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देवडूंगरी का प्रसाद


हर पहाड़ी पर किसी-न-किसी देवता का वास रहता है- ऐसा प्रायः हर गाँव के लोग मनाते हैं। पहाड़ियों से बहकर जाने वाले निर्मल जल को देवों का प्रसाद मानकर रोक लिया जाये तो प्रकृति प्रसन्न हो जाती है। प्रकृति के इस सन्देश को समाज हर गाँव में कहाँ समझ रहा है। गाँव-समाज को यह सन्देश आत्मसात करना होगा कि देवडूंगरी से केवल नारियल और मिठाई का प्रसाद ही नहीं मिलता है। एक और महत्त्वपूर्ण प्रसाद है- पहाड़ी पर अभिषेक करने वाली बूँदों का प्रसाद। देवडूंगरी में इसी प्रसाद ने तो यहाँ रबी का रकबा 60 हेक्टेयर में बढ़ा दिया है। ...इस पहाड़ी का नाम देवडूंगरी है।

गुर्जर समाज के देवता यानी देवनारायणजी का यहाँ एक मन्दिर बना हुआ है। उज्जैन जिले के खाचरौद ब्लॉक में 36 गाँवों में गुर्जरों का बाहुल्य है। गुर्जर समुदाय यानी खेती-किसानी और मवेशी पालकों का समुदाय। ये गुर्जर दीपावली के दूसरे दिन पड़वा को इस पहाड़ी पर अपनी मनौती माँगने के लिये जरूर आते हैं। इस दिन यहाँ मेला लगता है।

क्या आपको पता है, बहुसंख्य गुर्जर इस खास दिन कौन-सी कामना करते हैं?

अपनी जीवनरेखा को जीवन्त बनाए रखने की। जीवनरेखा यानी कृषि का कामकाज। कृषि जिन्दा है तो समाज भी सही मायने में ‘जीवन्त’ है और कृषि का आधार क्या है? नन्हीं-नन्हीं बूँदें जो देवडूंगरी पर मनौती माँगने आने वाले किसानों की तकदीर लिख सकती हैं। किंवदंती तो यह भी है कि बादल आसमान में दिखें तो प्रसन्न समाज एक बार देवडूंगरी के आगे नतमस्तक हो आता है कि दे देव! इन बादलों की बेटियों की हम पर मेहरबानी बनाए रखना। यही तो होती है इन्द्र भगवान की पूजा-अर्चना।

...गाँव-समाज को यहाँ ऐसा प्रतिफल मिला है कि सूखे के बावजूद पानी के मामले में आस-पास की स्थिति ‘समुद्र’ वाली है। देवडूंगरी की पहाड़ी पर आने वाली बूँदों को समाज ने रोकने की मनुहार कर डाली। इन बूँदों की ‘पूजा’ कर दी। नीचे स्थित भटेरा गाँव में आपको प्रसन्नचित्त बूँदें सूखे में भी मुस्कुराती दिख जाएँगी। कभी यह जमीन से ऊपर उठकर किसी मेहनतशील किसान के ललाट पर पसीने की खुशबू के साथ भी आपको दर्शन दे देंगी।

...हम इस समय भटेरा गाँव की सीमा पर स्थित एक किसान के खेत पर खड़े हैं।

...श्री दरियावसिंह गुर्जर अपनी भाभी साहिबा उमराबाई के साथ कुएँ में थमीं बूँदों को ऊपर लाने की मशक्कत में जुटे हैं। कहने लगे- “आसमान से तो सूखा ही आया था, लेकिन गाँव में पानी रोकने के काम ने हमारी किस्मत बदल दी है। पहले के सालों में तो सामान्य वर्षा में भी बरसात के तुरन्त बाद पानी कम हो जाता था, लेकिन इस बार हम नई मोटर से पानी खींच रहे हैं और कुएँ में लगातार आव जारी है। हमारी 52 बीघा जमीन में से अकाल के बावजूद 25 बीघा जमीन में गेहूँ की फसल ले रहे हैं और पास के ही खेत वाले उदयसिंह गुर्जर का कुआँ 12-12 घंटे लगातार चल रहा है, पहले तो यह पाँच घंटे में ही बोल जाया करता था। ये महाशय भी अपनी 10 बीघा जमीन में गेहूँ की फसल ले रहे हैं।”

