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बागमती पर तटबंध को लेकर सरकार ने बनायी कमेटी


पत्र बागमती नदी पर तटबंध बनाये जाने के खिलाफ लगातार चले आंदोलन व मीडिया में छपी खबरों को गंभीरता से लेते हुए बिहार सरकार ने आखिरकार रिव्यू कमेटी (समीक्षा समिति) बनाने की घोषणा कर दी। 27 अप्रैल को बिहार के जल संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव ने अधिसूचना जारी कर कमेटी बनाने की घोषणा की।

इस कमेटी का अध्यक्ष जल संसाधन विभाग के रिटायर अभियंता ज्वाला प्रसाद को बनाया गया है। गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग के पूर्व निदेशक सच्चिदानंद तिवारी, गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग के निदेशक एलपी सिंह, आईआईटी कानपुर के भूविज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ राजीव सिन्हा, आईआईटी पटना के आर्सैनिक अभियंत्रण विभाग के सहायक प्रध्यापक ओम प्रकाश, एनआईटी पटना के आर्सेनिक अभियंत्रण विभाग के प्राध्यापक रागाकार झा, गंगा मुक्ति आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक अनिल प्रकाश और जल संसाधन विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र को समिति का सदस्य बनाया गया है। बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण (मुजफ्फरपुर) के मुख्य अभियंता समिति के संयोजक होंगे। कमेटी को दो और सदस्यों को इसमें शामिल करने का अधिकार दिया गया है। गौरतलब है कि बागमती नदी पर मुजफ्फरपुर में दोनों तटबंध बनाने की योजना है। सरकार के इस फैसले का स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं। इस पूरे मामले को लेकर ‘इंडिया वाटर पोर्टल हिन्दी’ में भी कई आलेख छपे थे। इन आलेखों में से एक आलेख का जिक्र अधिसूचना में किया गया है। अधिसूचना में कहा गया है, “मुजफ्फरपुर जिलांतर्गत बागमती नदी के दोनों किनारे तटबंध निर्माण योजना के खिलाफ किये जा रहे धरना-प्रदर्शन व विरोध, विभिन्न समाचारपत्रों में छपे आलेख, बिहार विधानसभा के सदस्यों द्वारा दिये गये आवेदन तथा इंडिया वाटर पोर्टल हिन्दी में बागमती तटबंध गैरजरूरी और नुकसानदेह भी नाम से प्रकाशित आलेख के आलोक में बागमती तटबंध निर्माण योजना की समीक्षा हेतु एक समीक्षा समिति का निम्नवत रूप में गठित किया गया है।”

अधिसूचना के अनुसार यह समिति एक महीने में तटबंध के प्रभाव पर अपनी रिपोर्ट जमा करेगी। रिपोर्ट में बागमती के बाढ़ से लोगों को होनेवाले नुकसान, तटबंध निर्माण की आवश्यकता, तटबंध निर्माण के बाद लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव व पूर्व में बने तटबंध से स्थानीय लोगों पर पड़े प्रभाव का आकलन किया जायेगा।

16 मार्च को सीएम नीतीश कुमार ने कहा था कि रिव्यू कमेटी बनेगी और इसके लिये मंत्री को निर्देश दे दिया गया है। लेकिन, इसके बाद कोई सुगबुगाहट शुरू नहीं हुई थी।

गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े अनिल प्रकाश ने कहा, ‘16 मार्च को सीएम नीतीश कुमार ने कहा था कि रिव्यू कमेटी बनेगी और इसके लिये मंत्री को निर्देश दे दिया गया है। लेकिन, इसके बाद कोई सुगबुगाहट शुरू नहीं हुई थी। अब जाकर कमेटी बनाने की घोषणा की गयी।’ अनिल प्रकाश ने कहा, ‘हम नीतीश सरकार को पूरा सहयोग करेंगे।’

तटबंध के खिलाफ चल रहे आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे ठाकुर देवेंद्र सिंह, राम सज्जन राय, जीतेंद्र यादव, जगन्नाथ पासवान, मोनाजिर हसन व अन्य ने सीएम नीतीश कुमार की इस पहल का स्वागत किया है। गौरतलब है कि पूर्व में बने तटबंधों से किसानों को हो रहे नुकसान व बाढ़ से बढ़े नुकसान के मद्देनजर कई विशेषज्ञों का कहना है कि तटबंध बना दिये जाने से न तो सरकार को फायदा होने वाला है, न आम लोगों को न ही बागमती को। लेकिन, दुःखद यह है कि सरकार के कानों तक न तो नदियों के विशेषज्ञों की बात पहुँच रही है और न ही ग्रामीणों की।

. बागमती काठमांडू से 16 किलोमीटर दूर हिमालय से निकलती है। यह सदानीरा नदी है यानी सालभर इस नदी में पानी रहता है। बिहार में यह नदी 394 किलोमीटर बहती है। इस नदी में 600 छोटी-छोटी नदियाँ मिलती हैं। चूँकि बागमती सदानीरा नदी है, तो जाहिरी तौर पर बारिश के दिनों में नदी में पानी ज्यादा हो जाता है, जिससे नदी के आस-पास के खेत-खलिहानों में पानी भर जाता है। लेकिन, इस बाढ़ का सबसे ज्यादा फायदा यह होता है कि नदी अपने साथ भारी मात्रा में उपजाऊ मिट्टी लेकर आती है और खेतों में बिखेर देती है। इससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है और लोगों को फसल में खाद नहीं डालना पड़ता है।

