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जलकृषि का पर्यावरणीय प्रभाव - एक मूल्यांकन

Author: 
पी. जयशंकर
Source: 
उत्तरदायित्वपूर्ण मात्स्यिकी और जलकृषि, केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोचीन, केरल, मत्स्यगंधा 2004

पहल

आज कृषि कार्यों में उपयुक्त प्रबंधन उपायों के जरिए अपशिष्टों का उत्पाद एवं बहिस्राव कम करने पर ध्यान देने की प्रवणता बढ़ रही है। ये प्रयास परम प्रधान भी है और भविष्य में पर्यावरणीय मूल्यांकन और किये गये उपायों की पर्यावरणीय दक्षता जाँचने के लिये मॉनिटरिंग कार्य भी बढ़ जाएगा।

अन्य कृषि मेखलाओं के समान जलकृषि भी प्राकृतिक सम्पदाओं पर आश्रित है। पर जलकृषि में पर्यावरणीय सुरक्षाओं से सम्बन्धित समस्याएँ बढ़ती जा रही है। इस हालत में सम्पदाओं के सदुपयोग की दक्षता बढ़ाना और विपरीत पर्यावरणीय प्रभावों को कम करना आने वाले दशकों के लिये सर्वमान्य एवं स्वीकृत लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिये जलकृषि के विकास में लगे सभी व्यक्तियों के सहयोग और कार्यान्वयन आवश्यक है। इस पर होने वाला अधिकांश विवाद पर्यावरणीय अवनति से जुड़े हैं। ये विकासीय कार्यों के समन्वयन और प्रबंधन में अपर्याप्त जानकारी और कुछ उद्यमकर्ताओं के दायित्वहीन प्रवृत्तियों के कारण उत्पन्न हुए हैं जो सारे के सारे जलकृषि सेक्टर को बदनाम कर देता है।

यह देखा गया है कि जलकृषिजन्य प्रमुख पर्यावरणीय प्रभाव अधिकत: उच्च-निवेशित उच्च-लाभयुक्त तीव्र कृषि रीतियों के कारण हुए हैं (उदा: रेसवेय्स ओर पिंजरों में साल्मोनिडों का संवर्धन) जिनके परिणाम पानी में तैरने वाले वस्तुओं की उपेक्षा, अभिग्राही जल क्षेत्रों में फैलने वाले पोषक और जैव संपुष्टीकरण के फलस्वरूप अनोक्सिक अवसादों के रूपायन, नितलस्थ जीवजातों समुद्री संस्तर के वनस्पतिजात और प्राणिजातों में परिवर्तन, झीलों के पौष्टीकरण आदि हैं।

बड़े पैमाने की चिंगट कृषि के लिये गरान वनों और आद्रभूमि ने नशीकरण किए हैं जिस से पीने के पानी का लवणीकरण और भौमजल निकालने के जरिए भूमि का अवतलन हुए हैं। इसके अतिरिक्त पशुपालन और रोग प्रबंधन के गलत तरीका, प्राकृतिक बीजों का संग्रहण (प्राकृतिक बीजों के संग्रहण के समय उपपकड़ के रूप में प्राप्त अवांछित जातियाँ) और खाद्य के रूप में मात्स्यिकी संपदाओं का उपयोग आदि भी पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाले कारक हैं। मोलस्क संवर्धन/कृषि उस क्षेत्र के जीववायु घटाव और तीव्र अपरदन के कारण बन गए हैं।

अलवणजलीय मछलियों की प्रस्तुति का मुख्य कारण जलकृषि है और यहाँ तक के अनुभव ने यह व्यक्त किया है कि प्रस्तुत की गयी जातियाँ पालन स्थल से बचकर अपने आप या पालनकर्ता द्वारा छोड़ देने के कारण प्राकृतिक पारिस्थितिकी में पहुँच जाती है। इस प्रकार आने वाली विस्थानीय जातियाँ स्थानीय सम्पदाओं और पर्यावरण पर संकरण और तद्वारा प्राकृतिक प्रभावों का नष्ट, परभक्षिता और प्रतियोगिता, रोग संक्रमण और आवासीय परिवर्तन जैसे बिलकार्यता, पौधों को निकालना, अवसाद और पंकिलता फैलाव आदि विपरीत असर पैदा कर डालते हैं।

