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किसानों का मर्सिया

Author: 
रिचर्ड महापात्रा
Source: 
डाउन टू अर्थ, फरवरी 2018

भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से के लिये कृषि आजीविका का स्रोत बनी रही। 2014-15 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस सेक्टर ने करीब 13 फीसदी का योगदान दिया था। 1971 से कृषि में लगे श्रमिकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। हालांकि, 2001 से 2011 के बीच किसानों की संख्या में कमी आई है। कृषि मजदूरों की संख्या 107 मिलियन से बढ़कर 144 मिलियन हो गई। इसके विपरीत, कृषि मजदूरों की संख्या 2004-05 के 92.7 मिलियन से घटकर 2011-12 में 78.2 मिलियन हो गई।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार कृषि क्षेत्र को ऐसे संकट से बचाने की कोशिश कर रही है, जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। इस सिलसिले में 10 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार 100 से अधिक अर्थशास्त्रियों से मिले। इस बातचीत में कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी के मुद्दे हावी रहे। मोदी का 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वादा लटक गया है, क्योंकि पूरे देश से भारी कृषि संकट की रिपोर्ट्स आ रही हैं।

2017 में उचित मूल्य न मिल पाने की वजह से किसानों को अपना उत्पाद सस्ते में बेचना या सड़क पर बिखेरना पड़ा। इस तरह की खबरें अखबारों की सुर्खियाँ बनीं। अर्थव्यवस्था पर सरकार का डेटा चिन्ताजनक है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में, कृषि पिछले वर्ष के 4.9 प्रतिशत की तुलना में 2.1 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। ये संकेत ठीक नहीं हैं, क्योंकि पिछले दो बार के सामान्य से कम मानसून की तुलना में इस बार मानसून सामान्य था। आमतौर पर, सूखे के बाद, निम्न बेसलाइन लेवल के कारण कृषि विकास अधिक होता है।

लेकिन, मोदी-अर्थशास्त्रियों की बैठक में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य गौण रहा। मोदी सरकार ने कृषि पर काफी मेहनत से तैयार की गई रिपोर्टों की एक शृंखला तैयार करवाई है। ये रिपोर्ट अशोक दलवाई के नेतृत्व में बनी है, जिसका नाम है, “द कमेटी ऑन डबलिंग फार्मर्स इनकम”। यह कमेटी कृषि की दशा और किसानों की आय बढ़ाने के तरीके पर 14 रिपोर्ट देगी। आठ रिपोर्ट्स पहले ही जारी की जा चुकी हैं।

दलवाई कमेटी की पहली रिपोर्ट में 100 विशेषज्ञों के रिसर्च और इनपुट का उपयोग किया गया है। यह रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में भारतीय कृषि एक गहरे संकट में फँसी हुई है। ऐसा इसलिये है, क्योंकि 2004-2014 के दौरान देश के कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक विकास हुआ। रिपोर्ट इसे सेक्टर का ‘रिकवरी फेज’ कहती है। ये एक ऐसा शब्द है, जो इसे ऐतिहासिक बनाता है।

ये रिपोर्ट, किसानों की आय दोगुना करने के तरीकों का सुझाव देने से ज्यादा, भारतीय कृषि की हालत पर आँख खोलती है। डाउन टू अर्थ यहाँ देश की कृषि से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहा है, जिनकी खबरें आमतौर पर सामने नहीं आतीं।

किसान घटे, कृषि मजदूर बढ़े


राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान घट रहा है, लेकिन यह अब भी 56 प्रतिशत आबादी को रोजगार देता है।

कोई भी राष्ट्र अपनी कृषि और किसानों से समझौता नहीं कर सकता और भारत जैसे देश में तो बिल्कुल भी नहीं। भारत में, जहाँ 1951 में 70 मिलियन हाउसहोल्ड (घर) कृषि से जुड़े हुए थे, वहीं 2011 में ये संख्या 119 मिलियन हो गई। इसके अलावा, भूमिहीन कृषि मजदूर भी हैं, जिनकी संख्या 1951 में 27.30 मिलियन थी और 2011 में बढ़कर ये संख्या 144.30 मिलियन हो गई। भारत की इतनी बड़ी आबादी का कल्याण एक मजबूत कृषि विकास रणनीति से ही हो सकती है, जो आय वृद्धि की दृष्टिकोण से प्रेरित हो।

भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से के लिये कृषि आजीविका का स्रोत बनी रही। 2014-15 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस सेक्टर ने करीब 13 फीसदी का योगदान दिया था। 1971 से कृषि में लगे श्रमिकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। हालांकि, 2001 से 2011 के बीच किसानों की संख्या में कमी आई है। कृषि मजदूरों की संख्या 107 मिलियन से बढ़कर 144 मिलियन हो गई।

