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बिहार में मछलियों के दम पर मलेरिया-चिकनगुनिया से लड़ाई


बिहार सरकार ने मछलीपालन और इसकी मदद से मच्छर जनित रोगों पर नियंत्रण का निर्णय लिया है। इस कार्ययोजना पर काम करते हुए यदि उन अध्ययनों की तरफ भी बिहार अनुसन्धान संस्थान के अनुसन्धानकर्ता ध्यान दे पाएँ जो पिछले दिनों इस देश में मच्छर जनित रोग के नियंत्रण में कुछ खास मछलियों की भूमिका को लेकर हुए हैं तो इससे उनके काम को अधिक सहयोग ही मिलेगा।

सौ से अधिक सालों से भारत में मच्छर जनित रोगों से निदान के लिये मछलियों के इस्तेमाल का चलन रहा है। पश्चिमी देशों में इन मछलियों का इस्तेमाल व्यापक पैमाने पर किया जाता है, निश्चित तौर पर भारत में इनका इस्तेमाल कम रहा है। मलेरिया के मच्छरों पर नियंत्रण के लिये मुम्बई के अन्दर 1904 में लार्वीवोरस मछलियों का इस्तेमाल किया गया था।

यह मछलियाँ दक्षिणी अमेरिका से ताल्लुक रखती हैं। इसी तरह की मलेरिया के नियंत्रण करने में मददगार दूसरी मछली गैम्बुसिया है। यह टेक्सास से ताल्लुक रखने वाली मछली है। मलेरिया पर नियंत्रण के लिये इन मछलियों का भारत में आयात 1908 और 1928 में किया जा चुका है। 80 के दशक के मध्य में राष्ट्रीय मलेरिया अनुसन्धान केन्द्र ने अपने अध्ययन में मलेरिया नियंत्रण के लिये लार्वीवोरस मछलियों के योगदान को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया था।

बिहार सरकार भी अब मलेरिया और चिकनगुनिया के राज्य में बढ़ते मामलों को लेकर इस रोग से निर्णायक लड़ाई के लिये गम्भीर हुई है। इसके लिये वह अमेरिकी मछलियों के इस्तेमाल की योजना पर काम कर रही है। जैसाकि ऊपर बताया गया है कि महानगरों और शहरों में मच्छरों के नियंत्रण में इन मछलियों का उपयेाग पहले भी किया गया है। पश्चिमी देशों में इन मछलियों का चलन अधिक है। ये मछलियाँ मच्छर जनित रोगों पर नियंत्रण कार्यक्रम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

अब बिहार सरकार राज्य में गैम्बुसिया मछली को विकसित कर रही है, जिससे आने वाले समय में इसे बिहार के छोटे शहरों और गाँवों तक पहुँचाया जा सके। यह मछलियाँ बिहार में निशुल्क वितरित की जाएँगी। संस्थान ने अपने पास रखकर इन मछलियों को पाला है। अब लोगों को मच्छर जनित रोगों से बचने के लिये अपने घर के आस-पास पानी में इन्हें पालने के लिये प्रेरित किया जाएगा।

गैम्बुसिया का मुख्य आहार ही मच्छरों का लार्वा है। इस तरह प्रदेश में जहाँ-जहाँ मच्छरों के पनपने की आशंका अधिक होगी। वहाँ-वहाँ इन्हें पाला जाएगा। नदी, नाला, पोखर, तालाब जैसी जगहों पर छोड़े जाने पर वहाँ मौजूद मच्छरों को यह अपना आहार आसानी से बना लेंगी। इस तरह बिहार में मच्छर जनित रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।

बिहार में हुए शोध में पाया गया है कि ये मछलियाँ किसी भी प्रकार की परिस्थिति में जीवित रह सकती हैं। इन्हें नदी और नाले में रखकर देखा जा चुका है।

यह खुशी की बात है कि बिहार सरकार ने मछलीपालन और इसकी मदद से मच्छर जनित रोगों पर नियंत्रण का निर्णय लिया है। इस कार्ययोजना पर काम करते हुए यदि उन अध्ययनों की तरफ भी बिहार अनुसन्धान संस्थान के अनुसन्धानकर्ता ध्यान दे पाएँ जो पिछले दिनों इस देश में मच्छर जनित रोग के नियंत्रण में कुछ खास मछलियों की भूमिका को लेकर हुए हैं तो इससे उनके काम को अधिक सहयोग ही मिलेगा। मसलन मच्छर जनित रोगों पर नियंत्रण के लिये मछलियों के सहयोग पर एक प्रयोग राउरकेला, ओड़िशा में अनुसन्धानकर्ताओं ने धान के खेत में डेनिओ रेरियो और ओरिजिया मेलास्टिग्मा मछलियों के साथ किया। वहाँ मिले परिणाम अनुसन्धानकर्ताओं के लिये उत्साहवर्धक थे।

राष्ट्रीय मलेरिया अनुसन्धान संस्थान ने अपने सर्वेक्षण में पाया है कि कई ऐसी मछलियाँ भारत में है जो यहाँ साफ पानी में पलती बढ़ती हैं और मच्छरों के लार्वे को बड़े चाव से खाती हैं लेकिन इन मछलियों का अपने देश में ही हमने प्रचार-प्रसार नहीं किया। डेनिओ रेरियो, इजोमस डेनरिकस, बाडिज-बाडिज, चंदा नामा, पुनटस टिक्टो, कोलिसा फेसिएटा जैसी मछलियों में भी गैम्बुसिया जैसी क्षमता पाई गई है।

बिहार सरकार ने मलेरिया से लड़ने के लिये जो नई रणनीति बनाई है, उसके लिये प्रदेश सरकार बधाई की पात्र है लेकिन इस अभियान में लगे अनुसन्धानकर्ताओं को जरूर देश में चल रहे इस विषय से सम्बन्धित समानान्तर अनुसन्धानों पर नजर रखने की जरूरत है। जिससे उनका काम अधिक-से-अधिक बेहतर परिणाम दे पाये।

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