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गोदी में खेलती हैं इसकी हजारों नालियाँ

Author: 
सोपान जोशी
Source: 
'जल थल मल' किताब, जुलाई 2016, गाँधी शांति प्रतिष्ठान से साभार

बारिश के पानी को सहेजने की ‘प्रणाली’ आज मैले पानी की ‘नाली’ बन गई है। जलस्रोतों को मैला पानी इसलिये ढोना पड़ता है क्योंकि तेजी से बढ़ते शहरों को विशाल सीवर चाहिए। लेकिन सीवर की व्यवस्थित नालियाँ हमारे शहरों में बहुत ही कम हैं। सन 1999 में केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने पहली बार यह पता करने की कोशिश की कि हमारे 301 मुख्य शहरों में पानी, मैले पानी के निकास और कचरा हटाने की व्यवस्था कैसी है।नाली शब्द अपभ्रंश है संस्कृत के शब्द ‘प्रणाली’ का, जिसका मतलब है नहर। हमारे उपमहाद्वीप में साल भर का पानी मानसून के कुछ दिनों के कुछ घंटों में ही बरस जाता है। इस पानी को ठीक से सहेजने की प्रणाली पर ही यहाँ का जीवन टिका रहा है। चतुर्मास की बरसात ही इस उपमहाद्वीप की जीवन प्रणाली है। पानी की आवक-जावक पर ध्यान दिये बिना यहाँ किसी तरह की बस्ती टिक नहीं सकती।

सिंधु घाटी सभ्यता के प्राचीन शहरों में तो मैले पानी के निकास की प्रणाली भी थी। इस शहरी सभ्यता का लोप क्यों हुआ यह आज तक ठीक से पता नहीं चला है। कई अनुमान हैं। कोई बाढ़ की बात करता है, कोई अकाल की। कोई कहता है कि नदियों ने रास्ता बदल लिया और यहाँ के लोग पूरब की ओर जा बसे। कुछ वैज्ञानिकों का अन्दाजा है कि बरसात का ढर्रा बदलने से ये नगर उजड़ गए। कुछ लोगों ने अन्दाजा लगाया था कि इस शहरी सभ्यता को तबाह किया बाहर से आये खानाबदोश ‘आर्य’ लोगों ने। आर्यों का मुख्य देवता था बारिश का देवता, वज्रधारी इंद्र। उसका एक पुराना नाम है ‘पुरंदर’, यानी पुरों को, नगरों को तबाह करने वाला। इस नाम का एक और अर्थ है, घर में सेंध लगाने वाला चोर।

प्रमाणों के अभाव में यह ठीक से कहना मुश्किल है कि इतिहास क्या है कि कथा साहित्य में तथ्य क्या है और मिथ्या क्या है। लेकिन चौमासे का वर्षाफल यथार्थ है। इस उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों को यह बहुत पहले से पता था कि जो नगर या गाँव बरसात की अवहेलना करता है उसे बादलों का प्रकोप बहा ले जाता है। शहर हो या गाँव, बस्ती बसाने की पुरानी प्रणाली में बरसाती पानी का रास्ता छोड़ा जाता था। जो नहीं छोड़ते होंगे वे निश्चित ही पुरंदर की भेंट हो जाते होंगे।

कई लोक कथाओं और ग्रंथों में इंद्र की वर्षा सत्ता की झलक मिलती है। इनमें एक प्रसिद्ध किस्सा है श्रीमद्भागवत पुराण से। कथा में बालक कृष्ण अपने पिता नंद से पूजा और यज्ञ का कारण पूछता है। नंद बाबा बताते हैं कि वह यज्ञ वर्षा के स्वामी इंद्र को प्रसन्न करने के लिये है। फिर बालक कृष्ण पूछता है कि अगर सभी प्राणी अपने कर्मों के हिसाब से जीते-मरते हैं, तो उन्हें इन्द्र से डरने की क्या आवश्यकता है और इन्द्र की जगह वे अपने गोवर्धन पर्वत की पूजा क्यों नहीं करते।

नंद बाबा मान जाते हैं। गोवर्धन की ही पूजा होती है। इंद्र इस विद्रोह से क्रोधित हो जाता है और सात दिन, सात रात तक बारिश करवाता है। ब्रज में बाढ़ आ जाती है लेकिन कृष्ण गोवर्धन को उठाकर सबको बचा लेते हैं। इंद्र का घमंड चूर-चूर हो जाता है। देवताओं की खुशामद करने की बजाय कर्मयोग की जीत होती है। राजस्थान जैसे प्रान्तों में वर्षा के बादल बहुत कम पहुँचते हैं, पर यहाँ इंद्र से कहीं ज्यादा प्रेम और आस्था कृष्ण के प्रति रही है। उन्हें मरुधर कहा जाता है, यानी मरुस्थल को धारण करने वाला। वर्षाजल संचयन की राजस्थान में गौरवशाली परम्परा कृष्ण के बताए कर्मयोग से ही रही है, वर्षा के देव इंद्र की खुशामद से नहीं।

ऐसी कथाएँ कई पीढ़ियों के अनुभवों को संजो कर बनती हैं। जो गाँव और नगर मानसून की बारिश को सहेजने के लिये जमीन नहीं छोड़ते होंगे उन्हें लोगों ने डूबते हुए देखा होगा। आज भी डूबते हैं। हर मानसून में हमारे शहरों में हाहाकार मचता है। चेन्नई शहर दिसम्बर 2015 में ताबड़तोड़ बारिश का बाद डूबा। लाखों लोग बेघर होकर जान बचाने के लिये भागे। पूरा नगर कई दिनों तक ठप्प पड़ा रहा।

मुम्बई में 26 जुलाई 2005 को एक मीटर पानी बरसा था। नतीजाः 450 लोग मारे गए थे और शहर का तीयाँ-पाँचा खुल गया था। अचानक मुम्बई को पता चला कि उसके बीच से कभी मिट्ठी नाम की एक नदी बहती थी, जिसकी जमीन पाटकर भवन बना दिये गये थे। अगर नदी का दम न घोंटा गया होता तो वह पुरंदर का आवेग ग्रहण कर जाती, फिर उसका मीठा पानी पीने को भी मिल जाता। लेकिन पानी के लिये जगह छोड़ने के इस व्यावहारिक ज्ञान की आजकल जमीन के बाजार में कोई जगह नहीं है। शहरों में बचे हुए जलस्रोतों का आज सिर्फ एक काम बचा है, मैले पानी की निकासी।

बारिश के पानी को सहेजने की ‘प्रणाली’ आज मैले पानी की ‘नाली’ बन गई है। जलस्रोतों को मैला पानी इसलिये ढोना पड़ता है क्योंकि तेजी से बढ़ते शहरों को विशाल सीवर चाहिए। लेकिन सीवर की व्यवस्थित नालियाँ हमारे शहरों में बहुत ही कम हैं। सन 1999 में केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने पहली बार यह पता करने की कोशिश की कि हमारे 301 मुख्य शहरों में पानी, मैले पानी के निकास और कचरा हटाने की व्यवस्था कैसी है। मंत्रालय की रपट छह साल बाद जारी हुई, सन 2005 में। रपट कहती है कि मैले पानी की निकासी हमारे सभी शहरों की बड़ी मुसीबत है। इस रपट के 871 पन्नों से एक बदबू उठी, एक भयानक गन्दी तस्वीर खिंची।

301 शहरों में से सीवर तंत्र पाया गया केवल 100 नगरों में। जिन शहरों में सीवर था उनमें रहने वाले लोगों में भी केवल 58 प्रतिशत के पास यह सुविधा थी। शहरी विकास का व्यापक अनुमान लेने के लिये केन्द्र सरकार की एक स्वायत्त शोध संस्था ने सन 2011 में एक रपट जारी की थी। यह कहती है कि हमारे 5,161 छोटे-बड़े शहरों में से केवल 300 में ही किसी भी प्रकार की सीवर व्यवस्था है। बंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में आधे घर भी सीवर की नालियों से जुड़े नहीं हैं। जहाँ सीवर की नालियाँ लगी हुई हैं उनमें से 40 फीसदी नालियाँ ‘कम्बाइंड’ सीवर की है, जिनमें बारिश का पानी और मैला पानी मिल जाता है।

कुछ शहरों ने ढेर सा धन डालकर सीवर की नालियाँ बनाई हैं। जैसे शिमला ही लीजिए, जहाँ से एक समय भारत भर पर राज होता था और जो अब हिमाचल प्रदेश की राजधानी है। सन 2011 की एक रपट कहती है कि शिमला नगर के 70 प्रतिशत इलाकों में सीवर की नालियाँ बिछाई जा चुकी हैं। लेकिन शहर के 40,000 भवनों में से केवल 12,500 ही सीवर से जुड़े थे। बाकी लोगों ने अपने घर सीवर तंत्र से जोड़े ही नहीं हैं, क्योंकि यह खर्चा भवनों के मालिकों की जिम्मेदारी है। उनका मैला पानी जमीन में बने गड्ढों में जाता है और वहाँ से पहाड़ी इलाके के भूजल के सम्पर्क में।

