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भूजल का दोहन करती एक योजना


फार्म पांड स्कीम लाया गया था, तो इसका उद्देश्य ही था बारिश के पानी को बर्बाद होने से रोकना। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना व राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के दिशा-निर्देश के मुताबिक, इस तरह के तालाबों में इनलेट की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि बारिश का पानी ऊपरी क्षेत्रों से तालाब में आ सके। इसके साथ तालाबों में आउटलेट की व्यवस्था भी होना अनिवार्य है ताकि क्षमता से अधिक पानी भरने पर आउटलेट के रास्ते पानी बाहर निकल जाये। दिक्कत की बात है कि इस गाँव में बने 300 तालाबों में से किसी में इनलेट व आउटलेट की व्यवस्था नहीं है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के संगमनेर तालुका में एक बहुत छोटा गाँव है। नाम-हिवरगाँव पवासा। इस गाँव में खेतों के पास आपको छोटे-छोटे तालाब दिखेंगे। नेशनल हाईवे 50 से पूरब की तरफ मुड़ते ही दूर से तालाबों की शृंखला नजर आने लगती हैं। आप पास जाएँगे तो आपको हर खेत के निकट एक तालाब मिलेगा। महज 1500 की आबादी वाले इस गाँव में 300 तालाब हैं जिन्हें फार्म पांड भी कहा जाता है।

केन्द्र सरकार के महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत इन तालाबों का निर्माण किया गया है। इन्हें बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य खेतों की सिंचाई सुनिश्चित करना है। हालांकि इन तालाबों को लेकर सैंड्रप व अन्य सिविल सोसाइटी सवाल उठा रहे हैं। इन सबके बीच इस बार के बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने घोषणा की है कि वित्तवर्ष 2017-2018 में और 5 लाख तालाब खोदे जाएँगे ताकि सूखाग्रस्त इलाकों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। पिछले वित्त वर्ष में भी केन्द्र सरकार ने 5 लाख तालाब बनाने का लक्ष्य रखा था।

सिविल सोसाइटी की आपत्ति इस बात पर है कि तालाब में पानी ग्राउड से निकाल कर डाला जाता है जबकि इस तरह के तालाबों का निर्माण बारिश के पानी को संजोने के लिये किया जाना चाहिए, ताकि भूजल स्तर बना रहे। लेकिन, इन तालाबों में पानी भूगर्भ से निकालकर डाला जाता है। सिविल सोसाइटी के अनुसार इस व्यवस्था का एक बड़ा नुकसान यह है कि इसके लिये भूजल का दोहन किया जाता है। बारिश के पानी को संजोने की जगह अगर भूजल का दोहन किया जाता है, तो इसका दीर्घकालिक परिणाम चिन्ताजनक होगा।

असल में फार्म पांड स्कीम लाया गया था, तो इसका उद्देश्य ही था बारिश के पानी को बर्बाद होने से रोकना। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना व राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के दिशा-निर्देश के मुताबिक, इस तरह के तालाबों में इनलेट की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि बारिश का पानी ऊपरी क्षेत्रों से तालाब में आ सके। इसके साथ तालाबों में आउटलेट की व्यवस्था भी होना अनिवार्य है ताकि क्षमता से अधिक पानी भरने पर आउटलेट के रास्ते पानी बाहर निकल जाये। दिक्कत की बात है कि इस गाँव में बने 300 तालाबों में से किसी में इनलेट व आउटलेट की व्यवस्था नहीं है। उल्टे अधिकांश तालाबों का निर्माण खेतों के ऊपरी हिस्से में किया गया है ताकि सिंचाई करते वक्त पानी खेतों में आसानी से पहुँच जाये।

नदी व बोरवेल से भरते हैं तालाब


इस गाँव के तालाबों में पानी मुख्य रूप से दो स्रोतों से इकट्ठा किया जाता है- बोरवेल व प्रवरा नदी। प्रवरा नदी गाँव से 4 किलोमीटर दूर बहती है। बताया जाता है कि छोटे से बड़े आकार तक के तालाब बनाए गए हैं जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत तालाब भूजल पर निर्भर हैं।

