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स्वच्छ भारत के लिये व्यवहार परिवर्तन संचार

Author: 
परमेश्वरन अय्यर
Source: 
योजना, मार्च 2018

भारत की ही तरह अन्य विभिन्न देशों में भी स्वच्छता अभियान की सफलता की राह में अनेक रोड़े हैं जिनकी वजह से अभियान की कामयाबी कठिन एवं जटिल हो जाती है। इन समस्याओं का सफलतापूर्वक सामना करने के लिये, स्वच्छ भारत अभियान के अन्तर्गत राज्यों में अनुकूल कार्य योजनाओं को तैयार करने की दृष्टि से पर्याप्त लचीलापन बरता गया है। अभियान में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग, अभियान को प्रभावी बनाने के लिये स्थानीय लोक कलाकारों का उपयोग, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों के लिये अनुकूलित शौचालय प्रौद्योगिकी आदि समाधान इसमें सम्मिलित हैं। इसमें राज्यों पर किसी प्रकार की कोई पाबंदी नहीं है।

भारत में पिछले चार दशक में देश में विभिन्न सरकारों द्वारा ग्रामीण स्वच्छता के लिये अनेक कार्यक्रम शुरू किये गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित स्वच्छता का एेसा प्रथम प्रयास केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम 1981 था। इसे सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) के रूप में 1999 में निर्मल भारत अभियान के रूप में पुनर्गठित किया गया।

देश में स्वच्छ भारत अभियान के रूप में इस प्रकार का अपूर्व जन उभार पहले कभी नहीं देखा गया। यह दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छता कार्यक्रम है। स्वच्छ भारत अभियान अपने पूर्व निर्धारित प्रारूप से भी आगे निकल चुका है, यह जनसमुदाय की व्यापक भागीदारी पर आधारित एक व्यापक जन आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है।

यह आलेख स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के अपने लक्ष्य पूर्व स्वच्छता की प्रगति की यात्रा को प्रदर्शित करता है। लेख में कार्यक्रम का सिंहावलोकन, इसकी प्रगति और उपलब्धियों पर नजर डालने के बाद, अभियान के मुख्य आधार सामुदायिक भागीदारी और कार्यक्रम के श्रेष्ठतम प्रभावों पर विचार किया गया है। इसके अलावा प्रपत्र में विभिन्न अभियानों और घटनाओं की चर्चा की गई है, जिन्होंने इसे जनआन्दोलन के रूप में विकसित किया।

यह लेख 2019 में स्वच्छ भारत की दिशा में आगे बढ़ने इसे जारी रखने के लिये इसके संन्देशों के प्रसारण और इन्हें श्रोताओं के अनुकूल बनाने तथा व्यवहार परिवर्तन संवाद (बीसीसी) का महत्त्व रेखांकित करता है।

लाल किले से 2 अक्टूबर 2014 को अपने ऐतिहासिक सम्बोधन में प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत के लिये आह्वान किया और फिर इस असाधारण तथा साहसिक कार्य में सफलता के लिये उन्होंने पथ प्रदर्शन किया। 2014 के बाद से, शौचालय युक्त घरों की संख्या का प्रतिशत दो गुना बढ़ चुका है। शौचालय युक्त घर सिर्फ 3 वर्षों के भीतर 6 करोड़ हो गए हैं। ये 2014 में 39 प्रतिशत थे जो अब बढ़कर 76 प्रतिशत से अधिक हो चुके हैं।

इन तीन वर्षों में स्वच्छता मोर्चे पर देश ने जो यह उपलब्धि हासिल की है, वह आजादी के 67 वर्षों के बराबर है! सात राज्यों (सिक्किम, केरल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, हरियाणा, गुजरात और अरुणाचल प्रदेश) के ग्रामीण इलाके और दो केन्द्र शासित प्रदेश (चंडीगढ़ और दमन और दीव) खुले शौच मुक्त (ओडीएफ) हो चुके हैं।