मैला पानी साफ करने की इस दुनिया में वास्तविकता और आदर्श में बहुत ज्यादा अन्तर है। हमारे नगर निगमों के पास ऐसे कारखाने बनाने को धन नहीं होता, कुछ तो आधे-अधूरे बने पड़े रहते हैं। बने हुए कारखाने चलाने को धन नहीं होता। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का उदाहरण लीजिए। कुछ समय पहले वहाँ का एक चमचमाता कारखाना बेकार पड़ा था। एक शोधकर्ता ने कारण पूछा तो पता चला कि नगर निगम के पास बिजली का बिल भरने को धन नहीं है, सो मैला पानी चलाने वाले पम्प बेकार पड़े हैं।सीवर में जाने वाला मैला पानी भी प्रदूषण करता है। सन 2007 में शिमला में पीलिया फैल गया। पुणे के राष्ट्रीय वाएरालॉजी संस्थान के वैज्ञानिक वहाँ पहुँचे। उन्होंने बताया कि पीने के पानी के स्रोत में मैला पानी रिस रहा है, एक मैला पानी साफ करने के कारखाने से ही। उसके बाद से शिमला और आसपास के इलाकों में बार-बार पीलिया फैल चुका हैः 2008 में, 2010 में और फिर 2013 में। सन 2016 के पहले दो महीनों में ही शिमला में 1,100 से ज्यादा लोग पीलिया के शिकार थे और सात लोगों की मृत्यु हो गई थी। मैले पानी के कारखाने में कोताही बरतने के लिये एक इंजीनियर और एक सुपरवाइजर को हिरासत में लिया गया, लेकिन कारखाना चलाने वाला ठेकेदार फरार हो गया। शिमला में छह कारखाने हैं मैले पानी का उपचार करने के लिये लेकिन इनकी स्थिति बहुत ही खराब है। इन पर ध्यान गया पीलिया फैलने के कारण, नहीं तो इस तरह के हालात हमारे शहरों में आम हैं।

किसी को सही-सही पता नहीं है कि हमारे शहर कुल कितना मैला पानी पैदा करते हैं। इसका अन्दाजा लगाने के लिये केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सन 2005 में एक रपट निकाली। सन 2009 के आँकड़ों के हिसाब से इस रपट को बोर्ड ने ठीक भी किया। वैज्ञानिक इस अनुमान पर चलते हैं कि कुल जितना पानी एक शहर में इस्तेमाल होता है उसका 80 प्रतिशत मैले पानी के रूप में सीवर में बह जाता है। तो बोर्ड ने 498 ऐसे शहर चुने जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है, और उनमें पानी की आपूर्ति और मैले पानी के निकास की छान-बीन की।

पता यह लगा कि 498 शहर रोज 3,825 करोड़ लीटर मैला पानी पैदा कर रहे थे। सन 2005 में इन शहरों में मैला पानी साफ करने वाले 231 कारखाने थे और 38 कारखानों पर काम चल रहा था। अगर ये सब कारखाने लगातार, निर्विघ्न चलते तो भी हर रोज 1,178 करोड़ लीटर से ज्यादा मैला पानी नहीं साफ कर सकते थे। यानी आदर्श परिस्थितियों में भी केवल एक-तिहाई मैला पानी साफ हो सकता था। 498 शहरों में केवल आठ ऐसे निकले जो अपने कुल मैले पानी का आधा भी साफ कर पा रहे थे। उपचार कारखानों की कुल क्षमता का लगभग आधा केवल दो शहरों में था, दिल्ली और मुम्बई, जो कुल मैले पानी का छठा हिस्सा भर पैदा करते हैं।

बोर्ड ने मार्च 2015 में ऐसे कारखानों का लेखा-जोखा नए आँकड़ों के हिसाब से दुरुस्त करके जारी किया। कई नए कारखाने इस दशक में बन चुके थे। कागज पर अब कुल 816 कारखाने आ चुके थे, जिनमें 2,327 करोड़ लीटर मैला पानी साफ किया जा सकता है। लेकिन बोर्ड ने बताया कि इनमें से केवल 522 कारखाने ही काम कर रहे हैं, बाकी या तो खराब पड़े हैं, या बनाए जा रहे हैं और 70 कारखाने तो अभी केवल प्रस्ताव के रूप में हैं। जो कारखाने काम कर रहे हैं। उनकी क्षमता हर दिन 1,888 करोड़ लीटर मैला पानी साफ करने की है। लेकिन कुल मैला पानी पैदा करने का अनुमान 2005 और 2015 के बीच लगभग दोगुना हो गया है। आज हमारे बड़े नगर 6,200 करोड़ लीटर मैला पानी पैदा करते हैं। यानी उपचार की क्षमता एक-तिहाई से भी नीचे आ गई है। इस दुनिया को करीब से जानने वाले बताते हैं कि हमारे देश में केवल एक-तिहाई मैले पानी का ही उपचार असल में होता है।

मैला पानी साफ करने की इस दुनिया में वास्तविकता और आदर्श में बहुत ज्यादा अन्तर है। हमारे नगर निगमों के पास ऐसे कारखाने बनाने को धन नहीं होता, कुछ तो आधे-अधूरे बने पड़े रहते हैं। बने हुए कारखाने चलाने को धन नहीं होता। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का उदाहरण लीजिए। कुछ समय पहले वहाँ का एक चमचमाता कारखाना बेकार पड़ा था। एक शोधकर्ता ने कारण पूछा तो पता चला कि नगर निगम के पास बिजली का बिल भरने को धन नहीं है, सो मैला पानी चलाने वाले पम्प बेकार पड़े हैं।

दूसरी जगहों से भी इस तरह के किस्से आये दिन सुनने को मिलते हैं। कारखानों की क्षमता और उनकी वास्तविक कार्य-कुशलता में बहुत बड़ा अन्तर है। सरकारी कागज की सच्चाई और नाली में बहते पानी की सच्चाई एकदम अलग है। इसलिये जब कहीं जलस्रोतों को साफ करके उन्हें निर्मल बनाने की कसम खाई जाती है, आप मान सकते हैं कि उस प्रतिज्ञा में आशा की मात्रा कहीं अधिक है, अपेक्षा का अनुपात कम ही हैं। गंगा नदी के बाबत ऐसे बातें खूब होती हैं। गंगा को बचाने की कसम खाना आम बात हो चुकी है।

वाराणसी में गंगा में मैला पानी गिरने से रोकने के लिये कुछ साल पहले एक योजना बनी। केन्द्र और राज्य सरकार मिलकर इसकी लागत का 95 प्रतिशत देने को तैयार हो गए। पर योजना फिर भी खटाई में पड़ गई। इससे जुड़े लोग बताते हैं कि वाराणसी नगर निगम बचा हुआ 5 प्रतिशत देने को राजी नहीं था। वाराणसी दुनिया के सबसे पुराने जीवित शहरों में से है और उसका वजूद गंगा से ही है। नदी में डुबकी लगाकर पाप धोने वाले असंख्य तीर्थयात्रियों के पर्यटन से चलने वाला यह शहर अपने मैले की धुलाई का धन देने के लिये तैयार नहीं था।

सरकारी रपटें ही बताती हैं कि साधनों के अभाव में कई परिशोधन कारखाने काम नहीं करते हैं। जो करते हैं वे रामभरोसे चलते हैं। उनमें कभी बिजली होती है और कभी नहीं होती, कभी मशीनें और उपकरण ठीक काम करते हैं, कभी नहीं करते। कभी उनमें आने वाले मैले पानी की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, जैसे बारिश के बाद। मजबूरी में कारखाना चलाने वालों को उसे बिना साफ किये आगे भेजना पड़ता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि दिल्ली के 35 कारखाने अपनी कुल क्षमता का दो-तिहाई मैला पानी भी साफ नहीं कर पाते हैं।

यह सब गणित डरावना लगता है। थोड़ा और गहरा देखने से पता चलता है कि यह सारी जानकारी अधूरे आँकड़ों पर आधारित है। यह सच हमें समझाती है सन 2012 की एक रपट, जिसे निकाला था दिल्ली की गैर-सरकारी संस्था ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ ने, जिसे सीएसई भी कहा जाता है। दो खण्ड और 772 पन्नों की यह पुस्तक 71 शहरों के सर्वे से बनी है। इस विषय पर अब तक का यह सबसे प्रामाणिक अध्ययन माना जाता है। रपट बताती है कि पीने के पानी और सीवर के पानी के गणित में एक बड़ी चूक है।

पिछले 20-25 सालों में हुई आर्थिक तरक्की का एक आकलन मैले पानी में दिखता है। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय की रपट बताती है कि ठीक से काम करने वाले सीवर तंत्र और सफाई कारखाने लगाने के लिये हमारे शहरों को बहुत सारा धन चाहिए। कितना धन चाहिए यह किसी को ठीक पता नहीं है क्योंकि यही नहीं पता कि कितना मैला पानी पैदा होता है। एक अन्दाजा कहता है कि इसके लिये कोई डेढ़ लाख करोड़ रुपए चाहिए। इतना धन कहाँ से आएगा?हमारे शहरों में इस्तेमाल होने वाले पानी का एक बड़ा हिस्सा मोटर से चलने वाले ट्यूबवेलों से आता है। इस भूजल का हिसाब किसी के पास नहीं होता। कई साल तक हमारे शहरों में कोई भी ट्यूबवेल गाड़ सकता था। अब कुछ नगरपालिकाओं ने इस पर रोक लगाई है, इसके नियम बनाए हैं। असंख्य ट्यूबवेलों का असर ये होता है कि नगर निगम जितना पानी पाइप के जरिए लोगों तक पहुँचाते हैं उससे कहीं ज्यादा पानी शहरों में इस्तेमाल होता है। इसका मतलब यह भी है कि हमारे सीवरों में आकलन से अधिक मैला पानी बहता है। कितना ज्यादा?