इन तालाबों की सतह पर प्लास्टिक की चादरें बिछाई गई हैं ताकि पानी भूगर्भ में न चला जाय।

जब तालाब का पानी खत्म हो जाता है, तो दोनों स्रोतों की मदद से उसे फिर भर दिया जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि जनवरी में तालाब को दोबारा भर दिया जाता है क्योंकि जनवरी से मानसून आने तक बारिश नहीं होती है। इस अवधि में तालाबों के पानी से खेतों की सिंचाई की जाती है। किसानों का कहना है कि हर डेढ़ महीने के अन्तराल पर खेतों की सिंचाई की जाती है। हालांकि भूजल से तालाब भरने के फायदे के बारे में किसान तो बताते हैं लेकिन इसके नुकसान की ओर उनका ध्यान नहीं है। अपने साढ़े चार एकड़ खेत के लिये तालाब बनाने वाली सरोदे कहती हैं, ‘इस तालाब से काफी मदद मिल रही है। तालाब के पानी से सूखे की स्थिति में भी हम अपनी फसल बचा लेते हैं। चूँकि सूखे के सीजन में भी पानी उपलब्ध रहता है इसलिये फसल भी अच्छी होती है।’ वह अपने खेतों में फसल के अंगूर व केले व दूसरे तरह के फल उगाती हैं। उन्होंने कहा कि पानी की उपलब्धता होने से फलों की पैदावार भी अच्छी होती है।

किसान सचिन पावशे ने अपने पैसे से ही तालाब बनाया है क्योंकि सरकार की तरफ से तालाब बनाने के लिये जो सब्सिडी दी जाती है, उसके लिये तय शर्तों को वह पूरा नहीं करता है। इसका उसे कोई मलाल नहीं कि उसे सब्सिडी नहीं मिली है, बल्कि उसे खुशी है कि तालाब बन जाने से उसे अब सिंचाई के लिये परेशान नहीं होना पड़ता है। सचिन कहते हैं, ‘पहले बोरवेल से पानी दिया करते थे। बोरवेल से पानी धीमी रफ्तार से निकलता था जिससे बड़ी परेशानी होती थी, लेकिन तालाब ऊँचाई पर स्थित है जिस कारण खेतों के पटवन में काफी सहूलियत होती है। ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। ढलान होने के कारण तुरन्त खेतों तक पानी पहुँच जाता है।’

कई किसानों ने पम्प के जरिए पानी पटवन के लिये सोलर पीवी भी लगवा लिया है। ये किसान जब पानी से लबालब तालाब देखते हैं तो उनके चेहरे पर सन्तोष व खुशी के भाव साफ नजर आते हैं क्योंकि वे आश्वस्त होते हैं कि बारिश नहीं भी होगी तो उनकी फसलों को पानी मिल जाएगा।

वर्ष 2012 से 2015 के बीच बने अधिकांश तालाब


महाराष्ट्र के कई गाँवों में फॉर्म पांड के जरिए भूजल का बेजा दोहन किया जा रहा है और इससे उभरने वाली समस्याएँ भी अब दिखने लगी हैं। पश्चिम महाराष्ट्र के लोग इन समस्याओं से दो-चार होने लगे हैं। इसको लेकर डब्ल्यूओटीआर के सीनियर रिसर्चर ईश्वर काले ने रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी। रिपोर्ट में उन्होंने फॉर्म पांड के निर्माण के तरीके पर चिन्ता जाहिर करते हुए कई तरह के सुझाव दिये हैं। उनके मुताबिक, फॉर्म पांड की संख्या को तय किया जाये व यह भी सुनिश्चित किया जाये कि सूखाग्रस्त क्षेत्र में पेयजल की उपलब्धता बनी रहे।बताया जाता है कि हिंवारगाँव में अधिकांश तालाब वर्ष 2012 से वर्ष 2015 के बीच बनाए गए। नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन (एनएचएम) ने तालाब खोदने के लिये सब्सिडी भी दी। आकार के अनुसार तालाब की खुदाई में 95 हजार रुपए से 3.55 लाख रुपए तक खर्च होते हैं। सब्सिडी के लिये सरकार की ओर से जो शर्तें रखी गई हैं, उन शर्तों पर छोटे तालाब फिट नहीं बैठते हैं, इसलिये उन्हें सब्सिडी भी नहीं मिलती है। शर्तें पूरी करने वाले तालाबों के लिये सरकार की तरफ से 75 हजार रुपए दिये जाते हैं।

