तो भारत में क्रिकेट हो जायेगा बन्द

Submitted by RuralWater on Thu, 03/15/2018 - 14:15
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डाउन टू अर्थ, मार्च 2018

क्रिकेट के लिये वायु प्रदूषण के मानक बने तो भारतीय शहरों में शायद ही कोई मैच हो पाये। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पहले से ही इस बात का ऐलान कर चुका है कि भविष्य में नवम्बर और दिसम्बर के दौरान दिल्ली को अन्तरराष्ट्रीय मैचों की मेजबानी से वंचित किया जा सकता है। हालाँकि व्यास का कहना था कि प्रदूषण के कारण क्रिकेट को बन्द नहीं किया जा सकता, बस उसे किसी दूसरी जगह पर जरूर स्थानान्तरित किया जा सकता है

भविष्य में क्या भारत में क्रिकेट बंद हो जायेगा? दिसम्बर, 2017 में दिल्ली टेस्ट मैच के दौरान क्रिकेट के मैदान पर मास्क पहनकर खेलते हुए श्रीलंकाई खिलाड़ियों की तस्वीरों ने जो बहस छेड़ी वह दूर तलक गई है। भारत में धर्म का रूप अख्तियार कर चुके क्रिकेट के लिये यह यक्ष प्रश्न इन दिनों चहुँओर क्रिकेट भक्तों के बीच बहस का मुद्दा बना हुआ है। सब इसी बहस में उलझे हैं कि दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगर क्या प्रदूषण से घिरे होने के कारण बड़े क्रिकेट मैचों के आयोजन से हाथ धो बैठेंगे?

प्रदूषण की मार से क्या भारत अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट की पिच पर क्लीन बोल्ड हो जायेगा? भारत में आम लोगों का खेल बन चुके क्रिकेट की साख पर प्रदूषण का संकट है। सबसे ज्यादा परेशानी उन प्रायोजक कम्पनियों की है जो इस खेल और इसके खिलाड़ियों की ब्रांडिंग में खजाना खोलकर बड़े मुनाफे का गुणा-भाग कर चुकी हैं। आम क्रिकेट प्रेमी से लेकर इससे जुड़े बाजार को शीघ्र ही दुबई में होने वाली अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी की बैठक का इंतजार है, जहाँ आईसीसी प्रदूषण के मानक तय करने के लिये विचार विमर्श करेगी।

क्रिकेट में बारिश और रोशनी कम होने की स्थिति के लिये तो नियम-कायदे बनाये गये। लेकिन पहले टेस्ट मैच (15 मार्च, 1877) के बाद से अब तक 140 साल के क्रिकेट के इतिहास में पहली बार प्रदूषण को लेकर नियम लागू करने, मानक तय करने की बात उठी है।

प्रदूषण की पड़ी मार के असर का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आईसीसी ने अपना बयान जारी कर कहा, “हमने इस बात पर ध्यान दिया है कि दिल्ली में टेस्ट मैच किन हालात में खेला गया। साथ ही, हमने पहले से ही अपनी चिकित्सीय कमेटी को यह मुद्दा भेज दिया है, जिससे भविष्य में इस तरह के मुद्दे से निपटने के लिये दिशा-निर्देश और मानक तय किये जा सकें। कोटला टेस्ट मैच में श्रीलंकाई खिलाड़ी प्रदूषण से निपटने के लिये चेहरे पर मास्क पहने दिखाई पड़े थे। यह एक ऐसी तस्वीर थी, जो पहले कभी क्रिकेट के इतिहास में मैदान पर तो नहीं ही देखी गई थी।”

क्रिकेट मुश्किल में


प्रदूषण के कारण भारतीय क्रिकेट मुश्किल पड़ सकता है, यह सवाल सुनकर राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के पूर्व उपाध्यक्ष विवेक व्यास ने लगभग झल्लाते हुए कहा, “यह भारत के लिये शर्म की बात है कि श्रीलंका जैसा छोटा देश भारत में आकर प्रदूषण को लेकर इतना हल्ला मचा गया कि लगभग टेस्ट मैच रद्द होते-होते बचा। इसके लिये पूरी तरह से प्रशासन जिम्मेदार है। आखिर जिस देश में क्रिकेटरों को भगवान का दर्जा हासिल हो, वहाँ अब वक्त आ गया है कि प्रदूषण जैसे मामलों पर भी नियम-कानून बने।”