जलकृषि खेतों के बीच पर्यावरणीय सहसम्बन्ध खेतों में प्रदूषण और रोग संक्रमण आदि अवांछित फल उत्पन्न करते हैं जो खेतों में संभरित प्रभावों के नाश और तद्वारा वित्तीय नष्ट में परिणत हो जाता है।

संपदाओं के दक्षतापूर्ण उपयोग, प्रतियोगिताओं को सामना करने और बाजार शक्तियों को प्रभावित करने में होने वाला दबाव कुछ क्षेत्रों में तीव्र जलकृषि उत्पादन की ओर मुड़ने के लिये प्रेरित करने वाले घटक हैं और इन तीव्र कृषि रीतियों के लिये अत्यधिक परिष्कृत फार्म प्रबन्धन, मूल्यवान जातियों का एकल संवर्धन, और संपन्न उपभोक्ताओं को लक्ष्य करना आदि कार्य अनिवार्य बन जाते हैं। लेकिन तीव्र जलकृषि यदि सही ढंग की योजना और प्रबंधन एवं संपदा, निवेशों, उपकरणों और रसायनों के कुशल उपयोग के बिना की जाएँ तो पर्यावरण पर प्रतिकूल असर बढ़ जाएगा।

समाधान
अत: उत्तरदायित्वपूर्ण जलकृषि के प्रति बाध्य होना सबसे अनिवार्य आवश्यकता होती है। आज केवल उत्पादक ही नहीं, सरकारी प्राधिकारियों, उपभोक्ताओं सहित जन सामान्य जलकृषि विकास एवं शक्य पारिस्थितिकी प्रभावों पर सामाजिक और आर्थिक स्थितियों पर पड़ने वाले नकारात्मक नतीजों पर अवबोध और जानकारी बढ़ाने की ओर तुले रहे हैं। अभी तक की प्रायोगिक जानकारी जलकृषि के निरंतर विकास के लिये संशोधित समन्वयन और प्रबंधन की सिफारिश करती है।

जलकृषि में विदेशज जातियों की प्रस्तुति करते समय आवश्यक वारणिक उपाय लेना उचित होगा। इसी प्रकार अति संवेदनशील आवासों, जैसे ज्वारनदमुखों, गरान क्षेत्रों, आर्द्रभूमि, नदितटीय प्राणिजातों और वनस्पतिजातों या विशिष्ट प्रजनन और पालन तलों के प्रबंधन में विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि जलकृषि का दुष्प्रभाव इन आवासों पर न पड़े।

प्रतिरोधी अभिगमों के प्रयोग और उन्नयन का लाभ उन स्थानों में अधिक प्रकट होता है जहाँ पर्यावरणीय डाटा कृषि और पर्यावरणीय सम्बन्धों से सम्बन्धित सूचनाओं की जारी होती है। पर्यावरणीय प्रभाव निर्धारण के विकास और प्रयोग के साथ नियमित पर्यावरणीय मॉनिटरिंग प्रत्येक फार्मों, फार्म समूहों या चिंगट, साल्मोण, शंबु आदि किसी खास उत्पादन में लगे सेक्टरों के प्रभावी प्रबंधन उपायों के लिये अनिवार्य डाटा प्रदान करने में सक्षम होगा।

प्राकृतिक बीजों के संग्रहण में सर्तकता स्फुटनशाला प्रौद्योगिकी विकास और उन्नयन के लिये अनिवार्य घटक होती है। उत्पादन और जलकृषि बीजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये समुचित आनुवंशिक और जैवप्रौद्योगिकी रीतियों का प्रयोग भी अनिवार्य बन जाता है।

