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त्योहार एवं लोकोक्तियाँ

Source: 
ग्राविस, जोधपुर, 2006

बरसात और पानी का आना राजस्थानी लोक जीवन में मंगल, उत्सव और खुशियों का अवसर है। बादलों को लेकर जितने लोकगीत राजस्थान में हैं उतने शायद कहीं न होंगे। यहाँ उस गंडेरी के ऊपर भी गाने है, जिसे सिर पर रखकर औरतें उसके ऊपर घड़ा लेकर चलती है। अधिकांश तालाबों के पास मन्दिर है। अनेक अवसरों पर जलते दीप पानी में तैरा दिये जाते हैं। पानी हर आदमी के जीवन को खुशियों और प्रकाश से भर देता है। जल संचय, वितरण और उपयोग, सभी काम स्थानीय समुदाय द्वारा साझे तौर पर किये जाते थे। राजस्थान की शुष्क जलवायु, रेतीली भूमि और जल की दुर्लभता ने यहाँ के जनजीवन को कठिन बना दिया है। राजस्थान के लोग जीविका के लिये भीषण गर्मी, धूलमरी आँधियों को झेलते हुए दिन भर परिश्रम करते हैं। महिलाएँ सिर पर घड़ा रखकर पानी लेने मीलों दूर पैदल जाती हैं। तपती धूप में हल चलाना, बीज बोना, सिंचाई करना, पानी का इन्तजाम करना आदि अत्यन्त दुष्कर होता, यदि इन लोगों के जीवन में गीत-संगीत और त्योहार नहीं होते। कठोरतम परिस्थितियों को भी ये लोग अपने तीज-त्योहारों, लोकगीतों और लोकोक्तियों की मदद से सरल बना देते हैं। दुर्भिक्ष परिस्थितियों वाले जीवन में रंग भरना यहाँ के पूर्वजों की देन है। सरस और रंगीन जीवन राजस्थान की विशेष पहचान है।

कृषि से जुड़े त्योहार, वर्षा से जुड़ी लोकोक्तियाँ, सावन के ऊपर रचे लोकगीत, पानी के महत्त्व और संरक्षण से जुड़ी आस्थाएँ राजस्थान की संस्कृति से समृद्ध ग्रामीण जीवन को दर्शाती हैं। ग्रामीण स्त्रियों का रंग-बिरंगा पहनावा और आभूषण उनके जीवन के प्रति हर्ष उल्लास को प्रदर्शित करते हैं। लोक मान्यताएँ और आस्थाएँ जन-जीवन को प्रकृति और पर्यावरण से जोड़ती हैं और लोग इनके संरक्षण को जीवन में सहजता से उतार लेते हैं। ये त्योहार एवं आस्थाएँ दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।

राजस्थान में पानी के महत्त्व से जुड़ी अनगिनत लोक कथाएँ हैं और ये इसके उपयोग के प्रति आस्था को बताते हैं। बरसात और पानी का आना राजस्थानी लोक जीवन में मंगल, उत्सव और खुशियों का अवसर है। बादलों को लेकर जितने लोकगीत राजस्थान में हैं उतने शायद कहीं न होंगे। यहाँ उस गंडेरी के ऊपर भी गाने है, जिसे सिर पर रखकर औरतें उसके ऊपर घड़ा लेकर चलती है। अधिकांश तालाबों के पास मन्दिर है। अनेक अवसरों पर जलते दीप पानी में तैरा दिये जाते हैं। पानी हर आदमी के जीवन को खुशियों और प्रकाश से भर देता है। जल संचय, वितरण और उपयोग, सभी काम स्थानीय समुदाय द्वारा साझे तौर पर किये जाते थे। मानसून से पहले सारा गाँव मिलकर तालाब के आगोर या पायतान को पूरी तरह साफ कर देता था। इसी तरह तालाबों से मिट्टी निकालने में पूरा गाँव श्रमदान किया करता था।

एक राजस्थानी कहावत है कि –

घीयड़ो ढूले तो म्हारो काई नहीं जासी।
पानीड़ो ढूले तो म्हारो जी बल जासी।।


अर्थात घी बिखर जाये तो मेरा कुछ नहीं जाएगा पर यदि पानी बिखरे तो मेरा मन जल जाता है।

