जलवायु परिवर्तन से मुश्किल होगा दो तिहाई आबादी का जीना

Submitted by RuralWater on Sun, 07/31/2016 - 10:39
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21वीं सदी के आखिर तक उत्तरी अफ्रीका और मध्य एशिया जलवायु परिवर्तन के चलते आबादी के पलायन के कारण खाली हो सकता है। गौरतलब है कि तकरीब 50 करोड़ की आबादी वाला मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका मूल रूप से गर्म क्षेत्र है। इस समूचे इलाके में सामान्य रूप से दिन का तापमान 40 डिग्री और रात का तापमान तकरीबन 26 डिग्री तक रहता है। जर्मनी की मैक प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ केमिस्ट्री में हुए एक अध्ययन के बाद इस तथ्य का खुलासा हुआ है कि सदी के मध्य तक यहाँ रात का तापमान 30 डिग्री से नीचे नहीं जाएगा। लेकिन दिन का तापमान 46 डिग्री से ऊपर जाएगा। वैज्ञानिक वर्षों से चेता रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के चलते आने वाले दिनों में आदमी का जीना मुहाल हो जाएगा। मौजूदा हालात में जलवायु परिवर्तन के कारण वह हो रहा है जो बीते एक लाख साल में भी नहीं हुआ है। माना जाता है कि एक लाख बीस हजार साल पहले आखिरी बार आर्कटिक की बर्फ खत्म हो गई थी। लेकिन अब ऐसा फिर हो रहा है।

कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी के पोलर ओसेन फिजिक्स ग्रुप के प्रोफेसर पीटर बडहम्स कहते हैं कि उन्होंने चार साल पहले ही अंटार्कटिक से बर्फ गायब होने की भविष्यवाणी की थी। उन्होंने दावा किया है कि इस साल या अगले साल आर्कटिक समुद्र की सारी बर्फ खत्म हो जाएगी। अमेरिका के नेशनल स्नो एंड आइस डाटा सेंटर की तरफ से ली गई हालिया सेटेलाइट तस्वीरें इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं।

असलियत में ध्रुवीय इलाके में तेजी से बदलते तापमान को इसकी असली वजह बताया जा रहा है। माना जा रहा है कि इसी की वजह से ब्रिटेन में बाढ़ आ रही है और अमेरिका में बेमौसम तूफान आ रहे हैं। यदि सेटेलाइट से ली गई तस्वीरों का जायजा लें तो पता चलता है कि इस साल एक जून को आर्कटिक समुद्र में 1.11 करोड़ वर्ग किलोमीटर इलाके में बर्फ बची थी।

यह हालात की भयावहता का प्रतीक है। जबकि पिछले साल जून के महीने की शुरुआत में जमी बर्फ का पिछले 30 साल का औसत 1.27 करोड़ वर्ग किलोमीटर था। यह कम हुई तकरीब 15 करोड़ वर्ग किलोमीटर बर्फ यूनाइटेड किंगडम की छह गुना ज्यादा है।

अब नए अध्ययनों और शोधों ने इस बात का खुलासा कर दिया है कि 21वीं सदी के आखिर तक उत्तरी अफ्रीका और मध्य एशिया जलवायु परिवर्तन के चलते आबादी के पलायन के कारण खाली हो सकता है। गौरतलब है कि तकरीब 50 करोड़ की आबादी वाला मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका मूल रूप से गर्म क्षेत्र है।

इस समूचे इलाके में सामान्य रूप से दिन का तापमान 40 डिग्री और रात का तापमान तकरीबन 26 डिग्री तक रहता है। जर्मनी की मैक प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ केमिस्ट्री में हुए एक अध्ययन के बाद इस तथ्य का खुलासा हुआ है कि सदी के मध्य तक यहाँ रात का तापमान 30 डिग्री से नीचे नहीं जाएगा। लेकिन दिन का तापमान 46 डिग्री से ऊपर जाएगा।