खुले में शौच की समस्या को कम करने की दिशा में स्वच्छ भारत अभियान की अनेक उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। इस अभियान में व्यवहार परिवर्तन, जरूरत-आधारित क्षमता निर्माण और परिणामों के लगातार आकलन पर जिस प्रकार जोर दिया गया उसके बदौलत ही यह कामयाबी मुमकिन हो सकी है।

कार्यक्रम की निरन्तरता बनी रहे इसके लिये शौचालयों के निर्माण तक सीमित रहने की जगह लोगों के व्यवहार में परिवर्तन और खुले में शौच मुक्त के लिये समाज की भागीदारी के आकलन पर मुख्य जोर दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान (एसबीएम) के प्रमुख सम्प्रषेक खुद प्रधानमंत्री हैं और सब कुछ उनके नेतृत्व में संचालित हुआ है, इसनेे गेमचेंजर की तरह निर्णायक भूमिका का निर्वाह किया।

अतीत के स्वच्छता अभियानों एवं वर्तमान स्वच्छ भारत अभियान में यह एक प्रमुख अन्तर है। यह अभियान जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, व्यक्तियों और समुदायों के लिये यह बात अधिक महत्त्वपूर्ण होती जाती है कि वे स्वयं ओर अपने आस-पास साफ-सफाई और स्वच्छता की जिम्मेदारी ग्रहण करें।

अत्यन्त पुराने समय से चले आ रहे परम्परागत तौर-तरीकों, प्रवृति एवं मनःस्थिति में परिवर्तन के साथ व्यवहार में बदलाव द्वारा ही यह मुमकिन है। इस बारे में पारस्परिक संवाद (आईपीसी) स्वच्छ भारत अभियान का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। आईपीसी के अन्तर्गत विभिन्न गतिविधियाँ जैसे कि दरवाजे-दरवाजे जाकर जागरुकता उत्पन्न करना, गाँवों में सुबह-सुबह एेसे खुले शौच के स्थानों जहाँ आमतौर पर लोग शौच किया करते हैं, निगरानी करना आदि सम्मिलित हैं। जागरुकता कार्यक्रम आयोजित करने और सुधार प्रक्रिया में नागरिकों की सहभागिता पर जोर दिया गया है।

देश के सभी गाँवों में स्वच्छाग्रहियों की वाहिनी बनाई गई हैं विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से इसके सदस्यों की बहुआयामी क्षमताओं को विकसित किया गया। ये स्वच्छता के वे अग्रिम सिपाही हैं, जिनके माध्यम से अभियान को अन्तर-व्यक्तिगत संवाद (आईपीसी) के जरिए आधारभूत, गहराई और व्यापक स्तर पर विकसित किया जाता है। वर्तमान में, प्रबन्धन सूचना प्रणाली (एमआईएस) में लगभग 3.5 लाख स्वच्छताग्रही पंजीकृत हैं और यह संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

गाँव की बैठकों के दौरान स्वच्छाग्रही जन-भावनाओं को उद्वेलित करने में प्रत्यक्ष भूमिका अदा करते हैं। सामुदायिक दृष्टिकोण से स्वच्छता कार्यक्रम (सीएएस) के अन्तर्गत सभी जिलों में प्रमुख प्रशिक्षक (मास्टर ट्रेनर) के माध्यम से सर्वेक्षण और बैठकों का आयोजन किया जाता है।

ग्रामीणों को शौचालय बनाने के महत्त्व के साथ भावनात्मक रूप से प्रेरित किया जाता है। इसके लिये मानव के व्यवहार को संचालित करने वाले विभिन्न पक्ष, जैसे कि परिवार के प्रति प्रेम, बच्चों की देखभाल, सामाजिक स्तर, स्वाभिमान, समाज में सम्मान आदि भावों को जागृत किया जाता है। प्रतिष्ठा या निजी गरिमा, सुरक्षा और स्वास्थ्य पर जोर देने के लिये गन्दगी के प्रति घृणा या मातृत्व की भावनाओं को प्रेरित किया जाता है।

ये ‘प्रेरक’ सामान्य तौर पर ग्रामीणों से शौचालय बनाने के लिये सीधे-सीधे नहीं कहते हैं, बल्कि कुछ इस अन्दाज में सवालों को पेश करते हैं कि वे स्वयं आत्मनिरीक्षण करने के लिये प्रेरित होते हैं और उन्हें खुद यह अहसास होता है कि घर में शौचालय बनाना और उसका नियमित प्रयोग करना ही उनके और उनके परिवारों के लिये सबसे अच्छा है। इसका एक उदाहरण है, स्वच्छाग्रही एक सीधा सा सवाल करता है, “एक समय में एक व्यक्ति कितना मलोत्सर्जन करता है?”

