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मनरेगा में अरबों खर्च पर नहीं रुका पलायन


पलायन की वजह से खाली पड़ा गाँव एवं घरपलायन की वजह से खाली पड़ा गाँव एवं घरपश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी जिलों झाबुआ, अलीराजपुर, धार और बड़वानी जिले के गाँवों में रहने वाले हजारों आदिवासियों को अब भी गुजरात जाकर मजदूरी करना पड़ रहा है। इन दिनों इलाके में बस अड्डों पर परिवार सहित पलायन कर गुजरात जाने वाले आदिवासियों की भीड़ नजर आ रही है। बीते साल मनरेगा और अन्य योजनाओं पर इन जिलों के आदिवासी बेल्ट में करीब डेढ़ अरब से ज्यादा के विकास काम सरकारी फाइलों में दर्ज हुए हैं, फिर भी जमीनी हकीकत यह है कि पलायन नहीं रुक सका।

झाबुआ, अलीराजपुर और धार जिले की 80 फीसदी आबादी आदिवासियों की है। ये तीनों जिले प्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में गिने जाते हैं। यहाँ रोजी-रोटी का भारी टोटा है। यहाँ सरकारें रोजगारमूलक कामों के लिये करोड़ों खर्च करती हैं लेकिन इन तक धेला भी नहीं पहुँच पाता। रोजगार मिल भी जाता है, तो मजदूरी पूरी नहीं मिलती।

सतत आजीविका परियोजना के अनुसार इलाके के 80 प्रतिशत गाँवों से लोग मजदूरी के लिये पलायन करते हैं। ज्यादातर लोग इन जिलों की सीमा से सटे गुजरात के गोधरा और बालासिन्नौर जाकर मजदूरी करते हैं। यहाँ पत्थरों की पिसाई के कई कारखानें हैं। पत्थरों की धूल से काँच बनता है। पत्थरों की पिसाई के दौरान लापरवाही से जहरीली और घातक पारदर्शक सिलिका धूल साँस के जरिए इनके फेंफड़ों में जमा हो जाती है। यह धूल धीरे-धीरे फेफड़ों में सीमेंट की तरह जम जाती है, जिससे साँस लेने में दिक्कत होने लगती है।

साफ है कि आदिवासी परिवारों के गुजरात जाने के मायने सिर्फ पलायन करना नहीं है, बल्कि यहाँ जाने का मतलब पहले बीमारी और उसके बाद धीमी मौत है। यहाँ मौत पर रोटी का सवाल भारी पड़ रहा है। यहाँ सिलिकोसिस का कहर इस तरह टूटा है कि कई परिवार इसके खूनी पंजे की चपेट में हैं।

इससे पीड़ित मरीजों के बचने की कोई उम्मीद नहीं बचती। तिल-तिल कर मरने और हर पल मौत के इन्तजार के सिवा उनके हाथ कुछ नहीं बचता। पीड़ित की मौत के बाद जब शव को जलाया जाता है तो उसके फेफड़े किसी जीवाश्म की तरह साबूत बच जाते हैं। उन्हें तोड़ने या काटने पर उसके भीतर से पत्थर का चूरा निकलता है जिससे काँच बनता है। अप्रैल 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक धार, झाबुआ और अलीराजपुर जिले के 105 गाँवों में सिलिकोसिस बीमारी से हाहाकार मचा हुआ है, यहाँ के 1721 पीड़ितों में से 589 लोगों की मौत हो चुकी है और बाकी 1132 लोग हर दिन अपनी मौत के साए में दिन गुजार रहे हैं।

अलीराजपुर जिले के मालाबाई, रोडधा और रामपुरा गाँव में हालात बेहद खराब हैं। यहाँ कुछ परिवार के मुखिया और औरतों की असमय मौत से कुछ घरों में तो अनाथ बच्चे ही बचे हैं। इसी जिले की ध्याना पंचायत में 80 लोग अपनों को छोड़ इस दुनिया से विदा हो गए। झाबुआ जिले के मुण्डेत, बरखेडा और रेदता गाँव के 150 से ज्यादा लोगों ने भी दम तोड़ दिया।

पश्चिमी मध्य प्रदेश ही नहीं, प्रदेश के बाकी आदिवासी इलाकों सहित छत्तीसगढ़ और झारखण्ड जैसे प्रदेशों से आदिवासी बड़ी संख्या में हर साल रोजी-रोटी की तलाश में महीनों तक पलायन करते हैं। जबकि सरकारी अफसर हमेशा ही पलायन को सिरे से ही खारिज करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत सब कुछ बयान करने के लिये पर्याप्त है। उधर अफसरों के इस रवैए से जहाँ एक तरफ ऐसे मुद्दे सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं जुड़ पाते वहीं दूसरी और इनके समाधान के लिये जरूरी बातचीत और माहौल भी नहीं बन पाता है।

