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जल व वन संरक्षण की कहानी अधूरी, मगर ठिकाने लगता करोड़ों का बजट


उत्तराखण्ड का जंगलउत्तराखण्ड का जंगलउत्तराखण्ड हिमालय को ‘वन सम्पदा’ के लिये समृद्ध राज्य कहते हैं। होगा भी क्यों नहीं, यहाँ से गंगा और यमुना, काली और गोरी जैसी सदानीरा नदियों का उद्गम स्थल जो है। इन्हें तरोताजा करने के लिये यहाँ की ‘वन सम्पदा’ ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जी हाँ! जहाँ वन है वहीं प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता भी होती है।

हालांकि इस ‘वन सम्पदा’ को संरक्षित रखने में एक तरफ उत्तराखण्ड के लोग कहते हैं कि इसका संरक्षण उन्होंने किया है दूसरी तरफ राज्य का ‘वन विभाग’ कहता है कि वह तो साल भर में दो बार राज्य भर में वृहद वृक्षारोपण करता है। इसमें कौन सही कौन गलत है इसकी पड़ताल तो जमीनी स्तर पर जाकर ही की जा सकती है। अलबत्ता वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि जंगल के बिना पानी का संरक्षण करना इस पहाड़ में मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

ज्ञात हो कि बीते बरसात के मौसम में राज्य में हरेला कार्यक्रम, कैम्पा योजना, मेरा पेड़ मेरा धन व नियमित वृक्षारोपण कार्यक्रम के तहत अकेले गढ़वाल मण्डल के छः वृत्तों में 655 स्थानों में हरेला कार्यक्रम मनाया गया, इस तरह 23 जुलाई से पहले तक लगभग 10 हजार 34 पौधे रोपे गए। इस तरह एक अनुमान के तहत यदि सम्पूर्ण राज्य में बरसात के मौसम में हुए वृक्षारोपण के आँकड़ों पर गौर करें तो लगभग पाँच लाख पौधों का रोपण हुआ है।

अर्थात कह सकते हैं कि एक ही दिन में एक ही सरकारी कार्यक्रम के दौरान वन विभाग ने इतनी बड़ी उपलब्धता हासिल की है। इसके अलावा यदि शिक्षण संस्थाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं, महिला समूहों, अन्य सरकारी विभागों, आन्दोलनकारी संगठनों के वृक्षारोपण के आँकड़ों को जोड़ दिये जाएँ तो राज्य में वृक्षारोपण का यह आँकड़ा 50 लाख को पार कर जाएगा और वर्षफल में बदल देंगे तो प्रति वर्ष राज्य में लगभग एक करोड़ पौधे रोपे जाते हैं। फिर भी राज्य के ऊँचाई वाले स्थानों पर रह रहे लोग गर्मियों के मौसम में पानी की समस्या का सामना करने के लिये तैयार रहते हैं।

जंगलों की उपेक्षा के कारण लगते आगकई गाँव ऐसे भी हैं जो गर्मियों के दिनो में गाँव से पलायन कर लेते हैं। ताज्जुब हो कि गाँव में पाइप लाइन नहीं हो, गाँव के पास में कोई प्राकृतिक जलस्रोत नहीं हो, ऐसा भी नही है। मगर राज्य में प्रतिवर्ष प्राकृतिक जलस्रोतों का सूखना तीव्र गति से बढ़ रहा है और जल संरक्षण के लिये रोपे गए पौधों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।

अब सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर इतने पौधों की क्षमता कहाँ गायब हो गई? क्या ये रोपित पौधे कागजी खानापूर्ती कर रहे हैं? तमाम सवाल आज राज्य वासियों के लिये कौतुहल का विषय बने हुए हैं। कुल मिलाकर जल, जंगल जमीन के संरक्षण बाबत जो भी योजनाएँ संचालित हो रही हैं वे सभी लोक सहभागिता के बिना क्रियान्वित हो रही हैं। इसलिये लोगों को लगता है कि यह सरकार की योजना है।

गौरतलब हो कि ‘फायर सीजन’ के दौरान उत्तराखण्ड हिमालय के जंगलों में अन्धाधुन्ध ‘आग’ की खबरें आती हैं। जिस वनाग्नि में प्रतिवर्ष लगभग 3000 हेक्टेयर से लेकर 5000 हेक्टेयर तक का ‘वन’ स्वाहा हो जाता है। इसी ‘वनाग्नि काण्ड’ में वन विभाग के कर्मचारी और स्थानीय लोग कई बार अपनी जान गँवा चुके होते हैं। सो रही पिछले वृक्षारोपण की बात वह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ‘वृक्षारोपण’ तो वनाग्नि की भेंट चढ़ चुका है।

इस तरह पहाड़ के पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ता नजर आता है और जलस्रोतों का सूखने की यह भी एक बड़ी बिडम्बना सामने आ रही है। परन्तु आज तक एक भी रिपोर्ट सामने नहीं आई कि जितना वृक्षारोपण हुआ है वर्ष में उनमें से कितने वृक्ष सुरक्षित हैं। फिर भी वृक्षारोपण का कार्य जारी है और इन वृक्षों पर हो रहे धन के दुरुपयोग का खेल भी जारी है।