दिल्ली का उदाहरण लीजिए। दिल्ली जल बोर्ड ने 2005 में अपनी जल आपूर्ति के आँकड़ों से अन्दाजा लगाया कि शहर हर रोज 300 करोड़ लीटर मैला पानी पैदा करता है। पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिल्ली की यमुना नदी में बहने वाला सीवर का पानी नापा। उसने पाया कि नाले 370 करोड़ लीटर मैला पानी हर दिन नदी में उलट देते हैं। सरकारी हिसाब से 70 करोड़ लीटर मैला पानी गायब था। सीएसई का 71 शहरों का सर्वेक्षण ज्यादातर नगर निगमों के हिसाब में ऐसी चूक दिखाता है।

एक तो पहले ही मैले पानी के उपचार के कारखाने जितने होने चाहिए उतने हैं नहीं, उनकी क्षमता भी कम है, और उनको चलाना नगरपालिकाओं पर भारी पड़ता है। फिर यह तक हमें नहीं पता है कि हमारे शहर कितना मैला पानी पैदा करते हैं। सरकार इस आधी-अधूरी जानकारी के दम पर अगर ठीक निर्णय ले भी तो उसका परिणाम क्या होगा?

पिछले 20-25 सालों में हुई आर्थिक तरक्की का एक आकलन मैले पानी में दिखता है। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय की रपट बताती है कि ठीक से काम करने वाले सीवर तंत्र और सफाई कारखाने लगाने के लिये हमारे शहरों को बहुत सारा धन चाहिए। कितना धन चाहिए यह किसी को ठीक पता नहीं है क्योंकि यही नहीं पता कि कितना मैला पानी पैदा होता है। एक अन्दाजा कहता है कि इसके लिये कोई डेढ़ लाख करोड़ रुपए चाहिए। इतना धन कहाँ से आएगा? अगर केन्द्र सरकार इतनी राशि खर्च करने को राजी हो भी जाये और कई नए कारखाने लगा भी दिये जाएँ, तो नगरपालिकाएँ इन्हें चलाएँगी कैसे? क्या शहरी लोग अपना मैला पानी साफ करने की थोड़ी भी कीमत चुकाएँगे?

इसका जवाब उन शहरों में मिल सकता है जो हमारी नई आर्थिक तरक्की के झंडाबरदार हैं। जैसे गुड़गाँव और बंगलुरु। तीस साल पहले गुड़गाँव दिल्ली के पड़ोस में बसा एक छोटा सा कस्बानुमा शहर था। आज यह नए भारत की आर्थिक राजधानियों में गिना जाता है। यहाँ वह सब कुछ है जो विकास की कसौटी मान लिया गया है। ढेरों नई अट्टालिकाएँ, दसियों जगमगाते मॉल, व्यापार और वाणिज्य की दुनिया के सबसे बड़े नाम, फर्राटे से दौड़ती चमचमाती मोटर गाड़ियाँ। यह सब निजी निवेश से हुआ है, सरकार की भागीदारी इसमें न के बराबर रही है। लेकिन मैले पानी पर निजी कम्पनियों और सरकार में कोई अन्तर नहीं है। गुड़गाँव का एक बड़ा हिस्सा भूजल पर चलता है और किसी को पता नहीं है कि यह शहर कितना मैला पानी पैदा करता है। सरकारी अनुमान में तथ्य कम हैं, तुक्के ज्यादा हैं।

कई करोड़ लीटर पानी रोज साफ करने वाले कारखाने यहाँ हैं, लेकिन ज्यादातर पुराने शहर की नालियाँ ही इनकी ओर आती हैं। सीएसई का सर्वेक्षण बताता है कि गुड़गाँव की 30 फीसदी आबादी ही सीवर की नालियों से जुड़ी है। बाकी का मैला पानी यहाँ-वहाँ बह जाता है या जमीन के अन्दर बने अनगिनत सेप्टिक टैंकों में समा जाता है। जहाँ सीवर हैं वहाँ की नालियों की हालत खराब है। पुराने सीवर जितनी आबादी के लिये बने थे उससे कहीं ज्यादा लोग गुड़गाँव में आज रहने लगे हैं। कई नालियाँ तो गाद के जमने से अटकी पड़ी हैं, कई में टूट-फूट भी है। नई बस्तियों में लोग मैला पानी निकालने के लिये टैंकर बुलाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे पीने के पानी के टैंकर मँगवाए जाते हैं। बरसात में मैला पानी हर कहीं बहता दिख सकता है।

मैले पानी के उपचार के लिये लगे एक कारखाने का सन 2005 में राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जायजा लिया। पाया गया कि वहाँ साफ हुआ पानी भी मैला ही था। बोर्ड ने यह भी पाया कि कभी-कभी मैला पानी बिना साफ किये ही छोड़ा जाता है, खासकर बारिश के दिनों में। पश्चिम यमुना नहर से होते हुए जिस नदी का पानी गुड़गाँव की प्यास बुझाता है उसे गुड़गाँव मैला पानी वापस करता है। दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में बसे गुड़गाँव का मैला पानी नजफगढ़ नाले में दिल्ली से होता हुआ उसके दूसरे छोर तक जाता है, उत्तर-पूर्व के वजीराबाद इलाके में यमुना नदी में विसर्जित होता है। मैले पानी को इतना लम्बा रास्ता इसलिये तय करना पड़ता है क्योंकि वह एक पुरानी, बरसाती नदी में बहता है। जिसे आज नजफगढ़ नाला कहा जाता है वह एक समय साहिबी नाम की प्रणाली थी जो अरावली पर्वतमाला के बगल से बह कर यमुना से दिल्ली के उत्तर में मिलती थी। यमुना नदी दिल्ली में जो निर्जीव और बदबूदार पानी ढोती है उसमें गुड़गाँव की तरक्की का अर्क भी मिलता है।

कम्प्यूटर और इंटरनेट की जिस दुनिया ने गुड़गाँव को बदला है उसका गढ़ तो बंगलुरू है। यमुना जैसी कोई बड़ी नदी यहाँ नहीं है, पर बंगलुरु को तालाबों का शहर कहा जाता है। एक सर्वेक्षण के हिसाब से सन 1973 में यहाँ 379 तालाब थे। सन 1996 में इनमें से 246 ही बचे थे। आज इनकी संख्या 206 बताई जाती है। जो तालाब बचे हुए हैं उनमें भी बहुत सी जमीन पर अवैध कब्जा हो चुका है। बंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान की एक रपट बताती है कि 1973 में तालाबों के नीचे 5,742 एकड़ जमीन थी। यह घटकर 2013 में केवल 445 एकड़ बची थी। यानी 40 साल में दसवें हिस्से से भी कम जमीन बची है तालाबों के नीचे।

सन 2015 में कर्नाटक की विधानसभा की एक समिति ने बंगलुरु के शहरी और देहाती इलाकों का निरीक्षण करवाया। इसमें 200 सर्वेक्षकों ने 14 महीने की अवधि में घूम-घूम कर जानकारी इकट्ठी की, उसका जमीनी जायजा भी लिया। जब जनवरी 2016 में इसकी रपट जारी हुई तो पता लगा कि 10,472 एकड़ की तालाबों की जमीन पर कब्जे हो चुके थे। इस जमीन की बाजार में कीमत डेढ़ लाख करोड़ रुपए बताई गई। 11,595 ऐसे व्यक्तियों और सरकारी संस्थाओं के नाम भी समिति ने सामने रखे जिन्होंने तालाबों की जमीन दबोच रखी है। कहीं रिहायशी या व्यावसायिक भवन हैं, कहीं स्कूल, जनवासे और न जाने क्या-क्या। इस सूची में नगर के कई नामी-गिरामी बिल्डरों के नाम हैं, कई सरकारी विभागों के भी।

