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कावेरी - बैर मिट पाएगा


अनुपम मिश्र लेखक, सम्पादक, फोटोग्राफर। पर अनुपम जी को तो देश गाँधीवादी और पानी-पर्यावरण के जानकार के तौर पर ही पहचानता है। 1948 में महाराष्ट्र के वर्धा में प्रसिद्ध जनकवि भवानी प्रसाद मिश्र और सरला मिश्र के घर अनुपम जी का जन्म हुआ था। 1968 में गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, के प्रकाशन विभाग में सामाजिक काम और पर्यावरण पर लेखन कार्य से जुड़े। तब से ही गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान की पत्रिका गाँधी मार्ग पत्रिका का सम्पादन करते रहे। कुछ जबरदस्त लेख, कई कालजयी किताबें, उनकी रचना संसार का हिस्सा बनीं। उनकी कालजयी पुस्तक "आज भी खरे हैं तालाब" को खूब प्यार मिला, मेरी जानकारी में हिन्द स्वराज के बाद इसी पुस्तक ने कार्यकर्ताओं की रचना की, सैंकड़ों पानी के कार्यकर्ता। पानी-पर्यावरण के कार्यकर्ताओं ने अनुपम जी का लेखन और विचार का खूब उपयोग किया अपने काम के लिये। आज वो हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके विचार हमारे बीच हैं, हम उनके सभी लेख धीरे-धीरे पोर्टल पर लाएँगे, ताकि विचार यात्रा निरन्तर जारी रहे। - कार्यकारी संपादक

कावेरी नदीकावेरी नदीकावेरी की गिनती हमारे देश की उन सात नदियों में की जाती है, जिनका नाम देश भर में सुबह स्नान के समय या किसी भी मांगलिक कार्य से पहले लिया जाता है। इस तरह पूरे देश में अपनी मानी गई यह नदी आज प्रमुख रूप से दो राज्यों के बीच में ‘मेरी है या तेरी’ जैसे विवाद में फँस गई है। इसमें दो प्रदेश- कर्नाटक और तमिलनाडु के अलावा थोड़ा विवाद केरल व पुदुचेरी का भी है। कुल मिलाकर नदी एक है। उसमें बहने वाला पानी सीमित है या असीमित है, यह लालच तो उसका है, जो इसमें से ज्यादा-से-ज्यादा पानी अपने खेतों में बहता देखना चाहता है।

सत्रह साल विवाद में फँसे रहने के बाद जब पंचाट का फैसला आया तो शायद ही कुछ क्षणों के लिये ऐसी स्थिति बनी होगी कि अब यह विवाद सुलझ गया है। घोषणा होते ही एक पक्ष का सन्तोष और दूसरे पक्ष का असन्तोष सड़कों पर आ गया।

इस तरह सत्रह साल के इन्तजार ने विवाद को हल करने के बदले क्षण भर ठहरने का एक पड़ाव दिया है और अब कहा नहीं जा सकता कि यह विवाद सुलझने में और कितने बरस लेगा। कर्नाटक और तमिलनाडु की गिनती हमारे देश के जल सम्पन्न राज्यों में की जाती है। दक्षिण में भी किसानों ने कुछ जगह आत्महत्याएँ की हैं लेकिन ये दो राज्य ऐसी परेशानी की हालत से काफी हद तक बचे हुए हैं।

महाराष्ट्र के विदर्भ और आन्ध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों से तुलना करें तो यहाँ की बेहतर स्थिति सामने आ जाएगी। लेकिन पिछले बीस वर्षों में पानी को लेकर इन दो राज्यों का झगड़ा इस हद तक पहुँचा है कि ऐसा लगता है जैसे इन दोनों राज्यों के हर खेत तक यह नदी पहुँचती होगी।

वास्तविकता ऐसी नहीं है। ब्रह्मगिरि से निकलने वाली यह कावेरी नदी और अंग्रेजों के जमाने में व उसके बाद उस पर बनी नहरें दोनों राज्यों के एक छोटे-से हिस्से की माँग ही पूरी कर पाती हैं। दोनों जगहों का ऐसा बहुत बड़ा हिस्सा है, जहाँ तक इसकी नहरों का पानी कभी नहीं पहुँच पाएगा। इसलिये कहा जा सकता है कि पानी की यह प्यास खेतों से ज्यादा राजनीति के सूखे गले के लिये बढ़ाई जा रही है।

दोनों राज्यों में पानी सहेजने की बहुत पुरानी परम्परा है। इस परम्परा से वर्षाजल का पूरी कुशलता से संग्रह होता था। ऐरी, तालाब, चेरी जैसे ढाँचे जल संग्रह के लिये सैकड़ों की संख्या में बनाए जाते थे, फिर हजारों लोग इनकी देखभाल करते थे और लाखों किसान इनके पानी से अपने खेतों की उत्पादकता बढ़ाते थे। लेकिन पिछले दौर में ऐसे अधिकांश ढाँचे नष्ट किये गए हैं और उनकी जगह कोई बेहतर विकल्प नहीं खड़ा किया गया है।