हालांकि वर्तमान में राज्य सरकार ने ‘वन संरक्षण और जल संरक्षण’ के लिये कई लोक लुभावनी योजनाएँ आरम्भ कर दी हैं। सरकार का दावा है कि जो लोग वन संरक्षण के कामों में हिस्सेदारी करेंगे उन्हें पेड़ बचाने का बोनस दिया जाएगा। यही नहीं ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत एवं महिला समूह के माध्यम से जल संरक्षण के कार्यों को प्रमुखता से करवाया जाएगा, जिसमें चाल-खाल को विशेष तौर पर रखा गया है।

पौधारोपणसरकार का कहना है कि गाँव स्तर पर जो लोग पेड़ बचाने के काम में लगें हैं उन्हें भी ‘जल संरक्षण’ के कामों के लिये प्रोत्साहन दिया जाएगा। जिसके तहत प्रत्येक जिले में आगामी वित्तीय वर्ष में 1000 तालाब बनवाने की खास योजना है।

चौड़ी व चारा पत्ती के रोपे सवा करोड़ पौधे


वन महकमा ने इस वर्ष वर्षाकाल में जंगलों में 20 फीसदी पौधे फलदार रोपे हैं और अन्य चारा पत्ती एवं चौड़ी पत्ती के कुल सवा करोड़ पौधे रोपे हैं। विभाग का कहना है कि जहाँ ये पौधे पर्यावरण सन्तुलन का काम करेंगे वहीं मानव-जंगली पशुओं के संघर्ष में रोकथाम करने में सहायक होंगे। मुख्य वन संरक्षक प्रचार-प्रसार एसपी सुबुद्धि ने कहा कि इस दौरान जंगलों में बांज, दूसरे चारा पत्ती के तथा फलदार पौधे इसलिये रोपे गए कि मानव व जंगली पशुओं में बढ़ रहे संघर्ष को काबू किया जा सके।

विभाग अब इनकी देख-रेख की योजना बना रहा है। कहा कि इस दौरान चीड़ के पौधों को इसलिये नहीं रोपा गया कि बढ़ती वनाग्नि पर काबू पाया जा सके।

वनीकरण के लिये मिले डेढ़ हजार करोड़


केन्द्र सरकार ने कैम्पा के मद में उत्तराखण्ड राज्य को वनीकरण के लिये डेढ़ हजार करोड़ रुपए स्वीकृत कर दिये हैं। इस बात की पुष्टि एक कार्यशाला के दौरान केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के विशेष सचिव व महानिदेशक डॉ. एसएस नेगी ने की।

उत्तराखण्ड का जंगलसाथ ही वन निगरानी प्रणाली को मजबूत करने के निर्देश विभाग को दिये। यह भी कहा कि इस योजना के तहत अब यह देखना होगा कि कितने वृक्ष लगे हैं और उनकी क्या स्थिति है? इसकी बार-बार निगरानी होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि क्षतिपूरक वनीकरण के लिये थर्ड पार्टी मॉनीटरिंग की भी व्यवस्था कैम्पा के मद में कर दी गई है।

ईको सिस्टम को बिगाड़ती संकर प्रजातियाँ


विदेशी आक्रान्ता वनस्पतियों ने बड़ी संख्या में देशी के साथ मिलकर संकर प्रजातियाँ पैदा कर दी हैं। ये संकर प्रजातियाँ ईको सिस्टम के लिये खतरा बन गई है, जो कि अपने पूर्वजों से कई गुना तेज है और देशी वनस्पतियों के वासस्थलों पर कब्जा कर रही है।

जहाँ-जहाँ ये प्रजातियाँ कब्जा कर रही हैं वहाँ-वहाँ का जल प्रबन्धन गड़बड़ होता जा रहा है। इससे ईको सिस्टम सर्विसेस से जुड़े कारोबार को नुकसान पहुँच रहा है। इस बात की पुष्टी वन अनुसन्धान संस्थान की एक रिपोर्ट में की गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि शाकाहारी जीवों के ना रहने से मांसाहारी जीवों की फूड चेन टूट रही है।

इन प्रजातियों का बर्ताव आक्रामक होता है। मिट्टी में चाहे जितनी पानी, पोषक तत्वों की कमी हो ये जड़ पकड़ लेती है। वन अनुसन्धान की निदेशक डॉ. सविता ने बताया कि लैंटाना, एगररैटम, कोनीजोइडीस, बिडेनस्पीलोसा, कैसिया, आक्सीडेंटेलिस, कैसिया टोरा, क्रोमोलोइनाओडोराटा, साईप्रस, रोटनडस, एक्लीप्टाप्रोस्ट्रेटा, यूपेटोरियम, ऐडीनोफोरम, यूफोरबिया हिरटा, हाईपटिश्यूएवियोलेंस आदि 111 संकर प्रजाति की आक्रान्ता वनस्पतियाँ हिमालय में सक्रीय है। इस कारण 20 फीसदी फसलें भी बर्बाद हो रही हैं।

पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन

उत्तराखण्ड का एक पहाड़ी गाँव

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