इसके विपरीत, कृषि मजदूरों की संख्या 2004-05 के 92.7 मिलियन से घटकर 2011-12 में 78.2 मिलियन हो गई। ये दर्शाता है कि प्रतिवर्ष लगभग 22 लाख कृषि मजदूरों ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया। उसी समय, रोजगार और बेरोजगारी पर एनएसएसओ सर्वेक्षण के अनुसार, 2004-05 से 2011-12 के दौरान खेती करने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 1.80 प्रतिशत की दर से घटती गई। 1967-71 के बाद, हाल के दशक में कृषि में लगे किसानों की संख्या में नकारात्मक वृद्धि देखी गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि लोग खेती से दूर जा रहे हैं।

किसानों की आय 7 रुपए प्रतिमाह


गैर-कृषि मजदूर, किसान से तीन गुना अधिक कमाता है।

वर्तमान कृषि संकट इतना गहरा है कि इसे एक किसान-अनुकूल बजट के माध्यम से ही तत्काल ठीक किया जा सकता है। आइए, भारत में एक किसान की आय को देखें। ‘रिकवरी फेज’ के दौरान भी, एक कृषक परिवार का एक सदस्य लगभग 214 रुपए प्रतिमाह कमाता था। लेकिन, उसका खर्च करीब 207 रुपए था।

सरल भाषा में कहें तो एक किसान की डिस्पोजल मासिक आय 7 रुपए थी। 2015 के बाद से, भारत में दो भयंकर सूखे पड़े। बेमौसम बरसात से और अन्य सम्बन्धित घटनाओं के कारण फसल बर्बाद होने की लगभग 600 घटनाएँ हुईं और अन्त में बम्पर फसल के दो साल के दौरान किसानों को उचित कीमत ही नहीं मिली।

इसका मतलब है कि एक किसान के पास अब निवेश के लिये आधार पूँजी भी नहीं है और न ही उसमें कृषि क्षेत्र में वापस जाने के लिये जोखिम लेने की क्षमता है। इससे संकट में बढ़ोत्तरी हुई, जिसने असन्तोष को और अधिक बढ़ा दिया।

अक्सर यह महसूस किया जाता है कि कृषि आय और गैर-कृषि आय के बीच असमानता बढ़ रही है और जो लोग कृषि क्षेत्र से बाहर काम करते हैं, वे उन लोगों की तुलना में बहुत तेजी से प्रगति कर रहे हैं, जो कृषि क्षेत्र में काम करते हैं। 1983-84 में एक मजदूर की कमाई से तीन गुना अधिक किसान कमाता था। एक गैर-कृषि मजदूर उन किसानों या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा कमाई गई आय से तीन गुना अधिक कमाता था, जो मुख्य रूप से कृषि से जुड़े हुए थे।

हाल के इतिहास में पहली बार, अपेक्षाकृत अमीर किसान अपने उत्पादों के बेहतर मूल्य के लिये सड़क पर विरोध कर रहे थे। दलवाई समिति की रिपोर्ट बताती है कि मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिये, खाद्यान्न आयात करने की सरकार के कदम ने घरेलू किसानों के बाजार को कमजोर किया है। भारत का कृषि उत्पादन का निर्यात कम हो गया है। यह 2004-2014 के दौरान, पाँच गुना वृद्धि दर्ज करते हुए 50,000 करोड़ रुपए से बढ़कर 2,60,000 करोड़ रुपए हो गया था। एक साल में, यानी 2015-16 में ये 2,10,000 करोड़ रुपए तक आ गया। इसका अर्थ है कि बाजार को 50,000 करोड़ रुपए का सम्भावित नुकसान हुआ।

दूसरी ओर, कृषि आयात में लगातार वृद्धि दर्ज की गई। यह 2004-05 में 30,000 करोड़ रुपए था, जो 2013-14 में बढ़कर 90,000 करोड़ रुपए हो गया। यह यूपीए-2 सरकार का अन्तिम साल था। 2015-16 में यह बढ़कर 1,50,000 करोड़ रुपए तक पहुँच गया।

करीब 22 प्रतिशत किसान गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। किसानों की आय में गिरावट को देखते हुए, आय दोगुना करने का वादा ‘न्यू इण्डिया’ के लिये एक और भव्य योजना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कृषि विकास ही किसानों की गम्भीर, गरीबी कम करने का काम कर सकता है।

बागवानी : मुख्य संचालक


अपने उत्पाद को बेचने में सक्षम नहीं होना ही किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा है

लगातार छह साल तक, बागवानी (फल और सब्जियाँ) उत्पादन अनाज उत्पादन से आगे रहा है। हाल के समय में, बागवानी का उदय, कृषि विकास का एक कम स्वीकार्य पहलू रहा है। विशेषकर 2004-14 के उच्च विकास चरण के दौरान। हालांकि यह सिर्फ खेती के 20 प्रतिशत हिस्से को ही कवर करता है, लेकिन यह कृषि जीडीपी में एक तिहाई से भी ज्यादा का योगदान देता है। पशुधन के साथ, कृषि के इन दो उपक्षेत्रों में वृद्धि जारी रही है और ये अधिकतम रोजगार भी दे रहे हैं।

देश में फलों और सब्जियों का उत्पादन, खाद्यान्न से आगे निकल गया है। कृषि मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी एक बयान में कहा गया है कि वर्ष 2016-17 (पूर्वानुमान) के दौरान 300.6 मिलियन टन बागवानी फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में 5 प्रतिशत अधिक है।