त्योहार


1. आखा-तीज (अक्षय तृतीया)


यह त्योहार बैसाख महीने की बैसाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। जब खरीफ की फसल की शुरुआत होने की सम्भावना होती है तब पहली बार आखा-तीज के दिन खेत में जाते हैं और खेत में जाकर शुभ शगुन पाते हैं। ये शगुन कई प्रकार के होते हैं, जैसे- रास्ते में किसी भी औरत के हाथ में हरी घास लिये हुए मिलना, खेत के अन्दर पेड़-पौधों जैसे खेजड़ी के वृक्ष पर नीमझर (अंकुर) का निकलना आदि शुभ संकेत माने जाते हैं।

किसान खेत में पशु-पक्षी को चुग्गा खाते देखना, चहचहाना, मोर की सुरीली आवाज और चीटियों को रेत में चलते देखना जैसे शुभ संकेत पाता है। औरतें घर में बाजरे की खिचड़ी बनाकर घर में चढ़ावा लगाती हैं फिर उस दिन सारा परिवार खिचड़ी का भोजन करता है। ये त्योहार सिर्फ राजस्थान में ही मनाया जाता है।

2. गोवर्धन पूजा


गोवर्धन पूजा कार्तिक मास की शुक्ल एकम को मनाया जाता है।

दीपावली के दूसरे दिन सुबह जल्दी ही 4.00 बजे गोवर्धन पूजा की जाती है। इस प्रक्रिया में औरतें गोबर, बेर, सीटे, मतीरा, काकड़िया, अनाज, बाजरा एवं घी का दीपक जलाकर इसका पूजन करती हैं।

ये त्योहार खेतों में फसल पकने के आरम्भ में मनाया जाता है, जिससे ये मालूम होता है कि अब खरीफ की फसल पकने वाली है।

गोवर्धन पूजन के चढ़ावे में लगाए गोबर के कंडे का उपयोग सूखने के कुछ दिनों बाद घर में करते हैं। घर में किसी भी प्रकार की मिठाई बनाते समय आँच के साथ कंडे को लगा देते हैं, तो ऐसा मानना है कि वो मिठाई कई दिनों तक खत्म नहीं होती और बरकत ज्यादा होती है।

3. महालक्ष्मी पूजन (दीपावली)


दीपावली खुशहाली और सम्पन्नता का पर्व है। यह एक ग्रामीण पर्व है, जिसमें दीपावली पर मतीरे से महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है। किसान इस दिन पूजा के लिये खास दीपक बनाते हैं जिसे हिण्डोला कहते हैं।

पूजा के लिये एक बड़ा मतीरा लेते हैं और मतीरे के ऊपरी भाग में छेद करके इसका गूदा एवं बीज निकाल देते हैं। एक मिट्टी के दीये में तेल और रुई लगाकर जलाकर इसके अन्दर रख देते हैं। फिर इसे लेकर आस-पड़ोस, पशुओं के बाड़े और खेतों में लेकर जाते हैं और लोकगीत गाते हैं -

दीवाली रा दीया मीठा
काचर, बोर, मतीरा मीठा


(इसका अर्थ है कि जब दीवाली का दीया जलाते हैं तो काचर, बोर और मतीरा मीठा आता है।)

इसके बाद इस हिण्डोले को सम्भाल कर रख लेते हैं। पशु यदि खुरड नामक बीमारी से ग्रस्त हो जाएँ तो इसी सूखे मतीरे के टुकड़े पशु को खिलाये जाते है।

इस मतीरे को आने वाले त्योहार होली तक सुरक्षित रखा जाता है। होलिका दहन के समय होलिका की झलक में से इसे हिंडाले देकर निकालते हैं फिर धुलण्डी के दिन सांयकाल में इसका पूजन करे इसके बीजों को अपने खेत में चींटियों के बिल के ऊपर डाल देते हैं जिससे चींटियाँ उन्हें खाने के रूप में ग्रहण कर सकें।

4. होली


होली का त्योहार मार्च के महीने में आता है। इस त्योहार के दो अर्थ हैं। पहला यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के लिये मनाया जाता है। दूसरा यह त्योहार किसानों के लिये खुशी लेकर आता है, इस समय रबी की फसल पककर तैयार होती है। नई फसल के आगमन की खुशी मनाते हैं और अगली फसल खरीफ की तैयारी आरम्भ करते हैं।

