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स्वच्छ भारत मिशन : व्यवहार परिवर्तन के लिये कारगर सम्प्रेषण नीति

Author: 
पद्मकांत झा, योगेश कुमार सिंह
Source: 
कुरुक्षेत्र, अक्टूबर 2017

व्यवहार परिवर्तन संचार बेहद जरूरी है क्योंकि यह लोगों को जानकारी देने, शिक्षित करने और स्वच्छता कार्यक्रमों में अपनी भूमिका और दायित्व निभाने के साथ-साथ स्वच्छता के सही तौर-तरीकों में निवेश से होने वाले फायदों का लाभ उठाने का मंच साबित हो सकता है। मिशन को असरदार बनाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि एक ऐसा समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाये जो जन-समुदायों को प्रतिभागी प्रविधियों से अधिकार-सम्पन्न बनाए ताकि लोग स्वच्छता की स्थिति के बारे में सोच-समझ कर फैसले कर सकें।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 68.84 प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है। जनगणना के आँकड़ों से जब सरकार को पता चला कि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 32.70 प्रतिशत परिवारों को शौचालय की सुविधा प्राप्त है और देश की दो तिहाई ग्रामीण आबादी शौचालय की सुविधा से वंचित है तो सरकार और विकास के लिये आवाज उठाने वाले दंग रह गए। खुले में शौच करना न सिर्फ स्वास्थ्य के लिये खतरनाक है, बल्कि देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं के लिये भी हानिकारक है। ग्रामीण इलाकों में जिन महिलाओं को शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है वे सूर्योदय से पहले या रात के अंधेरे में ही शौच कर सकती हैं।

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि भारत में बच्चों की शारीरिक बढ़वार रुक जाने वालों की संख्या सबसे अधिक है। शारीरिक वृद्धि का रुक जाना न केवल स्वास्थ्य सम्बन्धी एक जोखिम है जो खुले में शौच करने से फैलता है बल्कि इससे कई दूसरी बीमारियाँ भी हो सकती हैं। पानी और स्वच्छता से सम्बन्धित बीमारियाँ भारत में पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक हैं। भारत में बाल मृत्यु दर 53 प्रति हजार जीवित प्रसव है। खराब स्वच्छता सुविधाओं से भूजल प्रदूषित हो जाता है और बीमारी फैलाने वाले जीवाणु के संक्रमण से पेचिश जैसी बीमारियाँ फैलती हैं। पेचिश की बीमारी के प्रत्येक प्रकोप में शरीर के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं जिससे कुपोषण, शारीरिक वृद्धि का रुकना और कभी-कभी मृत्यु होने तक की नौबत आ जाती है।

भारत कम प्रति व्यक्ति आय की श्रेणी में आने वाले देशों में शामिल है। खुले में शौच करने से होने बीमारियाँ गरीब परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं। साफ-सफाई की कमी से ऐसे लोग बीमारियों के प्रति और अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। साफ पानी और स्वच्छता सुविधाओं तक पहुँच से बीमारियाँ फैलाने वाले जीवाणुओं से सम्पर्क का खतरा कम हो जाता है जिससे दस्त और पेचिश जैसी संक्रामक बीमारियों की आशंका कम हो जाती है। परिणामस्वरूप बच्चों के एंथ्रोपोमीट्रिक यानी जैवमितीय सूचकांकों में सुधार होता है और कुल मृत्यु दर घट जाती है।

2011 की जनगणना के अनुसार देश में शौचालयों का इस्तेमाल करने वालों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में 32.70 प्रतिशत थी। इससे यह भी पता चलता है कि ग्रामीण लोगों के लिये शौचालय प्राथमिकताओं की दृष्टि से बहुत कम महत्त्वपूर्ण आवश्यकता थी। 2 अक्टूबर, 2014 को प्रारम्भ हुए स्वच्छ भारत मिशन में लोगों को शौचालयों के निर्माण के लिये प्रेरित करने और उनका उपयोग करने का लक्ष्य रखा गया। इसके अलावा शौचालयों के सेप्टिक टैंक में जमा मानव मल के निपटान को लेकर सामाजिक वर्जनाएँ भी स्वच्छता के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती थीं।