विकल्प यह दिया जाता है 200 ग्राम से 400 ग्राम; 400 ग्राम से 600 ग्राम; या 600 ग्राम से अधिक। अधिकांश लोगों का जवाब 500 ग्राम प्रति व्यक्ति होता है। इस हिसाब से पाँच सदस्यों के एक परिवार द्वारा यदि प्रतिदिन खुले में एक समय में 2.5 किलोग्राम मल पदार्थ का उत्सर्जन और चार परिवारों द्वारा 10 किलो मल उत्सर्जन किया जाता है, तो इस मल पर बैठने वाली मक्खियाँ जब भोजन पर बैठती हैं तो इस माध्यम से वह मल हमारे भोजन में सम्मिलित हो जाती हैं। इस तरह के सवाल-जवाब के माध्यम से होने वाले संवाद का ग्रामवासियों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है।

स्वच्छाग्रही सभी उम्र,लिंग, जाति एवं धर्म से सम्बन्धित होते हैं। बच्चे स्वच्छता के सर्वोत्तम समर्थक हैं। देश के सभी जिलों में वानरसेना के रूप में छोटे बच्चों की टीम इसकी निगरानी करती है कि कोई भी खुले में शौच नहीं करे। वह इसकी निगरानी में बड़ी कारगर भूमिका अदा कर रही है। वे इसे खेल बना लेते हैं।

खुले में शौच को रोकने के लिये उनके दिलचस्प उपाय हैं, जैसे कि कोई खुले में शौच करता हो तो सीटी बजाना, गाने गाते हुए जागरुकता फैलाना। वे खुले शौच के हानिकारक प्रभाव से लोगों को अवगत कराने में उत्साह के साथ जुट जाते हैं। वे सुबह-सवेरे गाँव में खेतों एवं आम स्थल जहाँ लोग खुले शौच जाया करते हैं, पहुँच जाते हैं और लोगों से शौचालय बनाने और उसका उपयोग करने के लिये कहते हैं।

जब तक शौचालय न बने तब तक मल पर मिट्टी डालकर उसे ढँक देने की सलाह देते हैं, ताकि खुले शौच से जुड़ी बीमारियों के फैलने से बचाव हो सके। इसके अलावा, बच्चे घर-घर जाकर स्वच्छ भारत अभियान का सन्देश देते हैं। ये बच्चे क्योंकि गाँव-समाज के ही बच्चे हैं, इसलिये वे जब लगातार लोगों को टोकते हैं या स्वच्छता का सन्देश देते हैं तो लोग बुरा नहीं मानते। इस प्रकार वानर सेना समाज के भीतर से उसे प्रेरित और जागरूक करने का बेहद कारगर माध्यम है।

वानर सेना और अन्य एेसे उदाहरणों से यह स्थापित हुआ है कि समाज के भीतर से स्वच्छता अभियान के हरावलों को विकसित करने की कार्यप्रणाली ऊपर से निर्देशित कमांड शृंखला की तुलना में अधिक बेहतर, प्रेरक और प्रभावशाली है। इस कार्यशैली से खुले में शौच मुक्त ग्राम विकसित करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिये पूरे समाज में एकता विकसित होती है।

राष्ट्रीय स्तर पर, जमीनी स्तर पर किये जा रहे कामों को बल प्रदान करने के लिये विभिन्न कार्यक्रम और आयोजन किये जाते हैं। इनके अन्तर्गत किये जा रहे कामों को सन्देश के रूप में प्रचारित करने, इनकी चर्चाओं को ताजा रखने और जनआन्दोलन को गुन्जायमान रखना भी अभियान का महत्त्वपूर्ण अंग है। गाँवों में शौचालय के उपयोग को बढ़ावा देने के लिये,मई 2017 में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने दरवाजा बन्द नाम से एक नया आक्रामक अभियान प्रारम्भ किया है।

