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गंगा शुद्धि के सवाल पर गंगाप्रेमी लामबन्द


केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों को जिम्मा सौंपा गया। एक अलग मंत्रालय भी बनाया गया जिसका दायित्व साध्वी उमा भारती को दिया गया। उन्होंने दावा किया कि गंगा सफाई का परिणाम अक्टूबर 2016 से दिखने लगेगा। उसके बाद वह समय-समय पर गंगा सफाई के बारे में दावे-दर-दावे और गंगा सफाई की समय सीमा भी बढ़ाती रहीं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि यदि गंगा 2018 तक साफ नहीं हुई तो वह जल समाधि ले लेंगी। गंगा साफ नहीं हुई और उमा भारती जी को अपने मंत्रालय गंगा संरक्षण से मुक्त होना पड़ा।

दुनिया भर में पतित पावनी, मोक्षदायिनी, पुण्यसलिला नदी के रूप में जानी जाने वाली नदी गंगा आज अपने अस्तित्व के लिये ही जूझ रही है। इसका सबसे बड़ा और अहम कारण यह है कि प्रदूषण के चलते गंगा इतनी मैली हो गई है कि आज जिस गंगाजल को लोग हर धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर पूजा में प्रयोग करते थे, वह आज आचमन लायक तक नहीं रह गया है।

यही नहीं वह अब पुण्य नहीं बल्कि मौत का सबब बनकर रह गया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि जिस गंगा में स्नान लोग पुण्य का सबब मानते थे आज उसमें स्नान जानलेवा भयंकर बीमारियों की वजह बनता जा रहा है। यह जगजाहिर है और गंगाजल के वैज्ञानिक परीक्षण इस तथ्य के जीते जागते सबूत हैं।

ऐसी बात नहीं कि गंगा की शुद्धि के लिये सरकारी प्रयास नहीं हुए, वह हुए, गैर सरकारी प्रयास भी किये गए। गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिये अनवरत आन्दोलन भी हुए। देश के साधु सन्तों ने भी इन आन्दोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। आज से तकरीब 32 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के कार्यकाल में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई। उसके बाद संप्रग सरकार के कार्यकाल में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया।

गंगा की शुद्धि के लिये प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का भी गठन किया गया। जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के नेतृत्व में हरिद्वार में कुम्भ के अवसर पर सन्तों ने घोषणा की कि अब सन्त गंगा को बचाएँगे। हाँ उस समय इतना जरूर हुआ कि जनान्दोलन के दबाव के चलते सरकार को उत्तराखण्ड में निर्माणाधीन तीन जलविद्युत परियोजनाओं लोहारी नागपाला, मनेरी भाली और भैरोघाटी को बन्द किया गया और सरकार ने घोषणा की कि भविष्य में इस संवेदनशील पर्वतीय राज्य में कोई भी जलविद्युत परियोजना नहीं बनेगी। इससे उस समय यह आशा बँधी थी कि अब गंगा साफ हो जाएगी। संप्रग सरकार का दूसरा कार्यकाल भी बीत गया। लेकिन गंगा की हालत जस-की-तस रही।

फिर आया 2014 का लोकसभा चुनाव। इसकी शुरुआत में राजग के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने उत्तर प्रदेश के बनारस में नामांकन के समय यह घोषणा की कि माँ गंगा ने मुझे बुलाया है। गंगा की शुद्धि उनका पहला लक्ष्य है। वह बनारस से भारी मतों से जीते भी। उसके बाद वह देश के प्रधानमंत्री भी बने। उन्होंने गंगा की शुद्धि के लिये नमामि गंगे नाम से एक परियोजना की शुरुआत की। यह उनकी महत्त्वाकांक्षी परियोजना के रूप में जानी गई। इसकी सफलता के लिये केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों को जिम्मा सौंपा गया। एक अलग मंत्रालय भी बनाया गया जिसका दायित्व साध्वी उमा भारती को दिया गया।