होली के दिन पुरानी सूखी लकड़ियों व घास-फूस को इकट्ठा कर होलिका बनाई जाती है। सायंकाल सभी लोग होलिका के चारों ओर एकत्र होकर इसका सूखे गोबर की माला से पूजन करते हैं। होलिका दहन के समय सभी ग्रामीण इसकी परिक्रमा करते हैं एवं होली के गीत गाते हैं। होलिका दहन की लौ की दिशा के आधार पर अगली फसल का अनुमान लगाया जाता है। मान्यता है कि यदि होलिका की लपटें सीधी एवं ऊँची जाएँगी तो फसल अच्छी होगी तथा जिस दिशा में लौ झुकेगी उस दिशा वाले क्षेत्र में फसल अच्छी होगी।

होलिका की अग्नि में गेहूँ की बालियों और कच्चे चने को भून कर प्रसाद की तरह ग्रहण करते हैं।

5. जवारी


जवारी एक शगुन है। यह नवरात्रि के त्योहार में अक्टूबर महीने में किया जाता है। गेहूँ या जौ की फसल के बीज बोने से पहले अमावस्या, दूज या तीज के दिन जवारी का शगुन करते हैं। जवारी का शगुन मार्च महीने में गणगौर के त्योहार में भी करते हैं।

एक उथले मिट्टी के बर्तन में मिट्टी भर कर उसमें गेहूँ या जौ के बीज मुट्ठी भर बो दिये जाते हैं और पानी देते रहते हैं। इस बर्तन को घर में पानी के घड़ों के पास या कुएँ के पास रखते हैं। बीजों का अंकुरण इंगित करता है कि आने वाली फसल कैसी होगी।

जवारी का दूसरा पहलू भी है। बीज नमी या कीड़ों से खराब तो नहीं हो गए, यह जाँचा जाता है। जवारी पुराने बीजों से की जाती है, नए बीजों से नहीं। इससे बीजों के अंकुरण का भी पुनर्अनुमान हो जाता है। जवारी की प्रथा के नाम पर किसान में बीजों के संग्रहण की भी आदत बन जाती है ताकि अगली फसल के लिये बीज खरीदने ना पड़े।

शगुन - हमारे ग्रामीण समाज में शगुन–अपशगुन का बड़ा महत्त्व है। हालांकि शगुन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, लेकिन फिर भी ग्रामीण जीवन में ये शगुन बहुत मान्यता के साथ अपनाए जाते हैं। शायद ये बुजुर्गों के पर्यावरणीय निरीक्षण और ज्ञान की देन है, जिनके द्वारा वे मौसम या फसल सम्बन्धी पूर्वानुमान लगाते हैं। राजस्थान की ग्राम संस्कृति में प्रचलित कुछ शगुन निम्न प्रकार के हैं।