सरकार शौचालयों का निर्माण तो करवा सकती है लेकिन इसके साथ ही साफ-सफाई और स्वास्थ्य के प्रति जनता के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता महसूस की गई। व्यवहार परिवर्तन संचार और सूचना, शिक्षा और संचार के अभाव में पहले चलाए गए स्वच्छता कार्यक्रमों का कोई खास असर नहीं दिखाई दिया। लोगों ने घरों में शौचालय तो बनवाए मगर उनका उपयोग कुछ ही समय तक हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत साफ-सफाई और स्वास्थ्य के बारे में लोगों की अपनी-अपनी सोच और धारणाएँ होती हैं। शौचालय को अपवित्र और प्रदूषण का स्रोत मानने और खुले में शौच की आदत की वजह से लोगों ने घरों में शौचालयों के निर्माण के प्रति ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया। जिन लोगों ने शौचालयों का निर्माण करा भी लिया तो उनकी खुले में शौच की आदत नहीं छूट पाई। घर के पुरुषों का सुबह के समय घूमने के लिये खेतों में निकलना और खुले में शौच करना आदत का हिस्सा बन चुका था जिसे छुड़ाना और उन्हें शौचालय के इस्तेमाल के लिये प्रेरित करना बड़ा मुश्किल था। दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आमतौर पर खेती पर निर्भर होते हैं जिन्हें खेतीबाड़ी के लिये अक्सर पैसा उधार लेना पड़ता है। इसलिये शौचालय के लिये कर्ज लेना वे अतिरिक्त आर्थिक बोझ समझते हैं और इसलिये इसके लिये उधार नहीं लेते।

स्वच्छता कार्यक्रमों के पहले कार्य निष्पादन को देखते हुए स्वच्छ भारत अभियान पर मुख्यमंत्रियों का एक उप-समूह बनाया गया और उसे खुले में शौच की समस्या के परिमाण का विश्लेषण करने तथा देश को साफ-सुथरा बनाने के बारे में सिफारिशें करने को कहा गया। सिफारिशों के प्रथम समूह में व्यवहार परिवर्तन शामिल था जिसे मिशन की सफलता के लिये सबसे अहम माना गया। मुख्यमंत्रियों के उप-समूह की सिफारिशों में व्यवहार परिवर्तन घटक के लिये अधिक धनराशि के आवंटन पर जोर दिया गया। इसके अलावा राजनीतिक और सामाजिक/वैचारिक नेताओं, बड़ी हस्तियों, मीडिया घरानों को अभियान में शामिल करने और साफ-सफाई के व्यवसाय में लगे लोगों के प्रति सकारात्मक/सम्मानजनक दृष्टिकोण कायम करने पर भी जोर दिया गया। उप-समूह ने शिक्षा को मिशन की रणनीति के रूप में अपनाने की सिफारिश की और स्वच्छता को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने तथा परिवर्तन के वाहकों के रूप में बच्चों की क्षमता का उपयोग करने की सिफारिश की गई। स्वच्छता के बारे में लोगों की मानसिकता में सार्थक बदलाव लाने के लिये छात्रों का एक समूह बनाना बहुत जरूरी है क्योंकि छात्र अपने-अपने इलाकों में सफाई के अभियान को और आगे बढ़ा सकते हैं।

