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बूँदों के छिपे खजाने

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बूँदों के तीर्थ ‘पुस्तक’

तलाई की खुदाई के दौरान एक 10 फीट गहरी कुण्डी मिली। ...और इसमें मिला बूँदों का ‘छिपा खजाना’ इस कुण्डी में इतना पानी निकला कि पिछले साल गर्मी में पूरे गाँव के समाज व मवेशियों को यहीं से पीने का पानी मिलता रहा। इसकी विशेषता यह है कि यह कभी खाली नहीं होती, जितना पानी निकालो थोड़ी देर बाद पुनः भर जाता है। पहाड़ी में समाई बूँदें इसमें रिसन के द्वारा आती रहती हैं। इससे बाहर आया पानी तलाई में एकत्रित हो जाता है। इसके लिये नाली की संरचना भी तैयार कर ली गई। करौंदी की झाड़ियों के बीच छिपी पहाड़ी की एक बड़ी शृंखला जो खत्म होती नहीं दिखती।

इन पहाड़ियों के बीच में छिपी बरसों पहले बनी सात तलाइयाँ।

इन तलाइयों में छिपी कुण्डी।

...और कुण्डी में हैं - बूँदों के छिपे खजाने…!

यह पानी संचय के परम्परागत तरीकों की एक दिलचस्प कहानी है। उज्जैन जिले के बड़नगर में पालसोड़ा के पास बसी है गुलाबखेड़ी। किसी जमाने में यहाँ एक तालाब था, जो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में जा पहुँचा। इसका पानी पूरे गाँव से बहकर निकलता था। आने-जाने के कोई साधन नहीं थे। यदि कोई बीमार भी होता तो उसे कन्धे अथवा ट्रैक्टर पर बिठाकर ले जाना पड़ता था। गाँव में पानी आन्दोलन के फैलाव की कहानी सुनाते राष्ट्रीय मानव बसाहट एवं पर्यावरण केन्द्र के परियोजना अधिकारी श्री मनोज मकवाना कहने लगे- “गाँव की यह समस्या हल करना पहली प्राथमिकता थी। इस समस्या के समाधान के लिये गाँव-समाज लगातार संवाद के बाद आगे आया। गाँव में स्टॉपडैम कम रपट का निर्माण किया। इससे इस गाँव की पहचान बन चुकी बुनियादी समस्या हल हो गई। गाँव समाज ने इस कार्य में भरपूर सहयोग भी दिया। साइड में लगभग 50 ट्रॉली बोल्डर डाले गए। समाज को एक ही नारा दिया था- सभी अपने-अपने हाथ आगे बढ़ाओ, समस्याएँ खुद-ब-खुद हल होती जाएँगी।”

...इस तरह गुलाबखेड़ी में पानी बाबा को रोकने के लिये 6 तलइयाँ, 5 गेबियन संरचना, पहाड़ियों पर लूज बोल्डर बाँध, कंटूर ट्रेंच, 20 डबरियाँ और स्टॉपडैम कम रपट बनाया है।

...थोड़ा दिल थामकर...! अब हम आपको ‘मगरे’ की यात्रा कराएँगे। मगरा यानी पहाड़ी। घबराइए मत। महिदपुर के खजुरिया मंसूर की तरह आपको तीन पहाड़ों को नहीं पार करना है। एक पहाड़ चढ़कर उसी शृंखला में किनारे-किनारे चलना है।

इस मगरे के ऊपर सबसे पहले हम छोटी तलाई के किनारे पहुँचते हैं। यहाँ बरसों से एक छोटी-सी तलाई रही है। किसी ने तब यहाँ एक मेड़ भी बना दी थी। कुछ क्षेत्र में सिंचाई होती थी और मिट्टी का कटाव भी रुक गया था। इसी तर्ज पर यहाँ एक बड़ी तलाई का निर्माण किया। ऊपर के एक बड़े हिस्से का पानी इसमें आता है। बरसात अत्यन्त कम होने के कारण यह सिर्फ एक बार ही पूरी तरह से रिचार्ज हो पाई है। इस रिचार्जिंग से नीचे की जमीन वाले लोगों को फायदा हुआ। इसमें हाकमसिंह व भेरूसिंह प्रमुख हैं। अब लाभान्वित किसान दो फसल लेने की स्थिति में हैं।

मगरे पर कुछ दूरी की यात्रा के बाद एक और तलाई मिली। पानी आन्दोलन के तहत इसका भी जीर्णोंद्धार किया गया। तलाई की खुदाई के दौरान एक 10 फीट गहरी कुण्डी मिली। ...और इसमें मिला बूँदों का ‘छिपा खजाना’ इस कुण्डी में इतना पानी निकला कि पिछले साल गर्मी में पूरे गाँव के समाज व मवेशियों को यहीं से पीने का पानी मिलता रहा। इसकी विशेषता यह है कि यह कभी खाली नहीं होती, जितना पानी निकालो थोड़ी देर बाद पुनः भर जाता है। पहाड़ी में समाई बूँदें इसमें रिसन के द्वारा आती रहती हैं। इससे बाहर आया पानी तलाई में एकत्रित हो जाता है। इसके लिये नाली की संरचना भी तैयार कर ली गई।