अत: सुधरी गई मछली पालन रीतियाँ बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है, विशेषत: खेतों में प्रयुक्त करने वाले खाद्यों के चयन में आवश्यक जानकारी प्राप्त करनी चाहिए औषधों और रसायनों का कुशल और प्रभावी प्रयोग सुनिश्चित करना चाहिए। साधारणतया उपयोग की जाने वाली जल सम्पदाओं एवं उत्पादित अपशिष्टों के अच्छे प्रबंधन के लिये कई अवसर होते हैं। तकनीकी और आर्थिक दक्षता को बल देते हुए उपयुक्त सम्पदाओं का बेहतर उपयोग फार्म प्रबंधन की प्रगति के लिये सहायक होगा। बड़े पैमाने के तीव्र और उच्च निवेश वाली प्रणालियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

अति तीव्र उत्पादन प्रणाली से पर्यावरणीय और सम्पदाओं के उपयोग से होने वाली समस्याओं को कम किया जा सकता है। क्योंकि बड़े पैमाने के व्यापक प्रणाली के लिये विस्तृत क्षेत्र (स्थल या जल) की आवश्यकता पड़ती है जिससे कुछ क्षेत्रों में आवास व्यवस्था की अवनति की सम्भाव्यता होती है जबकि अति तीव्र प्रणालियों में कम क्षेत्र में सम्पदाओं के समुचित उपयोग से अधिक उत्पादन किया जा सकता है। इसके लिये एक अच्छा उदाहरण है चिंगट कृषि।

अधिकतर चिंगट खेत विस्तृत या अर्ध तीव्र प्रणाली की होती है और हमेशा आर्द्रभूमि अवनति की समस्या विस्तृत कृषि प्रणालियों से उत्पन्न होती है। तीव्र कृषि भी उच्च निवेश और अपशिष्टों के उच्च जमाव के कारण प्रदूषण समस्याएँ जरूर खड़ा करती है, लेकिन यह प्रदूषण समस्या चुनी गयी स्थानिक विशेषताओं पर आश्रित होती है और विशेषकर अभिग्राही जल क्षेत्र के स्वांगीकरण या प्रर्यावरणीय दक्षता पर निर्भर रहती है। व्यावहारिक दृष्टि में कहे जाए तो उत्पादकता को मानते हुए प्रभावी उपायों का प्रयोग और दक्ष प्रबंधन रीतियों का स्वीकरण अभिकाम्य होगा।

ली गई कार्रवाई
उपर्युक्त मुद्दों पर विचार करते हुए जलकृषि और पर्यावरण के परस्पर सम्बन्ध पर उपयोगी सूचनाएँ विशेषत: शीतोष्ण पश्चिम देशों में आज उपलब्ध है या विकासशील देशों में इसका विकास हो रही है। इन पहलों पर अवबोध जगाने के लिये और प्रौद्योगिकीय मार्गदर्शन और सलाह देने के उद्देश्य से कई सम्मेलन, कार्यशालाएँ और बैठकें आयोजित की गयी है।

उदाहरण के लिये :
- विकासशील देशों की पर्यावरण और जलकृषि पर वर्ष 1991 में आई सी एल ए आर एम/जी टी इज्ड सम्मेलन।
- एशिया-पैसिफिक में पर्यावरणीय मूल्यांकन और जलकृषि विकास के प्रबंधन पर वर्ष 1994 में एफ ए ओ/एन ए सी ए क्षेत्रीय कार्यशाला।
- उत्तरदायित्वपूर्ण मात्स्यिकी के लिये वर्ष 1995 में एफ ए ओ आचरण संहिता का स्वीकरण, जलकृषि विकास पर इसके अनुच्छेद 9 सहित।
- पर्यावरणीय प्रभावों, उनके मॉनिटरिंग, रसायनों के उपयोग और जलकृषि को तटीय प्रबंधन में एकीकरण पर वर्ष 1991-1997 के दौरान जी ई एस ए एम पी विशेषज्ञों की बैठक।
- टिकाऊ चिंगट कृषि की नीतियों पर वर्ष 1997 में एफ ए ओ बांगोंक तकनीकी परामर्श।
- उत्तरदायित्वपूर्ण मात्स्यिकी के अनुच्छेद 9 का मेडिटरेनियन क्षेत्र में प्रयोग के सम्बन्ध में वर्ष 1999 में परामर्श
- तीसरे सहस्राब्दी जलकृषि विकास के पर्यावरणीय मूल्यांकन और प्रबंधन में वर्ष 2000 की बांगोक घोषणा।

