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बीज बचाकर खेती बचाने की जुगत (Farm saving by saving the seeds)


मध्य प्रदेश के 35 जिलों के ग्रामीण इलाकों से निकल रही 'बीज बचाओ-खेती बचाओ' यात्रा दरअसल जैवविविधता तथा परम्परागत खेती को सहेजने की कोशिश है। इसमें पाँच सदस्यों के दल ने 55 दिनों तक 25 जिलों के गाँव–गाँव घूमकर परम्परागत देसी अनाजों, वनस्पतियों, पेड़–पौधों, देशज पशुओं, मवेशियों और विलुप्त हो रही जैवविविधता पर गाँव की चौपाल पर ग्रामीणों से बात की। यह दल गाँवों में ही रुकता और उनके जन-जीवन समझने की कोशिश करता। बीते पचास सालों में नए चलन की खेती और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में देसी किस्म के अनाज, धान और अन्य वनस्पतियाँ तेजी से विलुप्ति की कगार तक पहुँच गई हैं। इनसे दूरस्थ और आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोगों को पोषण सम्बन्धी कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इन्हें खाने से जहाँ ग्रामीण समाज और आदिवासी हट्टे–कट्टे रहकर खूब मेहनत–मशक्कत करते रहते थे, आज उनके बच्चे गम्भीर किस्म के कुपोषित हो रहे हैं। अन्धाधुन्ध रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों के उपयोग से धरती की कई बेशकीमती प्रजातियाँ खत्म हो रही हैं। हालांकि इनमें से कुछ को अब भी कहीं–कहीं ग्रामीण समाज ने बचाकर रखा है।

इन्हें बचाना इसलिये भी आवश्यक है कि ये प्रजातियाँ हमारे भौगोलिक पारिस्थितिकी के विकास क्रम में हजारों सालों और कई पीढ़ियों के संचित ज्ञान के फलस्वरूप हमारे जन-जीवन में रची बसी हुई थीं। यही कारण है कि इलाके में ज्यादा या कम बारिश और फसल रोग का इन पर उतना ज्यादा असर नहीं होता है, जितना फिलहाल की जा रही खेती पर। हरित क्रान्ति के बाद से ही लगातार परम्परागत खेती का तरीका तो बदला ही, कई किस्में भुलाकर उत्पादन की दौड़ में कई आयातित प्रजातियों के बीज बोना शुरू किये और इन्हें ही खेती का आधार मान लिया गया। ये जिस गति से विलुप्त हो रही हैं, बड़ी चिन्ता का सबब है।

मध्य प्रदेश के 35 जिलों के ग्रामीण इलाकों से निकल रही 'बीज बचाओ-खेती बचाओ' यात्रा दरअसल जैवविविधता तथा परम्परागत खेती को सहेजने की कोशिश है। इसमें पाँच सदस्यों के दल ने 55 दिनों तक 25 जिलों के गाँव–गाँव घूमकर परम्परागत देसी अनाजों, वनस्पतियों, पेड़–पौधों, देशज पशुओं, मवेशियों और विलुप्त हो रही जैवविविधता पर गाँव की चौपाल पर ग्रामीणों से बात की। यह दल गाँवों में ही रुकता और उनके जन-जीवन समझने की कोशिश करता। दल ने स्थानीय किसानों से विलुप्तप्राय अनाजों और दूसरी वनस्पतियों के करीब डेढ़ हजार से ज्यादा देसी किस्मों के बीज भी इकट्ठे किये, जिन्हें अब सरकारी बीज बैंक में सुरक्षित कर संरक्षित किया जा रहा है।

यात्रा के दौरान मिले बीजों को अधिक मात्रा में तैयार किया जाएगा ताकि भविष्य में ये आसानी से उपलब्ध हो सकें। जिन क्षेत्रों में दुर्लभ बीज मिले हैं, वहाँ के किसानों को भी सूचीबद्ध किया गया है। इसके लिये बाकायदा एक डाटा बैंक विकसित की गई है। यात्रा में शुगर फ्री गेहूँ, काली अरहर, सफेद तुलसी, कुटकी की 13 प्रजातियाँ, रामतिल, देसी अरंडी, पीली सरसों, सफेद घुमची, सफेद भरकटेया, कड़वी लौकी, गौमुखी बैंगन सहित बैंगन की कई प्रजातियाँ भी मिली हैं। एक ही सब्जी की 200 प्रजातियाँ भी अब डाटा बैंक में आ चुकी हैं। इनमें कई बीजों में औषधीय गुण भी हैं। यात्रा में कुल 1516 प्रजाति के 888 तरह के बीज, फल और सब्जी संग्रहित किये गए हैं।

