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यूरिया जीवन से जहर तक का सफर

Author: 
अक्षित संगोमला, अनिल अश्विनी शर्मा
Source: 
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018
क्या यूरिया के दिन लद गए हैं? यह सवाल इसलिये क्योंकि जिस यूरिया ने कई गुणा पैदावार बढ़ाकर किसानों को गदगद किया, वही अब उन्हें खून के आँसू रुला रहा है। अब उपज कम हो रही है और जमीन के बंजर होने की शिकायतें भी बढ़ती जा रही हैं, इसलिये किसान यूरिया से तौबा करने लगे हैं। एक हालिया अध्ययन में पहली बार भारत में नाइट्रोजन की स्थिति का मूल्यांकन किया गया है जो बताता है कि यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल ने नाइट्रोजन चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह पर्यावरण और सेहत को भी नुकसान पहुँचा रहा है। अक्षित संगोमला और अनिल अश्विनी शर्मा ने यूरिया के तमाम पहलुओं की पड़ताल की…

1- 120 से अधिक वैज्ञानिकों ने करीब 5 वर्षों की मेहनत के बाद भारत में नाइट्रोजन की स्थिति का मूल्यांकन “इण्डियन नाइट्रोजन असेसमेंट” में किया है।
2- 6,610 किग्रा. यूरिया का औसत इस्तेमाल एक भारतीय किसान पिछले पाँच दशकों में कर चुका है क्योंकि यह सस्ता पड़ता है।
3- 67 प्रतिशत यूरिया मिट्टी जल और पर्यावरण में पहुँच जाता है। करीब 33 प्रतिशत यूरिया का इस्तेमाल ही फसल कर पाती है।
4- 03 लाख टन नाइट्रस ऑक्साइड भारत के खेत छोड़ते हैं जो पर्यावरण में पहुँचकर वैश्विक तापमान में इजाफा करता है।
“इस बार तो हमने अपने एक एकड़ के खेत में चार-चार बार यूरिया डाला। आप मानिए कि 200 किलो से अधिक का यूरिया खेतों में डाल दिया, लेकिन उपज पिछले साल से भी कम ही मिल पाई। अब यह यूरिया हमारे लिये जी का जंजाल बन गया है। खेतों में डालो तो मुसीबत है और न डालने का तो अब सवाल ही नहीं पैदा होता है।” बिहार के बेगूसराय जिले के बखरी गाँव के 82 साल के किसान नंदन पोद्धार की इस उलझन का इलाज फिलहाल किसी के पास नहीं है। यूरिया उनके खेतों का वह जीवन बन गया है जिसकी फसल जहर के रूप में कट रही है।

देश को कृषि के क्षेत्र में मजबूत बनाने के उद्देश्य से यूरिया का इस्तेमाल हरित क्रान्ति (1965-66) के बाद पूरे देश में किया गया। पोद्धार कहते हैं, “शुरुआती सालों में देश के कई इलाकों में इस यूरिया के बारे में किसानों को विधिवत जानकारी नहीं दी गई बल्कि रात में खेतों में यूरिया की बोरी चुपचाप डाल दी जाती थी, इससे भी जब बात नहीं बनी तब गाँव के सरपंच के माध्यम से यूरिया किसानों को अपने-अपने खेतों में उपयोग करने के लिये आग्रह किया गया।” सभी किसानों से सरकार ने 1966-67 के दौरान यूरिया का इस्तेमाल करने की लगातार चिरौरी की। उन्होंने बताया कि हमें ऐसा लगा था कि खेती से होने वाला नुकसान यूरिया के उपयोग से मुनाफे में बदल जाएगा। हुआ भी ऐसा भी, पैदावार बढ़ने से हम खुश थे। हालाँकि शुरू में हम डर भी रहे थे कि यूरिया के इस्तेमाल से कहीं हमारी फसल ही चौपट न हो जाये। हमने डरते-डरते पहली बार 1967 में एक एकड़ में केवल चार किलो यूरिया डाला। जब फसल तैयार हुई तो हमें अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ क्योंकि पहली बारह हम देख रहे थे कि गेहूँ की उपज हमें तीन गुना अधिक मिली।

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