तालाब बनवाने में ठेकेदारों की बड़ी भूमिका रही है। संजय सरोदे कहते है, ‘इस तरह की स्कीम में ठेकेदारों की अहम भूमिका रहती है। सब्सिडी के लिये सारे कागजाती काम ठेकेदार ही करवाते हैं। हम लोग भी ठेकेदारों से ही पेपर वर्क करवाते हैं ताकि जल्द-से-जल्द सब्सिडी मिल जाये।’

ग्रामीण बताते हैं कि तालाबों के कारण गाँवों की आर्थिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। पारम्परिक खेती के साथ ही लोग अब फल भी उगाने लगे हैं।

भूगर्भ जल का दोहन


तालाबों से गाँव में आई खुशहाली सबको दिख रही है लेकिन तालाब में जिस पद्धति से पानी भरा जा रहा है, उससे होने वाले नुकसान की ओर किसी का ध्यान नहीं है।

हालांकि इसको लेकर किसानों की राय अलग है। उनका कहना है कि बारिश के मौसम में भूजल रिचार्ज हो जाता है इसलिये भूजल स्तर के घटने का सवाल ही नहीं है। वहीं, कुछ किसानों का यह तक मानना है कि अगर मानसून के पानी का इस्तेमाल नहीं किया गया, तो पानी बेकार चला जाएगा, इसलिये अच्छा है कि बोरवेल से पानी निकाल कर तालाबों में भरकर रखा जाये।

बहरहाल, हिवरगाँव तो महज एक बानगी है, महाराष्ट्र के कई गाँवों में फॉर्म पांड के जरिए भूजल का बेजा दोहन किया जा रहा है और इससे उभरने वाली समस्याएँ भी अब दिखने लगी हैं। पश्चिम महाराष्ट्र के लोग इन समस्याओं से दो-चार होने लगे हैं। इसको लेकर डब्ल्यूओटीआर के सीनियर रिसर्चर ईश्वर काले ने रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी। रिपोर्ट में उन्होंने फॉर्म पांड के निर्माण के तरीके पर चिन्ता जाहिर करते हुए कई तरह के सुझाव दिये हैं। उनके मुताबिक, फॉर्म पांड की संख्या को तय किया जाये व यह भी सुनिश्चित किया जाये कि सूखाग्रस्त क्षेत्र में पेयजल की उपलब्धता बनी रहे। इसके साथ ही वह यह भी कहते हैं कि तालाब में प्लास्टिक की सतह की जगह सीमेंट व मिट्टी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि प्लास्टिक पर्यावरण को प्रदूषित करता है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव भी दिया है कि इन तालाबों को भरने के लिये भूजल का दोहन कतई नहीं किया जाना चाहिए। प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान होने के सम्बन्ध में प्रख्यात पर्यावरणविद मोहित रे कहते हैं, ‘प्लास्टिक से वैसे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता है। पर्यावरण को नुकसान तब होता है जब उसे गलत तरीके से डिस्पोज किया जाता है।’