जलकृषि के पर्यावरणीय मूल्यांकन और प्रबंधन में प्रगति लाने के लिये कई परियोजनाएँ कार्यान्वित की गयी है। प्रौद्योगिकीय प्रगतियों के अलावा वैधिक और संस्थानीय ढाँचे के संरचना और विकास के लिये प्रयास किया गया है ताकि जलकृषि का टिकाऊपन कायम रखा जा सके। निजी जलकृषि सेक्टर के संगठनों द्वारा भी बेहतर पर्यावरणीय दक्षता और इसके जरिए एक सार्वजनिक धारणा उत्पन्न करने के लिये प्रयास जारी है।

निष्कर्ष
वैध और संस्थानीय ढाँचा निर्माण का कार्य जारी रहेगा, लेकिन इसे लागू बनाने और पर्यावरणीय विनियमन विशेषत: ई आई ए की आवश्यकताएँ और नियमित पर्यावरणीय मॉनिटरिंग कई देशों में अभी तक लागू नहीं किया गया है।

पर्यावरणीय
टिकाऊ जलकृषि विकास की योजनाएँ तैयार करने, पर्यावरणीय मूल्यांकन, संपदा के समुचित उपयोग पर पर्यावरणीय और उपभोक्ता समर्थकों और निजी सेक्टर के प्रति भागित्व भी जोडके संस्थानीय, आर्थिक और बाजार के पहलुओं के विश्लेषण के अनुसार नीति विकास आदि के लिये विशेषज्ञों की जरूरत होती है।

राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय निजी सेक्टर संस्थाओं और संगठनों द्वारा, कभी-कभी प्रदायकों, परचूनियों आदि के सहभागित्व के साथ जलकृषि का विकास हो रहा है। कुछ निजी सेक्टर स्वयं संहिता और मार्ग-निर्देश रचाकर अच्छे व्यवहार कर रहे हैं। ये निजी सेक्टर अपने सम्बन्धित सेक्टरों में उत्तम पर्यावरणीय निष्पादन और सदस्यता के लिये प्रोत्साहन देते हैं जिसका उद्देश्य है सामान्य लोगों के बीच उनके व्यवसाय के बारे में ज्ञान जगाना और उत्पादों के विपणन के लिये बाजार ढूंढना।

आज कृषि कार्यों में उपयुक्त प्रबंधन उपायों के जरिए अपशिष्टों का उत्पाद एवं बहिस्राव कम करने पर ध्यान देने की प्रवणता बढ़ रही है। ये प्रयास परम प्रधान भी है और भविष्य में पर्यावरणीय मूल्यांकन और किये गये उपायों की पर्यावरणीय दक्षता जाँचने के लिये मॉनिटरिंग कार्य भी बढ़ जाएगा। वास्तविक पारिस्थितिक प्रतिक्रिया प्रतिबिम्बित होने वाले पर्यावरणीय सूचक (उदाहरण के लिये आवास, समुदाय या जनसंख्या) निरीक्षण भी नियमित होने की संभावना है।

उपभोक्ता स्वीकार्यता पर प्रभाव डालने वाली जलकृषि उत्पादों की खाद्य सुरक्षा की समस्याएँ आज लोक स्वास्थ्य प्राधिकारियों की चिन्ता का विषय बन गया है। जलकृषि खेतों द्वारा निकटवर्ती खेतों के उत्पादों पर होने वाला पर्यावरणीय प्रभाव, स्वयं-प्रदूषण और जलकृषि उत्पादों एवं खाद्य और खाद्य संघटकों पर जलकृषितर व्यक्तियों द्वारा पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव पर भी गौरवपूर्ण मनन की प्रतीक्षा की जा सकती है।

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