सन 1950 का दौर था जब तटबंध को बाढ़ पर नियंत्रण का अचूक उपाय माना जाता था। उसी दौर में पहली बार बागमती को बांधने की कोशिश की गयी। तटबंधों को लेकर व्यापक तौर पर काम करने वाले डीके मिश्रा ने साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पांड्स के लिये लिखे अपने एक लेख में कहा है, ‘सन 1950 में दरभंगा को सोरमारहाट से लेकर खगड़िया के बदलाघाट तक तटबंध बनाया गया था। उस वक्त कितने परिवार विस्थापित हुए थे, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है। चूँकि आजादी के बाद देश के विकास की बात हर तरफ होने लगी थी और लोग इस विकास में हिस्सा लेना चाहते थे, इसलिए उस वक्त पुनर्वास कोई मुद्दा नहीं था। कुछ पुराने लोगों का कहना है कि कुछेक लोगों को तटबंध के बाहर जमीनें दी गयी थीं, लेकिन उन्हें मकान बनाने के लिये कोई राशि मुहैया नहीं करायी गयी।’

इसके बाद वर्ष 1965 में तत्कालीन बिहार सरकार ने बागमती से आने वाली बाढ़ को नियंत्रित करने के लिये तटबंध बनाने की योजना बनायी। वर्ष 1970 में इस योजना को मंजूरी मिल गयी। लेकिन, योजना को मंजूरी मिलने के साथ ही बागमती नदी ने अपना रास्ता बदल लिया जिस कारण दोबारा योजना तैयार करनी पड़ी और खर्च में इजाफा हो गया।

उस वक्त तटबंध की जद में 96 गाँव आये थे। इन गाँवों के करीब 14 हजार लोगों को अपना घर-बार कुर्बान कर देना पड़ा था। इनमें से 14 गाँवों के लोगों का पुनर्वास अब तक नहीं हुआ है।

फिलहाल सरकार की जो योजना है उसमें शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, खगड़िया से होते हुए 200 किलोमीटर तटबंध बनाया जाना है। नदियों को लेकर लंबे समय तक आंदोलन चलाने वाले अनिल प्रकाश कहते हैं, ‘पूर्व में बना बागमती का तटबंध अब तक 88 बार टूट चुका है और एक बार तटबंध टूटता है तो 50 से अधिक गाँव बह जाते हैं। तटबंध बनने से पहले जब बाढ़ आती थी जो जान-माल की क्षति नहीं के बराबर होती थी क्योंकि पानी फैल जाती थी। तटबंध बना कर पानी को एक निश्चित सीमा में बांधने की कोशिश की गयी जिस कारण बाढ़ का रूप रौद्र हो गया।’

अनिल प्रकाश आगे कहते हैं, ‘जब तटबंध नहीं बना था तो नदियों के किनारे के गाँवों में खुशहाली थी। अच्छी फसलें उगा करती थीं। महिलाएँ बागमती को मइया कहकर पुकारा करती और यह मनौती मांगती कि बाढ़ आये ताकि उनके खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़े लेकिन तटबंध ने उनकी समृद्धि ही रोक दी।’

अनिल प्रकाश ने कहा, ‘असल में पूरा खेल मुनाफा का है। 300 करोड़ की परियोजना अब बढ़कर 900 करोड़ रुपये पर पहुँच गयी है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े ठेकेदारों से लेकर अन्य साझेदारों को इससे मोटा मुनाफा होगा। यही वजह है कि येन-केन-प्रकारेण वे इस प्रोजेक्ट को पूरा करना चाहते हैं।’

यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि 70 के दशक के बाद से लेकर अब तक कई तरह के शोध हो चुके हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि तटबंध असल में समृद्धि के रास्ते में रोड़ा है लेकिन सरकार ने कभी भी इन शोधों को गंभीरता से नहीं लिया।

इस संबंध में आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंस डिपार्टमेंट के प्रमुख राजीव सिन्हा कहते हैं, ‘बागमती एक नदी नहीं है, बल्कि यह नदियों का समूह है। इससे आने वाली बाढ़ इतनी बड़ी समस्या नहीं है। बागमती का पानी ज्यादा से ज्यादा डेढ़ से ढाई दिनों तक रहता है और फिर वापस चला जाता है। अलबत्ता इससे फायदा जरूर है क्योंकि वह अपने साथ मिट्टी लाती है जो खेतों के लिये प्राकृतिक खाद का काम करता है। बागमती नदी के आस-पास रहने वाले लोगों को फसल उपजाने के लिये खाद का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता है।’

सिन्हा आगे कहते हैं, ‘बागमती के पूर्व में जहाँ भी तटबंध बने हैं वहाँ के लोगों की आर्थिक हालत लचर हो गयी है क्योंकि उनके खेतों में अब उतनी अच्छी फसल नहीं उगती जितनी तटबंध बनने से पहले उगा करती थी। फिलहाल जहाँ तटबंध बनाया जाना है, वहाँ के लोगों में भी यही डर है कि इससे उनके खेतों की उर्वराशक्ति पर असर पड़ेगा।’

उन्होंने कहा कि दिक्कत की बात है कि सरकार जनता की बात सुनना ही नहीं चाहती है। सरकार आधुनिक विकास का तिलिस्म खड़ा कर काम कर रही है, लेकिन इससे लोगों को फायदा हो नहीं रहा है।

बहरहाल अब देखना है कि रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट को सरकार कितनी गंभीरता से लेती है और क्या कदम उठाती है।

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