उन्होंने कहा, ‘अगर तालाब में इस्तेमाल प्लास्टिक और इस्तेमाल करने लायक नहीं रह जाता है, तो उन्हें इधर-उधर फेंकने की जगह उन्हें वैज्ञानिक तरीके से रिसाइकिल करना होगा अन्यथा इससे पर्यावरण को नुकसान होगा। फार्म पांड के साथ ही सरकार को प्लास्टिंग की रिसाइकिलिंग के लिये भी दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए।’ वहीं, प्लास्टिक के विकल्प के रूप में वे मिट्टी के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक की जगह सतह में वैसी मिट्टी डाली जा सकती है जो पानी को ग्राउंड में जाने से रोकती हो। इससे प्लास्टिक के इस्तेमाल का झंझट खत्म जाएगा व तालाब का इस्तेमाल सिंचाई के साथ-साथ मत्स्य पालन के लिये भी किया जा सकेगा।

केवल किसान नहीं जिम्मेदार


भूजल के दोहन के लिये सिर्फ-और-सिर्फ किसानों को जिम्मेवार नहीं ठहराया जाना चाहिए। असल में किसान लगातार मानसून की बेवफाई, सिंचाई योजनाओं की विफलता, खेती से जुड़ी तकनीकों के अभाव व उद्योगों के लिये पानी की उपलब्धता लेकिन खेतों के लिये पानी की किल्लत व अन्य समस्याएँ झेलते रहे हैं। ऐसे में फॉर्म पांड ही उनके पास एकमात्र विकल्प है जिसके जरिए वे अपने खेतों के लिये सिंचाई सुनिश्चित कर सकते हैं। फॉर्म पांड उनके लिये इतना फायदेमन्द है कि जिन किसानों को सरकार की तरफ सब्सिडी नहीं मिल रही है वे लोन लेकर फॉर्म पांड तैयार कर रहे हैं।

चुनांचे कहा जा सकता है कि सरकार की फॉर्म पांड योजना सफल रही है। बताया जा रहा है कि मनरेगा व राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत वर्ष 2009 से 2012 तक महाराष्ट्र में कुल 90010 तालाब तैयार किये गए।

फॉर्म पांड तैयार करने के लिये सरकार की तरफ से कई तरह की सब्सिडी दी जाती है। आँकड़े बताते हैं कि एनएचएम, आरकेवीवाई व जलयुक्त शिविर के तहत वर्ष 2014-2016 के बीच 13948 तालाब खोदे गए। वहीं नरेगा के तहत 2016-2017 में 24652 तालाब निर्माणाधीन थे जिनमें से 3412 तालाब बनकर तैयार हो गए हैं। इनमें वे तालाब शामिल नहीं है जिनका निर्माण नेशनल फुड सिक्योरिटी मिशन, इंट्रीग्रेटेड डेवलपमेंट पल्स व अन्य योजनाओं के तहत हुआ है। इसमें वे तालाब भी शामिल नहीं किये गए हैं जिनका निर्माण किसानों ने अपने पैसे से कराया है।

फॉर्मिंग पांड की बढ़ रही माँग


वर्ष 2014 में शुरू किये गए महाराष्ट्र सरकार के फ्लैगशिप प्रोजेक्ट जलयुक्त शिवर के बारे में कहा गया था कि इसका उद्देश्य बारिश के पानी का संग्रह करना और भूजल स्तर को बढ़ाना है, लेकिन इस प्रोजेक्ट का कामकाज सन्देह के घेरे में रहा। प्रोजेक्ट में अवैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई। इसमें पारदर्शिता का भी घोर अभाव था व आम लोगों की भागीदारी भी नहीं के बराबर थी, जिस कारण इसकी चौतरफा आलोचना हुई। मामला कोर्ट तक पहुँच गया था और कोर्ट ने पिछले साल दिसम्बर में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एक कमेटी का गठन करे जिसमें विशेषज्ञों को शामिल कर जल संरक्षण करने व पानी का वितरण व्यवस्थित व वैज्ञानिक तरीके से करे।केन्द्र सरकार के साथ ही महाराष्ट्र की सरकार ने भी तालाब योजना शुरू की है। वर्ष 2016 में फडनवीस सरकार ने फॉर्मिंग पांड ऑन डिमांड योजना का आगाज किया था, लेकिन फंड की किल्लत की वजह से कुछेक गाँवों में ही इस योजना को शुरू किया जा सका। इस योजना के लिये ऐसे गाँवों का चयन किया गया, जहाँ वर्ष 2010-2015 के बीच 50 प्रतिशत फसलें सिंचाई के अभाव में बर्बाद हो गईं। इसके तहत नरेगा की ओर फंड दिये गए और धीरे-धीरे योजना को पूरे राज्य में लागू किया गया।