इन विशेष दिनों मे शगुन देखे जाते हैं-

1. आखा तीज के दिन
2. वैशाख की अमावस्या पर
3. वैशाख की दूज पर
4. आषाढ़ की दूज पर
5. आषाढ़ की नवमीं पर
6. पहली वर्षा पर
7. पहली बार हल चलाने पर
8. सगुन चिड़ी जिसके ऊपर सफेद काली धारियाँ होती हैं, को देखकर शगुन का अनुमान लगाया जाता है। यदि शगुन चिड़ी हरे पेड़ पर बैठकर चहचहा रही है तो यह समृद्धि का संकेत है, लेकिन यदि यह उड़ते हुए जोर-जोर से चहचहा रही है तो यह अशुभ संकेत है।
9. तीतर भी शगुन का संकेतक है। हरियाली में या सूर्योदय के समय तीतर की मीठी आवाज सुनाई देना शुभ संकेत माना जाता है।
10. खर डावा, विषा जीवणा अर्थात खेत में जाते समय गधा बाईं ओर और साँप दाईं ओर दिखे तो यह शगुन है। गधा सामने ढेंचू-ढेंचू कर रहा है तो यह बुरा संकेत है, परन्तु यदि गधा पीछे से आवाज कर रहा है तो अच्छा संकेत है।
11. बैल भी शगुन के संकेतक माने जाते हैं। खेत में बैल पेशाब करके आगे की तरफ बढ़ते है तो यह शुभ शगुन है। खेत में प्रवेश करते ही बैल का आगे चलना शुभ है तो पीछे चलना अशुभ माना जाता है।
12. वैशाख की अमावस्या पर सुबह के समय बैल उत्तर दिशा की ओर चारा खाते हुए अपने अगले पैर सामने की तरफ सीधा फैलाकर बैठे हुए दिखना अच्छा शगुन है।
13. आखा तीज के दिन प्रातः काल बैल और गाय का रम्भाना महाकाल का संकेत है।
14. हिरण की बाईं से दाईं तरफ चलना शुभ है और दाईं से बाईं ओर चलना अशुभ है।
15. खेत पर जाने के दिन अगर कौआ आँगन में आकर दिन में काँव-काँव करता है तो यह शुभ संकेत है। कौआ अगर रात में काँव-काँव करता है तो यह महाकाल का लक्षण है।
16. कौआ खेत में रोटी का टुकड़ा गिरा दे तो यह अच्छा शगुन है और यदि कौआ खेत से रोटी का टुकड़ा ले उड़े तो यह बुरा शगुन है।
17. चींटी से भी शगुन का अनुमान लगाते हैं। आखातीज के दिन लोग लाटा बनाते हैं और उस पर अनाज बिखेर देते हैं। अगर चींटी लाटा पर से अनाज उठाकर ले जाती है तो यह शुभ माना जाता है।
18. खेत पर जाते समय पानी से भरा घड़ा लाते हुए विवाहित महिला का दिखना अच्छा शगुन होता है। परन्तु खाली घड़ा होने पर बुरा शगुन होता है।

सुबह उठने पर किसान को आसमान में बादल का एक टुकड़ा दिखाई दे तो यह अच्छी वर्षा का संकेत है। इन शगुनों पर अधिक गहराई से अध्ययन किया जाये तो इनके पीछे जुड़ी बाते शायद सिद्ध हो सकती हैं, परन्तु अभी इनका कोई ठोस आधार नहीं है।

इसी प्रकार वर्षा का अनुमान लगाने के लिये भी कई संकेत हैं, जैसेः-

1. चिड़िया रेत में नहाए।
2. चीटियाँ जमीन से अंडा लेकर चलती है।
3. मोर की सुरीली आवाज आना।
4. विषैले जानवर पेड़ों पर चढ़ने लगे।
5. बकरी, गाय हवा की दिशा में बढ़े।

लोकोक्तियाँ


विभिन्न परिस्थितियों पर विभिन्न प्रकार की लोकोक्तियाँ हैं जो ग्रामीणों के मुख से अक्सर सुनाई देती है।

वर्षा पर –


1. शुक्रवार की रही बादली, रही शनिचर छाए।
घाघ कहे सुन घाघिनी, बिन बरसे नहीं जाए।।

(शुक्रवार को छाये बादल शनिवार तक छाये रहे तो बारिश अवश्य होगी।)

2. आई परवायी बाइ अराड़ा महकठै सुलाई।
काई करा सूरा भाई दूनिया मरे तिसाई।।

(श्रावण मास में उत्तरी दिशा में चलने वाली हवा, भादों में पूर्व दिशा से चलने वाली हवा हो तो बहुत मूसलाधार वर्षा होगी।)

3. काला बादल जी डरपाते।
भूरा बादल पानी लावे।।


(काले बादल डराते हैं, भूरे बादल बारिश लाते हैं।)

4. तीतर वरणी चीतरी, काजल विधवा रेख।
वा बरसे वा घर करसे, इनमें मीन ना मेख।।


(विधवा शृंगार करे और तीतर के पंखों के रंग के समान बादल हो, तो बारिश होगी।)

5. रोहण तपे मृग बाजे।
आदर अणचितया गाजें।।


(14 दिन गर्मी व 14 दिन आँधी चले तो आदर मे निश्चित ही बारिश होगी।)

6. आदर आजे बाजे, झोपा झोलो खाए।

(जेठ आषाढ़ के बीच 14 दिन के पक्ष को आदर कहते हैं, इस माह में हवा चले तो केवल झोपें ही हिलते हैं।)