व्यवहार परिवर्तन संचार बेहद जरूरी है क्योंकि यह लोगों को जानकारी देने, शिक्षित करने और स्वच्छता कार्यक्रमों में अपनी भूमिका और दायित्व निभाने के साथ-साथ स्वच्छता के सही तौर-तरीकों में निवेश से होने वाले फायदों का लाभ उठाने का मंच साबित हो सकता है। चूँकि जनता इस अभियान के केन्द्र में होती है इसलिये सरकार ने मिशन को ‘जनान्दोलन’ कहकर पुकारना शुरू कर दिया। मिशन को असरदार बनने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि एक ऐसा समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाये जो जन-समुदायों को प्रतिभागी प्रविधियों से अधिकार-सम्पन्न बनाए ताकि लोग स्वच्छता की स्थिति के बारे में सोच-समझकर फैसले कर सकें। समुदाय के स्तर पर संचार को जनसंचार सम्बन्धी पहल से सुदृढ़ किया जा सकता है जिसमें माहौल तैयार करने और अनुस्मारक सेवाओं के जरिए वातावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिये सामाजिक और सांस्कृतिक मानदण्डों को बदलने पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय नियमित रूप से सफाई अभियानों का आयोजन कर रहा है। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और राज्यों ने स्वच्छता मिशन और व्यवहार परिवर्तन अभियान चलाने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है। राष्ट्रीय-स्तर पर जोरदार मीडिया अभियान आयोजित किये गए हैं जिनमें दृश्य-श्रव्य (टेलीविजन) और श्रव्य (रेडियो) माध्यमों का उपयोग किया जा रहा है। अमिताभ बच्चन, विद्या बालन, शिल्पा शेट्टी, अनुष्का शर्मा, अक्षय कुमार और सचिन तेंदुलकर को अभियान से जोड़ा गया है। इसके अलावा अन्य जाने-माने लोगों और विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों को भी अभियान में सहभागी बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं। सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग किया जा रहा है। हाइक एप पर एक राष्ट्रीय स्वच्छ भारत ग्रुप है जिसमें भारत के सभी राज्यों और कुछ चुने हुए जिलों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। जमीनी-स्तर पर देशभर में होने वाली घटनाओं को दैनिक आधार पर शेयर किया जाता है। मंत्रालय अपने ट्विटर हैंडल (@swachbharat) और फेसबुक पेज (Swachh Bharat Mission) का भी भरपूर इस्तेमाल करता है। मंत्रालय के वेबसाइट (www.mdws.gov.in) को अपग्रेड किया गया है और इसे बेहतरीन तौर-तरीकों को रीयल टाइम में एक-दूसरे के साथ शेयर करने का मंच बना दिया गया है। राष्ट्रीय-स्तर की आईईसी कंसल्टेशन तथा अन्य कार्यशालाओं के जरिए फायदों को अधिकतम करने और धनराशि में बढ़ोत्तरी करने के प्रयास भी किये जा रहे हैं। कारपोरेट घराने, सिविल सोसाइटी संगठन और अन्य मंत्रालय व विभाग भी स्वच्छ भारत मिशन के तहत जनता में साफ-सफाई के बारे में जागरुकता पैदा करने में मदद को आगे आये हैं। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने केन्द्रीय-स्तर पर एक मीडिया अभियान प्रारम्भ किया है जिसमें ‘यही है असली तरक्की’ नाम की फिल्म भी शामिल है। इसके अलावा मंत्रालय ने स्वच्छता पर अंग्रेजी और हिन्दी में अमर चित्र कथा प्रकाशित की है तथा शहरी स्थानीय निकायों के अधिकारियों के प्रशिक्षण का दायरा बढ़ाने के लिये ई-लर्निंग का पोर्टल शुरू किया है।

सितम्बर 2017 में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने स्वच्छ भारत हैकाथॉन ‘स्वच्छाथॉन 1.0’ का आयोजन किया जिसका उद्देश्य स्वच्छता से सम्बन्धित मुद्दों पर जनता से समाधान प्राप्त करना था। मंत्रालय के प्राथमिक लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों के युवा थे जिनसे निम्नलिखित श्रेणियों की समस्याओं के अभिनव समाधान प्रस्तुत करने को कहा गया था:

(क) पर्वतीय, शुष्क, बाढ़ के खतरे वाले और दूर-दराज इलाकों के लिये नई, टिकाऊ, पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल शौचालय टेक्नोलॉजी का विकास;
(ख) शौचालयों के इस्तेमाल पर नजर रखने के लिये तकनीकी समाधान;
(ग) शौचालयों के इस्तेमाल और साफ-सफाई के मामले में व्यवहार में परिवर्तन के लिये तकनीकी समाधान;
(घ) स्कूलों के शौचालयों के संचालन और रख-रखाव में सुधार के लिये अभिनव विधियाँ और मॉडल;
(ङ) महिलाओं में माहवारी के दौरान स्वास्थ्य की निगरानी के लिये अभिनव समाधान;
(च) मानव मल को जल्द सड़ाने के लिये अभिनव समाधान।

इसके अलावा गन्दगी को दूर करने के प्रधानमंत्री के आह्वान पर में पेयजल और स्वच्छता मंत्री ने घोषणा की कि स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अन्तर्गत आजादी की 70वीं जयन्ती तक “खुले में शौच से आजादी” सप्ताह मनाए जाएँगे। इस दौरान :

1. 24 से अधिक राज्यों ने सप्ताह के सिलसिले में स्वच्छता कार्ययोजना बनाई ताकि अभिनव तरीकों से उनके स्वच्छता प्रयासों को मजबूती मिले और इसमें जनसमुदाय का सहयोग मिले।

2. 12 अगस्त, 2017 को पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय तथा जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने पाँच राज्यों (उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल) में 24 गंगा ग्रामों की संयुक्त रूप से घोषणा की जिन्हें आदर्श गाँव के रूप में विकसित किया जाएगा।

3. उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद में 12 अगस्त, 2017 को मुख्यमंत्री, केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री तथा पेयजल और स्वच्छता मंत्री की उपस्थिति में 30 स्वच्छता रथ रवाना किये गए।

4. इसी तरह के स्वच्छता रथ देश के दूसरे भागों में भी शुरू करने के बारे में विचार किया गया। स्वच्छता रथ एलईडी पैनल से युक्त मोबाइल वैन हैं जिनमें स्वच्छता फिल्मों के प्रदर्शन की व्यवस्था के साथ-साथ गाँवों में जनसमुदायों के साथ सम्पर्क साधने के लिये नुक्कड़ नाटक मंडलियाँ भी रहती हैं। ये रथ समूचे राज्य का दौरा करते हैं और जनता में जागरुकता पैदा करते हैं ताकि लोगों में व्यवहार परिवर्तन लाने में मदद मिले।

नमामि गंगे अभियान के तहत पाँच राज्यों-उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के 52 जिलों में गंगा नदी के तट पर बसे 4480 गाँवों को खुले में शौच की आदत से मुक्त घोषित कर दिया गया। ‘गंगा ग्राम’ पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय तथा जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय की इन गाँवों को साफ-सफाई के लिहाज से आदर्श गाँव बनाने की साझा पहल है। इन गाँवों के ग्राम प्रधानों को आदर्श गंगा ग्राम बनाने के लक्ष्य को पूरा करने की शपथ दिलाई गई। गंगा ग्राम पहल के तहत बेहतर सफाई और बेहतर बुनियादी ढाँचा सुविधाओं जैसे ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबन्धन, तालाबों और जलस्रोतों के संरक्षण, जल-संरक्षण, ऑर्गेनिक फार्मिंग, शवदाह गृहों तथा अन्य सरकारी विभागों और परियोजनाओं के साथ समग्र तालमेल पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

उत्तराखण्ड में गंगा नदी के किनारे वीरपुर खुर्द नाम के गाँव में आयोजित एक कार्यक्रम में केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री ने ग्लोबल इंटरफेथ वॉश अलायंस (गीवा) के स्वामी चिदानंद सरस्वती के नेतृत्व में विभिन्न आस्था नेताओं की उपस्थिति में दो गंगा ग्रामों की शुरुआत की गई। देहरादून में गंगा तट पर ‘वीरपुर खुर्द’ और पौड़ी गढ़वाल में ‘माला’ नामक गाँवों को पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने आदर्श ग्राम के रूप में विकसित करने के लिये अपना लिया है। इसमें ग्लोबल इंटरफेथ वॉश अलायंस का सहयोग मिलेगा।

केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री और जाने-माने फिल्मी सितारे अक्षय कुमार ने मध्य प्रदेश के खरगौन जिले में रेघवान गाँव में शौचालय के गड्ढे को खाली कराया ताकि इस बारे में ग्रामीण लोगों के मन की वर्जना की भावना दूर हो। पेयजल और स्वच्छता मंत्री और अक्षय कुमार केन्द्र और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के दल का नेतृत्व करते हुए गाँव के एक परिवार के यहाँ पहुँचे जिसने दो गड्ढे वाले शौचालय को अपनाया था और भरे हुए गड्ढे की सफाई ही नहीं की बल्कि उसमें से निकली कम्पोस्ट खाद को अपने हाथों में लेकर लोगों को दिखाया कि ऐसा करने में न तो कोई जोखिम है और न कोई बुराई।

देश भर में ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिये पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने 30 मई, 2017 से ‘दरवाजा बन्द’ नाम का एक जबरदस्त प्रचार अभियान शुरू किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय द्वारा तैयार किये गए इस प्रचार अभियान का शुभारम्भ जाने-माने फिल्मी सितारे अमिताभ बच्चन, केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के सचिव और केन्द्र तथा राज्य के कई अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में मुम्बई में किया गया। राज्य के सभी जिलों के अधिकारियों और कुछ चुनी हुई ग्राम पंचायतों के सदस्यों ने इसमें हिस्सा लिया। इस अभियान को विश्व बैंक का सहयोग मिल रहा है और शुभारम्भ के बाद इसे देश भर में चलाया जा रहा है। यह अभियान ऐसे लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने के मकसद से चलाया जा रहा है जिनके घरों में शौचालय तो हैं मगर वे उनका इस्तेमाल नहीं करते। इस अभियान में फिल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की भी भागीदारी है जिन्हें ग्रामीण महिलाओं को स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिये सामने आने और अभियान का नेतृत्व करने को कहा जा रहा है।

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अन्तर्गत पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में 29 और 30 जून, 2017 को दो दिन का कलेक्टरों का सम्मेलन आयोजित किया। यह कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के स्वच्छता पखवाड़ा समारोह का ही एक हिस्सा था। इसके अन्तर्गत पखवाड़े की अवधि के दौरान अकादमी को स्वच्छ भारत अकादमी का नया नाम दिया गया।

केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री ने भी घोषणा की है कि स्वच्छ भारत मिशन के तीन साल पूरे होने के उपलक्ष्य में मंत्रालय ने देश भर में 25 सितम्बर से 2 अक्टूबर, 2017 तक विभिन्न स्वच्छता कार्यक्रमों की योजना बनाई है। इस दौरान सबसे निचले स्तर के स्वच्छता चैम्पियनों, जिला-स्तर के अधिकारियों, बेहतरीन स्वच्छता पखवाड़ा आयोजित करने वाले मंत्रालयों, उत्कृष्ट योगदान करने वाले मंत्रालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा संरक्षित स्वच्छता के प्रतीक स्थलों और स्वच्छता कार्य योजनाओं को राष्ट्रीय स्वच्छता पुरस्कार प्रदान किये जा रहे हैं।

ज्यों-ज्यों स्वच्छ भारत मिशन अपनी तीसरी जयन्ती की तरफ बढ़ रहा है, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने ग्रामीण भारत में मिशन की प्रगति का जायजा लेने के लिये तृतीय पक्ष से सत्यापन कराने के बाद सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है। क्वालिटी काउंसिल ऑफ इण्डिया (क्यूसीआई) ने सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में ग्रामीण स्वच्छता की वर्तमान स्थिति का तृतीय पक्ष से पारदर्शी मूल्यांकन कराया है जिसे स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2017 नाम दिया गया है।