मध्य प्रदेश जैवविविधता मण्डल के सौजन्य से हो रही इस यात्रा में किसान बाबूलाल दाहिया, जगदीश यादव, रामलोटन कुशवाहा, शैलेन्द्र सिंह कुशवाहा, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल कर्णे तथा नीलेश कपूर शामिल हैं। ये अपने-अपने क्षेत्र में जैवविविधता के लिये लम्बे अरसे से काम करते रहे हैं। श्री दाहिया 120 से ज्यादा किस्म के धान प्रजातियों को संरक्षित कर चुके हैं। रामलोटन कुशवाहा 200 किस्म के पेड़-पौधों (जड़ी बूटियों) के संरक्षक है। शैलेन्द्र सिंह ग्वालियर क्षेत्र के जानकार हैं, वहीं जगदीश यादव आसपास के 30-40 गाँव में यात्रा निकाल बीज बचाने का काम करते रहे हैं तो अनिल कर्णे देशी बीज बचाओ आन्दोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं। नीलेश जैवविविधता बोर्ड से हैं।

बाबूलाल दाहिया कहते हैं- "1965 तक हमारे देश में धान की ही एक लाख से ज्यादा प्रजातियाँ हुआ करती थीं। अब यह बीते 50 सालों में घटते-घटते महज चार से आठ तक ही सिमट गई है, जिस तेजी से हमारे देसी अनाज, वनस्पति, पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं की विविधता खत्म हो रही है, वह चिन्ता का कारण है। यदि यही गति रही तो अपनी देशी प्रजाति कुछ बचेगी ही नहीं और उस तरह की दशा भी हो सकती है जैसे आस्ट्रेलिया ने अपने देशी आलू के स्थान पर विदेशी आलू अपना लिया पर जब उस में विषाणु रोग लगा तो पूरा-का-पूरा आलू नष्ट हो गया क्योंकि रोग प्रतिरोधी देशी किस्म पहले हो खो चुका था।"

प्रदेश में होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिले का बड़ा हिस्सा कभी कोदो, कुटकी, समा और मक्का की खेती का क्षेत्र रहा है। बालाघाट, शहडोल, सीधी में देसी धान तो सतना, पन्ना और सागर में गेहूँ, धार, झाबुआ गेहूँ, मक्का और कपास तथा शिवपुरी और श्योपुर जिले में बाजरा और धनिया की देसी प्रजातियों का इलाका माना जाता रहा है। इसी तरह हर क्षेत्र की अपनी सब्जियाँ हुआ करती थीं। लेकिन बीते कुछ सालों में इनमें बड़ा बदलाव आया है। इस बीज यात्रा में अनाज, सब्जियों तथा एनी वनस्पतियों के देसी बीजों का संग्रह करना, खेती के परम्परागत ज्ञान को सहेजना तथा खानपान की पद्धतियों की पड़ताल, लोगों को जागरूक बनाना, लुप्तप्राय बीजों का संरक्षण करना और खेती में पानी के अन्धाधुन्ध उपयोग रोकने की तकनीकों का अध्ययन करना शामिल था। इसी साल मई-जून के महीनों में यह यात्रा निकाली गई थी।

यात्रा में शामिल बाबूलाल दाहिया से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि इसका अनुभव बड़ा ही अच्छा रहा है। हमें करीब एक हजार किस्मों के बीज मिले (इनमें से कई तो लुप्तप्राय हैं) तो स्थानीय किसानों से बहुत अच्छी बातें भी हुईं। दूरस्थ अंचलों में अब भी शहरी और शहर के आसपास के इलाकों की तुलना में देसी प्रजातियाँ ज्यादा मिलती हैं। संग्रहित बीजों को अब बीज बैंक में रखकर इनसे और भी (बहुगुणित कर) बीज उत्पादन किया जाएगा।