सन 2005 के एक गैर-सरकारी सर्वेक्षण ने 2,61,573 ट्यूबवेलों का आँकड़ा निकाला, जबकि नगरपालिका के पास केवल 1,70,000 ट्यूबवेल पंजीकृत थे। हर साल अन्दाजन 6,500 नए ट्यूबवेल खोदे जाते हैं। इस बेतरतीब पानी के इस्तेमाल से बेहिसाब मैला पानी निकलता है। साफ कितना होता है? जिस मैले पानी का हिसाब सरकारी विभागों के पास है उसका एक-तिहाई भी साफ करने की क्षमता बंगलुरु में नहीं है। अगर कुल कूवत ही इतनी कम है तो साफ कितना होता होगा? जो साफ नहीं होता वह कहाँ जाता है?पिछले 25 सालों में आए नए पैसे से शहर बहुत तेजी से बढ़ा है। पर नए इलाकों में सीवर की नालियाँ नहीं हैं। इनका मैला पानी कहाँ जाता है इसकी कोई पक्की जानकारी नहीं है। कहीं किसी निचले इलाके या तालाब में छोड़ दिया जाता है या जमीन में गड्ढा करके उसमें डाला जाता है। इन गड्ढों को साफ करने का एक आधुनिक तरीका निकला है जिससे सरकार पूरी तरह बेखबर है। पीले रंग के ट्रक जिनमें पानी खींचने की मोटर लगी है और एक हवाबन्द टंकी भी। इन्हें ‘पिटसकर’ या ‘हनीसकर’ कहा जाता है, यानी गड्ढा चूसने वाले या शहद चूसने वाले ट्रक। पर ये मैला पानी निकालने के बाद डालते कहाँ हैं? कुछ तो जहाँ-कहीं खाली जगह मिले वहीं खाली कर दिये जाते हैं। कुछ मैले पानी के कारखाने में खाली होते हैं। कुछ ट्रक वालों का समझौता होता है शहर के आसपास के किसानों के साथ। मैला पानी उनके खेत में डलता है, जमीन में शहद जैसी उर्वरता उड़ेलता है।

कुछ किसान नए इलाकों की चमचमाती इमारतों और फ्लैट से निकला मैला पानी पसन्द नहीं करते क्योंकि उसमें विषैली दवाएँ अधिक होती हैं। इन इमारतों में जो पढ़े-लिखे, साधन-सम्पन्न लोग रहते हैं उन्हें चमचमाते, रोगाणुओं से मुक्त शौचालय चाहिए होते हैं। लेकिन जीवाणुओं को मारने वाली दवाएँ फसल को नुकसान पहुँचाती हैं। यह बात किसानों को किसी वैज्ञानिक परीक्षण से नहीं, बल्कि अपने तजुर्बे से पता चली है। मैले पानी की खबर लेते हुए ऐसा कई बार दिखता है कि अविकसित और पिछड़े माने गए लोग ज्यादा समझदारी दिखा जाते हैं।

सूचना क्रान्ति के आकाशदीप बंगलुरु में हर तरह की जानकारी कम्प्यूटर के ‘माउस’ की एक ‘क्लिक’ से मिल जाती है। लेकिन किसी कम्प्यूटर का कोई भी सर्च इंजन कितने भी क्लिक करने से यह ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि यहाँ कितना मैला पानी पैदा होता है। नगर निगम का अन्दाजा रोजाना 111 करोड़ लीटर का है, लेकिन इसमें भूजल खींचने वाले अनगिनत ट्यूबवेलों का हिसाब नहीं है।

सन 2005 के एक गैर-सरकारी सर्वेक्षण ने 2,61,573 ट्यूबवेलों का आँकड़ा निकाला, जबकि नगरपालिका के पास केवल 1,70,000 ट्यूबवेल पंजीकृत थे। हर साल अन्दाजन 6,500 नए ट्यूबवेल खोदे जाते हैं। इस बेतरतीब पानी के इस्तेमाल से बेहिसाब मैला पानी निकलता है। साफ कितना होता है? जिस मैले पानी का हिसाब सरकारी विभागों के पास है उसका एक-तिहाई भी साफ करने की क्षमता बंगलुरु में नहीं है। अगर कुल कूवत ही इतनी कम है तो साफ कितना होता होगा? जो साफ नहीं होता वह कहाँ जाता है? उन तालाबों में जिनसे पहले पीने का पानी आता था। फिर पीने का पानी अब कहाँ से आता है? या तो भूजल से या कावेरी नदी से।

बंगलुरु ही क्या, हर शहर के जलस्रोतों की यही कहानी है। पानी के पास रहना सौन्दर्य और विलासिता का प्रतीक रहा है। सबसे आलीशान और महंगे भवन जलस्रोतों के इर्द-गिर्द ही बनते रहे हैं। लेकिन आज किसी जलस्रोत का पता हवेलियों और बावड़ियों के शिल्प से नहीं, मैले पानी के दुर्गन्ध से लगता है। नए और महंगे इलाकों में मैले पानी के प्रबन्ध में कोई सूझ-बूझ नहीं होती है और जलस्रोत मैले पानी के पात्र बना दिये जाते हैं। हमारे शहरों का अपने जलस्रोतों के साथ सम्बन्ध खत्म होता जा रहा है क्योंकि ये बहुत दूर-दूर से पानी छीनकर ला सकते हैं। अपने जलस्रोत बचाने में उनकी कोई रुचि, कोई स्वार्थ नहीं बचा है। लेकिन जलस्रोतों को मैले पानी का पात्र बनाने में शहरों का स्वार्थ है। उदाहरण के लिये फिर दिल्ली लौटते हैं।

उत्तरी दिल्ली के वजीराबाद में यमुना दिल्ली में प्रवेश करती है। आज यहाँ एक अजब नजारा दिखता है। बरसात का मौसम छोड़ दें तो वजीराबाद बाँध के उत्तर में हरा-नीला साफ पानी लबालब भरा दिखता है। यहाँ पर नदी एक झील में बदल जाती है, क्योंकि बाँध से नीचे पानी छोड़ा नहीं जाता है। यहाँ से सारा पानी दिल्ली के इस्तेमाल के लिये निकाल लिया जाता है। बाँध के ठीक नीचे यमुना खाली पड़ी दिखती है। लेकिन कुछ दूरी तक ही। जरा आगे नजफगढ़ नाला उत्तर-पश्चिम दिल्ली का मैला पानी यमुना में उड़ेलता है। इस बदबूदार घोल को पतला करने के लिये नदी में पानी नहीं होता है। बाँध के ऊपर होती है हरे-नीले पानी की लबालब झील, बाँध के नीचे एक पतली सी काली धारा। एक आधुनिक शहर का अपने जलस्रोत से यह विकराल सम्बन्ध उपग्रह के चित्रों में भी दिखता है। और इंटरनेट पर गूगल के नक्शों में भी।

दिल्ली का यमुना से सम्बन्ध सदा से ऐसा नहीं था। अरावली से आने वाली कई छोटी-बड़ी बरसाती नदियाँ यमुना में मिलती थीं। ये नदियाँ कई कुओं, बावड़ियों और तालाबों से जुड़ी हुई थीं। दिल्ली बाग-बगीचों का शहर कहा जाता था। चाहे आज यहाँ रहने वालों को इसकी भनक तक न हो, फिर भी वे दिल्ली के पानीदार इतिहास को जाने-अनजाने याद करते हैं जब शहर के इलाकों के नाम पुकारे जाते हैं। हौजखास, मोती बाग, धौला कुआँ, झील खुरेजी, हौज रानी, पुल बंगश, खारी बावली, अठपुला, लाल कुआँ, हौज-ए-शम्सी, पुल मिठाई, दरियागंज, बारहपुला, नजफगढ़ झील, पहाड़ी धीरज, पहाड़गंज, सतपुला, यमुना बाजार…

चौमासे की बारिश के बाद अरावली से बहकर आने वाली नदियाँ फैलती थीं, इनसे आसपास का भूजल बढ़ता था जो कुओं और तालाबों में पहुँचता था। गर्मी में जब नदियों में पानी कम पड़ जाता था तो अगल-बगल के भूजल से उनमें पानी रिसता हुआ वापस आता था। इस लेन-देन की बदौलत दिल्ली पानी के मामले में बहुत अमीर रहा है, और शहर बसाने के लिये आदर्श स्थान। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि कई बार उजड़ने के बाद भी नए नगर और किले यहीं, अरावली और यमुना के बीच में बार-बार बसे। इस विलक्षण भूगोल और पानी के लेन-देन की वजह से दिल्ली बाढ़ से बचा रहा है, पुरंदर के हाथ नहीं चढ़ा।

