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केन्द्रीय टीम ने माना बिहार को भारी नुकसान

Author: 
अमरनाथ

बिहार में इस साल चार चरणों में बाढ़ आई। जुलाई में नेपाल में बारिश होने की वजह से गंडक में जबरदस्त बाढ़ आ गई। पानी के दबाव में गंडक बैराज का एक फाटक टेढ़ा हो गया। इस बाढ़ से नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में बाढ़ और कटाव का प्रकोप अभूतपूर्व रहा। गंडक की बाढ़ का असर पश्चिम चम्पारण और गोपालगंज जिलों में रहा। तो कोसी और महानन्दा की बाढ़ से पूर्वी बिहार के जिले डूब गए। कुल मिलाकर 14 जिलों के 78 प्रखण्डों में जुलाई महीने में बाढ़ की हालत बन गई। बाढ़ से हुए नुकसान का जायजा लेने आई केन्द्रीय टीम ने माना कि बाढ़ से इस बार बिहार में भारी नुकसान हुआ है। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव अजय रमेश सुले के नेतृत्व में आई सात सदस्यीय टीम ने भागलपुर-नौगछिया, समस्तीपुर, पटना और अरवल जिलों का दौरा करने के बाद राज्य के अधिकारियों के साथ बैठक की। स्थल निरीक्षण, आमलोगों से बातचीत के बाद अधिकारियों के साथ बैठक में वीडियो क्लिपिंग और विभिन्न विभागों की ओर से पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन हुए।

बिहार के आपदा प्रबन्धन विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने मीडिया को बताया कि टीम को उन जगहों पर ले जाया गया जहाँ बाढ़ से हुए नुकसान के चिन्ह अब तक मौजूद हैं। ध्वस्त स्कूल और सड़क, तबाह खेत और फसल, क्षतिग्रस्त घर एवं अन्य निर्माण दिखाए गए। टीम ने पहले समर्पित ज्ञापन के कतिपय बिन्दुओं पर विस्तृत जानकारी माँगी। जिसे सात दिनों के भीतर भेज देने की बात है।

उल्लेखनीय है कि बिहार की बाढ़ का जायजा लेने के लिये केन्द्रीय टीम का दौरा दो बार रद्द हो जाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केन्द्र सरकार की मंशा पर कटाक्ष करते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा था। उस पत्र का असर हुआ और सात सदस्यीय टीम दो दिवसीय दौरे पर बिहार आई। इस टीम को बाढ़ राहत के मद में बिहार सरकार की माँग के औचित्य की समीक्षा करनी है और केन्द्रीय सहायता के बारे में अपनी सिफारिश करनी है। बिहार सरकार ने 22 सितम्बर को सौंपे अपने ज्ञापन में 4112 करोड़ रुपए की सहायता माँगी है।

बिहार में इस साल चार चरणों में बाढ़ आई। जुलाई में नेपाल में बारिश होने की वजह से गंडक में जबरदस्त बाढ़ आ गई। पानी के दबाव में गंडक बैराज का एक फाटक टेढ़ा हो गया। इस बाढ़ से नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में बाढ़ और कटाव का प्रकोप अभूतपूर्व रहा। गंडक की बाढ़ का असर पश्चिम चम्पारण और गोपालगंज जिलों में रहा। तो कोसी और महानन्दा की बाढ़ से पूर्वी बिहार के जिले डूब गए।

कुल मिलाकर 14 जिलों के 78 प्रखण्डों में जुलाई महीने में बाढ़ की हालत बन गई। बाद में झारखण्ड में हुई बारिश की वजह से दक्षिण और मध्य बिहार की नदियाँ उफन गईं। इस बाढ़ का आलम यह रहा कि अन्तःसलिला नदी फल्गू में भी उफान आ गया। पुनपुन नदी तो लम्बे समय तक उफनाई रही। गंगा में जल विर्सजन नहीं होने से पटना जिले के कई प्रखण्ड पुनपुन की बाढ़ में डूब गए। मोरहर, हरोहर, किउल आदि दक्षिण बिहार की सभी नदियों में इस साल बाढ़ आई।

गंगा बिहार के बीचोंबीच से बाँटती हुई पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित है। आमतौर पर उत्तर बिहार के जिले बाढ़ प्रवण माने जाते हैं और दक्षिण के जिलों को सूखा प्रवण माना जाता है। इस बार यह विभाजन बेकार हो गया। दक्षिण के सूखा प्रवण माने जाने वाले कुछ जिलों में औसत से अधिक वर्षा हुई जबकि उत्तर के बाढ़ प्रवण जिलों में से अधिकांश में सामान्य से कम बारिश हुई। इनमें शिवहर और खगड़िया जिले अव्वल है। शिवहर में औसत से 65 प्रतिशत कम वर्षा हुई। लेकिन नेपाल से आई नदियों के माध्यम से उस जिले में भी बाढ़ आई।