गाँव के बुजुर्ग लोगों ने यहाँ 50-60 साल पहले इन तलाइयों का निर्माण किया था। पानी आन्दोलन की शुरुआती चर्चा के दौरान ही पहाड़ी पर नीचे बसने वाले समाज ने बता दिया था कि गाँव ने परम्परागत तरीके से बहुत पहले ही जल प्रबन्धन की तैयारी कर ली थी।

इन पहाड़ों को दूर से देखने पर यह आभास नहीं होता है कि इनकी गोद में पानी के ‘छिपे खजाने’ मौजूद हैं। इस कुण्डी से गुलाबखेड़ी के पंचायत मुख्यालय नारेलाकलाँ के समाज व मवेशियों ने भी पानी पिया। पानी समिति के तकनीकी सलाहकार राकेश बघेल कहने लगे- “पहाड़ी की झाड़ियों ने इस कुण्डी के खजाने को अकूत बना रखा है।” इनसे पानी जमीन में जाता है। यही रिचार्ज होकर कुण्डी में आता है। गाँव में किंवदंती है कि कुछ समय के लिये इस पहाड़ी के पास बंजारों ने डेरा डाला था। पानी संचय की तकनीक से वाकिफ होने के कारण ही उन्होंने इस कुण्डी को खुदवाया होगा। लोग इसे ‘माणिया बावड़ी’ के नाम से पुकारते हैं। माणिया से आशय श्मशान घाट से है- जो इसके पास ही है।

आप इस तरह की सात तलाई देख सकते हैं, जो पहाड़ी पर मौजूद हैं। पानी आन्दोलन के तहत सभी का जीर्णोंद्धार कराया गया है। एक अन्य तलाई में जीर्णोंद्धार के दौरान इसी तरह पानी निकला तो वहाँ भी कुण्डी तैयार की गई। ये सब एक शृंखला में बनी हैं। गाँव के भेरूलाल कहने लगे- “हमको यह विश्वास है कि गाँव में सब जगह अवश्य पानी समाप्त हो जाएगा, लेकिन यह कुण्डी सदैव पानी से भरी रहेगी।”

...यह पहाड़ी की एक और तलाई है। इसमें गहरीकरण के साथ-साथ पहाड़ी के नाले को भी इस दिशा में मोड़ दिया गया है। यदि अच्छी बरसात हो तो पूरा क्षेत्र हरा-भरा हो जाए। पहले यहाँ पाल बाँधकर तलाई बनाई गई थी।

सोहनसिंह और भेरूसिंह इस रिचार्जिंग का अपने खेत के लिये उपयोग करते थे। इसी आधार पर यहाँ पानी की सम्भावना देखी गई। इसे गाँव के पास वाली तलाई कहा जाता है। गाँव के ऊपर वाली तलाई का भी गहरीकरण कर जल प्रबन्धन किया गया। पहले ऊपर वाली पहाड़ी का पूरा पानी यहाँ आकर गाँव से निकलता था। इस वजह से गाँव में कीचड़ हो जाया करता था। पहले से यहाँ बनी पाल केवल चार फीट की थी। इसका गहरीकरण किया और नाला बन्द कर दिया। इसमें रबी के मौसम में भी पानी भरा है। गाँव के मवेशी यहाँ पानी पीने आते हैं। इन तलाइयों को देखकर उज्जैन के जल विशेषज्ञ एम.एल. वर्मा कहने लगे- “उज्जैन के सप्त सागर की तरह इन्हें भी गुलाबखेड़ी के सप्त सागर के नाम से पुकारा जाना चाहिए।”

पानी आन्दोलन के बाद गाँव में एक नई तरह की जागरूकता आई है। पानी समिति अध्यक्ष भेरूसिंह और सचिव सीताराम नरवरिया के साथ गाँव-समाज जलसंवर्धन के और उपाय खोजते रहता है। पहले गाँव में कोई आता था तो लोग घरों के भीतर चले जाते थे, लेकिन अब लोग बात करने के लिये आगे आते हैं।

...जल आन्दोलन में इस गाँव की क्या पहचान होनी चाहिए?

...पुरानी परम्परागत जल संरचनाएँ, जो अब समाज ने पुनः जिन्दा की हैं।

...या पहाड़ पर बूँदों के छिपे खजाने। ...या गुलाबखेड़ी के सप्त सागर!

एक बार मगरे की सैर कर आइए!

आप खुद पहचान लेंगे इस गाँव की पहचान को, पानी का खजाना जो हाथ लग जाएगा!!

 

बूँदों के तीर्थ


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

बूँदों के ठिकाने

2

तालाबों का राम दरबार

3

एक अनूठी अन्तिम इच्छा

4

बूँदों से महामस्तकाभिषेक

5

बूँदों का जंक्शन

6

देवडूंगरी का प्रसाद

7

बूँदों की रानी

8

पानी के योग

9

बूँदों के तराने

10

फौजी गाँव की बूँदें

11

झिरियों का गाँव

12

जंगल की पीड़ा

13

गाँव की जीवन रेखा

14

बूँदों की बैरक

15

रामदेवजी का नाला

16

पानी के पहाड़

17

बूँदों का स्वराज

18

देवाजी का ओटा

18

बूँदों के छिपे खजाने

20

खिरनियों की मीठी बूँदें

21

जल संचय की रणनीति

22

डबरियाँ : पानी की नई कहावत

23

वसुन्धरा का दर्द

 


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