लेन-देन आज भी है। शहर नदी से पानी लेता है और मैला पानी उसे लौटा देता है। अरावली से आने वाली छोटी-छोटी कई नदियाँ मैले पानी के नालों में तब्दील हो चुकी हैं। जमीन की कीमत देखते हुए इन्हें पाटकर सड़क या भवन बनाए जा रहे हैं। भूजल को बढ़ाने जितना पानी न तो दिल्ली की यमुना में बचा है और न ही उसकी सहायक नदियों में। जमीन को पक्का कर देने से बारिश का पानी जमीन में बैठने की बजाय बाढ़ का रूप लेता है।

पानी की लूट और मैले पानी के फेंकने का असर नदियों और तालाबों पर साफ दिखता है, पर भूजल की हालत दिखती नहीं है। शहरों में ट्यूबवेल हर साल-दो-साल पर गहरे करने पड़ते हैं। दक्षिणी दिल्ली के अमीर इलाकों में पानी की गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही हैः भूजल स्तर हर साल 10 फुट गिर रहा है। उसके स्रोत का मैले पानी से प्रदूषण भी हो रहा है। जो मैला पानी खुली नालियों में या गड्ढों में डाल दिया जाता है वह रिसकर भूजल में पहुँचता है।दिल्ली का चमचमाता नया एयरपोर्ट कम-से-कम तीन तालाबों की जमीन पर बना है। सन 2013 में बारिश का पानी एयरपोर्ट के भीतर तक आ गया था और अखबारों में घुटने तक पानी में चलते यात्रियों की तस्वीरें छपी थीं। जलवायु परिवर्तन से वैसे भी चौमासे की बरसात का स्वभाव बदल रहा है। बारिश के दिन कम हो रहे हैं, लेकिन जब वर्षा होती है तब पुरंदर कई दिनों का पानी एक साथ नीचे पटक देता है। गर्मी में घनघोर प्यास और चौमासे में बाढ़। मानसून के किसी भी दिन दिल्ली में अब वे ही नजारे दिख सकते हैं जो 26 जुलाई 2005 को मुम्बई में दिखे या दिसम्बर 2015 में चेन्नई में दिखे। पुरंदर अब दिल्ली को ललकारने लगा है।

शहर की प्यास भी बढ़ रही है। कौन कितना विकसित है यह इससे पता लगता है कि वह कितना पानी इस्तेमाल कर सकता है, कितना पानी निचोड़कर निकाल सकता है। दिल्ली जलबोर्ड के ही 3,000 से ज्यादा ट्यूबवेल चलते हैं। एक लाख निजी ट्यूबवेल पंजीकृत हैं। केन्द्रीय भूजल बोर्ड का अन्दाजा है कि दिल्ली में कुल निजी ट्यूबवेलों की संख्या चार लाख भी हो सकती है। कितने हैं यह किसी को ठीक से पता नहीं है। लेकिन यह पता है कि कैसे भी करके दिल्ली की प्यास बुझती नहीं है। यमुना और उसकी सहयोगी नदियों को सुखा लेने के बाद, भूजल को निचोड़ने के पश्चात, दिल्ली की नीयत हमेशा दूसरों के जलस्रोतों पर रहती है।

1960 के दशक में भाखड़ा परियोजना बनने के समय से पंजाब की रावी और व्यास नदियों का पानी दिल्ली लाया जा रहा है, 355 किलोमीटर दूर से। दिल्ली से 300 किलोमीटर उत्तर में टिहरी बाँध के बनने का एक कारण दिल्ली की जल आपूर्ति था। गंगा का पानी तो पहले ही ऊपरी गंगा नहर से दिल्ली लाया जा रहा है। अब दिल्ली की नजर 305 किलोमीटर दूर हिमाचल के सिरमौर की तरफ है, जहाँ 20 गाँवों को डुबो कर रेणुका बाँध परियोजना बनाने का प्रस्ताव है। इन गाँवों के लोग अपना विस्थापन बचाने के लिये जैसे-तैसे कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली जितना पानी रेणुका परियोजना से चाहता है उतना पानी तो शहर के रिसते हुए पाइप यूँ ही बहा देते हैं। हर रोज 120 करोड़ लीटर।

दिल्ली में शिकायत केवल प्रवासियों की बढ़ती आबादी की ही होती है, उस पानी की नहीं होती जो राजधानी दूर-दूर से बलात ले आती है। अगर आप दिल्ली के 400 किलोमीटर की परिधि में रहते हैं तो अपने जलस्रोत सम्भाल कर रखिए। दिल्ली की नीयत खराब है। मौका लगते ही राजधानी आपका पानी छीन सकती है। दिल्ली की ताकत दूसरों को प्रेरित करती है। हमारा हर शहर आज अपने जलस्रोत सहेजने की बजाय दूसरों का पानी लूटना चाहता है। जल प्रबन्धन की शाश्वत परम्परा वाला हमारा देश आज पानी लूटने वालों का देश है। शहरी विकास की प्रणाली अब यही है।

पानी की लूट और मैले पानी के फेंकने का असर नदियों और तालाबों पर साफ दिखता है, पर भूजल की हालत दिखती नहीं है। शहरों में ट्यूबवेल हर साल-दो-साल पर गहरे करने पड़ते हैं। दक्षिणी दिल्ली के अमीर इलाकों में पानी की गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही हैः भूजल स्तर हर साल 10 फुट गिर रहा है। उसके स्रोत का मैले पानी से प्रदूषण भी हो रहा है। जो मैला पानी खुली नालियों में या गड्ढों में डाल दिया जाता है वह रिसकर भूजल में पहुँचता है।

हमारे देश के सिविल इंजीनियरी के पाठ्यक्रम में सीमेंट के भवन बनाने की पढ़ाई तो होती है, शुचिता का विचार नहीं सिखाया जाता है, न उन्हें भवन की बनावट के भूजल पर पड़ने वाले असर के बारे में ठीक से पढ़ाया जाता है। ऐसे पढ़े इंजीनियर भवन बनवाते हैं। नतीजतन सेप्टिक टैंक में वे सावधानियाँ नहीं बरती जातीं जो मल-मूत्र को भूजल में रिसने से बचाती हैं। अगर सिविल इंजीनियर तैयार भी हों तो भवन बनवाने वाले बढ़िया सेप्टिक टैंक बनाने के लिये खर्च करने को तैयार नहीं होते। इस सब का असर भूजल पर भले ही दिखे नहीं, पर वह पानी की गुणवत्ता में झलकता है। बंगलुरु में 735 जगहों से निकले भूजल के नमूनों की जाँच सन 2003 में हुई। आधे नमूने भी पीने लायक नहीं थे। विकार का कारण था ‘नाइट्रेट’ की अधिक मात्रा। इनमें से 100 नमूनों की जाँच बैक्टीरिया के लिये की गई। तीन चौथाई में वे बैक्टीरिया पाये गए जो हमारे मल में पाये जाते हैं और जिनका भूजल में पहुँचने का मैले पानी के सिवा कोई और तरीका नहीं है।

देश भर के जलस्रोतों के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बस्तियों से निकला मैला पानी ही है, ऐसा केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बरसों से कह रहा है, कई रपटों में कह चुका है। उसके परीक्षणों में लगभग हर बड़े शहर के पानी में मल से आने वाले ‘नाइट्रेट’ और बैक्टीरिया की मात्रा हद से बहुत ज्यादा है। भारत पर यूनिसेफ की 2013 की रपट जल प्रदूषण को ‘टाइम-बम’ बताती है।

अगर जलस्रोतों में मल-मूत्र सीधा पहुँच रहा है तो पानी से फैलने वाली बीमारियों को अब तक महामारी का रूप ले लेना चाहिए था। ऐसा इसलिये नहीं होता क्योंकि नगर निगम जो पानी पाइप के जरिए पहुँचाता है उसका गहन उपचार होता है। शहरों में घर-घर में पानी साफ करने की मशीनें भी लगने लगी हैं। फिर भी मैला पानी टूटी-फूटी नालियों के जरिए पीने के पाइप में पहुँच जाता है। जून 2013 के आखिरी हफ्ते में दक्षिणी दिल्ली के एक मुहल्ले में दो लोग मैले पानी से फैलने वाले रोग से मारे गए और 40 बीमार पड़ गए।

