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उत्तराखण्ड का निजाम केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री के शरण में


केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री के साथ उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावतकेन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री के साथ उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावतवैसे राज्य सरकारों की निर्भरता केन्द्र पर ही रहती है। लेकिन कुछ काम हैं, जो राज्य सरकार खुद के संसाधनों से संचालित करती है। आज तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं आया की राज्य सरकार ने खुद के संसाधनों से फलाँ-फलाँ विकास का काम जनता को समर्पित किया है।

खैर! यहाँ उत्तराखण्ड की मौजूदा सरकार की कसरत कुछ ऐसी है, जिससे चुनिन्दा लोगों को तो बहुतायत में फायदा होगा, परन्तु जो नुकसान एक सम्पूर्ण सभ्यता को होगा, उसकी भरपाई कभी हो, ऐसी सम्भावना दिखाई नहीं दे रही है। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री ने केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से यह माँग कर डाली कि राज्य को 1000 मी. की ऊँचाई पर वन कटान की स्वीकृति दी जाये। प्रश्न यह है कि यदि उत्तराखण्ड में जंगल बढ़ गए हैं तो हिमरेखा पीछे क्यों खिसक रही है?

यदि जंगल बढ़ रहे हैं तो हर वर्ष वृक्षारोपण क्यों करवाया जा रहा है? सरकार को वन कटान की इजाजत चाहिए, पर जो कम्पनियाँ बाँध बना रही हैं उन्हें वन कटान की स्वीकृति किसकी संस्तुति पर मिली है। वन सम्पदा से सम्बन्धित कुछ अनसुलझे सवाल हैं, जिसका जवाब सिर्फ सरकार के पास ही है।

जनता की दलील


राज्य की जनता चाहती है कि उन्हें दैनिक उपयोग की चीजें जो वनों से मिलती हैं वे बिना कानून के उन्हें मिल जानी चाहिए। यदि प्राकृतिक दोहन करके कोई विकास का काम किया जाता है तो यथा स्थान के ग्रामीणों की स्वीकृति होनी चाहिए। चिपको आन्दोलन के बाद सरकार ने निर्णय लिया था कि 1000 मी. की ऊँचाई पर वनों का व्यावसायिक दोहन नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऊँचाई के वन जैवविविधता के भण्डार हैं, जो हजारों सालों में पुनर्जीवित होते हैं।

यहीं नहीं ये ऊँचाई के वन पर्यावरणीय सन्तुलन का काम भी करते हैं। ऊँचाई के वनों के कारण निचले स्थानों पर बसी बसासत को पानी, जलावन लकड़ी व पशुओं के लिये चारा-ईंधन की आपूर्ति स्वस्फूर्त होती है। लोगों का अब यह आरोप है कि जितनी भी जलविद्युत परियोजनाएँ बन रही हैं उनकी रिपोर्टें कुछ कहती हैं और निर्माण में वे और ही कुछ करवा देती हैं।

इतना भर ही नहीं निर्माणाधीन और प्रस्तावित ऐसी परियोजनाएँ यह बताने के लिये मुखर जाती है कि जितना वे प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन करेंगे उसकी प्रतिपूर्ति वे कैसे करेंगे और विस्थापित तथा पुनर्वास की उनकी क्या योजना है जिसकी जवाबदेही निर्माणाधीन कम्पनियाँ सरकारों के सिर फोड़ देती हैं। राज्य के आम लोगों का यह भी सवाल खड़ा है कि राज्य बनने के बाद वन दोहन से राज्य को कितना राजस्व प्राप्त हुआ है। इसका जवाब तो सरकार नहीं दे पा रही है, परन्तु राज्य का निजाम वन दोहन की स्वीकृति के लिये केन्द्र का दरवाजा खटखटाकर आ गया है।

सरकारी स्तर के तर्क


इधर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से माँग की है कि प्रदेश में वन भूमि हस्तान्तरण तथा क्षतिपूर्ति सम्बन्धी प्रावधानों में सरलीकरण, डिग्रेडेड फॉरेस्ट लैंड को ही क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिये उपलब्ध करवाए जाएँ। भागीरथी इको सेंसेटिव जोन से सम्बन्धित अधिसूचना के प्रावधानों में संशोधन किये जाएँ।

कैम्पा के प्रावधानों में सरलीकरण, 1000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पेड़ कटान की अनुमति तथा जंगली सूअर से मानव एवं कृषि की रक्षा हेतु जंगली सूअरों को मारने की अनुमति दिये जाने की स्वीकृति का राज्य सरकार को दी जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्होंने वन अधिनियम के नियमों से राज्य में विकास परियोजनाओं में आ रही बाधाओं, प्रदेश के अन्तर्गत नियोजित विकास में सहयोग, बेहतर वन प्रबन्धन तथा मानव एवं कृषि को जंगली पशुओं से क्षति की रोकथाम हेतु भी समुचित उपाय किये जाने की आवश्यकता पर एक प्रस्ताव केन्द्रीय वन मंत्री को दिया है।