बागवानी किसानों की सबसे बड़ी चुनौती बिक्री और फसल होने के बाद में होने वाली हानि (बर्बादी) है। इससे यह किसानों के लिये कम आकर्षक सेक्टर बन जाता है। हालांकि, सरकार ये बात गर्व के साथ कहती है कि भारत दुनिया में सब्जियों और फलों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है, लेकिन यहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए कि फसल पैदा होने के बाद होने वाली बर्बादी की वजह से फल और सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता काफी कम है। फल और सब्जियों की बर्बादी कुल उत्पादन का लगभग 25 से 30 प्रतिशत होता है।

फल और सब्जियों की ये बर्बादी कोल्ड चेन (शीत गृह) की संख्या में कमी, कमजोर अवसंरचना, अपर्याप्त कोल्ड स्टोरेज क्षमता, खेतों के निकट कोल्ड स्टोरेज का न होना और कमजोर परिवहन साधन की वजह से होती है। किसानों की आय दोगुना करने के लिये बनी कमेटी के मुताबिक, “अखिल भारतीय स्तर पर, किसानों को 34 प्रतिशत फल, 44.6 प्रतिशत, सब्जियाँ और 40 फीसदी फल और सब्जी के लिये मौद्रिक लाभ नहीं मिल पाता है। यानी, इतनी मात्रा में फल और सब्जियाँ किसान बेच नहीं पाते या बर्बाद हो जाती है।”

इसका मतलब है कि हर साल, किसानों को अपने उत्पाद नहीं बेच पाने के कारण 63,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो जाता है, जिसके लिये उन्होंने पहले ही निवेश किया होता है। इस चौंकाने वाले आँकड़े को ऐसे समझ सकते हैं कि यह राशि फसल कटाई के बाद होने वाली बर्बादी से बचने के लिये आवश्यक कोल्ड चेन अवसंरचना उपलब्ध कराने के लिये जरूरी निवेश का 70 प्रतिशत है।

यह किसानों द्वारा किये जा रहे व्यापक विरोध प्रदर्शन की व्याख्या करता है। मिर्च, आलू और प्याज की कम कीमत इसके पीछे प्रमुख कारणों में से एक थी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी नवीनतम आँकड़ों के मुताबिक, 2014 में जहाँ 628 कृषि से जुड़े प्रदर्शन हुए थे, वहीं 2016 में इसमें 670 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई और ये संख्या बढ़कर 4,837 हो गई थी।

दोगुनी आय - एक नया सौदा


2022 तक किसानों की आय को दोगुना करना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे महत्त्वाकांक्षी राजनीतिक वादा है। लेकिन दलवाई समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों को देखते हुए, यह एक मुश्किल चुनौती प्रतीत होती है, हालांकि यह सम्भव है। इन रिपोर्टों के अनुसार, इसमें कृषि के लिये बड़े पैमाने पर निजी और सार्वजनिक खर्च को शामिल किया गया है, जिसने लगातार कम निवेश नहीं देखा है। कृषि से कम होती आय के कारण, किसान इस आजीविका को छोड़ रहे हैं। इसलिये, पहले उन्हें खेतों तक वापस लाया जाना चाहिए और फिर आय बढ़ाने के लिये काम किये जाने चाहिए, ताकि वे खेती जारी रखें।

हाल ही में नीति आयोग के अर्थशास्त्री रमेश चंद, एसके श्रीवास्तव और जसपाल सिंह ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन और रोजगार सृजन पर इसके प्रभावों पर एक चर्चा पत्र जारी किया। इस पत्र के अनुसार, 1970-71 से 2011-12 के दौरान, “भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था 2004-05 की कीमतों पर 3,199 बिलियन रुपए से बढ़कर 21,107 बिलियन हो गई।” यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सात गुना वृद्धि थी।

अब इस वृद्धि की तुलना रोजगार वृद्धि के साथ करें। इसी अवधि ये 191 मिलियन से बढ़कर 336 मिलियन हो गई। दलवाई समिति की रिपोर्ट में कहा गया है, “किसानों की आय को दोगुनी करने की रणनीति के तहत मुख्य रूप से खेती की व्यवहार्यता बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, इसलिये इस रणनीति का उद्देश्य कृषि आय का अनुपात गैर-कृषि आय के 60 से 70 प्रतिशत मौजूदा दर को बढ़ाना चाहिए।” इसी के साथ, इस विकास रणनीति को समानता पर भी ध्यान देना चाहिए, जैसे कम विकसित क्षेत्रों में उच्च कृषि विकास को बढ़ावा देना, जिसमें बारिश पर निर्भर क्षेत्रों सहित, सीमान्त और छोटे भूमि धारक भी शामिल हों।

भारत की खेती योग्य भूमि का 60 प्रतिशत हिस्सा बारिश पर निर्भर है और इन्हीं क्षेत्रों में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं और इन्हें सूखे का सामना करना पड़ रहा है। ये वो क्षेत्र है, जहाँ सरकार वर्तमान में हरित क्रान्ति 2 को क्रियान्वित कर रही है।

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