महाराष्ट्र सरकार के अफसरों की मानें, तो उक्त योजना के लिये 163,302 आवेदन जमा किये गए थे जिनमें से सबसे अधिक आवेदन पश्चिमी महाराष्ट्र के अहमदनगर, नासिक, सोलापुर व इसके बाद औरंगाबाद, जालना और सांगली से आये। महाराष्ट्र सरकार ने वर्ष 2016-2017 में 1,11,111 तालाब बनाने का लक्ष्य रखा। इसके लिये 2 हजार करोड़ रुपए आवंटित किये गए। संप्रति इस योजना के तहत किसानों को तालाब के लिये 50 हजार से लेकर 2.21 लाख रुपए तक की सब्सिडी दी जा रही है।

सरकार को भूजल के दोहन की फिक्र नहीं


महाराष्ट्र सरकार यह कहकर अपनी पीठ थपथपा रही है कि उसने किसानों को सूखे का एक अच्छा विकल्प उपलब्ध करवा दिया है, लेकिन इसकी वजह से भूजल के दोहन की ओर सरकार का ध्यान नहीं है। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पांड्स (सैंड्रप) व वाटरशेड ऑर्गनाइजेशन ट्रस्ट (डब्ल्यूओटीआर) समेत कई संस्थाएँ कई सालों से भूजल के दोहन के सम्भावित खतरे की ओर ध्यान दिला रही हैं लेकिन सरकार के कानों पर जू तक नहीं रेंग रहे।

सैंड्रप ने तो एनएचएम के डाइरेक्टर को वर्ष 2014 में ही पत्र लिखकर चिन्ता व्यक्त की थी, लेकिन उस तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। सोचने वाली बात यह है कि भूजल की मॉनीटरिंग करने वाली एजेंसियों को भी इसकी चिन्ता नहीं है। उसकी रिपोर्ट में फॉर्म पांड से होने वाले नुकसान का कोई जिक्र नहीं है। सैंड्रप के को-ऑर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर कहते हैं, ‘फॉर्म पांड की डिजाइन ऐसी होनी चाहिए कि बारिश के पानी को उसमें संग्रहित किया जाये। ऐसा न कर ग्राउंड से पानी निकालकर उससे तालाब को भरना सरासर गलत है।’ उन्होंने कहा कि हमने एनएचएम को चिट्ठी लिखकर अपनी चिन्ता जाहिर की थी लेकिन अब तक उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ठक्कर के मुताबिक सरकार को साफ और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर बताना चाहिए फॉर्म पांड है क्या और उसका आकार कितना होना चाहिए।

हालांकि कुछ अधिकारी सम्भावित खतरे से अवगत हैं लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं है। संगमनेर के सब-डिविजनल ऑफिसर कहते हैं, ‘फॉर्म पांड को लेकर जो चिन्ता व्यक्त की गई है, उससे हम अवगत हैं लेकिन एक बार तालाब बन जाता है, तो हम कैसे किसानों से यह कह दें कि तालाब में भूगर्भ का पानी नहीं रखें? इस तरह का नियमन सम्भव ही नहीं है।’ एनएचएम के प्रोजेक्ट मैनेजर ने कहा कि किसानों से कहा जा रहा है कि भूजल का उतना ही इस्तेमाल किया जाय, जिससे नुकसान न हो साथ ही हम तालाब के पानी के वाष्पीकरण को रोकने की कोशिश भी कर रहे हैं।

