलाघाट बाजारों की है। यहाँ के बाजार स्थानीय गाँवों के ग्राहकों से ज्यादा नेपाल से आने-जाने वाले ग्राहकों से ज्यादा चलते हैं। मगर सामाजिक आकलन रिपोर्ट में इनका कोई जिक्र नहीं है।

शहरी विस्थापन के लिये, जो टिहरी शहर बसाया गया, वहाँ पर भी 40 प्रतिशत ही पुरानी टिहरी शहर के लोग हैं। शहरी पुनर्वास की स्थिति देखें तो यहाँ भी प्रभावितों ने ग्रामीण विस्थापितों की ही तरह किसी तरीके से बसाने की कोशिश की है। दस साल बाद जमीन मिली। अब मुआवजे तो खत्म हो गए थे। टिहरी शहर के मुआवजे की सूची देखें तो 5 रुपए से लेकर 35 रुपए तक भी मकानों के मुआवजे मिले थे।

आज यह कहा जा सकता है कि मुआवजा बहुत अच्छा दे रहे हैं, लाखों रुपए दे रहे हैं। मगर देखना तो यह है कि क्या उसमें नई जगह पर मकान बन पाएगा? फिर सरकार अगर जमीन देने की बात करती है तो क्या सबके लिये उतनी जमीन उपलब्ध है? परिवार किसको माना? जिसके नाम जमीन है। यानि प्रायः वृद्ध लोगों को। जाहिर सी बात है कि आँकड़े बहुत कम दिखेंगे। जैसा टिहरी में हुआ, यहाँ पर भी वही बात है।

पंचेश्वर में तो सर्वे बिल्कुल ही गलत है। टिहरी बाँध में प्रभावितों को जमीन देना बहुत ही मुश्किल हो गया था। सरकार ने अपने हिसाब से बार-बार नीतियाँ बदली। जैसे ऋषीकेश के पशुलोक क्षेत्र में 1100 एकड़ जमीन को शहर के पास माना गया और पुनर्वास नीति में दो एकड़ होने के बावजूद आधा एकड़ जमीन स्वीकार करने के लिये लोगों को मजबूर किया गया। क्योंकि बाँध सामने था और लोगों को मजबूरी थी। इसलिये उन्हें लगा जो मिले वही ले लेना चाहिए।

सरकारी अधिकारियों व बाँध कम्पनी की मिली-भगत से गाँव-गाँव के अन्दर दलाल खड़े हो गए थे। लोगों ने रिश्वत देकर, दया आधार पर, किसी तरीके से मुआवजे लिये। मतलब अपनी जो जमीन, सम्पत्ति पीढ़ियों से जो संचित की हुई है, वो डूब रही है और उसके बदले में जो मिल रहा है, उसे लेने के लिये लोगों को आपसी लड़ना-झगड़ना, धरना-प्रदर्शन करना पड़ा। भ्रष्टाचार का शिकार होना पड़ा। उसके बाद भी सभी टिहरी बाँध प्रभावितों को समुचित मुआवजा मिल पाया हो, ऐसा भी नहीं हो पाया। हजारों केस विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं।

ज्ञातव्य है कि अभी भी राज्य सरकार ने टिहरी बाँध कम्पनी को टिहरी बाँध पूरा भरने की इजाजत नहीं दी है। यह भी तथ्य है कि सुन्दरलाल बहुगुणा के आन्दोलन और केस के दवाब से पर्यावरण व पुनर्वास की शर्तें मजबूत हो पाईं और लोगों का पुनर्वास सम्भव हो पाया। पंचेश्वर के बाँधों के आंशिक डूब के गाँवों में भी धसकने की स्थिति आएगी। अब पंचेश्वर के बाँधों के सन्दर्भ में सरकार कह सकती है कि पहले ही पुनर्वास की जन-सुनवाइयाँ हो रही हैं।

यदि सरकार सब सुनिश्चित कर भी दें तो जमीन कहाँ है उतनी? क्या वो जमीन खेती लायक है? खेती कैसी हो पाएगी? क्या वो जमीन बसने लायक है? जंगल मिलेगा? भूमिधर अधिकार कब मिलेगा? मूलभूत सुविधाएँ कब तक होंगी? ऐसे तमाम प्रश्न इसमें उलझे पड़े होते हैं। लेकिन क्या इस विस्थापन के बाद सुकून को वह स्थिति आएगी? राज्य में अन्य बड़े बाँधों को आगे बढ़ाने वाली उत्तराखण्ड व केन्द्र सरकारों का दायित्व नहीं बनता कि वे पुराने बाँधों के विस्थापितों व उनकी समस्याओं का तत्काल निदान करे, बजाय उनको अपने हाल पर छोड़ने पर लाचार होने के लिये।

लेखक, माटू जन संगठन, उत्तराखण्ड के संयोजक है। उत्तराखण्ड में बड़े बाँधों के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी हैं।


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