ध्यान रहे कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पहले से ही इस बात का ऐलान कर चुका है कि भविष्य में नवम्बर और दिसम्बर के दौरान दिल्ली को अन्तरराष्ट्रीय मैचों की मेजबानी से वंचित किया जा सकता है। हालाँकि व्यास का कहना था कि प्रदूषण के कारण क्रिकेट को बन्द नहीं किया जा सकता, बस उसे किसी दूसरी जगह पर जरूर स्थानान्तरित किया जा सकता है।

वहीं, उत्तर प्रदेश के पूर्व रणजी खिलाड़ी विश्वजीत सिंह ने कहा, “भारतीय क्रिकेट में पैसा इतना अधिक है कि वह प्रदूषण जैसे बड़े मुद्दे को भी कमजोर कर देगा। हालाँकि, आईसीसी ने प्रदूषण को मानक बनाने की घोषना की है लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि वह विश्व क्रिकेट में भारतीय क्रिकेट बोर्ड के दबदबे से अपने को निकाल कर कितना सही मानक तैयार कर पाती है।” वह बताते हैं “प्रदूषण का असर तो खेल पर पड़ता ही है, जहाँ तक प्रदूषण के कारण भारत में क्रिकेट बन्द हो जाये यह सम्भव नहीं है। आखिर यह भारतीयों की नस-नस में बस गया है।

आईसीसी अगर कोई मापदंड बनाती भी है तो इसके लिये एक ही हल है। जैसे कि दिल्ली का फिरोजशाह कोटला क्रिकेट मैदान जो कि एक ऐसे स्थान पर स्थित है, जहाँ सबसे अधिक प्रदूषण का स्तर पूरे साल भर बना रहता है। ऐसे में शहर के बाहरी इलाके में स्टेडियम स्थानान्तरित किये जाने की जरूरत है। हो सकता है, नये मापदंड बनने के बाद दिल्ली जैसे और सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में मैच नहीं कराये जायें।”
सिंह ने कहा, “जहाँ तक बाहरी देशों के प्रदूषण के कारण भारत आने की बात है तो वे पैसे के कारण मना करने की स्थिति में तो कतई नहीं हैं। लेकिन वे जरूर कह सकते हैं कि हम इन-इन स्थानों पर मैच नहीं खेलेंगे। उदाहरण के लिये फिरोजशाह कोटला की जगह ग्रेटर नोएडा में बने स्टेडियम में खेल सकते हैं।”

क्या किसी प्रदूषित स्थान पर मैच नहीं करवाने से समस्या हल हो जायेगी। इस सवाल पर भारतीय टीम के पूर्व टेस्ट सलामी बल्लेबाज तमिलनाडु के सदगोपन रमेश ने बताया, “बीसीसीआई और आईसीसी के लिये बड़ी चुनौती है कि मैच के लिये जगहों को चुनने के लिये प्रदूषण के मानक क्या तय किये जायेंगे।” बीसीसीआई और आईसीसी की प्रदूषण की पहल की सराहना करते हुए रमेश ने कहा, “खिलाड़ी और खेल के दृष्टिकोण से यह निर्णय सराहनीय है। लेकिन यह कदम भारत जैसे विशाल भूभाग वाले देश में पानी में लाठी मारने जैसा साबित होगा। खिलाड़ी को खेल के दौरान काफी थकान होती है, जिसकी वजह से वह तेजी से साँस लेता है। ऐसे में प्रदूषित वातावरण उसे और उसके प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है। खेल के दौरान मैदान में प्रकाश कम होता है तो उसे जरूरत के अनुसार सही कर लिया जाता है पर प्रदूषण के स्तर को कम कर पाना टेढ़ी खीर है।” रमेश ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत में क्रिकेट बन्द नहीं किया जा सकता है।

प्रदूषण के कारण भारतीय क्रिकेट मैच होने और नहीं होने के सवाल पर भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व मीडिया मैनेजर रहे चेन्नई के आरएन बाबा का कहना है कि यह जरूरी नहीं कि किसी क्षेत्र व स्थान का प्रदूषण स्तर हमेशा एक समान हो। यह परिस्थिति बोर्ड के लिये परेशानी का सबब बन सकती है। जैसे अगर नियमों के अनुसार, बोर्ड ने किसी मैच के लिये चेन्नई के मैदान का चयन किया। लेकिन अगर वह भोगी-पोंगल के मौके पर पड़ा तो उस दिन का प्रदूषण स्तर बाकी दिनों की अपेक्षा में अधिक रहेगा। ऐसे कई स्थान और हैं, वहाँ मनाये जाने वाले त्यौहार हैं जो प्रदूषण के स्तर को प्रभावित करते हैं। यही नहीं, कुछ विशेष स्थानों पर विशेष समय में ऐसे कारक होते हैं जो प्रदूषण के स्तर को प्रभावित करते हैं। इस परिस्थिति से निबटने के लिये भी बोर्ड को गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है।