खेती पर –


1. उत्तम खेती, मध्यम बान।
निषिद्ध चाकरी, भीख निदान।।


(खेती उत्तम पेशा है, व्यवसाय मध्यम, नौकरी और भीख माँगना निकृष्ट काम है।)

2. जाके खेत पड़ा नहीं गोबर।
उस किसान को जानो दूबर।।


(जिस किसान के खेत में गोबर नहीं डाला गया, वह कमजोर है।)

3. श्रावण सुरंगी खेजड़ी, काति दिरंगा खेत।
श्रावण बिरंगी खेजड़ी, काति सुरंगा खेत।।


(यदि सावन में खेजड़ी बहुत हरी है तो अगली फसल कार्तिक में अच्छी नहीं होगी।)

4. आषाढ़ सूनम, घण बादल घम बीज।
बचद राखो कालोड़ियो, ओंदे राखो बीज।।


5. आषाढ़ सूनम, न धण बादल न धण बीज।
हल बांगो ईधन करो, अबा चाबों बीज।।


(आषाढ़ की शुक्ल नवमी में बिजली चमके तथा बारिश हो तो बैल और बीजों को तैयार रखें, नहीं तो हल को तोड़के ईंधन बनाएँ।)

तिल तालरिया, मूंग मगरिये, डेरियों झूकी ज्वार।
धोरों में निपजे बाजरी दूवो कहे विचार।।


(तालर में तिल, मगरे में मूंग, डेरिया में ज्वार और धौरों (रेतीले टीलों) में बाजरी अच्छी होती है।)

पशुओं पर


1. नाटा छोटा बेचकर, चार धुरंधर तोओ।
आपण काम निकालकर औरण मंगनी देऊँ।।


(छोटे मोटे पशुओं को बेचकर अच्छे पशु रखना चाहिए ऐसा करने से आप अपने काम के साथ दूसरों की भी मदद कर सकेंगे।)

2. छोटा मुँह, ऐंठा कान, यही अच्छे बैल की है पहचान।
नीला कंधा, बेगन खुरा, कभरी ना निकले कंठा बूरा।
जिस बैल की है लम्बी पूंछे, उसे खरीद लो बिना पूछे।।


(अच्छे बैल के बारे में कहा गया है कि जिस बैल का छोटा मुँह, ऐंठा हुआ कान, नीला कंधा, बैंगन के रंग का खुर और लम्बी पूंछ हो उसे बिना किसी से पूछे खरीद लेना चाहिए। ये बैल अच्छे होते हैं।)

3. नाहरिया नागौरी बड़िया, झाँकी जैसलमेरिया।
पुंगल वाली गाय देखों, घोड़ा बाड़मेरिया।।


(बैल नागौर का ऊँट जैसलमेर का, गाय बीकानेर की और घोड़ा बाड़मेर का बढ़िया होता है।)

अकाल पर


1. पग पुंगल, धड़ कोटवा, बाहा बाड़मेर।
आवत जावत जोधपुर, ढ़ावा जैसलमेर।।


(अकाल की शुरुआत बीकानेर की पुंगल तहसील से होती है। इसका धड़ है वह काटेवा में बाँह बाड़मेर में, आना-जाना जोधपुर में और रहवास जैसलमेर में है।)

2. सत संवत इकट्ठा कीजे, तीन मिलाए तिगुना कर दीजे, भाग उसमें सात का दीजे।

(शून्य बचे तो महाकाल, एक बचे तो सुकाल, दो बचे तो आधोकाल, तीन बचे तो वर्षा राजे।)

3. चार बचे तो पवन बाजे, पाँच बचे तो अन्न घनेरा साजे, छः बचे तो आधोकाल।

(सतसंवत वर्ष के अंक में तीन मिलाकर तीन से गुणा कर दो फिर उसका सात से भाग करो। अगर शून्य बचे तो उस वर्ष महाकाल होगा, एक बचे तो सुकाल, दो बचे तो आधाकाल, तीन बचे तो अच्छी वर्षा, चार बचे तो केवल हवाएँ चलेगी, पाँच बचे तो अन्न खूब होगा और छः बचे तो आधाकाल होगा।)

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