कर्नाटक राज्य के एक भूतपूर्व आला अफसर वी. बालासुब्रह्मण्यम ने बंगलुरु पर एक अध्ययन करने के बाद कहा कि कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर शहर को दस साल में खाली करना पड़े, क्योंकि तब तक उसके जलस्रोत मैले पानी से इतने दूषित हो चुके होंगे। पर्यावरण के प्रदूषण से कैंसर रोग का सीधा सम्बन्ध होता है। भारत में कैंसर पर शोध कर रहे कुछ वैज्ञानिकों ने सन 2012 में पाया कि भारत में कहीं भी कैंसर के कई रूप उतने व्याप्त नहीं हैं जितने गंगा के इलाके में हैं, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में। पाप धोने वाली पवित्र गंगा को हमने जानलेवा रोगों का स्रोत बना दिया है। इसमें उद्योगों से आने वाले जहरीले पानी का भी हाथ है। गंगा के पानी में अब कैंसरकारक रसायन पाये जाते हैं। यह इलाका कुछ सौ सालों से कुओं और तालाबों पर टिका हुआ है। लेकिन अब भूजल को ट्यूबवेल या हैण्डपम्प से दोहने का जमाना है। आर्सेनिक, यानी संखिया का जहर भूजल के साथ ऊपर आने लगा है। इसके प्रमाण गंगा के पानी में भी मिलते हैं। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि सरकारी स्वच्छता अभियान में बनने वाले शौचालयों की टंकियों से मैला पानी रिस-रिस कर, मिट्टी में बँधे हुए आर्सेनिक के जहर को मुक्त कर देगा और बड़े इलाके में इसका प्रकोप फैलेगा। एक जाने-माने वैज्ञानिक बेतरतीब शौचालय बनाने वाले स्वच्छता अभियानों को गंगा के इलाके को जहरीला बनाने का अभियान कहते हैं।

देश में किसी नदी को साफ हो जाना चाहिए था तो वह है दिल्ली की यमुना। दिल्ली से ज्यादा धन और साधन किसी शहर के पास नहीं हैं। हमारे देश में कुल मैला पानी साफ करने की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली में ही है, जबकि यहाँ पैदा होने वाला मैला पानी हमारे सारे शहरों के कुल योग का दसवाँ हिस्सा ही है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में कुल 172 शहर आते हैं, जिनमें मार्च 2010 तक 5,148 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इसमें से लगभग 13 फीसदी केवल दिल्ली पर खर्च हुआ हैः 650 करोड़ रुपए।हमारे जलस्रोतों को साफ करने की कई तरह की कोशिशें हुई हैं। सन 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुछ उद्योगों की अर्जी पर यमुना के तल और तट से झुग्गी-झोपड़ियाँ हटाने का आदेश दिया। कारण दो थे। एक, इन बस्तियों से नदी के आसपास का माहौल खराब हो रहा था। दो, इन से यमुना का प्रदूषण हो रहा था। इन दिनों 2010 के राष्ट्रकुल खेलों के लिये दिल्ली को सुन्दर बनाने पर जोर था। आदेश के बाद 20,000 से ज्यादा परिवार यमुना के पास से हटाए गए और उनका पुनर्वासन किया गया दूर, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के बवाना में। इसके बाद नदी में प्रदूषण कम होना चाहिए था पर अगले साल यमुना में प्रदूषण और बढ़ चुका था।

ऐसा कैसे हुआ? कुछ सामाजिक संगठनों ने इसकी पड़ताल की। मैले पानी का हिसाब लगाने के सरकारी तरीके के मुताबिक इन बस्तियों का यमुना के प्रदूषण में हिस्सा 0.33 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता था। यह भी इस पर निर्भर था कि इन बस्तियों में सरकार जरूरत जितना पानी पहुँचाए और यहाँ सीवर की नालियाँ भी बिछी हों। पर ऐसा था नहीं। कई तरह के शोध दिखा चुके हैं कि धनवान इलाकों में रहने वालों की तुलना में झुग्गियों में रहने वाले लोग कम पानी इस्तेमाल करते हैं और उनसे जल प्रदूषण भी कम होता है। फिर भी यमुना की सफाई के नाम पर कोई एक लाख लोगों को बेघर किया गया। उसी जमीन को बाद में अक्षरधाम मन्दिर, राष्ट्रकुल खेलगाँव और मेट्रो रेल को दे दिया गया।

जिन न्यायाधीशों ने झोपड़ियाँ हटाने का आदेश दिया उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि न्यायालय के जिन शौचालयों का वे खुद इस्तेमाल करते हैं उनका मैला पानी कहाँ जाता है। अगर पूछते तो पता लगता कि यमुना को मैली करने का सबसे बड़ा स्रोत अनधिकृत बस्तियाँ और झुग्गियाँ नहीं हैं, बल्कि वैधानिक तौर पर बसाए इलाकों का मैला पानी है। इसमें दिल्ली उच्च न्यायालय का मैला पानी भी आता है। उस सर्वोच्च का भी जो सरकार से खबर लेता रहता है कि यमुना मैली क्यों है।

अगर देश में किसी नदी को साफ हो जाना चाहिए था तो वह है दिल्ली की यमुना। दिल्ली से ज्यादा धन और साधन किसी शहर के पास नहीं हैं। हमारे देश में कुल मैला पानी साफ करने की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली में ही है, जबकि यहाँ पैदा होने वाला मैला पानी हमारे सारे शहरों के कुल योग का दसवाँ हिस्सा ही है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में कुल 172 शहर आते हैं, जिनमें मार्च 2010 तक 5,148 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इसमें से लगभग 13 फीसदी केवल दिल्ली पर खर्च हुआ हैः 650 करोड़ रुपए। इस योजना में खर्च हुई कुल राशि का चौथा हिस्सा (1,353 करोड़ रुपए) केवल एक नदी पर खर्च हुआ है और वह है यमुना। इसमें से 1,200 करोड़ रुपये तो सिर्फ दिल्ली में मैला पानी साफ करने के 17 कारखाने लगाने पर खर्च हुए। पवित्र गंगा का मूल्य इस योजना में केवल 932 करोड़ रुपए निकला।

कई तरह की नई प्रणालियों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया है। केन्द्र सरकार और दिल्ली राज्य सरकार ही नहीं, न्यायपालिका भी यमुना साफ करने के लिये प्रतिबद्ध है। इस सबके बावजूद यमुना है कि साफ होती ही नहीं है। नदी की हालत जानने के लिये प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों को परेशान करने की जरूरत नहीं है। न ही बोर्ड की वेबसाइट पर जाकर प्रदूषण के आँकड़े निकालने की। आँख और नाक वह बताती हैं जो शायद वैज्ञानिक भी न बता पाएँ। यमुना की कुल लम्बाई का केवल 2 प्रतिशत दिल्ली से बहता है, यानी 22 किलोमीटर। इतनी सी लम्बाई में यमुना का 80 फीसदी प्रदूषण हो जाता है। यह है राजधानी का उसकी नदी के साथ सम्बन्ध।

जल प्रदूषण का मामला जब कभी उठता है सरकार पर कुछ करने का दबाव बढ़ता है। एक और खर्चीली योजना, एक और नई प्रणाली निकाली जाती है। ऐसी ही एक योजना है ‘गंगा एक्शन प्लान’ या ‘गैप’, जो सन 1986 में शुरू हुई थी। सन 2000 तक इस योजना में 900 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे। सरकारी खाते में धन खर्च हो जाने का मतलब होता है काम पूरा हुआ। सन 2000 की केन्द्रीय नियंत्रक और महालेखाकार की रपट बताती है कि योजना में साधनों का घोर दुरुपयोग हुआ।

सरकार ने इस योजना का दूसरा चरण सन 1993 में चालू कर डाला, जिसे दो साल बाद ही राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना का नाम दे दिया गया। धीरे-धीरे कई और नदियों के लिये वैसे ही प्रदूषण निवारण कार्यक्रम बनाए गए जिनसे गंगा साफ नहीं हो पाई थी। गैप के पहले दो चरणों में 2,300 करोड़ रुपए मैला पानी साफ करने के कारखाने बनाने जैसे कामों पर खर्च हुए। कई हजार करोड़ रुपयों की इस योजना में धन खर्च करने का आपाधापी है। पर इसका नदी पर असर दिखता नहीं है। शहरों में रहने वालों का मल-मूत्र, उनके सीवर का मैला पानी ही नदी के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। गंगा किनारे के शहरों ने सरकारी योजना का धन पचा लिया और अभी भी इन्तजार में हैं कि उन्हें अपना दारिद्रय धोने का अगला मौका मिले।

इनमें से तीन लीजिए, कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी। तीनों शहरों में मैला पानी साफ करने के कारखाने लगे हुए हैं। गंगा को साफ करने के लिये तीनों शहर ऐसे कई और कारखाने लगाना चाहते हैं, पर इन शहरों के 71-84 प्रतिशत इलाकों में सीवर की नालियाँ ही नहीं है। मैला पानी भवनों से कारखानों तक पहुँचेगा कैसे, कोई नहीं जानता। योजनाएँ हैं, उनमें धन है, सो खर्च करने के कल्पनाशील तरीके भी शहर निकाल ही लेते हैं, लेकिन इस सब से नदियाँ साफ नहीं होतीं।

