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जंगलों के अभाव में वन्यजीवों का हो रहा जीना मुश्किल


बीते सालों के आँकड़ों पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि साल 2014 से 2016 के बीच के इन तीन सालों में 1052 लोगों को हाथियों ने और 92 को बाघों ने अपना शिकार बनाया। इस बीच वन्यजीव और इंसानी संघर्ष में 345 बाघ और 84 हाथियों ने भी अपनी जान गँवाई। सबसे ज्यादा घटनाएँ उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में घटित हुई हैं। देश के अन्य राज्यों में भी ऐसी घटनाएँ अस्तित्व में आती रहती हैं जो अक्सर समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनती हैं।

बीते दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ठाकुरगंज के रिहायशी इलाके मिश्रीबाग स्थित मूक बधिरों के मिशनरी सेंट फ्रांसिस दि हियरिंग इम्पेरेड स्कूल में अलसुबह एक तेंदुआ घुस गया। स्कूल में घुसने के बाद वह स्कूल के असेम्बली स्टेज के नीचे बने बेसमेंट में जाकर छिप गया। स्कूल की प्रिंसीपल जोशिया मैरी और सिस्टर सचिदा ने वहाँ मौजूद 60 मूक-बधिर बच्चों के साथ खुद को कमरे में बन्द कर अपनी जान बचाई और पुलिस को सूचना दी।

तकरीब आठ घंटे की मशक्कत के बाद स्थानीय पुलिस, वन विभाग और स्थानीय प्राणी उद्यान की रैपिड रिस्पांस यूनिट की टीम ट्रैंकुलाइजर गन से बेहोश करके ही उसे पकड़ने में कामयाब हो सकी। इसी तरह बलरामपुर के तुलसीपुर थाना क्षेत्र के अमरहवां कलां गाँव में घर के बाहर खेल रहे पाँच साल के बच्चे को तेंदुआ उठाकर ले गया। साहसी ग्रामीणों ने उसका पीछा कर बच्चे को छुड़ा लिया।

मुम्बई के उपनगरीय इलाके मुलुंड में जंगलों और पहाड़ों से घिरे नानीपाड़ा इलाके में एक तेंदुआ घुस आया और उसने छह लोगों को जख्मी कर डाला। देखा जाये तो अब वन्यजीवों के मानव आबादी में घुसने की घटनाएँ आम हो गई हैं। कभी अरावली से सटे हरियाणा के सोहना इलाके में, तो कभी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के ठाकुरद्वारा, डिलारी, सूरजपुर के गाँवों में, लखीमपुर जिले में, खीरी में, बिजनौर में, पीलीभीत में, इटावा में तेंदुए और गुलदार, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बाघों के मानव आबादी में घुसने और हमलों की घटनाओं में बीते बरसों में काफी तेजी आई है।

ऐसा इन्हीं इलाकों में हो रहा है, ऐसा कहना भी गलत होगा। हालत यह है कि अब तो देश में ऐसी घटनाएँ आये-दिन की बात हो गई हैं। कोई राज्य ऐसा नहीं है जहाँ ऐसी घटनाएँ न हो रही हों। इसमें कहीं तो इनके इंसान शिकार हो रहे हैं और कहीं ये खुद मानव आबादी में घिरकर उनके शिकार हो रहे हैं।

यदि बीते सालों के आँकड़ों पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि साल 2014 से 2016 के बीच के इन तीन सालों में 1052 लोगों को हाथियों ने और 92 को बाघों ने अपना शिकार बनाया। इस बीच वन्यजीव और इंसानी संघर्ष में 345 बाघ और 84 हाथियों ने भी अपनी जान गँवाई। सबसे ज्यादा घटनाएँ उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में घटित हुई हैं। देश के अन्य राज्यों में भी ऐसी घटनाएँ अस्तित्व में आती रहती हैं जो अक्सर समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनती हैं।

उत्तराखण्ड में हाथियों, गुलदार और बाघ के हमलों की घटनाएँ सबसे ज्यादा हैं। इनमें तकरीब 80 फीसदी से अधिक घटनाएँ गुलदार से जुड़ी हैं। बीते डेढ़ दशक में 364 लोग गुलदार के हमलों में, 98 हाथियों के हमलों में और 16 लोग बाघ के शिकार हुए हैं। हालत यह है कि अब ये वन्यजीव भोजन और पानी की तलाश में गाँवों में ही नहीं, शहरों में आवासीय इलाकों और होटलों तक में घुसकर हमले करने लग गए हैं।

उत्तर प्रदेश में बीते कुछ महीनों में 15 लोग जंगली जानवरों के हमलों में अपनी जान गँवा चुके हैं। 16 लोग बाघ के हमलों में मारे जा चुके हैं। अकेले पीलीभीत टाइगर रिजर्व में पिछले कुछ दिनों में तीन लोगों की जान जा चुकी है। उत्तर प्रदेश में तो सबसे ज्यादा घटनाएँ नेपाल से सटे सीमाई जिलों में बाघों और हाथियों के घुस आने के कारण बढ़ रही हैं। बिहार और झारखण्ड में साल 2015-2016 यानी एक साल में ही वन्यजीवों के हमलों में कुल मिलाकर 66 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।