भूगर्भ जल के रिचार्ज पर ध्यान नहीं


महाराष्ट्र में फॉर्म पांड योजना को परवाज तो मिल गया लेकिन सरकार की तरफ से भूजल को रिचार्ज करने के लिये कोई कदम नहीं उठाया गया, ताकि भूजल का स्तर बना रहे।

वर्ष 2014 में शुरू किये गए महाराष्ट्र सरकार के फ्लैगशिप प्रोजेक्ट जलयुक्त शिवर के बारे में कहा गया था कि इसका उद्देश्य बारिश के पानी का संग्रह करना और भूजल स्तर को बढ़ाना है, लेकिन इस प्रोजेक्ट का कामकाज सन्देह के घेरे में रहा। प्रोजेक्ट में अवैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई। इसमें पारदर्शिता का भी घोर अभाव था व आम लोगों की भागीदारी भी नहीं के बराबर थी, जिस कारण इसकी चौतरफा आलोचना हुई। मामला कोर्ट तक पहुँच गया था और कोर्ट ने पिछले साल दिसम्बर में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एक कमेटी का गठन करे जिसमें विशेषज्ञों को शामिल कर जल संरक्षण करने व पानी का वितरण व्यवस्थित व वैज्ञानिक तरीके से करे।

वाटर कंजर्वेशन एडवाइजरी काउंसिल के पूर्व सदस्य व जल संरक्षक विजय अन्ना बोराडे बताते हैं, ‘जलयुक्त शिवर का काम इतने अवैज्ञानिक तरीके से होता है कि ग्राउंड वाटर का रिचार्ज सम्भव नहीं है। भूजल का रिचार्ज मिट्टी पर निर्भर है। अगर मिट्टी को संरक्षित किया जाता है तभी भूजल रिचार्ज होगा। जलयुक्त शिवर में बालू, मिट्टी को स्क्रैप किया जाता है जबकि ये तत्व ही पानी को स्टोर करने का काम करते हैं व उसे भूगर्भ तक पहुँचाने में मदद करते हैं। ऐसे में भूजल रिचार्ज कैसे होगा? असल में ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करने के लिये वाटरशेड डेवलप किया जाना चाहिए, लेकिन इस योजना में ऐसा नहीं होता है। महाराष्ट्र में वाटरशेड डेवलपमेंट का काम रुका हुआ है।’

फॉर्म पांड से भी हो सकता है भूजल रिचार्ज


ऐसा नहीं है कि फॉर्म पांड से भूजल रिचार्ज नहीं हो सकता है लेकिन इसके लिये सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। विशेषज्ञ बताते हैं कि प्लास्टिक लाइनिंग (तालाब की सतह पर प्लास्टिक डालना) के बिना अगर तालाब तैयार किये जाएँ तो इससे भूजल भी रिचार्ज हो जाएगा। लेकिन, फिलहाल महाराष्ट्र में ऐसा कोई तालाब नहीं है जिसमें प्लास्टिक लाइनिंग न हो।

सरकार को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए व उसे फॉर्म पांड पर ही फोकस न करते हुए भूजल स्तर को बनाए रखने के लिये भी प्रयास करना चाहिए। सबसे जरूरी है कि इसमें आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाय, ताकि उनमें जल संरक्षण का दायित्वबोध आये।

आने वाले समय में सरकार फॉर्म पांड को और अधिक बढ़ावा देगी, तो इस बात का खयाल रखना होगा कि प्लास्टिक की सतह वाले तालाब की जगह ऐसे तालाब को तरजीह दे जिससे सिंचाई तो सुनिश्चित हो ही, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि भूजल भी रिचार्ज हो जाये।

(इनपुट्स 2 मार्च 2017 को सैंड्रप में प्रकाशित अमृता प्रधान के लेख से लिये गए हैं)

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