इस मुद्दे पर उत्तराखंड क्रिकेट एसोसियेशन के वर्तमान सचिव दिव्य नौटियाल का कहना है कि खेलों का स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। जहाँ कहीं भी खेल हो, वहाँ पर्यावरण तो साफ-सुथरा होना ही चाहिए। इसलिये प्रदूषण वाले शहरों में क्रिकेट ही नहीं कोई भी खेल प्रतियोगिता आयोजित नहीं की जानी चाहिए। प्रदूषण का असर खिलाड़ियों पर बहुत अधिक पड़ता है। इस बाबत मोहम्मद कैफ और सुरेश रैना जैसे खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे चुके उत्तर प्रदेश खेल निदेशालय के पूर्व खेल अधिकारी विनय गिल कहते हैं, आईसीसी यदि ऐसा कोई मानक तैयार करती है तो यह देखना होगा कि वह क्या स्तर रखता है। क्योंकि वास्तविकता यह है कि भारत ही नहीं पूरी दुनिया में मानकों की अनदेखी की जा रही है।

प्रदूषित वातावरण में खेलने से खिलाड़ियों की प्रतिरोधक क्षमता और कमजोर होती है। यह उनके भविष्य के लिये घातक होता है, विशेषकर तेज गेंदबाजों के लिये। वह कहते हैं, “प्रदूषण के कारण भारत जैसे देशों में क्रिकेट बन्द करने की कल्पना करना अभी बहुत जल्दबाजी होगी।”

भारतीय क्रिकेट टीम के अंडर-19 टीम के पूर्व कप्तान अमीकर दयाल आईसीसी के प्रस्तावित प्रदूषण मानकों को काफी हद तक सही मानते हैं। उन्होंने बताया, “जब आम आदमी को प्रदूषित शहर में तेज चलने पर साँस लेने में परेशानी होती है तो एक क्रिकेटर के साथ क्या स्थिति होती होगी, यह सोचना जरूरी है। मैच में पूरे समय सक्रिय रहने वाले क्रिकेटर को साँस लेने में परेशानी होने पर वह एकाग्रता खो सकता है। इसलिये, प्रदूषण पर चिन्ता स्वाभाविक है।” वे बताते हैं, “बीते साल 8 दिसम्बर को दोपहर एक बजे पटना में हवा गुणवत्ता सूचकांक 401 पर था। ठीक इसी समय दिल्ली का सूचकांक 208 पर दिखा। किसी भी स्थिति में पटना का यह प्रदूषण स्तर सीवियर स्तर दिखा रहा था।”

चेन्नई के वरिष्ठ खेल पत्रकार शिलरजी शाह ने कहा, “बोर्ड इस मुद्दे को लेकर काफी देर से जागा है। लेकिन यह अच्छी बात है। जब जागो तभी सवेरा। भारत में वे खिलाड़ी अधिक प्रभावित होते हैं जो बाहर के देश से आते हैं।” प्रदूषण के सम्बन्ध में तमिलनाडु के स्वास्थ्य सचिव जे. राधाकृष्णन ने कहा, “बीसीसीआई और आईसीसी जैसी संस्थाएँ ऐसे कदम उठाती हैं तो यह सराहनीय है क्योंकि खेल के दौरान मैदान में खिलाड़ियों का स्वास्थ्य सबसे अहम होता है और यह तभी स्वस्थ रह सकता है जब प्रदूषण का स्तर न के बराबर हो। आईसीसी को कायदे से प्रदूषण के मानक तैयार करते समय किसी दबाव में नहीं आना चाहिए और उसे खेल और खिलाड़ी के हितों को ध्यान में रखकर कड़े प्रदूषण मानक तैयार करना चाहिए। यह देखने वाली बात जरूर होगी कि प्रदूषण से भविष्य में निपटने के लिये आईसीसी क्या मानक तय करती है और ये मानक कब से लागू होते हैं।”

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