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व्यर्थ पानी के उपयोग से हरी-भरी हुई टेकरी


मन्दिर के चारों तरफ छाई हरियालीमन्दिर के चारों तरफ छाई हरियालीमध्य प्रदेश के देवास शहर की पहचान यहाँ की माता टेकरी से है। देवास शहर इसी टेकरी के आसपास बसा हुआ है। लेकिन यह टेकरी बीते कुछ सालों से अपना अस्तित्व खोती जा रही थी। इसके आसपास की हरियाली खत्म होकर यह बंजर स्वरूप में आ गई थी। इसकी हरियाली बढ़ाने के लिये कई जतन किये जाते रहे लेकिन कुछ नहीं बदला। बड़ी बात थी कि पानी की कमी वाले इस शहर में तेजी से बढ़ते पौधों के लिये जरूरी पानी का नियमित इन्तजाम करना आसान नहीं था। लेकिन यहाँ के अन्नक्षेत्र से हर दिन व्यर्थ बह जाने वाले पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल किया गया तो आज टेकरी फिर से हरी-भरी हो चुकी है।

सैकड़ों साल पुरानी इस टेकरी पर करीब दसवीं सदी के दो बड़े माता मन्दिर हैं। इलाके से हर दिन बड़ी तादाद में दर्शनार्थी यहाँ आते हैं। 35-40 साल पहले तक यह टेकरी हरीतिमा से आच्छादित होकर बड़ी सुन्दर और हरी-भरी नजर आती थी। इसके चारों ओर पेड़-पौधों का झुरमुट हुआ करता था। लेकिन बढ़ते शहरीकरण के चलते पेड़-पौधे कटते गए और लोगों ने टेकरी की जमीन पर अतिक्रमण करते हुए इस पर मकान बनाना शुरू कर दिये। स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की लापरवाही ने इस समस्या को और भी बढ़ा दिया। अब तो टेकरी दूर से ही बंजर नजर आने लगी। ऊँचाई तक लोगों ने कच्चे-पक्के झोपड़े बना लिये और पेड़ों की लकड़ियाँ कटने लगी।

बीते दस सालों में टेकरी को बचाने के लिये प्रशासन ने कड़े कदम उठाए और अतिक्रमण करने वालों को यहाँ से हटाया। इसके बाद जमीन की सतह पर टेकरी के चारों ओर करीब तीन किमी लम्बाई में सुरक्षा दीवार बनाई गई है। यहाँ दीवार के साथ-साथ खुबसूरत पाथवे भी निर्मित किया गया है। यहाँ पाथवे बन जाने से लोगों की आवाजाही बढ़ी है। सुबह शाम बड़ी तादाद में लोग यहाँ घूमने और सैर करने आते हैं।

अब सबसे बड़ी समस्या यह थी कि टेकरी की हरियाली कैसे बढ़ाई जाये। पौधे लगाना तो आसान था लेकिन उन्हें जीवित रखकर पेड़ में बदलने के लिये हर दिन पानी देने की जरूरत थी, जो इस पथरीली जमीन पर सम्भव नहीं था। नीचे से ऊपर इतनी बड़ी मात्रा में पानी पहुँचाना बहुत कठिन प्रक्रिया थी लेकिन अच्छे काम में राह निकल ही आती है। यहाँ भी जहाँ चाह, वहाँ राह की तर्ज पर रास्ता निकला। शुरुआत में यह रास्ता उपयोगी नहीं लगता था लेकिन देखते-ही-देखते बीते दो सालों ने इसने कमाल दिखाया और कभी बंजर हो चुकी यह टेकरी अब फिर से हरियाली का बाना ओढ़े खड़ी नजर आने लगी है। अब यहाँ रोप गए पौधे कुछ ही महीनों में पेड़ बनने को बेताब हैं।

देवास स्थित माता टेकरी पर रोपे गए सैकड़ो नए पौधों के लिये पीवीसी पाइप लाइन बिछाई और अन्नक्षेत्र के निकले हुए व्यर्थ पानी को इसमें इस्तेमाल किया जा रहा है। गौरतलब है कि भीषण गर्मी के दिनों में पहाड़ीनुमा जमीन पर पौधों को बचाए रखना मुश्किल का काम होता है। यहाँ हर दिन पानी दिया जाना सम्भव नहीं होता वही पहाड़ी की ढलान होने की वजह से भी मुश्किल आती है। लेकिन माता टेकरी क्षेत्र में डेढ़ साल पहले लगाए पौधे अब हरे-भरे होकर लहलहा रहे हैं। इसकी खास वजह इन्हें समुचित रूप से लगातार पानी दिया जाना है। यहाँ पौधों की सुरक्षा के लिये अन्नक्षेत्र से निकलने वाले व्यर्थ पानी को रूफ वाटर हार्वेस्टिंग संयंत्र के जरिए साफ करने के बाद पौधों में छोड़ा जा रहा है। यहाँ पौधों को पीवीसी पाइप के जरिए नलों से जोड़ दिया गया है। इससे हर पौधे की जड़ तक पानी पहुँचता रहता है और किसी तरह से पानी का अपव्यय भी नहीं हो पाता।