यह सदी के अन्त तक 50 डिग्री से ऊपर पहुँच सकता है। इस कारण इस पूरे इलाके में सदी के आखिर तक बेहद गर्मी पड़नी शुरू हो जाएगी। इसका सीधा असर खाद्यान्न, प्राकृतिक संसाधन, मुख्य रूप से जलापूर्ति यानी पेयजल पर सबसे ज्यादा पड़ेगा। नतीजन आदमी का जीना मुश्किल हो जाएगा।

जलवायु परिवर्तन के चलते इस क्षेत्र में तापमान के चरम पर पहुँचने की वजह से हालात इतने बिगड़ जाएँगे जिससे जीवन तो मुश्किल होगा ही, इस इलाके से बड़ी आबादी ठंडे प्रदेशों की ओर कूच करने को मजबूर होगी। जलवायु परिवर्तन से जब पूरी पृथ्वी के औसत तापमान में दो डिग्री की बढ़ोत्तरी होगी, तब मध्य एशिया में तापमान वृद्धि की दर दोगुनी हो जाएगी। यह भयावह खतरे का संकेत है।

देखा जाये तो जिस बात के संकेत पिछले दो दशकों से मिल रहे थे, अब यह साफ हो चुका है कि जलवायु परिवर्तन का घातक असर फसलों पर पड़ने लगा है। अब फसलों पर हाइड्रोजन साइनाइड जैसे रसायनों का असर दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इसके कारण फसलें जहरीली हो रही हैं। सूखा, तेज गर्मी व बेमौसम बारिश जैसे कठोर मौसम के दौरान पैदा होने वाली फसलों में हाइड्रोजन साइनाइड जैसे खतरनाक रसायनों के अंश पाये गए हैं। दरअसल जिस तरह लोग कठोर मौसम में खुद को बेहद असहज महसूस करते हैं, उसी तरह फसलें भी सूखे की स्थिति में प्रतिक्रिया करती हैं।

सामान्य हालात में होता यह है कि पौधे मिट्टी से नाइट्रेट लेकर उसे पोषक अमीनो अम्ल और प्रोटीन में तब्दील कर देते हैं। लेकिन सूखे के दौरान यह प्रक्रिया एकदम धीमी हो जाती है या लम्बे समय तक सूखा रहने के कारण यह प्रक्रिया होती ही नहीं है। हालात यहाँ तक खराब हो चुके हैं कि मक्का, गेहूं, ज्वार, सोयाबीन, कसावा और पटसन जैसी फसलों में इस बेहद जहरीले रसायन की पहुँच खतरनाक स्तर तक हो गई है। बहुतेरे देशों में इसका इस्तेमाल कीड़े, मकोड़े और पतंगों को मारने में किया जाता है। अफ्लॉटाक्सीन नामक रसायन के अंश अब मक्का और मूँगफली आदि में भी पाये गए हैं।

दरअसल सूखे से प्रभावित फसलें अचानक बारिश आने के कारण तेज गति से बढ़ती हैं। उस दशा में उनमें मौजूद नाइट्रेट, हाइड्रोजन साइनाइड में तब्दील हो जाता है। हाइड्रोजन साइनाइड जब मनुष्य के शरीर में पहुँचता है तब वह ऑक्सीजन की संचार प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है। इसके साथ पौधों में अफ्लॉटाक्सीन नामक रसायन की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है। इससे प्रभावित खाद्यान्न के खाने से जिगर खराब हो सकता है, अन्धेपन की बीमारी का प्रकोप बढ़ सकता है और गर्भस्थ शिशु के विकास में भी अवरोध पैदा करता है।

बीते माह नाइजीरिया की राजधानी नैरोबी में आयोजित ‘यूनाइटेड नेशन्स एन्वायरमेंट असेम्बली’ में प्रस्तुत रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है। यूएनईपी में पूर्व चेतावनी एवं आकलन प्रभाग के निदेशक और प्रमुख वैज्ञानिक जैक्लिन मैकग्लेड का कहना है कि अफ्लॉटाक्सीन रसायन से प्रभावित फसलों की जद में विकासशील देशों की तकरीब 4.5 अरब से ज्यादा आबादी है।