ऐसी ही एक कठिन नाम वाली एक योजना सन 2005 में शुरू हुई, नाम था ‘जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन’। इसके तहत नगर निगम वे काम करने के लिये केन्द्र सरकार से सहायता पा सकते हैं जो वे अपने खर्चे से यह राज्य सरकार की मदद से कर नहीं सकते हैं। मार्च 2012 में इसका पहला चरण पूरा होने तक इसमें 60,000 करोड़ रुपए खर्च किये जा चुके थे। दूसरी सुविधाओं की ही तरह मैला साफ करने के संयंत्र भी इस योजना में लगाए जा सकते थे। लेकिन इस मिशन के साथ काम करने वाले लोगों का कहना है कि सबसे ज्यादा धन साफ पानी की आपूर्ति में ही खर्च हुआ है। इतनी बड़ी योजना में खूब गुंजाइश थी कि जलस्रोत ठीक किये जाएँ और मैला पानी साफ करने के साधन खड़े किये जाएँ। पर ऐसा नहीं हुआ। सन 2014 में नई सरकार ने इस योजना को बन्द कर दिया। इसकी जगह एक और कठिन नाम की योजना की घोषणा कीः ‘अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन’, जिसे अंग्रेजी में ‘अमृत’ भी कहा जाता है।

मैला पानी कारखानों तक पहुँचाना महंगा सौदा पड़ता है। एक अन्दाजा बताता है कि मैला पानी साफ करने की कुल लागत का 80 प्रतिशत तो केवल नालियों को बिछाने, मैले पानी को इनमें चलाने के लिये बिजली के पम्प लगाने, फिर बिजली के बिल चुकाने और दूसरी तरह के रख-रखाव में खर्च होता है। इसमें यह अपेक्षा रहती है कि इतनी बिजली पहले से मौजूद है और तंत्र को ठीक से चलाने के लिये प्रशिक्षित कामगार भी, जो अमूमन हमारे शहरों में होता नहीं है।सरकारी कार्यक्रम असरकारी नहीं माने जाते हैं। सरकार टेंडर के आधार पर काम करती है। टेंडर में वह अपनी जरूरत बताती है और सबसे सस्ते में काम पूरा करने का वायदा करने वाले को टेंडर दे दिया जाता है। इसमें दोनों पक्षों को बैठकर काम का कारगर तरीका ढूँढने का मौका नहीं रहता। टेंडर का आवेदन भरने वाले प्रस्तावित दाम कम-से-कम रखने के लिये हर तरह के समझौते करते हैं। यह कटौती दिखाई देती है काम पूरा होने के बाद। अब तो खुद सरकारें ही निजी क्षेत्र के साथ काम करने की बात करती हैं। गंगा की सफाई के अभियान में अब बार-बार पंजाब के बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल का नाम लिया जाता है। उन्होंने सन 2000 में एक सामाजिक अभियान शुरू किया था कालीबेई नामक एक छोटी सी नदी की सफाई के लिये। 160 किलोमीटर लम्बी इस नदी का सिख धर्म में गहरा महत्त्व है। गुरू नानक देव 14 साल इसके किनारे रहे थे और यहीं पर उन्हें दिव्य ज्ञान मिला था।

कुछ ही सालों के भीतर बाबा सींचेवाल ने आसपास के गाँव के लोगों और सरकारी विभागों को जोड़कर नदी को साफ करने का काम कर दिखाया। उनका सामाजिक प्रभाव इतना है कि उनके बुलाने से लोग कार सेवा करने उमड़ आते हैं। यही नहीं, दूर अमेरिका और कनाडा में बसे सिखों ने जी भर के साधन भेजे हैं। सरकार में आजकल ‘सींचेवाल मॉडल’ की खूब चर्चा है। लेकिन सरकारी योजनाओं में वह सामाजिक प्रभाव कैसे आएगा जिसकी वजह से बाबा सींचेवाल ने लोगों को कालीबेई नदी से एक बार फिर जोड़ दिया?

सरकार पर ही सारी जिम्मेदारी मढ़ना शायद गलत होगा। सीवर प्रणाली के मूल में ही कुछ कमियाँ हैं। मैला पानी कारखानों तक पहुँचाना महंगा सौदा पड़ता है। एक अन्दाजा बताता है कि मैला पानी साफ करने की कुल लागत का 80 प्रतिशत तो केवल नालियों को बिछाने, मैले पानी को इनमें चलाने के लिये बिजली के पम्प लगाने, फिर बिजली के बिल चुकाने और दूसरी तरह के रख-रखाव में खर्च होता है। इसमें यह अपेक्षा रहती है कि इतनी बिजली पहले से मौजूद है और तंत्र को ठीक से चलाने के लिये प्रशिक्षित कामगार भी, जो अमूमन हमारे शहरों में होता नहीं है।

सीवर प्रणाली में पानी बहुत लगता है। साल भर जगह-जगह शौचालयों से मल-मूत्र बहाने के लिये इतना पानी कहाँ से आएगा? हमारे देश में कुल बारिश का 90-70 प्रतिशत पानी मानसून के तीन महीनों में ही गिर जाता है। फिर शहरों में इतनी जमीन कहाँ से आएगी कि इस मैले पानी को साफ करने के कारखाने लगाए जाएँ? जमीन मिल भी गई तो उसे खरीदने और फिर इन संयंत्रों को बनाने और निर्विघ्न चलाने का धन कैसे जुटेगा?

चाहे आधुनिक शहर के ढाँचे में सीवर व्यवस्था अनिवार्य हो, लेकिन मल-मूत्र हटाने का यह तरीका बेहद अस्वाभाविक है। जितना मैला पानी इकट्ठा होता जाता है उसे साफ करने कई गुणा कठिन और महंगा होता जाता है। फ्लश कमोड से निकले पानी को साफ करने का एक व्यावहारिक तरीका है मैला पानी जहाँ पैदा हो वहीं उसका उपचार किया जाये, उसे आगे भेजने के पहले। इससे कई तरह के खर्चे बचाए जा सकते हैं। ऐसा करना असम्भव नहीं है, कुछ देशों ने यह करके दिखाया भी है।

इनमें मुख्य है जापान। हालांकि वहाँ के ज्यादातर हिस्सों में बड़े-बड़े कारखाने हैं मैले पानी के उपचार के लिये। पर देश के पाँचवें हिस्से के मैले पानी का उपचार छोटे-छोटे कारखानों में होता है, खासकर उन इलाकों में जहाँ की आबादी 20,000 से कम हो। इन्हें ‘जोकासो’ कहते हैं। किसी छोटी गाड़ी या पानी की टंकी का इसका आकार होता है, इसलिये किसी इमारत के आसपास या तलघर में ही ऐसे कारखाने लग सकते हैं। जापान में पिछले 40 साल से ये लग ही रहे हैं, और काम भी कर रहे हैं। इनमें एक इमारत या बस्ती का मैला पानी सीवर की नाली में जाने के पहले ही साफ कर दिया जाता है। उसमें बदबू नहीं बचती। कई जगहों पर ऐसे साफ किये पानी की जाँच भी होती है, यह पता करने के लिये कि संयंत्र ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं।

इन्हें भवनों के मालिक अपने खर्च पर लगवाते हैं, जबकि सरकार इनकी कीमत पर 40-90 प्रतिशत का अनुदान भी देती है। कुछ कारखाने तो स्थानीय सरकारें ही चलाती हैं। जापान अमीर देश है और हर कहीं सीवर की नालियाँ पहुँचाने का माद्दा रखता है। लेकिन जापान के ज्यादातर हिस्से पहाड़ी हैं और यहाँ हर कभी भूचाल आते रहते हैं। ऐसे में हर जगह सीवर की पक्की नालियों से मैला पानी इकट्ठा करके ले जाना और फिर उसका उपचार करना व्यावहारिक नहीं होता। इसलिये कुछ जगहों पर मैला पानी जहाँ पैदा होता है वहीं उसका उपचार किया जाता है।

इन संयंत्रों के काम करने का सिद्धान्त सीवर के विशाल कारखानों से थोड़ा अलग होता है। डीआरडीओ के बनाए बायोडाइजेस्टर शौचालय की ही तरह जोकासो भी बिना ऑक्सीजन के रहने वाले जीवाणुओं पर चलते हैं। ये बैक्टीरिया अंधियारी और बन्द जगहों में फलते-फूलते हैं, अगर इन्हें रहने के लिये जगह मिल जाये। इसके लिये इन छोटे संयंत्रों में जालियाँ या छोटे-मोटे पत्थरों के खाने बने होते हैं, जिनके बगल से मैला पानी बहता है। घर मिल जाये तो पानी से मैल निकालकर उसे जीवाणु खुद भोजन बना लेते हैं। पर ये जीवाणु आते कहाँ से हैं? कुछ तो हमारे पेट से निकले मल में पहले से ही मौजूद होते हैं, कुछ और अपने आप से अंधेरी, ऑक्सीजन-विहीन जगहों पर सहज प्रकट हो जाते हैं।