यहाँ हर दिन बड़ी तादाद में दर्शनार्थी माता मन्दिरों में दर्शन के लिये पहुँचते हैं। ये लोग जिस पानी का इस्तेमाल करते हैं वही पाइपों के जरिए एक जगह इकट्ठा होता है और इसमें अन्नक्षेत्र का व्यर्थ पानी भी आता है और फिर यह पानी एक बड़े पाइप से गुजरता है। इस पाइप में कोयले, पत्थर, कंकर और मुरम डालकर इसे वाटर फिल्टर का स्वरूप दिया गया है। यहाँ से पानी शुद्ध होकर एक बड़ी टंकी में इकट्ठा होता है और इसी टंकी में छोटी मोटर लगाकर सुबह-शाम पौधों के लिये पानी छोड़ा जाता है।

बीते दिनों भीषण गर्मी के बावजूद माता टेकरी पर हरियाली बरकरार रही। यहाँ आने वाले श्रद्धालु भी भीषण गर्मी में इस हरियाली को देखकर अभिभूत हो जाते हैं। दर्शनार्थियों की सुविधा के लिये यहाँ हर दिन अन्नक्षेत्र में बड़ी तादाद में भोजन बनता है। भोजन बनाते समय उपयोग किये गए पानी को इन पौधों को दिया जाता है। अकेले अन्नक्षेत्र से हर दिन इतना पानी निकलता है कि पौधों को पानी देने के बाद भी दो खुली टंकियों से ओवरफ्लो करना पड़ता है।

पानी का उपयोग टेकरी के ऊपर तक रोपे गए पौधों में भी पानी देने में होता है। पाथवे की लम्बाई करीब 3 किलोमीटर से ज्यादा की है। फिर भी इस पूरे पथ पर पौधों की हरियाली देखते ही बनती है। इसे प्राकृतिक रूप से बहुत सुन्दर बनाया गया है।

जिला कलेक्टर आशुतोष अवस्थी इसे लेकर खासे उत्साहित हैं। उनके मुताबिक इससे पानी का सदुपयोग कर पा रहे हैं और टेकरी की हरियाली को भी बढ़ा रहे हैं। इस तरह बेहतर तालमेल से टेकरी का प्राकृतिक वैविध्य बढ़ता जा रहा है।

उन्होंने बताया कि सहयोगी हरियाली मिशन तथा चामुंडा सेवा समिति के जरिए माता टेकरी पर वन कक्ष क्रमांक 870 में नवम्बर 2014 से अगस्त 2015 तक करीब 12 सौ से ज्यादा पौधे रोपे गए हैं। इसके अलावा उद्यानिकी महोत्सव 2015 में भी यहाँ सीताफल 1000 बोगनवेलिया 1016 शोभादार पौधे तथा 108 त्रिवेणी यानी पीपल, बरगद और नीम के पौधे लगाए गए हैं। इसके अलावा अन्नक्षेत्र के पीछे वाले हिस्से पाथवे में बड़ी संख्या में बरगद, पीपल, केसिया, सायमा, पेल्टाफार्म, गुलमोहर, गुलर, अशोक, पारस, शीशम, चिरोल, नीम, केसिया ग्लूका, कचनार, जेकेरेंडा, कनक चम्पा, सप्तपर्णी, हरसिंगार, मधुकामिनी, टिकोमा, चम्पा, करंज, इमली, जामुन, गुल्टर, कपोक, बहेड़ा और चाँदनी के पौधे रोपे गए हैं। इससे सम्पूर्ण टेकरी क्षेत्र की हरियाली देखते ही बनती है। इनमें से ज्यादातर अब पेड़ बनने की स्थिति में हैं।

वन संरक्षक पीएस चांदावत कहते हैं, "अन्नक्षेत्र से निकलने वाले व्यर्थ पानी को टेकरी के ऊपरी हिस्से में रोपे गए पौधों तक पहुँचाने के लिये पूरी तकनीक लगाई गई है। पानी का सदुपयोग कर इसे पौधों में डाला जा रहा है। जिला प्रशासन की मदद से पौधे अब पेड़ का आकार ले रहे हैं।"

उन्होंने बताया कि इसके लिये वन विभाग ने दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी भी रखा है, जो हर दिन यहाँ पौधों को पानी देने का काम सुव्यवस्थित तरीके से करता है।

व्यर्थ बह जाने वाले पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल से बंजर हो चुकी टेकरी का अब हरियाला बाना ओढ़े देखना सच में एक अनूठा और नायाब मिसाल है। यह हमें यह भी बताता है कि हम चाहें तो पानी के बेहतर प्रबन्धन से असम्भव को भी सम्भव कर सकते हैं। पानी कुदरत की बसे बड़ी नियामत है और हमें इसे हर हाल में बचाकर अपने पर्यावरण को भी बचाना होगा।

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