वे बताते हैं कि आजादी से पहले मध्य प्रदेश में सिर्फ धान की ही एक लाख दस हजार से ज्यादा प्रजातियाँ थीं। गेहूँ और ज्वार की दर्जन भर प्रजातियाँ हुआ करती थीं। इनमें अपेक्षाकृत पानी भी कम लगता था और कम बारिश में भी फसल आ जाया करती थी। मोटे अनाज की देसी प्रजातियाँ खासी पौष्टिक हुआ करती थीं, जो हमारे मेहनतकश किसानों, आदिवासियों और मजदूर तबके के लोगों को पर्याप्त पोषण और ऊर्जा देती थी।

इन दिनों बाजार में कई तरह के चमत्कारी बीजों की भरमार है पर यदि हम परम्परागत अनाजों और पशुओं का इतिहास देखें तो सभी जंगल की देन हैं, जिन्हें हमारे किसान पूर्वज जंगलों से लाये थे और उनके गुणधर्मों को जानकर अनाज खेतों में उगाने लगे। उन्होंने मवेशियों को भी पालतू बना लिया, लेकिन अब अनाज व पशुओं के एक भी पूर्वज जंगल में नहीं बचे। इसलिये यदि एक भी प्रजाति खत्म हुई तो दोबारा लौटकर नहीं आएगी। यदि कोई कृषि वैज्ञानिक अनुसन्धान करता है तो उन्हीं पूर्वजों की खोजी हुई किस्मों से।खासकर कोदो, कुटकी, समा, मक्का, काकुन और अन्य। ये देसी अनाज लम्बे समय से हमारे यहाँ की भौगोलिक जलवायु में रचे-बसे थे और यहाँ के किसानों की हजारों साला विकास यात्रा से निकलकर आये थे। लेकिन बीते 50 सालों में हमने उत्पादन बढ़ाने के नाम पर इन्हें बर्बाद कर दिया। इससे खेती में पानी का संकट सामने है तो भुखमरी और कुपोषण भी काफी हद तक बढ़ गया है। अकेले धान की एक लाख से ज्यादा किस्में करीब–करीब लुप्त हो गईं।

देशी अनाज हजारों वर्षों से यहाँ की जलवायु में रचे बसे हैं और जलवायु के अनुसार पूरी तरह उपयुक्त हैं। वे जहाँ कम वर्षा और ओस में पक जाते हैं वहीं सूखा और रोगों से लड़ने में भी इनमें गजब की क्षमता है। इन्हें अतिरिक्त पानी की जरूरत नहीं होती, इसलिये भूजल भण्डार भी बना रहता है। जब कोई अनाज विलुप्त हो जाता है तो उसके साथ उनके वे सारे गुण-धर्म भी चले जाते हैं जो हजारों साल यहाँ उगकर यहाँ की पारिस्थितिकी में विकसित किया है।

इन दिनों बाजार में कई तरह के चमत्कारी बीजों की भरमार है पर यदि हम परम्परागत अनाजों और पशुओं का इतिहास देखें तो सभी जंगल की देन हैं, जिन्हें हमारे किसान पूर्वज जंगलों से लाये थे और उनके गुणधर्मों को जानकर अनाज खेतों में उगाने लगे। उन्होंने मवेशियों को भी पालतू बना लिया, लेकिन अब अनाज व पशुओं के एक भी पूर्वज जंगल में नहीं बचे। इसलिये यदि एक भी प्रजाति खत्म हुई तो दोबारा लौटकर नहीं आएगी। यदि कोई कृषि वैज्ञानिक अनुसन्धान करता है तो उन्हीं पूर्वजों की खोजी हुई किस्मों से। इसलिये यदि कोई किस्म ही न बची तो हमारे देश का कृषि अनुसन्धान भी प्रभावित होगा।