पानी रोकने से आये बदलाव की यह कहानी देखने आपको उज्जैन से भेरूगढ़, सोड़गे, रामटेकरी, उन्हेल, बैड़ावन, सरवना, महूं, देवडूंगरी होते हुए भटेरा गाँव आना पड़ेगा। इस गाँव की कहानी भी उज्जैन के खाचरौद क्षेत्र के गाँवों की आम बदहाली जैसी ही थी। पानी का संकट गाँव की पहचान हुआ करता था। गर्मियों में तो स्थिति अत्यन्त ही विकट हो जाया करती थी। गाँव के मवेशी 4-5 किलोमीटर दूर पानी पीने के लिये जाते थे। पानी आन्दोलन की कमान सम्भाल रहे स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय मानव बसाहट एवं पर्यावरण केन्द्र (एन.सी.एस.एच.सी.) के श्री अनिल शर्मा आत्मविश्वास से लबालब अंदाज के साथ कहते हैं- “अकाल में भी आप देख रहे हैं- पानी से भरे हैं तालाब। कुएँ जिन्दा हो गए हैं और किसान खुशी-खुशी रबी की फसल ले रहे हैं।” अनिल और गाँव का स्थानीय समाज हमें एक विशाल तालाब के पास ले जाता है। वह कहते हैं- “आप कल्पना कर सकते हैं। कल तक यहाँ महिलाएँ पीने का पानी ही दो किमी. दूर से बमुश्किल जुटा पाती थीं। उज्जैन जिले की औसत वर्षा एक हजार एम.एम. है। लेकिन, इस बार हमारे इलाके में 450 मिमी. वर्षा ही हुई है। लेकिन, हमने इस अत्यन्त कम वर्षा में भी यह चमत्कार कर दिखाया है।” पानी का समुचित प्रबन्धन-गाँवों की नई तस्वीर बना सकता है- यह भटेरा की कहानी है। इस गाँव के आस-पास छोटे-बड़े कुल सात तालाब बनाए गए हैं। इससे लगभग 21 कुएँ लगातार पानी देने लगे हैं। कभी यहाँ के मवेशी पानी के लिये भटकते थे, अब आस-पास के चार गाँवों के मवेशी यहाँ पानी पीने आते हैं। पिछले तीन सालों से लगातार सूखे के बावजूद यहाँ खेत रबी की फसलों से लहलहा रहे हैं।

भटेरा में पहले पानी के अभाव में खरीफ की फसल ही एकमात्र सहारा थी। कुछ क्षेत्रों में रबी ली जाती थी, लेकिन एक सिंचाई अथवा मावठे का सहारा लेकर फसल बो देते थे। पानी के अभाव में प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी केवल 6 क्विंटल ही था। इस समय कुएँ जिन्दा होने की वजह से फसल उत्पादन यहाँ 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होने जा रहा है। इससे बढ़ी आय लाखों रुपए से भी ज्यादा होगी।

तालाब में एक नाले का पानी लिया जा रहा है। बरसात के बाद यह नाला सूख जाया करता था। तालाब के बाद नीचे की ओर यह नाला बरसात बाद 4 महीने तक जिन्दा रहता है। किसान इस नाले पर स्थानीय हिसाब से छोटे-छोटे बन्धान बनाकर पम्प से सिंचाई करते हैं। यह नाला भी तो देवडूंगरी की पहाड़ी से आता है। तालाब के किनारे हमारी मुलाकात राजाराम से हुई। वह कहने लगे- “सूखा तो बहुत है, लेकिन रुके पानी ने गाँव में खुशहाली ला दी है। हम देवडूंगरी के किसान हैं और मवेशियों को पानी पिलाने इसी तालाब पर लाते हैं।”
देवडूंगरी से भटेरा की ओर देखने पर आपको अकाल के साये में दिखेंगे- लहलहाते खेत, पानी से भरे तालाब, जिन्दा कुएँ, जिन्दा समाज! वाटर मिशन के तहत व्यवस्था और समाज ने जब पानी की मनुहार करने की ठानी तो देवडूंगरी भी प्रसन्न हो उठी। पानी की मनौती माँगने के अनेक किस्से स्थानीय गाँव-समाज ने सुनाए।

...दरअसल, हर पहाड़ी पर किसी-न-किसी देवता का वास रहता है- ऐसा प्रायः हर गाँव के लोग मनाते हैं। पहाड़ियों से बहकर जाने वाले निर्मल जल को देवों का प्रसाद मानकर रोक लिया जाये तो प्रकृति प्रसन्न हो जाती है। प्रकृति के इस सन्देश को समाज हर गाँव में कहाँ समझ रहा है। गाँव-समाज को यह सन्देश आत्मसात करना होगा कि देवडूंगरी से केवल नारियल और मिठाई का प्रसाद ही नहीं मिलता है। एक और महत्त्वपूर्ण प्रसाद है- पहाड़ी पर अभिषेक करने वाली बूँदों का प्रसाद। देवडूंगरी में इसी प्रसाद ने तो यहाँ रबी का रकबा 60 हेक्टेयर में बढ़ा दिया है। पानी देते कुओं को अकाल उदासीन चेहरे के साथ दूर से देख रहा है। अब इसकी हिम्मत कहाँ है मुस्कुराते चेहरों से आँख मिलाने की।

क्या आपके पास भी कोई पहाड़ी है…?

तो फिर ग्रहण क्यों नहीं करते इसका प्रसाद...।

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