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जहरीली होती हवा और अस्वीकारोक्ति के स्वर

Author: 
कुमार सिद्धार्थ
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2017

वायु प्रदूषण का स्तर जानलेवा होता जा रहा है, जो सभी के स्वास्थ्य के लिये खतरनाक साबित हो रहा है। इसी वजह से दिल सम्बन्धी और साँस सम्बन्धी बीमारियों का खतरा बढ़ने से रोगग्रस्तता और मृत्युदर पर असर पड़ रहा है। प्रदूषण की वजह से दुनिया में हर बरस तकरीबन एक करोड़ छब्बीस लाख लोग मर रहे हैं। वायु प्रदूषण की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज देश के हर शहर एक बड़े गैस चेम्बर के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में लोग वायु प्रदूषण की वजह से काल के मुँह में समा रहे हैं। पाँच राज्यों के चुनाव-परिणामों की गहमागहमी के बीच पिछले पखवाड़े ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2017’ नामक रिपोर्ट अखबारों की सुर्खियों में नहीं आ पाई। विश्व पटल पर प्रस्तुत की गई इस महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट से भारत में प्रदूषण से आम जनता की सेहत पर पड़ने वाले प्रभावों और होने वाली मौतों की भयावहता की तस्वीर सामने आई है।

इस रिपोर्ट को हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवेल्यूशन ने संयुक्त तौर पर तैयार किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में 195 देशों के 1990 से 2015 तक के विस्तृत आँकड़े हैं। इनके आधार पर वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या को निकाला जाता है।

रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2015 में पूरी दुनिया में 42 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई। इनमें से 52 फीसदी मौतें भारत और चीन में हुईं। भारत में हर वर्ष करीब 10 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण से होती है। चीन ने इस दिशा में जो कारगर कदम उठाए हैं, उनकी वजह से इन मौतों की संख्या स्थिर हो गई है, जबकि भारत में अभी वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

रिपोर्ट में जिन छह देशों की वायु गुणवत्ता का अध्ययन किया गया है, उनमें इसकी वजह से मृत्यु में सबसे खराब स्थिति भारत की पाई गई। वर्ष 1990 में प्रति एक लाख जनसंख्या पर वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या 165 थी। जबकि वर्ष 2010 में यह संख्या घटकर 135 हो गई। लेकिन वर्ष 2010 से वर्ष 2015 तक यह दरें लगभग समान रही।

उल्लेखनीय है कि नाइट्रोजन, सल्फर ऑक्साइड और कार्बन खासकर पीएम 2.5 जैसे वायु प्रदूषक तत्वों को विश्व में मौत का पाँचवाँ सबसे बड़ा कारण माना जाता है।

लेकिन मजेदार बात यह है कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे इस रिपोर्ट को एक सिरे से खारिज करते हैं। वे इस बात को जरूर मानते हैं कि वायु प्रदूषण की समस्या देश में तो है, पर वे रिपोर्ट के इन आँकड़ों को नहीं मानते। लेकिन इन आँकड़ों को न मानने के पीछे पर्यावरण मंत्रीजी ने कोई ठोस वैज्ञानिक और तथ्यपरक आधार भी नहीं रखे हैं।

देश में ऐसी रिपोर्ट्स को बिना वैज्ञानिक आधार के सीधे नकारने की परम्परा रही है। पर्यावरण मंत्री का बयान है कि हम भारतीय लोग बाहर की चीजों से बहुत प्रभावित होते हैं। हमें अपने विशेषज्ञों पर भरोसा करना चाहिए, उसी तरह जिस तरह हम अपनी सेना पर भरोसा करते हैं।

वे यह भी कहते हैं कि उनकी योजनाएँ देश के संस्थानों के आँकड़ों पर आधारित होती हैं और यह रिपोर्ट विदेशी है। लेकिन स्थिति यह भी रही है कि देशी संस्थाओं द्वारा समय-समय पर जारी की गई रिपोर्टों को भी सरकारें हमेशा नकारती रही हैं। पिछले वर्ष ही सबसे प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान ‘इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटेरियोलॉजी’, पुणे ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि दिल्ली में लोगों की छह वर्ष उम्र केवल वायु प्रदूषण के कारण कम हो गई है।

इस देशी रिपोर्ट को भी तत्कालीन पर्यावरण मंत्री ने गलत करार दिया था। वहीं आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट दी थी कि दिल्ली में लगभग बाइस हजार व्यक्ति वायु प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष मरते हैं। इस रिपोर्ट को केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अस्वीकार किया था। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी एक रिपोर्ट में वाराणसी शहर को सबसे अधिक प्रदूषित तीन शहरों में रखा था। लेकिन सरकार ने ऐसी कितनी रिपोर्टों को तवज्जो दी जिससे प्रदूषण नियंत्रण के लिये कोई सार्थक प्रयास देश के सामने आ सके।

इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि वायु प्रदूषण की वजह से होने वाली मौतों की जो संख्या इस रिपोर्ट में दी गई है, उसको लेकर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ जा सकता कि वायु प्रदूषण एक गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है और इससे लोगों को जान गँवानी पड़ती है।

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि तमाम सरकारों ने वायु प्रदूषण की समस्या को कभी गम्भीरता से नहीं लिया। वायु प्रदूषण कम करने की कोशिशें केवल दिल्ली, मुम्बई जैसे बड़े महानगरों तक केन्द्रित रहीं। छोटे शहरों को नजरअन्दाज किया जाता रहा है। जबकि सन 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी, उनमें भारत के 10 शहर शामिल थे।

समूची दुनिया में वायु प्रदूषण का स्तर जानलेवा होता जा रहा है, जो सभी के स्वास्थ्य के लिये खतरनाक साबित हो रहा है। इसी वजह से दिल सम्बन्धी और साँस सम्बन्धी बीमारियों का खतरा बढ़ने से रोगग्रस्तता और मृत्युदर पर असर पड़ रहा है। प्रदूषण की वजह से दुनिया में हर बरस तकरीबन एक करोड़ छब्बीस लाख लोग मर रहे हैं।

वायु प्रदूषण की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज देश के हर शहर एक बड़े गैस चेम्बर के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में लोग वायु प्रदूषण की वजह से काल के मुँह में समा रहे हैं। वाहनों से निकलने वाली खतरनाक जहरीली हवा पर्यावरण के लिये एक बेहद खतरनाक संकेत है। सवाल है कि क्या वक्त रहते सावधान हो जाना जरूरी नहीं हो जाता है?

अचरज की बात है कि अगर हम अपने शहरों में वायु प्रदूषण का अन्दाजा नहीं लगा पा रहे हैं, तो इनकी वजह से आम जनता की सेहत पर पड़ने वाले कुप्रभावों का अन्दाज हम कैसे लगा पाएँगे? इसके लिये जरूरी बुनियादी ढाँचे के अभाव की स्थिति में वैश्विक स्तर पर किये जा रहे इन विदेशी अध्ययनों के अलावा हमारे पास और क्या विकल्प बचता है।

अगर हम वास्तव में अपने शहरों और गाँवों केे प्रदूषणों के आँकड़े संग्रहित करें तो सच्चाई इस विदेशी रिपोर्ट से भी कहीं अधिक भयावह होगी। ऐसे में पर्यावरण मंत्रालय के लिये इस तरह की रिपोर्ट के निष्कर्ष आधार के तौर पर लिये जा सकते हैं। इससे आने वाले समय में वायु प्रदूषण को नियंत्रित किये जाने की दिशा में कारगर कदम उठाने में मदद मिल सकेगी।

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