झारखण्ड में बीते सोलह सालों में 154 हाथियों की मौत हो चुकी है। यह हाल अकेले झारखण्ड का ही नहीं, पूरे देश के दूसरे इलाकों का है। छत्तीसगढ़ में पिछले पाँच सालों में 200 के करीब लोग हाथियों के हमलों में मारे गए। यहाँ राज्य के कुल 27 जिलों में से 17 में हाथियों का बड़ा आतंक है। यहाँ मानव आबादी में हाथियों के घुस आने की घटनाएँ आम हैं। यहाँ के जंगलों में 400 से ज्यादा हाथी हैं लेकिन सरकार हंसदेव अरण्य और मांड रायगढ़ को एलिफेंट रिजर्व बनाने के मसले पर चुप्पी साधे बैठी है। रॉयल टाइगर का आवास माना जाने वाला बंगाल मानव-बाघ संघर्ष के लिये भी जाना जाता है। यहाँ हर साल तकरीब 35-40 लोग बाघ के हमलों के शिकार बनते हैं।

असलियत यह है कि वन्यजीवों की अलग-अलग प्रकृति और प्रवृत्ति होती है। उसमें वह किसी किस्म की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करते। समझौता करना उनकी प्रवृत्ति में नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते अत्याधिक दोहन के चलते जो उनके जीवन के आधार थे, वन्यजीवों की मानव आबादी में घुसपैठ बढ़ती जा रही है।

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उनके सामने आहार और पानी का संकट है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि शेर, बाघ, तेंदुआ, गुलदार, हाथी, गैंडे आदि वन्यजीवों के मानव आबादी में आने के पीछे मानव की पाशविक वृत्ति भी कम जिम्मेवार नहीं है। जंगलों का खात्मा होते जाना, चारागाहों का सिमटते जाना, झीलों-तालाबों का खात्मा यह उसी मानवीय पाशविक वृत्ति का नतीजा है। इनमें प्रशासन और सरकारों के प्रश्रय को भी नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। फिर अन्धाधुन्ध औद्योगिक विकास ने इन प्राकृतिक संसाधनों जिन पर वन्यजीव आश्रित थे, उनके खात्मे में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इनकी बढ़ोत्तरी में प्रशासनिक अधिकारियों, वन अधिकारियों और वन माफिया कहें या ठेकेदारों की साँठगाँठ ने अहम भूमिका निभाई है, जिसके चलते ये तबाह हो गए। इससे उनके स्वभाव में और व्यवहार में भी बदलाव देखने में आ रहा है। वह चिड़चिड़े हो रहे हैं। जहाँ तक हाथी का सवाल है, वह एक साल एक जगह पर नहीं रह सकता। भोजन खत्म होने पर वह आगे बढ़ जाता है।

मानवीय दखलंदाजी के चलते उनके आवास यानी जंगल और उनके आने-जाने का कॉरीडोर प्रभावित होता है। नतीजतन उनका व्यवहार बदल रहा है। यही वह अहम कारण है जिसकी वजह से वन्यजीव जंगल से पलायन कर मानव आबादी की ओर आने को विवश हैं। यह मनुष्यों के लिये तो घातक साबित हो ही रहा है, वन्यजीवों के लिये भी घातक है। वन्यजीवों की घटती तादाद इसी का नतीजा है। प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से घटते जाना जहाँ पर्यावरण के लिये बहुत बड़ा खतरा है, वहीं वन्यजीवों की घटती तादाद पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ते जाने का जीता-जागता सबूत है।

इसमें दो राय नहीं कि प्रकृति के साथ हरेक वन्यजीव का एक अनूठा रिश्ता है। यह इतना गहरा होता है कि मानव ने सदैव उसे अपने हृदय में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। यह भी सच है कि बीते दशकों में उनके प्रति आमजन की संवेदनाओं में काफी बढ़ोत्तरी हुई है।

नतीजतन देश में पर्यावरण व बाघ, हाथी, गैंडे आदि वन्यजीवों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी-बड़ी योजनाएँ अस्तित्व में आईं। राष्ट्रीय पार्कों व अभयारण्यों की शुरुआत भी बीते दशकों में हुई। इनको आबादी से अलग रखा गया। लेकिन आज इनकी अनदेखी, अन्धाधुन्ध औद्योगिक विकास और इनके आवास स्थलों में मानव दखलंदाजी के चलते हमारी इस वन सम्पदा पर खतरे के बादल मँडरा रहे हैं, वहीं सदियों से प्रकृति से जुड़ा अटूट रिश्ता भी अब टूटता जा रहा है। फिर वन्यजीवों के अंगों के अरबों के व्यापार के चलते किये जाने वाले शिकार ने इनकी घटती तादाद में अहम भूमिका निभाई है।

मौजूदा समस्याओं की असली वजह भी यही है। वन्यजीवों का संरक्षण सही मायने में तभी सार्थक होगा जबकि हम वनभूमि पर अतिक्रमण पर अंकुश लगाएँ। उनके आवास स्थलों में अवस्थित प्राकृतिक संसाधनों और खाद्य सुरक्षा उनके ही परिवेश में सुनिश्चित कर सकें। साथ ही उस क्षेत्र का जहाँ वे वास करते हैं, पारिस्थितिकी तंत्र स्थिर रहे। इसके बिना वन्यजीव संरक्षण की बात बेमानी सी प्रतीत होती है।

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