सबसे मारक गंगा में आई बाढ़ रही। मध्य प्रदेश में अत्यधिक वर्षा हुई। सोन नदी पर बने बाणसागर बाँध को बचाने के लिये अचानक बहुत अधिक पानी छोड़ दिया गया। जानकारी के अनुसार एकाएक 11 लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा गया। यह पानी गंगा में आया और गंगा उफन गई। गंगा के उफन जाने का असर अभी तक देखा जा रहा है। गंगा के तटवर्ती सभी जिलों में बाढ़ आई। बाढ़ का पानी शहरी क्षेत्रों के प्रवेश कर गया।

पटना, मुंगेर, भागलपुर से लेकर बनारस तक इसका असर देखा गया। नेशनल हाईवे और रेलमार्ग पर खतरा उत्पन्न हो गया। सोन नदी पर बने बाणसागर डैम से पानी आया और पश्चिम बंगाल में बने फरक्का बैराज से पानी की निकासी नहीं हुई। इसलिये गंगा और तटवर्ती इलाकों में लम्बे समय तक पानी जमा रहा। पटना में 19 अगस्त को गंगा का प्रवाह उच्चतम स्तर से अधिक हो गया और पानी का बढ़ना जारी था। अगले दिन बक्सर से भागलपुर तक जगह-जगह गंगा खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी।

वास्तविकता यह भी है कि गंगा की जलधारण क्षमता काफी घट गई है। उसके तल में भारी मात्रा में गाद जमा है। जगह-जगह बालू के टीले उत्पन्न हो गए हैं। थोड़ा पानी बढ़ने पर भी उसका उफन जाना स्वाभाविक है। इस बार तो अत्यधिक पानी आया था। जिसका प्रकोप पटना-बनारस शहरों पर तो दिखा ही, दूसरे तट के कस्बों और गाँवों में कहीं ज्यादा मारक अवस्था रही जिसकी चर्चा भी नहीं हो पाई।

उल्लेखनीय है कि आपदा मद में राशि देने में केन्द्र सरकार आरम्भ से ही कंजूसी करती रही है। बिहार सरकार ने पिछले नौ वर्षों में आठ बार ज्ञापन भेजा। विभिन्न आपदाओं की अवस्था का जायजा लेने के लिये केन्द्रीय टीम ने स्थल निरीक्षण भी किया। लेकिन बिहार को कभी नुकसान के बराबर राशि नहीं मिल सकी।

इस बार चार चरणों में आई बाढ़ से सरकारी आँकड़ों के अनुसार बाढ़ से बिहार के 31 जिलों के 177 प्रखण्डों के 1380 पंचायतों के 4862 गाँव प्रभावित हुए। जिसकी आबादी 86 लाख 12 हजार 802 है। बाढ़ में 243 मनुष्यों की मौत के साथ ही 5384 मवेशियों की मौत हुई। मकान, झोपड़ी, कच्चा मकान, फसल आदि के अलावा सड़क व स्कूल इत्यादि को नुकसान हुआ।

राज्य सरकार ने 2008 में 14800 करोड़ की माँग की थी लेकिन मिला 1010 करोड़ रुपए। 2009 में सूखाड़ से हुई नुकसान के मद में 14000 करोड़ की माँग की तुलना में 269 करोड़ मिले। 2010 में सूखा से हुए नुकसान के मद में 6573 की तुलना में 1459 करोड़ रुपए मिले। 2013 में सूखाड़ से नुकसान के एवज में 12564 माँगी गई लेकिन कुछ नहीं मिला। 2015 में तूफान से हुए नुकसान के एवज में 434 करोड़ माँगी गई थी, उसी वर्ष ओलावृष्टि के एवज में 2040 करोड़ माँगी गई थी लेकिन कुछ नहीं मिला।

इस वर्ष बाढ़ और सूखाड़ से बिहार के किसानों का अरबों की चपत लगी है जिसका हिसाब सरकारी आकलनों में नहीं हो पाता, मुआवजा मिलना तो दूर की बात है। बाढ़ में साढ़े तीन लाख हेक्टेयर में लगी फसल डूब गई जबकि सूखाड़ की वजह से करीब दो लाख हेक्टेयर जमीन परती रह गई।

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