उन्होंने दावा किया कि गंगा सफाई का परिणाम अक्टूबर 2016 से दिखने लगेगा। उसके बाद वह समय-समय पर गंगा सफाई के बारे में दावे-दर-दावे और गंगा सफाई की समय सीमा भी बढ़ाती रहीं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि यदि गंगा 2018 तक साफ नहीं हुई तो वह जल समाधि ले लेंगी। गंगा साफ नहीं हुई और उमा भारती जी को अपने मंत्रालय गंगा संरक्षण से मुक्त होना पड़ा। इसके पीछे क्या कारण रहे, यह किसी से छिपा नहीं है। हाँ इस दौरान सम्मेलन भी हुए। उसमें बेतहाशा पैसा खर्च हुआ और योजनाएँ-दर-योजनाएँ जरूर बनती रहीं। यही काम हुआ। इसके अलावा नमामि गंगे मिशन भ्रष्टाचार में डूबा सो अलग।

उमाजी के जाने के बाद नितिन गडकरी जी के कन्धों पर यह गुरूतर दायित्व सौंपा गया। बयानों में वह भी उमा भारती जी से पीछे नहीं हैं। निष्कर्ष यह कि मोदी सरकार के साढ़े तीन साल बाद भी गंगा मैली है। वह पहले से और बदहाली की अवस्था में है। 2018 आ गया, हालत यह है कि अभी तक गंगा सफाई की दिशा में नमामि गंगे मिशन के तहत प्राथमिकताएँ ही पूरी नहीं हो सकी हैं।

विडम्बना यह है कि इस हेतु अभी तक समितियाँ, अभिकरण, नियुक्तियाँ करने में ही मिशन अपनी ऊर्जा खर्च करने में लगा है। नतीजतन गंगा आज भी अपने तारनहार की प्रतीक्षा में है। दावे भले कुछ भी किये जाएँ गंगा दिन-ब-दिन और मैली हो रही है, इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। राजग सरकार और उसके प्रधानमंत्री मोदीजी से अब जनता का भरोसा उठता जा रहा है।

गंगा की दिनोंदिन बदहाली को देख देश के गंगाप्रेमी दुखित हैं, वह खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं, अब वह यह सोचने पर विवश हैं कि क्या गंगा साफ होगी? बीते 32 सालों से वह इसी उम्मीद में थी। मोदीजी से कुछ आस बँधी थी लेकिन अब वह भी टूट चुकी है। बनारस में ही गंगा बदहाल है। ऐसी स्थिति में दूसरी जगह गंगा की खुशहाली की कल्पना ही बेमानी है।

विडम्बना देखिए कि दुनिया में आज विकसित देश अपने यहाँ पर्यावरण के लिये खतरा बन चुके बाँधों को खत्म कर रहे हैं लेकिन हमारी सरकार गंगा को बिजली बनाने की खातिर सुरंगों में कैद कर बाँध-दर-बाँध बनाने पर तुली है। आज हालत यह है कि गंगा की अस्तित्व रक्षा के लिये संघर्षरत आन्दोलनरत सन्त शिवानंद सरस्वती की हरिद्वार में जान खतरे में है। सरकार और प्रशासन उन्हें मिटाने पर तुला है। गौरतलब है कि कई बरस पहले इन्हीं सन्त शिवानन्द सरस्वती के शिष्य निगमानन्द सरस्वती गंगा की रक्षा के लिये अपना बलिदान दे चुके हैं।