दरवाजा बन्द एक प्रतीक है, खुले में शौच करना चाहिए इसकेे माध्यम से यह सन्देश दिया गया है। सुप्रसिद्ध अभिनेता अभिताभ बच्चन के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को उन लोगों के व्यवहार में परिवर्तन के लिये तैयार किया गया है, जिनके घरों में शौचालय तो हैं, लेकिन वे उनका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। अभिनेत्री अनुष्का शर्मा द्वारा गाँवों में महिलाओं को इस अभियान में सम्मिलित होने और नेतृत्वकारी भूमिका अदा करने के लिये प्रोत्साहित किया गया है।

इन ब्रांड एंबेसडरों द्वारा मास मीडिया के माध्यम से सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देने से राष्ट्रीय स्तर पर अभियान को जबरदस्त मान्यता मिली है। मुख्यधारा के फिल्म उद्योग में भी स्व्च्छता के सरोकार ने अपनी जगह बनाई है। इसमें, टाॅयलेटः एक प्रेम कथा, उल्लेखनीय फिल्म है, जिसमें अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर मुख्य किरदार में हैं। इसमें स्वच्छता के सन्देश, इसके प्रति जागरुकता के साथ जमीनी हकीकत को भी उजागर किया गया है और इस अभियान द्वारा धरातल पर किये गए कामों को भी बताया गया है।

यह एक पत्नी की कहानी है जो अपनी ससुराल में शौचालय नहीं होने के कारण अपने पति का घर छोड़ देती है। यह एक असाधारण मामला था, परन्तु स्वच्छ भारत मिशन के शुरू होने के बाद से, ग्रामीण भारत में महिलाओं का अपने अधिकार के लिये संघर्ष में शौचालय एक जीवन्त विषय बन गया है।

सितम्बर 2017 में स्वच्छता ही सेवा पखवाड़े में 9 करोड़ से अधिक लोगों ने अपने समुदायों के साथ स्वच्छता के लिये श्रमदान किया, स्वच्छता की शपथ ली, साफ-सफाई पर निबन्ध लिखे, चित्र और फिल्में बनाई। इस तरह यह पखवाड़ा नागरिक भागीदारी को बढ़ाने के लिये एक मंच बन गया। अनेक विख्यात हस्तियाँ समर्थन में आगे आई, हाॅकी टीम ने बंगलुरू को साफ करने का बीड़ा उठाया, राजनीतिक नेताओं ने पूरे देश में स्वच्छता अभियानों का उद्घाटन किया।

भारतीय क्रिकेट टीम ने भी धब्बों को साफ कर अभियान में सहभागिता की स्वच्छता पर लघु वीडियो बनाए गए, जिन्हें उनके मैचों के टीवी शो के दौरान प्रसारित हुए। इसने अभियान को गति प्रदान की और इसे नई उँचाई पर पहुँचाया। समाज की सहभागिता बढ़ने के साथ स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) आगे बढ़ा है।

भारत की ही तरह अन्य विभिन्न देशों में भी स्वच्छता अभियान की सफलता की राह में अनेक रोड़े हैं जिनकी वजह से अभियान की कामयाबी कठिन एवं जटिल हो जाती है। इन समस्याओं का सफलतापूर्वक सामना करने के लिये, स्वच्छ भारत अभियान के अन्तर्गत राज्यों में अनुकूल कार्य योजनाओं को तैयार करने की दृष्टि से पर्याप्त लचीलापन बरता गया है।

अभियान में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग, अभियान को प्रभावी बनाने के लिये स्थानीय लोक कलाकारों का उपयोग, वरिष्ठ नागरिकों और अन्यथा सक्षम लोगों के लिये अनुकूलित शौचालय प्रौद्योगिकी आदि समाधान इसमें सम्मिलित हैं। इसमें राज्यों पर किसी प्रकार की कोई पाबन्दी नहीं है।