स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2017 के अन्तर्गत क्वालिटी काउंसिल ऑफ इण्डिया ने जिन 4626 गाँवों का सर्वेक्षण किया उनमें रहने वाले करीब 1.4 लाख ग्रामीण परिवारों में से कुल 62.45 प्रतिशत के पास शौचालय थे। सर्वेक्षण के समय, यानी मई-जून 2017 में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की समन्वित प्रबन्धन सूचना प्रणाली (आईएमआईएस) 63.73 प्रतिशत परिवारों को शौचालयों की सुविधा के दायरे में लाये जाने की जानकारी दी। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि शौचालय की सुविधा प्राप्त लोगों में से 91.29 प्रतिशत शौचालय का उपयोग कर रहे थे। सरकार द्वारा अपनाई गई व्यवहार परिवर्तन की सघन नीति, ग्रामीण भारत में शौचालयों के उपयोग में भारी बढ़ोत्तरी का कारण हो सकती है।

राज्यों और जिलों को स्वच्छता और ठोस-द्रव अपशिष्ट प्रबन्धन (एसएलडब्ल्यूएम) के अपने दायरे में और सुधार को प्रेरित करने के लिये पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने भारत के सभी जिलों को स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (समन्वित प्रबन्धन सूचना प्रणाली) पर उपलब्ध त्रैमासिक आँकड़ों के आधार पर रैंकिंग प्रदान करने का फैसला किया है। यह रैंकिंग कार्य निष्पादन, टिकाऊपन और पारदर्शिता के मापदण्डों पर आधारित होगी। जुलाई-सितम्बर 2017 की तिमाही अवधि के लिये पहली रैंकिंग 2 अक्टूबर, 2017 को घोषित की जाएगी।

यह मिशन ग्रामीण परिवारों के लिये शौचालयों के निर्माण से उन्हें स्वच्छता के दायरे में लाने में कामयाब रहा है। मिशन की शुरुआत के समय देश में सिर्फ 39 प्रतिशत परिवारों के अपने शौचालय थे। अब तक 69 प्रतिशत परिवारों को शौचालय की सुविधा वाले परिवारों के दायरे में लाया जा चुका है। सितम्बर 2017 में देश में शौचालयों की सुविधा से विहीन परिवारों की संख्या करीब 5.20 करोड़ थी जिनमें से करीब 2.70 करोड़ परिवार उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं। मंत्रालय को इन दो राज्यों के लिये विशेष रणनीति तैयार करनी चाहिए तभी भारत को खुले में शौच की बुरी आदत से मुक्त कराने के सपने को साकार किया जा सकेगा।

23 सितम्बर, 2017 को प्रधानमंत्री ने वाराणसी में दो गड्ढों वाले एक शौचालय के निर्माण में श्रमदान किया। स्वच्छता के अभियानों में उनकी बार-बार भागीदारी से साफ-सफाई के प्रति उनकी वचनबद्धता का पता चलता है। उन्होंने शौचालयों को ‘इज्जत घर’ नाम दिये जाने की भी तारीफ की। 27 अगस्त, 2017 को आकाशवाणी पर अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उन्होंने देशवासियों से 15 सितम्बर, 2017 से गाँधी जयन्ती तक आयोजित किये जा रहे ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान में भाग लेने का आह्वान किया। इस तरह के संकेतों से स्वच्छता के लिये देश में चलाए जा रहे अभियानों को जन-आन्दोलन बनाने में मदद मिलेगी।

लेखक परिचय


पद्मकांत झा भारत सरकार के नीति आयोग में उप सलाहकार (पेयजल एवं स्वच्छता) हैं; योगेश कुमार सिंह नीति आयोग में यंग प्रोफेशनल हैं।) (लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

ई-मेल : jha.pk@gov.in


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