गंगा की दुर्दशा को लेकर चिन्तित और उसके समाधान को लेकर बीते दिनों नई दिल्ली स्थित गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में देश भर से आये गंगाप्रेमियों, गाँधीवादियों, नदी जल विज्ञानियों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, शिक्षाविदों, पर्यावरण एवं नदी जल कार्यकर्ताओं की एक बैठक हुई। इसमें प्रख्यात गाँधीवादी एस.एन. सुब्बाराव, गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे, जलपुरुष राजेन्द्र सिंह, पर्यावरणविद सुबोध शर्मा, नीरी के निदेशक डॉ. राकेश कुमार, गाँधीवादी एवं जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता रमेश भाई, ईश्वर भाई, वैज्ञानिक विक्रम सोनी, जल बिरादरी के संयोजक अरुण तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार दीपक परबतिया, पंकज मालवीय, चेतन उपाध्याय, सामाजिक कार्यकर्ता भाई पंकज जी, संजय सिंह, आनन्द मुरारी, पर्यावरण कार्यकर्ता जगदीश सिंह, विश्व बैंक के सुरेश बाबू, तरुण भारत संघ के निदेशक मौलिक सिसौदिया, नदी जल विशेषज्ञ मेजर हिमांशु, इंजीनियर एवं उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल सहित गंगा प्रभावित छह राज्यों के अलावा देश भर के नदी-जल कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संस्थाओं सहित गंगा आन्दोलन से जुड़ी महिलाओं की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

बैठक में कहा गया कि गंगा का प्रदूषण पहले से बहुत ज्यादा हो गया है, यह इस बात का प्रमाण यह है कि गंगा में नील धारा और नरौरा बैराज में 30 प्रतिशत पक्षियों तथा जलीय जन्तुओं की संख्या बहुत तेजी से घटी है। कन्नौज से लेकर कानपुर, इलाहाबाद, बनारस के बीच कैंसर, आंत्रशोध आदि जानलेवा बीमारियों के रोगियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।

गंगाजल में फॉस्फेट, क्रोमियम, नाइट्रेट की तादाद बढ़ती ही जा रही हैं। इसका असर पर खेती पर दिखने लगा है। दारा नगर गंज (बिजनौर) से नरोरा बैराज तक डॉल्फिन की संख्या जो पहले 56 थी, अब घटकर 30 के आसपास हो गई है। आँकड़ों के अनुसार गंगा पर प्रतिदिन लगभग 12000 मिलियन ली. मल उत्सर्जित किया जाता है लेकिन केवल 4000 मिलियन ली. का ही जल शोधन हो पाता है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की चेतावनी के बाद भी गन्दे नाले गंगा नदी में मिल रहे हैं, रिवर और सीवर को अलग करने की कोई पहल नहीं हुई है। जबकि पिछली सरकार ने एनजीबीआरटी की तीसरी बैठक में इसे सिद्धान्ततः स्वीकार कर लिया था। इसी के चलते गंगा और नदी प्रेमियों में सरकार के प्रति नाराजगी है। गंगा नदी की सफाई और प्रदूषण मुक्त करने के लिये हजारों करोड़ों की योजना का ऐलान किया, मगर हुआ क्या। यह सबके सामने है। चुनाव से पहले गंगा, नर्मदा, कावेरी, यमुना नदी को बचाने की बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने की बात की जाती है।

गंगा के साथ सहायक नदियों के प्रदूषण मुक्ति का दावा किया जाता है। लेकिन सत्ता में आने पर सब भूल जाते हैं। इस बार भी यही कुछ हुआ है। जब गंगा इस बदहाली के दौर में है तो सहायक नदियों का पुरसाहाल कौन है। इसलिये अब गंगा की शुद्धि, निर्मलता और अविरलता के लिये आन्दोलन के सिवाय कोई चारा नहीं है।

इस क्रम में जनजागरण, गंगा के प्रवाह पथ के दोनों ओर के गाँवों से होकर जनजागृति यात्रा, धरना-प्रदर्शन, शैक्षिक संस्थानों में गंगा की दुर्गति के बारे में छात्र-छात्राओं-नौजवानों को और शहरों-कस्बों में महिलाओं को जागरूक किया जाएगा। इसको भू अधिकार संगठन से जुड़े पी.वी. राजगोपालजी का भी समर्थन हासिल है। ऐसा लगता है कि सुब्बारावजी और अन्ना हजारे के समर्थन से इस आन्दोलन में विशेषकर नौजवानों का जुड़ाव महती भूमिका निर्वहन करेगा। यदि ऐसा होता है तो आसन्न चुनावी साल में मोदी सरकार के लिये यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।

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