देश में खुले में शौच मुक्त गाँवों की संख्या 300,000 से अधिक हो चुकी है। यहाँ यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि इनमें से कई जिलों में खुले में शौच से मुक्त लक्ष्य हासिल करने में अनेक चुनौतियों से गुजरना पड़ा है। अन्य कई जिले हैं जिनके लिये इन जिलों के अनुभव काम आ सकते हैं। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्ल्यूएस) जिला एवं विकास खण्डों के स्तर पर प्रशासकों को इन अनुभवों से सीखने के लिये अनेक प्रकार से पहले ले रहा है।

उदाहरण के लिये राजस्थान के शुष्क थार मरुस्थल में स्थित बीकानेर जिले में स्वच्छता कार्यक्रम के दौरान अनेक सांस्कृतिक और भौगोलिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन जब बैंकों बिकानो शुरू किया गया, तो सभी आश्चर्य चकित रह गए।

दरवाजा बन्द अभियानलक्ष्य आधारित सरकारी कार्यक्रमों से अलग, यह गाँव की जनता की अगुआई में समुदाय संचालित कार्यक्रम है। इसके अलावा, इस कार्यक्रम का मूल आधार महिलाओं के लिये प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान, परिवार, गाँव और जिले के लिये प्रतिष्ठा एवं गौरव है। बैंको बीकानो के अभियान में स्थानीय भाषा और रीति-रिवाजों का उपयोग किया गया। इस प्रकार ग्रामीण बीकानेर के सामाजिक ताने-बाने में घुल मिलकर यह कार्यक्रम लगभग स्व-चालित एवं स्वतः स्फूर्त तरीके से विकसित हुआ है।

यह एकीकृत और अभिनव नजरिया है जिसके अन्तर्गत ग्रामीण भारत में हर किसी के दिमाग में स्वच्छता और साफ-सफाई सबसे ऊपर हैं। बैंको बीकाना के अन्तर्गत व्यवहार परिवर्तन संवाद खुले में शौच से मुक्ति हासिल करने के साथ समाप्त नहीं हो जाता, बल्कि इस लक्ष्य को हासिल करने के बाद भी व्यवहार में परिवर्तन का संवाद जारी रहता है। इस प्रकार अभियान की निरन्तरता सुनिश्चित रहती है।

खुले में शौच मुक्त गाँवों में निगरानी समितियों के रूप में बीकानेर में रेत के टिब्बों में सूर्योदय की पूर्व बेला में, पुरूषों, महिलाओंं और बच्चों के समूह उन लोगों पर निगरानी और उन्हें शर्मिन्दगी का अहसास कराने के लिये निकल पड़ते हैं जो खुले में शौच करते हैं। अक्सर बच्चों के छोटी टोलियों इसमें सबसे आगे रहती हैं। इस बैंको बीकाना अभियान का लक्ष्य पश्चिमी राजस्थान में बीकानेर जिले में शौच मुक्त (ओडीएफ) ग्राम पंचायतें हैं। व्यवहार बदलने का प्रयास समय बीत जाने के बाद हासिल सफलता पलट न जाये इस खतरे को कम करता है।

जैसा कि प्रधानमंत्री ने बार-बार बताया है, खुले में शौच से मुक्ति की स्थिति को प्राप्त करने और बनाए रखना पूरे राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है, यह सभी का साझा सरोकार है। स्वच्छ भारत मिशन आम जनता के सोच में रच-बस चुका है। इसमें हर कोई शामिल है। यह जनता का अभियान है और जनता के लिये है।

तीन साल से भी कम समय में 30 करोड़ से अधिक ग्रामीण भारतीयों तक शौचालयों की सुविधा पहुँच चुकी है। यह अभियान 2 अक्टूबर 2019 तक स्वच्छ और खुले में शौच से मुक्ति भारत के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, महात्मा गाँधी की 150वीं जयन्ती पर यह उचित श्रद्धांजलि होगी।