हमारे यहाँ इस पद्धति से मैला पानी साफ करने वाला डीआरडीओ ही अकेला संस्थान नहीं है। कुछ और संस्थाएँ भी ऐसे छोटे-छोटे कारखाने बना रही हैं। इनमें बिजली की जरूरत तो होती ही नहीं है, इन्हें लगाने के लिये जमीन भी कम लगती है। जाहिर है, लागत भी बड़े कारखानों की तुलना में बहुत कम आती है।

मैले पानी का एक और उपयोग कई शहरों में हो रहा है जिसका असर मालूम नहीं है। मैले पानी को खेतों में उर्वरक और सिंचाई के लिये इस्तेमाल किया जाता है, खासकर सब्जी की खेती में। ऐसा कई शहरों के आसपास के खेतों में देखा जा सकता है। एक दृष्टि से तो यह बहुत अच्छा है, क्योंकि मैले पानी में ढेर सारे उर्वरक होते हैं। उसका सदुपयोग तो यही है कि ये उर्वरक जमीन में जाएँ, खेती के काम आएँ। लेकिन शहरों से आये मैले पानी में मल-मूत्र और उर्वरक ही नहीं होते, कई तरह के रोगाणु भी होते हैं और विषैले पदार्थ भी, जैसे पारा और सीसा जैसी भारी धातुएँ।इस किफायती व्यवस्था का अंग्रेजी में महंगा सा नाम हैः ‘डीसेंट्रलाइज्ड वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम्स’, या संक्षिप्त में ‘डीवॉट्स’। कठिन हिन्दी में अनुवाद करें तो होगा ‘विकेन्द्रीकृत मैला पानी सफाई व्यवस्था’। जब तक इसके कुछ और व्यावहारिक नाम न गढ़े जाएँ, डीवॉट्स ही बेहतर है। इन पर काम करने वाली संस्थाओं में बंगलुरु की ‘सीडीडी’ का नाम सबसे पहले आता है। डीवॉट्स पद्धति समझाने के लिये संस्था ने अपने दफ्तर के एक हिस्से में एक रोचक प्रदर्शनी लगाई है। दूसरी संस्थाओं के साथ काम करने के अलावा सीडीडी ने अपने दफ्तर के बगल में एक कारखाना डाला है ऐसे छोटे कारखाने बनाने के लिये। इनकी बनावट ऐसी होती है कि इन्हें ट्रक पर लाद कर कहीं भी भेजा जा सकता है।

सीडीडी ने ही 150 से ज्यादा जगहों पर ऐसे संयंत्र खुद लगाए हैं और 350 से ज्यादा कारखाने सहयोगी संस्थाओं के साथ लगाए हैं। इनमें से कुछ में साफ किये पानी का परीक्षण किया गया और उसे निर्दोष पाया गया। कुछ तो आदर्श नतीजे दे रहे हैं, कुछ उतने अच्छे नहीं चले। हर नए संयंत्र के साथ इस काम को करने वालों का तजुर्बा बढ़ रहा है। सीडीडी सामाजिक संस्था है पर उसकी कोशिश है कि मैला पानी साफ करने का व्यापार भी खड़ा हो जाये, जिसके लिये किसी अनुदान या सहयोग की जरूरत न पड़े। जो मैला पानी पैदा करते हैं वे ही उसके उपचार का खर्चा उठाएँ, इसे नगर निगम या सरकार पर न छोड़ें। जो लोग ‘डीवाट्स’ से मैले पानी का उपचार करने का बीड़ा उठाएँ उनकी आजीविका भी इससे निकल आये।

ऐसी कोशिशें देश के कई हिस्सों में छोटी-छोटी कम्पनियाँ और रसायनशास्त्री कर रहे हैं। ऐसे रसायनों की खोज भी हो रही है जिनसे मैला पानी और तेजी से साफ हो सके। मैले पानी के उपचार में कई लोगों को मुनाफा दिख रहा है। अगर यह बढ़ता है तो हमारे जलस्रोतों के लिये अच्छा लक्षण ही है। लेकिन यह नया उभरता हुआ व्यापार उतना साफ-सुथरा नहीं है जितना लगता है।

इस व्यापार में लगे लोग जो समाधान बेचते हैं वे किसी-न-किसी तरह के बैक्टीरिया और कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं से तैयार होते हैं, जिनके सिद्धान्त जग-जाहिर हैं। इस व्यापार में लगे ज्यादातर लोग यह दावा करते हैं कि उनके जीवाणु और रसायन खास हैं, कि उनके नुस्खे में जादुई शक्ति है। यह भी कि जितने अच्छे और तेजी से मैले पानी का उपचार उनका तरीका कर सकता है उतना और कोई नहीं कर सकता। उनके नुस्खों में असल में क्या है, इसकी जानकारी कोई कम्पनी या ठेकेदार सार्वजनिक नहीं करता। हर कोई अपने-अपने तरीकों पर पेटेंट निकाले हुए हैं। वे अपने काम करने के तरीकों को गोपनीय रखना चाहते हैं, ताकि उनके प्रतियोगियों को उनके शोध और आविष्कार से मुनाफा न हो। इस होड़ में मैले पानी के नए और छोटे-छोटे तरीके फैलने की बजाय अपने-अपने गड्ढों में पड़े हुए सड़ रहे हैं।

इस व्यापारिक गोपनीयता का एक और नुकसान है। यह कहना कठिन है कि कौन सा तरीका कारगर है और कौन सा बेकार है। हर किसी के बड़े-बड़े दावे हैं। उन दावों का कोई परीक्षण नहीं होता, कोई वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं हो सकता। कई लोग अपने-अपने जादुई नुस्खे से मैला साफ करने के वादे भी करते हैं और उससे कमाई भी। अगर कोई व्यक्ति या समूह अपना मैला पानी साफ करना चाहे तो उन्हें कोई पुख्ता जानकारी इन उद्यमियों से नहीं मिलती। किसका नुस्खा खरीदें यह निर्णय किसी लाटरी खरीदने से कम नहीं है। लगी तो लगी, वरना जय रामजी की। कोई सभा, समिति या आयोग नहीं है जो इस नए उद्योग को व्यवस्थित कर सके, या बाजार में बिक रहे नुस्खों और दावों की जाँच करके उनकी हुंडी भरे।

मैले पानी का एक और उपयोग कई शहरों में हो रहा है जिसका असर मालूम नहीं है। मैले पानी को खेतों में उर्वरक और सिंचाई के लिये इस्तेमाल किया जाता है, खासकर सब्जी की खेती में। ऐसा कई शहरों के आसपास के खेतों में देखा जा सकता है। एक दृष्टि से तो यह बहुत अच्छा है, क्योंकि मैले पानी में ढेर सारे उर्वरक होते हैं। उसका सदुपयोग तो यही है कि ये उर्वरक जमीन में जाएँ, खेती के काम आएँ। लेकिन शहरों से आये मैले पानी में मल-मूत्र और उर्वरक ही नहीं होते, कई तरह के रोगाणु भी होते हैं और विषैले पदार्थ भी, जैसे पारा और सीसा जैसी भारी धातुएँ। फिर कई तरह के कीटनाशक, दवाएँ और तरह-तरह के रसायन भी मैले पानी के साथ बहकर आ जाते हैं। इनका फसलों पर क्या प्रभाव होता है यह ठीक से समझा नहीं गया है।

मैले पानी की दुनिया अज्ञान और नासमझी में ही चलती है। बारिश का देवता भले ही पुरंदर हो, लेकिन मैले पानी का कोई देवता हमारे यहाँ नहीं है। ढेर सा पानी इस्तेमाल करके, ढेर सा मैला पानी पैदा करना तो हमने पिछले कुछ दशकों में तेजी से सीख लिया है। लेकिन इतने मैले पानी का क्या करना है, यह किसी को पता नहीं है। कई तरह की नालियाँ और प्रणालियाँ उभर रही हैं। इसमें कहीं-कहीं छटपटाहट है। कहीं दिखता है कि नुकसान हो जाएगा, तो कहीं मुनाफे की उम्मीद भी। लेकिन क्या कोई आदर्श प्रणाली भी है? क्या कोई ऐसा शहर है जो अपना मैला किसी बेहतर तरीके से साफ कर लेता हो? जिसके पास मैले पानी का खतरा टालने की वाजिब और समयसिद्ध तरीका हो?

राजधानी एक्सप्रेस लीजिए और दिल्ली से चलिये कोलकाता।

यह आलेख 'जल थल मल' से लिया गया है। किताब खरीदने के लिये यहाँ सम्पर्क करें


मूल्य - तीन सौ रुपए
प्रकाशक - गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, 221 दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली 110002


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