गोंड और बैगा आदिवासियों का प्रिय लोक वाद्य मांदल है। यह ढोलक से कुछ लम्बा लकड़ी के खोल में चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है और डोरी के स्थान पर चमड़े की ही डोरी लगाते हैं। इसे सीधी, शहडोल, अनूपपुर और डिंडोरी हर जगह के आदिवासी बजाकर करमा गीत गाते है।

आदिवासी समुदाय हर साल जब नया अनाज खाना शुरू करता है तो सबसे पहले परम्परागत देसी धान सरइया का चावल साजा वृक्ष के दोने में रख कर भगवान बड़ादेव को भोग लगा कर ही नया अनाज खाना शुरू करता है। इसलिया सरइया धान पर करमा गीत गाया जाना स्वाभाविक है। यह उनका अनुष्ठानिक गीत है। एक करमा गीत देखिए-

मोर पकि गय रे, मोर पकि गय रे।
साठ दिना मा धान सरइया पकि गय रे।
लड़िका छेहर खाय गोलहथी पकि गय रे॥
मोर पकि गय रे साठ दिना मा धान सरइया पकिगय रे,
बड़ा देव का भोग लगाऊ पकि गय रे
मोर पकि गय रे साठ दिना मा धान सरइया पकि गय रे॥


मतलब यह कि मेरी साठ दिन में पकने वाली सरइया नामक धान पाक गई है। अब घर के लड़के बच्चे रोज गोलहथी बर्तन में पकाया हुआ गीला चावल खा सकेंगे। मैं इसे खाने के पहले भगवान बड़ादेव का भोग भी लगाऊँगा।

इसी तरह आदिवासियों का एक त्योहार बेदरी भी होता है जिसमें हर आदिवासी किसान नवतपा रोहिणी नक्षत्र में अपने घर से टोकनी में अनाज लेकर देवालय जाते हैं और अपने अनाज को पूजा के लिये वहाँ रखते हैं। बाद में वहाँ का पंडा सबको बोने के लिये मंत्रपूरित एक-एक मुट्ठी अनाज वापस करता है बाकी खेत में बिखेर देता है।

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ ब्लाक में एक ऐसा गाँव भी है जो धान की स्थानीय प्रजाति भेजरी के नाम से ही पहचाना जाता है। भेजरी 90 दिन में पकने वाली ऐसी धान है जिसका चावल लाल किन्तु खाने में स्वादिष्ट होता है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण होने के कारण इसे प्रसूता महिलाओं को भी खिलाया जाता है। सदियों से यहाँ के खेतों में बड़े पैमाने पर भेजरी धान उगाई जाती थी बाद में यहाँ बस्ती बसी तो गाँव का नाम भी भेजरी पड़ गया। यहाँ गौंड और पनिका समुदाय के लोग बसते हैं। आज भी यहाँ भेजरी धान ही अधिक मात्रा में घर-घर उगाया जाता है।

धन रे तै बइगा पूत, डोगर घुस जावे।
कांदा कुसा खई खाइ ला जिनगी बितावे॥


यह बैगा जनजाति का गीत है जिसका आशय है कि बैगा पुत्र तुझे धन्य है जो सुबह होते ही डोगर में घुस जाता है और वहाँ उगे कन्द-फल आदि खाकर अपनी जिन्दगी बिताता है। यहाँ विवाह पक्का होने पर वर पक्ष 5 कुंडों यानी 40 किलो कुटकी भोजन खर्च के लिये वधू पक्ष को देता है।

बैगा जनजाति डिंडोरी और अनूपपुर के पहाड़ी भूभाग में पाई जाती है। इनकी बगैर हल की बेवर खेती को पहले अंग्रेजों ने रोकना चाहा पर जब बैगाओं ने कहा कि धरती हमारी माँ है, हम हल से उसका पेट नहीं चीर सकते तो उन्होंने उन्हें डिंडोरी और अनूपपुर के पहाड़ों में बसा बेवर खेती की अनुमति दे दी और उस स्थान को बैगाचक नाम की संज्ञा दी।