स्वच्छ भारत मिशन


स्वच्छता- 2017 में हासिल उल्लेखनीय उपलब्धियाँ


सार्वभौमिक स्वच्छता कवरेज प्राप्त करने के प्रयासों को तेज करने के लिये और सुरक्षित सेनिटेशन पर विशेष ध्यान देने के लिये प्रधानमंत्री ने महात्मा गाँधी के जन्मदिवस 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) की शुरुआत की। एसबीएम का लक्ष्य 2 अक्टूबर 2019 तक स्वच्छ भारत का निर्माण है जिससे कि गाँधी जी के जन्मदिन 150वीं वर्षगाँठ पर उन्हें देश की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सके।

खुले में शौच मुक्त भारत के स्वप्न को साकार करने के लिये व्यवहारगत बदलाव की सबसे ज्यादा व आधारभूत जरूरत है। पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय इसे अपने केन्द्रित सूचना, शिक्षा व सम्प्रेषण कार्यक्रम के जरिए कर रहा है। यह जेंडर सेंसिटिव सूचना, व्यवहारगत बदलाव दिशा-निर्देश तथा विभिन्न जन शिक्षा गतिविधियों को प्रमोट करता है। मंत्रालय ने 2017 में जेंडर दिशा-निर्देश और 2015 में ऋतु चक्र प्रबन्धन दिशा-निर्देश जारी किया।

2 अक्टूबर 2014 को एसबीएम की शुरुआत के वक्त सेनिटेशन कवरेज 38.70 प्रतिशत था। 18 दिसम्बर 2017 तक यह बढ़कर 74.15 प्रतिशत हो गया।

स्वच्छ भारत मिशन - स्वच्छता सबकी जिम्मेदारी


पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय को इसे आवंटित एसबीएम-ग्रामीण के प्रभार के अलावा, स्वच्छ भारत के लक्ष्य को पूरा करने की दशा में सभी गतिविधियाँ व पहल अनिवार्य रूप से करने हैं। इस जिम्मेदारी को पूरा करने में मंत्रालय अन्य सभी मंत्रालयों, राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं, एनजीओ, विश्वसनीय संगठनों, मीडिया व अन्य स्टेकधारकों के साथ मिलकर लगातार काम कर रहा है।

यह प्रयास प्रधानमंत्री के उस आह्वान पर आधारित है कि स्वच्छता सबकी जिम्मेदारी होनी चाहिए न कि सिर्फ स्वच्छता विभाग की। इस प्रक्रिया में काफी कम समय में कई विशेष पहल व प्रोजेक्ट्स शुरू हुए हैं। सभी स्टेकधारकों से मिल रही प्रतिक्रियाएँ काफी उत्साहवर्द्धक हैं।

स्वच्छता पखवाड़ा


अप्रैल 2016 में शुरू स्वच्छता पखवाड़ा का लक्षाय केन्द्रीय मंत्रालयों व उनके विभागों द्वारा स्वच्छता के विभिन्न मसलों पर केन्द्रित पखवाड़े का आयोजन करना है। पखवाड़ा गतिविधियों के लिये योजना बनाने में मंत्रालयों की मदद करने के लिये उन्हें एक वार्षिक कैलेण्डर बाँटा गया।

नमामि गंगे


नमामि गंगे कार्यक्रम जल संसाधन मंत्रालय की एक पहल है जिसके तहत गंगा तट पर बसे गाँवों को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) बनाना है और ठोस व तरल कचरा प्रबन्धन की दिशा में आ रही समस्याओं को पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय द्वारा दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के 52 जिलों के सभी 4470 गाँवों को राज्य सरकारों की मदद से खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित किया गया है। अब मंत्रालय ने एनएमसीजी के सहयोग से गंगा तट पर बसे 24 गाँवों को गंगा ग्राम में तब्दील करने का प्रयास कर रहा है।

स्वच्छता कार्य-योजना (एसएपी)