इस बाबत मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तर्क दिया कि प्रदेश में लगभग 71 प्रतिशत भाग वनाच्छादित है। इस कारण विकास परियोजनाओं में न्यून से अधिक मात्रा में वन भूमि की आवश्यकता होती है। परन्तु वन भूमि हस्तान्तरण की प्रचलित प्रक्रियाओं को पूर्ण करने में काफी समय लगता है। लिहाजा वन भूमि हस्तान्तरण तथा क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण सम्बन्धी प्रावधानों में सरलीकरण की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार द्वारा पूर्व में एक हेक्टेयर तक वन भूमि हस्तान्तरण स्वीकृति निर्गत करने हेतु राज्य सरकार को अधिकृत किया गया था, जिसकी अवधि समाप्त हो गई है।

वर्ष 2013 की आपदा के उपरान्त भारत सरकार द्वारा आपदा प्रभावित जनपदों में पाँच हेक्टेयर तक के प्रकरणों में स्वीकृति प्रदान करने हेतु राज्य सरकार को अधिकृत किया गया था इसकी भी अवधि 2016 में समाप्त हो चुकी है। इसके विस्तारीकरण हेतु राज्य सरकार के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की जाय। मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण कार्य अभी भी अवशेष हैं और चारधाम ऑल वेदर रोड, पी.एम.जी.एस.वाई., ग्रामीण विद्युतीकरण तथा नमामि गंगे आदि परियोजनाओं के लिये वन भूमि हस्तान्तरण के लिये शीघ्र निर्णय की आवश्यकता है।

सड़क विकास परियोजना


इसी प्रकार भारत सरकार बीआरओ की सड़क निर्माण परियोजनाओं एवं केन्द्र सरकार/केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों की परियोजनाओं के लिये क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण डिग्रेडेड फॉरेस्ट लैंड पर किये जाने की अनुमति प्रदान करें। प्रदेश का 71 प्रतिशत भूभाग वनाच्छादित है। अन्य सिविल भूमि में भी अधिकांश भूमि दुर्गम व पथरीली है। लगभग 26 प्रतिशत डिग्रेडेड फॉरेस्ट लैंड होने के कारण यहाँ वनीकरण की अत्यन्त आवश्यकता है।

मुख्यमंत्री श्री रावत ने केन्द्रीय वन मंत्री के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि भारत सरकार द्वारा अन्तरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र में लाइन आफ एक्चुअल कंट्रोल से 100 कि.मी. एरियल डिस्टेंस बीआरओ तथा आईटीबीपी के लिये दो लेन मार्ग निर्माण की योजनाओं के सम्बन्ध में वन भूमि हस्तान्तरण के सभी प्रकरणों में अनुमति राज्य सरकार को अधिकृत की जाये। जबकि भारत सरकार के निर्देशों में उक्त व्यवस्था केवल देश के पूर्वी एवं पश्चिमी सीमा के लिये अनुमन्य की गई है। अतः इन निर्देशों पर पुनर्विचार कर चीन, नेपाल सीमा पर स्थित उत्तराखण्ड जैसे उत्तर पूर्वी सीमा क्षेत्रों के लिये भी समान व्यवस्था लागू किया जाना आवश्यक है।

चूँकि उत्तराखण्ड का अधिकांश क्षेत्र अन्तरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ा है। सीमा क्षेत्र में 100 किमी एरियल डिस्टेंस में पड़ने वाली समस्त सड़क परियोजनाओं को वन भूमि हस्तान्तरण के लिये राज्य सरकार को अधिकृत किया जाय।

पारिस्थितिकीय वन विकास क्षेत्र


मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने केन्द्रीय वन मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से भागीरथी ईको सेंसटिव जोन से सम्बन्धित अधिसूचना मेें पुनर्विचार अथवा अधिसूचना के प्रावधानों में संशोधन करने का भी अनुरोध किया। भारत सरकार द्वारा जनपद उत्तरकाशी के अन्तर्गत अन्तरराष्ट्रीय सीमा से लगे गोमुख से उत्तरकाशी तक के 135 किमी लम्बाई के क्षेत्र में मार्ग के दोनों ओर 4,179.59 वर्ग किमी क्षेत्र को ‘भागीरथी परिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है।