यदि तापमान में इसी गति से बढ़ोत्तरी होती रही तो यूरोप में फसलें जहाँ अपेक्षाकृत कम तापमान रहता है, वे भी इस जहर से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगी। इस स्थिति के मुकाबले के लिये दुनिया भर में कठोर मौसम को सहने में सक्षम बीजों का विकास किया जा रहा है। इसके अलावा मौसमी फसलें उगाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

उपरोक्त हालात समस्या की विकरालता की ओर इशारा करते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि हम अब भी नहीं चेते हैं। जबकि धरती पर रहने बसने वाले हरेक इंसान को यह भलीभाँति मालूम है कि मौसम में यह बदलाव क्यों आ रहे हैं। सूखा और बाढ़ में बढ़ोत्तरी का कारण क्या है। फसलों की पैदावार क्यों कम हो रही है। जीव-जन्तु क्यों विलुप्त हो रहे हैं। जल संकट क्यों गहराता जा रहा है। समुद्र का जलस्तर क्यों बढ़ रहा है।

समुद्री जलस्तर यदि इसी गति से बढ़ता रहा तो आने वाले कुछेक दशकों में समुद्र तटीय शहर जलसमाधि ले लेंगे। नई-नई बीमारियाँ क्यों दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही हैं। सरकारों के पास इनसे निपटने के लिये धन ही नहीं है। आखिर इसके लिये कौन जिम्मेवार है। इसका सीधा सा एक ही जवाब है और वह है कि प्रकृति और पर्यावरण से की गई बेतहाशा छेड़छाड़। सच यह है कि इसकी भरपाई असम्भव है। क्योंकि हमने उसका दोहन तो भरपूर किया लेकिन बदले में लेशमात्र भी देने में हमने कोताही बरती।

हमने इस ओर तो कभी सोचा ही नहीं कि यह धरती तो हमारी है। ये जमीन, जंगल, नदी, पानी, हवा और प्राकृतिक संसाधन भी तो हमारे ही हैं। इनका इस्तेमाल भी हमीं ने किया है। नदियों, पानी और हवा को हमने जहरीला बना दिया है। हरे-भरे जंगल वीरान कर दिये हैं। जमीन के अन्दर का पानी भी विषाक्त बना डाला है।

जीव-जन्तुओं तक को सौन्दर्य प्रसाधनों और पौरुषवर्धक औषधियों की खातिर खत्म करने में हमने कसर नहीं छोड़ी है। यदि आज इनके अस्तित्व पर संकट है तो वह भी हमारी वजह से ही है। उसी के कारण आज धरती तप रही है। धरती के तापमान और मौसम में आये बदलाव के चलते वनस्पतियों और जीवों की प्रजातियों पर संकट मँडरा रहा है। वे दिनोंदिन लुप्त होती जा रही हैं। इससे पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहा है।

आनुवांशिक स्रोतों के अस्तित्व पर संकट है। उस स्थिति में इस संकट का मुकाबला करने की जिम्मेवारी भी हमारी ही है। इसमें दो राय नहीं है। दावे तो बहुत किये जा रहे हैं लेकिन पर्यावरण बचाने की मुहिम वैश्विक स्तर पर अभी भी अनसुलझी है। सरकारें प्रयासरत तो हैं लेकिन उनके प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा साबित हो रहे हैं। कारण यह विषय उनकी प्राथमिकता में है ही नहीं।

ऐसे हालात में यह जरूरी है कि हम सब पर्यावरण को बचाने का संकल्प लें और इस दिशा में जी-जान से जुट जाएँ। क्योंकि अब बहुत हो गया। यदि पर्यावरण बचाने में हम नाकाम रहे तो वह दिन दूर नहीं जब मानव अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

राजकीय इंटर कॉलेज, एटा से 12वीं परीक्षा उत्तीर्ण, सागर विश्वविद्यालय से स्नातक, छात्र जीवन में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन, समाजवादी युवजन सभा और छात्र संघ से जुड़ाव रहा। राजनैतिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण विधि स्नातक और परास्नातक की शिक्षा अपूर्ण।

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