बैगा शब्द वैद्य का अपभ्रंश है, बैगा जड़ी-बूटियों का सबसे बड़ा जानकार होता है। सम्भव है कि बाद में आर्यों ने भी जड़ी-बूटियों का ज्ञान इन बैगाओं से ही प्राप्त किया हो। बताते हैं कि आर्य जहाँ से आये थे, वहाँ इस तरह जड़ी-बूटियों वाला क्षेत्र नहीं था और औषधियों के बारे में अगर सबसे बड़ी विविधता कहीं है तो हिमालय के बाद दूसरा स्थान अमरकंटक का ही है।

आयुर्वेद में औषधि को भेषज और वैद्य को भेषजी कहा जाता है जो बदल कर बैद्य बैदा और बाद में बैगा हो गया। बैगा जड़ी बूटी और पेड़ पौधों का कितना जानकार है यह सहज ही समझा जा सकता है। कि यदि किसी शहरी व्यक्ति से पेड़ों का नाम पूछा जाये तो 10-15 पेड़ों से ज्यादा नाम नहीं बता पाता और गाँव वाला 40-50 पर यदि किसी बैगा बालक से भी पूछा जाये तो वह सैकड़ों पेड़ पौधों और जड़ी-बूटियों का नाम बता सकता है।

श्री दाहिया बताते हैं कि अपढ़ बैगाओं के पास कोई लिपि तो थी नहीं कि उसका कही प्रलेखीकरण करते। सारी जानकारी मौखिक परम्परा में थी इसलिये अन्य पढ़े लिखे समुदायों ने इसी तरह उसे अपना ज्ञान बनाकर लिपिबद्ध कर लिया जैसे 110 प्रकार के धान बीज तो हमें किसानों से मिले, नाम भी उन्हीं किसानों के दिये हुए हैं पर धान बीजों का संकलन कर उनके गुण धर्मों का अध्ययन हमने किया तो कहा जाएगा कि बाबूलाल दाहिया के पास 110 प्रकार की देसी धान है।

वे मानते हैं कि गहराई से देखा जाय तो कृषि आश्रित समाज में सदियों से कई तरह के अनाज और तरकारियों के बीज की संरक्षक महिलाएँ ही थीं। उस व्यवस्था में काम का एक बँटवारा-सा था कि घर के बाहर का काम पुरुष देखे और अन्दर का महिलाएँ। जैसे ही कटाई मिजाई के बाद पुरुष अनाज को घर में ले आता वह सब महिलाओं के अधिकार क्षेत्र में आ जाता कि वे उसे कब कैसे सुखाए एवं भण्डारण करें। इसके लिये महिलाएँ कई आकृति की कुठली-कुठुलिया पेउला बण्डे बखारी आदि बनाती थीं। किस अनाज को कब और कितनी बार सुखाना है, सारी मौखिक और पारम्परिक तकनीक उनके पास थी।

सुखाये हुए अनाज में कितनी मात्रा में नीम की सूखी पत्ती या प्याज लहसुन के सूखे छिलके मेथी के सूखे पत्तों को कैसे मिलाकर रखना है, यह सब विरासत में मिले ज्ञान का हिस्सा था। इसी तरह भिंडी, लौकी, तरोई, कुंमढ़ा, टमाटर, फूट, ककड़ी के बीज रखने की अपनी तकनीक थी। घुन कीट से बचने के लिये कुछ उपले में पाथ कर रखे जाते तो कुछ को कड़वी लौकी के खोल में रख दिया जाता। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बीज आने के बाद यह सारा ज्ञान उनके हाथ से छूट कर विलुप्त हो गया।

इस ज्ञान की बानगी परसमनिया पठार के डाडी डबरा और लदबद गाँव की महिलाओं में अब भी देखने को मिलती है। बीज बचाओ कृषि बचाओ यात्रा की चौपाल में उन्होंने न सिर्फ तरह-तरह की सब्जियों और अनाजों के देसी बीज दिये बल्कि रख-रखाव की तकनीकी जानकारी भी दी। इनकी बीज रखने की तकनीक को सुन-देखकर नीलेश कपूर, शैलेश सिंह एवं जगदीश यादव तो विस्मित होकर देखते रह गए कि गाँव का ट्रेडिशनल बीज भर नहीं ट्रेडिशनल नॉलेज भी विलुप्त हो चुका है या उसे विलुप्तता का खतरा है। इसलिये समय के मार से उसे भी बचाने की जरूरत है।

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