इस क्षेत्र के अन्तर्गत 98 प्रतिशत आरक्षित वन क्षेत्र/संरक्षित क्षेत्र होने तथा मात्र दो प्रतिशत क्षेत्र ही कृषि एवं आवासीय हैं। ईको सेंसटिव जोन सम्बन्धी अधिसूचना में निहित प्रावधानों के अनुसार भू-उपयोग परिवर्तन, पहाड़ी ढलानों पर निर्माण, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट की स्थापना एवं खनन आदि प्रतिबन्धित होने के कारण इस क्षेत्र के अन्तर्गत सामरिक महत्त्व के मार्गों सहित चारधाम ऑल वेदर रोड जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजना के लिये भी भूमि की व्यवस्था कर पाना अथवा स्थानीय लोगों की मूलभूत आवश्यकता से सम्बन्धित अन्य विकास योजनाओं को क्रियान्वित कर पाना कठिन हो गया है।

अन्तरराष्ट्रीय सीमावर्ती क्षेत्रों में पलायन की प्रवृत्ति को रोकने तथा आन्तरिक सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं के निर्माण की सुगमता हेतु ईको सेंसटिव जोन की अधिसूचना पर पुनर्विचार आवश्यक है। उन्होंने माँग की है कि जोनल मास्टर प्लान के अन्तर्गत उत्तराखण्ड राज्य के लिये भी भारत सरकार द्वारा उसी प्रकार शिथिलीकरण स्वीकृत किया जाना आवश्यक है जैसा कि महाराष्ट्र (वेस्टर्न घाट ईको सेंसटिव जोन) एवं हिमाचल प्रदेश के लिये ईको सेंसटिव जोन के सम्बन्ध में दिया गया है।

वन विकास जैसी परियोजना


कैम्पा परियोजना के प्रावधानों में सरलीकरण हो। इस पर मुख्यमंत्री श्री रावत ने केन्द्रीय वन मंत्री को तर्क दिया कि उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्य जहाँ 71 प्रतिशत से अधिक भू-भाग पर वन हैं। जिसका पर्यावरणीय लाभ पूरे देश व विश्व को मिलता है, को अपनी वन सम्पदा के संरक्षण एवं संवर्धन की पूर्ति हेतु कैम्पा के एनपीवी मद में अतिरिक्त सहायता का प्रावधान रखे जाने की आवश्यकता है।

वर्ष 2017-18 की अनुमोदित वार्षिक कार्य योजना 192.35 करोड़ के सापेक्ष भारत सरकार द्वारा 96.00 करोड़ की धनराशि अवमुक्त की गई है, जिसमें उनके द्वारा विशिष्ट मदों में ही अवमुक्त धनराशि को व्यय किये जाने की शर्तें अधिरोपित की गई हैं। वन सुरक्षा, सुदृढ़ीकरण, मृदा एवं जल संरक्षण कार्य, वनाग्नि सुरक्षा एवं प्रबन्धन, मानव वन्यजीव संघर्ष रोकथाम, वन एवं वन्यजीव शोध, मानव संसाधन विकास, इत्यादि महत्त्वपूर्ण गतिविधियों के अन्तर्गत भी कैम्पा के अधीन व्यय किये जाने की अनुमति राज्य सरकार को मिल जानी चाहिए।

व्यावसायिक वन कटान


मुख्यमंत्री श्री रावत ने राज्य के एक हजार मीटर से अधिक ऊँचाई के क्षेत्रों में पेड़ कटान की अनुमति दिये जाने का भी अनुरोध केन्द्रीय वन मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से कर डाला। उनका तर्क है कि प्रदेश में चीड़ वनों के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता में गिरावट आई है। प्रौढ़ चीड़ वृक्षों से अत्यधिक मात्रा में लगातार पिरूल गिरने तथा फायर लाइनों पर चीड़ के प्रौढ़ वृक्ष आ जाने से वनों में अग्नि दुर्घटनाएँ बढ़ रही हैं। छत्र (Canopy) न खुलने के कारण चीड़ वनों में प्राकृतिक पुनरुत्पादन प्रभावित हो रहा है। चीड़ वृक्ष पड़ोस के अच्छे प्राकृतिक बांज वनों में अतिक्रमण कर रहे हैं, जिससे बांज वनों की गुणवत्ता एवं पर्यावरणीय सेवाएँ प्रभावित हो रही हैं।

चीड़ वन बगल के खुले कृषि भूमि में भी अतिक्रमण कर रहे हैं। इनका पातन न होने के कारण राजस्व में कमी आ रही है। अतः 1000 मीटर से ऊपर स्थित प्रौढ़ चीड़ वृक्षों को काटने की अनुमति प्रदान की जाय। उन्होंने माँग की है कि जंगली सुअर से मानव एवं कृषि की रक्षा हेतु जंगली सुअरों को मारने की अनुमति दी जाये। उत्तराखण्ड के समस्त ग्रामीण क्षेत्रों में जंगली सुअरों द्वारा खेती को अत्यधिक नुकसान पहुँचाया जा रहा है। खेती में हो रहा नुकसान पर्वतीय क्षेत्रों से लोगों के पलायन का एक प्रमुख कारण बन रहा है।

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