एसएपी स्वच्छता हेतु अपनी तरह का अनूठा अन्तरमंत्रालयीय कार्यक्रम है जो कि प्रधानमंत्री के इस नजरिए कि स्वच्छता सबकी जिम्मेदारी है का साकार रूप है। सभी यूनियन मंत्रालय/विभागों ने इसे साकार करने के लिये उपयुक्त बजट प्रावधानों के साथ अर्थपूर्ण तरीके से काम करना शुरू कर दिया है। वित्त मंत्रालय द्वारा इस दिशा में एक अलग बजट शीर्ष बनाना गया है। वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान मंत्रालयों/विभागों ने अपनी एसएपी के लिये रुपए 12468.62 करोड़ खर्च किया है। एसएपी कार्यान्वयन 1 अप्रैल 2017 को आरम्भ हुआ।

स्वच्छ आइकॉनिक स्थान (एसआईपी)


पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय ने भारत के 100 ऐसे स्थानों, जो कि अपनी बहु हितधारक पहल शुरू किया है। इस पहल का लक्ष्य इन स्थानों की सफाई को बेहतर करना है। यह पहल शहरी विकास मंत्रालय, पर्यटन व संस्कृति मंत्रालय की साझेदारी में किया जा रहा है जिसका नोडल मंत्रालय पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय है। पहले दो चरणों में अब तक 20 महत्त्वपूर्ण स्थानों पर काम शुरू किया गया है। इन सभी 20 स्थानों के पास वित्तीय व तकनीकी सहयोग के लिये पदनामित पीएसयू या काॅरपोरेट्स हैं।

स्वच्छ शक्ति


8 मार्च 2017 स्वच्छ शक्ति का आयोजन अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस, महात्मा मन्दिर, गाँधी नगर में किया गया। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर सभा को सम्बोधित किया। इस मौके पर देश भर से लगभग 6000 चुनिन्दा महिला सरपंच, जमीनी स्तर पर काम करने वालों ने शिरकत की और स्वच्छता चैम्पियंस को ग्रामीण भारत में स्वच्छ भारत का सपना साकार करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिये सम्मानित किया गया।

स्वच्छ संकल्प से स्वच्छ सिद्धि प्रतियोगिता (17 अगस्त से 8 सितम्बर) माननीय प्रधानमंंत्री ने स्वच्छ संकल्प से स्वच्छ सिद्धि के तहत 2022 तक नए भारत के निर्माण के लक्ष्य का आह्वान किया। इस सपने के परिदृश्य में पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय ने स्वच्छता को जन आन्दोलन बनाने की दिशा में 17 अगस्त से 8 सितम्बर तक देश भर में फिल्म निबन्ध व चित्रकला प्रतियोगिताओं का आयोजन किया।

दरवाजा बन्द मीडिया अभियान


व्यवहारगत बदलाव के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए दरवाजा बन्द शीर्षक से एक गम्भीर मास मीडिया अभियान चलाया गया जिसमें लोग खासकर पुरुषों द्वारा शौचालय के प्रयोग को प्रमोट करने का प्रयास किया गया। इसमें अमिताभ बच्चन का सहयोग रहा। इस अभियान में हिन्दी समेत 9 भाषाओं में 5 टीवी व रेडियो स्पाॅट शामिल थे और इसे देश भर में सफलतापूर्वक शुरू किया गया।

स्वच्छता ही सेवा (एसएचएस) 16 सितम्बर से 2 अक्टूबर 2017


प्रधानमंत्री ने 27 अगस्त 2017 की अपने मन की बात में स्वच्छता के भाव को जगाने और श्रमदान करने का आह्वान किया तथा सभी एनजीओ, स्कूलों, काॅलेजों, सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं, काॅरपोरेट व सरकारी अधिकारियों, कलेक्टरों तथा सरपंचों से 15 सितम्बर से 2 अक्टूबर 2017 के दौरान स्वच्छता गतिविधियों के आयोजन की अपील की। प्रधानमंत्री ने वाराणसी के शहंशाहपुर गाँव में शौचालय निर्माण में श्रमदान करते हुए अभियान का नेतृत्व किया। उन्होंने कहा कि स्वच्छता को स्वभाव बनाना होगा- अपने देश को स्वच्छ रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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