हमारी गाड़ी ऊँचे-नीचे पठारी इलाके में दौड़ती जा रही है। उजाड़ और उदासी के अलावा आसपास कुछ नहीं है। न दूर तक हरियाली न पेड़ों के झुरमुट, ऊँचे-नीचे पहाड़ों के बीच कुछ टापरियाँ जिन्दगी का अहसास कराती सी। इन्हीं टापरियों के छोटे-छोटे झुंड फलिया कहलाते हैं यानी आदिवासियों के गाँव। किसी फलिए में 4 से 5 तो किसी में 12 से 15 टापरियाँ। मालवा-निमाड़ की सीमारेखा का यह इलाका मध्य प्रदेश में काला पानी कहा जाता है। उजाड़ में उबड़-खाबड़ बसा आदिवासियों का यह इलाका सम्भ्रान्त शहरियों को कम ही भाता है।

झाबुआ जिले की सीमा से सटा एक छोटा-सा गाँव। करीब 800 की आबादी वाला कचलधरा गाँव इन दिनों वीरान और उजड़ा-उजड़ा सा लगता है। जिला मुख्यालय से करीब सौ किमी दूर इस आदिवासी गाँव की आधी से ज्यादा आबादी इन दिनों गाँव में नहीं रहती है। पूछने पर पता लगता है-जी, कोई अनहोनी नहीं, यह तो हर साल की बात है। हर साल यहाँ से बड़ी तादाद में आदिवासी रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर निकल जाते हैं। बरसात का मौसम गुजरते ही यहाँ से आदिवासियों का बाहर निकलना शुरू हो जाता है। गाँव में रोटी के लाले हैं। ऐसे में पलायन ही एकमात्र विकल्प बचता है।

गाँवों में काम न होने के कारण पलायन को मजबूर ग्रामीणयह स्थिति किसी एक गाँव की नहीं है, बल्कि आसपास के करीब 25 गाँवों की कमोबेश यही कहानी है। घरों में या तो बूढ़े बचे हैं या कुछ औरतें और उनके बच्चे। ज्यादातर तो औरतें भी पलायन की इस अस्थायी गृहस्थी में पुरुषों के साथ ही जाती हैं और वहाँ बराबरी से मजदूरी के काम भी करती हैं। वैसे तो ज्यादातर लोग दीवाली बाद ही हर साल पलायन करने लगते हैं लेकिन गेहूँ पकने के साथ तो गाँव-के-गाँव खाली हो जाया करते हैं। गेहूँ काटने के काम में एक साथ बड़ी तादाद में मजदूरों की जरूरत होती है। यह काम करीब दो महीने तक चलता है। इसके अलावा निर्माण कार्यों में भी ये लोग हाड़ तोड़ मेहनत कर इतना पैसा कमा लेते हैं कि बरसात में काम नहीं मिलने पर भी अपनी दो जून की रोटी का बन्दोबस्त हो सके।

इलाके से दीवाली बाद गाँव-के-गाँव गुजरात चले जाते हैं और अगली गर्मी खत्म होने के बाद बारिश से पहले ही ये अपने देश लौटते हैं। इलाके में अब ज्यादातर बूढ़े और बच्चे ही बच जाते हैं। अधिकांश लोग 'परदेस' चले जाते हैं। हालात ये हैं कि बारिश को छोड़ 8 महीने इन गाँवों में कोई नहीं होता। गाँव में मौजूद बूढ़े जैसे-तैसे अपनी गुजर-बसर करते हुए अपने परिवार के लोगों के लौट आने का इन्तजार करते रहते हैं। महीनों तक इन्तजार करते हुए इनकी बूढ़ी आँखें थककर पथरा जाती हैं। कई बार तो कोई नहीं बचने से हिफाजत के लिये घर के बाहर काँटों की बागड़ लगा जाते हैं।

झाबुआ के बस अड्डे पर गुजरात जा रहे पेमा भिलाला के परिवार ने बताया कि उन्हें इधर बहुत कम मजदूरी मिलती है। कभी मिलती है तो कभी नहीं पर गुजरात में बराबर काम मिलता रहता है। पत्थर फैक्टरियों में और खेतों में वहाँ बहुत काम है और पैसा भी अच्छा मिल जाता है। एक दिन का करीब पाँच सौ रुपया तक पड़ जाता है, जबकि मध्य प्रदेश में मनरेगा में कभी-कभार काम मिल भी जाये तो मात्र 169 रुपए ही मिलते हैं।

सरकार ने इनका पलायन रोकने के मकसद से महात्मा गाँधी रोजगार योजना में इन जिलों के आदिवासी क्षेत्र में करीब एक अरब से ज्यादा की राशि खर्च की है। अकेले अलीराजपुर जिले में ही 58 करोड़ की राशि खर्च हुई है पर कहीं कोई बदलाव नजर नहीं आता है। यह बात सरकारी अधिकारियों से भी छुपी नहीं है।

अलीराजपुर के जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी मगनसिंह कनेश भी यह बात स्वीकार करते हैं और बताते हैं कि गुजरात में ज्यादा मजदूरी मिलने से ये लोग वहाँ जाते हैं। हम पूरी कोशिश करते हैं पर क्या कर सकते हैं।

अच्छा लेख है।

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