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कहीं अतिशय बारिश, कहीं सूखा

Author: 
भागीरथ
Source: 
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018

महाराष्ट्र में बेमौसम और अतिशय बारिश की मार से सबसे ज्यादा किसान बेहाल हैं। राज्य की अधिकांश कृषि बारिश के भरोसे है। किसान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहते हैं। बारिश में उतार-चढ़ाव या अनिश्चितता किसानों के लिये डरावनी हकीकत में तब्दील होती जा रही है। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे कुछ इलाके भयंकर सूखे की चपेट में है जबकि मुम्बई और उसके आस-पास के इलाके ज्यादा बारिश से बेहाल हो रहे हैं। बारिश में यह तब्दीली जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखी जा रही है। स्थानीय प्रतिनिधि इसे किस नजरिए से देखते हैं, यह जानने के लिये भागीरथ ने उनसे बातचीत की… ग्लोबल वार्मिंग हकीकत है और महाराष्ट्र में इसे महसूस भी किया जा रहा है। राज्य में ज्यादातर किसान खेती के लिये मानसून पर निर्भर है। यहाँ सिंचित जमीन कम है। इसका सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ रहा है। मेरे इलाके में पिछले कुछ सालों से बारिश का ट्रेंड काफी बदल गया है। पहले 7 जून से बारिश शुरू होकर सितम्बर तक होती थी।

अब दिवाली के बाद तक भी बारिश का आना अनिश्चित है। इससे खेती प्रभावित हुई है। किसान मुसीबत में है। ज्यादा बारिश से ओला और कम बारिश से सूखे के हालात पैदा हो रहे हैं। इस कारण खेती प्रभावित हो रही है। इससे महंगाई बढ़ रही है। महाराष्ट्र में बारिश अनिश्चित और खेती का नुकसान होने के कारण देश में सबसे ज्यादा किसानों की आत्महत्या हो रही है। यह महाराष्ट्र के लिये सबसे दुखद बात है।

तत्काल राहत के लिये किसानों को जो नुकसान होता है, उसका मुआवजा देने के लिये केन्द्र सरकार ने नीति में बदलाव किया है। पहले 50 प्रतिशत नुकसान पर राहत मिलती थी। अब 33 प्रतिशत नुकसान पर भी राहत मिलती है। सरकार ओला और सूखे से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये मुआवजा देती है लेकिन प्रकृति के सामने आदमी और सरकार की मर्यादा है। प्रकृति आखिर प्रकृति है और उसकी फटकार मिलने से सँवरना बहुत मुश्किल होता है।

सरकार और लोग मिलकर सामना करें तो ग्लोबल वार्मिंग के संकट से निकलने का कोई रास्ता जरूर निकाल लेंगे। इस देश में वातावरण का सही अन्दाज देने के लिये हाइटेक और आधुनिक सेटेलाइट सेंटर जरूरी है। नदी का प्रदूषण और पेड़ कटाई, जंगल का खत्म होना और शहरीकरण का बढ़ना मुख्य समस्याएँ हैं। हम शहरीकरण तो नहीं रोक सकते लेकिन जंगल का क्षेत्रफल बढ़ा सकते हैं। 2030 तक देश के सब वाहन बिजली से चलने लगें और पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल पूरी तरह बन्द हो जाये, सरकार इस दिशा में काम कर रही है।

पुणे और इसके आस-पास का इलाका विदर्भ और मराठवाड़ा की तरह सूखे जैसे हालातों से तो नहीं गुजर रहा है लेकिन बेमौसम बरसात जरूर परेशानी पैदा कर देती है। शायद यह ग्लोबल वॉर्मिंग का असर है। इसके लिये हम लोग खुद ही कसूरवार हैं। मुझे लगता है कि जिस रफ्तार से जंगलों व पेड़ों को काटा जा रहा है और कंक्रीट का जंगल तैयार होता जा रहा है, वह इसके लिये जिम्मेदार है। साथ ही प्रदूषण भी काफी बढ़ गया है।

पहले तालाब और नदियों का पानी पीने लायक होता था लेकिन अब उसमें स्नान तक नहीं कर सकते। इनका पानी इतना गन्दा हो गया है कि लोग बीमार हो जाते हैं। कई नदियों और तालाबों में अब मछलियाँ तक नहीं होतीं। कुदरत से पहले इंसानों ने खेला और अब कुदरत इंसानों के साथ खेल रही है। कुदरत के इस खेल से सबसे ज्यादा नुकसान गरीब किसान और उनकी फसलों को होता है।

कई बार मार्च और अप्रैल में बारिश हो जाती है लेकिन जून में उतनी बारिश नहीं होती, जितनी जरूरी होती है। अक्सर पर्याप्त बारिश न होने से मूँगफली ठीक से नहीं हो पक पाती। प्याज की फसल को भी इससे नुकसान पहुँचता है। उनमें सफेद रंग के कीड़े लग जाते हैं और प्याज का रस चूस लेते हैं। इन कीड़ों को मारने के लिये अक्सर दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है। यह बात सच है कि महाराष्ट्र के अधिकांश क्षेत्र में हालात ठीक नहीं है। इसी कारण किसान अपनी जान भी दे रहे हैं।

हमारे गाँव में भौगोलिक स्थिति इसे सूखे बचा लेती है, साथ ही प्रसाशनिक और पंचायती स्तर पर किये गए विकास कार्यों को चलते बड़ी संख्या में चेकडैम बनाए गए हैं जिससे भूजल स्तर बढ़ गया है। महाराष्ट्र में जो सूखाग्रस्त हैं, वे भी ऐसे कदम उठाकर सूखे का असर कुछ हद तक कम कर सकते हैं। हमारे गाँव में पेड़ काटने की सख्त मनाही है। एक पेड़ काटने के बदले दस पेड़ लगाने पड़ते हैं। ऐसा जब जगह हो तो राहत मिल सकती है।

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