कावेरी विवाद में शामिल एक छोटा-सा हिस्सा पुदुचेरी का है। इस नाम का मतलब ही होता है ‘नया तालाब’। जगह का ऐसा नाम कैसे पड़ा होगा? किसी जमाने में इस इलाके में पानी का सुन्दर इन्तजाम था। जब वह थोड़ा कम हुआ या जरूरत बढ़ी तो नए इन्तजाम के तहत नए तालाब बनाए गए और इस खुशी में इलाके का नाम पुड्डचेरी (पुदुचेरी) हो गया। फिर यह जगह ‘पांडुचेरी’ बन गई। आज फिर से इसे वर्षों पुरानी पहचान मिली है।

आज पानी की कमी होने पर हम अपने इलाके में बरसने वाले पानी का संग्रह करने के बदले कहीं और से बहकर आने वाले पानी पर अपना हक जताते हैं और इस झगड़े में कीमती सत्रह साल बर्बाद कर देते हैं। कावेरी विवाद से जुड़े सभी प्रान्त और क्षेत्र इस विवाद में लड़ते-लड़ते भी अपने-अपने क्षेत्र में पानी रोकने के सुन्दर पारम्परिक काम जारी रखते तो बहुत सारी दिक्कतें इस अवधि में दूर भी हो सकती थीं।

इस विवाद के मौके पर हमें यह भी दोहरा लेना चाहिए कि अभी तो विवाद हम हल नहीं कर पाएँगे। हमारे एक प्रदेश का नाम वहाँ से बहने वाली पाँच नदियों के नाम पर है- पंजाब। यहाँ पर भी पानी की कोई कमी नहीं थी लेकिन आज पंजाब अपने पड़ोसी राज्य हरियाणा और राजस्थान के साथ दो घड़ा पानी बाँट लेने में कतरा रहा है। नर्मदा के पानी को लेकर मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच का विवाद जगजाहिर है।

राजधानी दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच यमुना के पानी को लेकर आये दिन विवाद होते रहते हैं। यह सूची बनाते चलें तो वह किसी भी नदी की तरह लम्बी-चौड़ी होती चली जाएगी, जिसमें केवल राज्यों के विवाद नहीं होंगे, बल्कि एक ही राज्य के दो जिलों के विवाद भी आ जाएँगे। इसलिये कई इलाकों के लोगों को लगता है कि लाख दुखों की एक दवा है- राष्ट्रीयकरण- क्यों न आजमाएँ। लेकिन लोग भूल गए हैं कि नदियों का हो या किसी और चीज का, राष्ट्रीयकरण पुरानी दवा थी।

यदि नदियों का राष्ट्रीयकरण हो जाए और फिर भी पानी के लिये चलने वाले राज्यस्तरीय विवाद हल न हों तो अगली दवा तो फिर निजीकरण ही सूझेगी। ये दोनों इलाज रोग से भी ज्यादा कष्टकारी हो सकते हैं। अच्छा हो, हमारे सभी प्रदेशों के जिम्मेदार लोग अपने इलाके के पानी को अपने-अपने ढंग से रोकने के तौर-तरीकों को फिर से याद करें।

इन तरीकों से बनने वाले तालाब पुराने ढर्रे के न माने जाएँ। वे इन इलाकों में लगे सबसे आधुनिक ट्यूबवेल को भी जीवन दे सकेंगे। इन सभी इलाकों में भूजल राजनीति की तरह ही बहुत तेजी से नीचे गिरा है और इसे राजनेता ऊपर नहीं उठा पाएँगे। लेकिन यदि लोग तय कर लें तो पानी रोकने के ऐसे प्रबन्ध हजारों-लाखों ट्यूबवेलों को फिर से जिन्दा कर सकेंगे और तब हर खेत को कहीं दूर बहने वाली कावेरी के पानी की जरूरत नहीं होगी। साथ ही समय रहते अपने खेतों को ऐसी फसलों को मुक्त कर लेना चाहिए, जिनकी प्यास बड़ी है। नहीं तो कावेरी का पूरा पानी भी अगर एक ही राज्य को सौंप दिया जाये, तब भी यह प्यास नहीं बुझने वाली है। निकटतम पड़ोसी बैरी बना रहेगा।

आज ऐसा लगता है, जैसे 270 टीएमसी फुट पानी कर्नाटक को मिला है इसलिये वह नाराज है और इसे उसकी माँग के मुताबिक 465 टीएमसी फुट कर दिया जाएगा तो वह सन्तुष्ट हो जाएगा या तमिलनाडु को उसकी माँग के मुताबिक 562 टीएमसी फुट पानी मिल जाएगा तो वह परम प्रसन्न हो जाएगा। कावेरी का पानी बैर नहीं मिटा पाएगा।

इस देश का एक बड़ा भाग जल की संस्कृति से रचा-पचा रहा है। बिना बुलाए, बिना सरकारी भत्ते या सुविधा के एक करोड़ से ज्यादा लोग कुम्भ में इकट्ठा हो जाते हैं। यह जल संस्कृति का सबसे बड़ा प्रमाण है। लेकिन पानी के प्रति ऐसी शुद्ध भावना रखने वाले लोग नीचे गिरती राजनीति के कारण पानी के नारों में बह भी जाते हैं। तब वे नदी को माँ के बदले नौकरानी की भूमिका में देखना चाहते हैं- अपने खेत की सेवा न हो पाये तो सड़कों पर उतर आते हैं।

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