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बरगी के गाँवों में आइसीडीएस और मध्यान्ह भोजन एक विश्लेषण

Author: 
अपरा विजयवर्गीय
Source: 
‘बरगी की कहानी’, प्रकाशक - विकास संवाद समूह, 2010, www.mediaforrights.org

कठौतिया एवं बढ़ैयाखेड़ा गाँव की स्थिति तो और भी खराब है क्योंकि ये दोनों गाँव एक टापू पर स्थित है। कठौतिया में तो गाँव दो मोहल्लों में बँटा है और एक मोहल्ले से दूसरे की दूरी लगभग 3 किमी है यह तीन किमी भी यूँ तो आसान सा आँकड़ा है पर बच्चों की दृष्टि से देखें तो 3-6 वर्ष के बच्चों को रोज आँगनबाड़ी जाना या 6 साल से कुछ बड़े बच्चों को प्राथमिक विद्यालय जाना हो, जो कि दूसरे मोहल्ले में है, वहाँ पैदल जाना तो सम्भव ही नहीं हैं नाव का भी कोई ठिकाना नहीं कब मिले और रोज नाव से जाने व आने के लिये 3-3 रुपए अर्थात रोज 6 रुपया व्यय कर पाना किस परिवार के लिये सम्भव होगा। बींझा, बरगी नगर से करीब 15 किमी. दूर, गाँव। जो कि मुख्य मार्ग से भी लगभग 5 किमी. अन्दर घने जंगल के मध्य तीन तरफ पानी व एक तरफ जंगल से घिरा है। इस गाँव से बरगी नगर जाने के लिये पहले पाँच किमी पैदल चलकर रोड पर आना होता है फिर यदि कोई बस या अन्य साधन मिल जाये तो ठीक अन्यथा शेष 10 किमी. भी पैदल चलकर बरगीनगर तक पहुँचना होता है। यह स्थिति सिर्फ बींझा की ही नहीं है बल्कि मगरधा, पायली, खामखेड़ा, आदि सभी गाँवों की है। इनके अलावा कठौतिया व बढ़ैयाखेड़ा गाँव तो पानी के बीच में है जिन तक पहुँचने के लिये नाव या मोटरबोट का ही सहारा होता है।

अब मोटरबोट तो सबको उपलब्ध हो नहीं पाती है और नाव से एक तरफ की दूरी के लिये कम-से-कम दो घंटे लगते हैं। ये सभी गाँव अवंति सागर बाँध परियोजना (बरगी डैम) के डूब प्रभावित हैं। ये सभी गाँव विस्थापित हुए हैं इन्हें शासन द्वारा वीरान गाँव घोषित किया जा चुका है। इससे गाँवों में न तो नरेगा का क्रियान्वयन हो पा रहा है न ही रोजगार का ही कोई जरिया बचा है। इनमें से अधिकांश में न तो आँगनबाड़ी भवन बन पा रहा है न ही स्कूल भवन। इन सभी गाँवों में जिन स्वसहायता समूहों द्वारा सांझा चूल्हा योजना के अन्तर्गत बच्चों (आँगनबाड़ी व स्कूल के) को आहार उपलब्ध करवाया जा रहा है उन्हें भोजन के लिये दाल, तेल, सब्जी मसाले आदि के लिये किसी-न-किसी तरह बरगी नगर पहुँचना होता है और इन वस्तुओं को ढोकर लाना होता है।

बरगी की कहानी बींझा गाँव का आँगनबाड़ी केन्द्र सरकारी भवन में चलता है और कार्यकर्ता भी स्थानीय है। यहाँ स्कूल व आँगनबाड़ी में बच्चों को भोजन खिलाने की जिम्मेदारी गंगा स्वसहायता समूह की है। गंगा स्वसहासता की अध्यक्ष जैनवती व सचिव रज्जो बाई है। स्कूल में खाना बनाने के लिये किचन शेड बना हुआ है जहाँ स्कूल व आँगनबाडी केन्द्र के बच्चों के लिये खाना मेन्यू के अनुसार बनाया व खिलाया जाता है।

इस क्षेत्र के गाँवों की विडम्बना यह है कि स्वसहायता समूह के सदस्यों को बच्चों को खाने में सब्जी देने के लिये भी सुबह चार बजे उठकर एक दिन पहले बीनकर रखी लकड़ियाँ सिर पर ढोकर 10-20 किमी पैदल चलकर बरगीनगर पहुँचकर गली-गली घूमकर बेचना होता है तब लौटते में सब्जी, मसाले व अन्य आवश्यकता का सामान ला पाते हैं। मसाले, तेल व ईंधन (मिट्टी का तेल) तो चलो महीने में एक बार लाया जा सकता है परन्तु सब्जी तो 1-2 दिन से ज्यादा की नहीं लाई जा सकती है। इसके बावजूद भी शासन की ओर से पोषण आहार का पैसा कभी 3 कभी 4 व कभी कभी 5 महीने में जाकर मिलता है।

बींझा व मगरधा में तो फिर भी सहकारी समिति गाँव में ही होने से गेहूँ गाँव में ही मिल जाते है परन्तु अन्य गाँवों में तो समूह को गेहूँ लेने के लिये भी समिति के गाँव तक जाना होता है जो कि कई स्थानों पर 15-20 किमी दूर है व कठौतिया व बढ़ैयाखेड़ा से तो आने जाने व आहार ले जाने तक की व्यवस्था नाव से करना होता है, क्योंकि इनका पंचायत मुख्यालय पानी के दूसरे छोर पर है।

इन क्षेत्रों की आँगनबाड़ी कार्यकर्ता की स्थिति तो और भी दुखद है क्योंकि 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चे, गर्भवती व धात्री महिलाएँ व किशोरी बालिकाओं के लिये टेक होम राशन के पैकेट पूरे माह के लिये स्वयं के व्यय पर लाने होते हैं।

बरगी की कहानी मिनी आँगनबाड़ी केन्द्र खामखेड़ा तो और भी समस्या से जूझ रहा है, क्योंकि यह एक छोटा सा गाँव है जो कि बींझा आँगनबाड़ी से सम्बद्ध है। इसका संचालन एक सहायिका, सुश्री माया कोकड़े, द्वारा किया जाता है। माया को एक माह में कुल 750/- मिलते हैं जिसमें से लगभग 60-75 उन्हें टेक होम राशन के पैकेट लाने के लिये व्यय करने होते हैं। खामखेड़ा पहुँचने का रास्ता तो और भी कच्चा व पहाड़ी रास्तों में से (ऊँचे नीचे) है। ये मिनी आँगनबाड़ी केन्द्र लगभग 8-9 महीने पहले ही खुला है।

खामखेड़ा में 3-6 वर्ष के बच्चों व स्कूल के बच्चों के भोजन को बनाने का कार्य लक्ष्मी स्वसहायता समूह द्वारा किया जाता है। अभी केन्द्र को पकाने खिलाने के लिये बर्तन आदि भी नहीं मिले है और न ही गेहूँ के लिये कूपन।

कठौतिया एवं बढ़ैयाखेड़ा गाँव की स्थिति तो और भी खराब है क्योंकि ये दोनों गाँव एक टापू पर स्थित है। कठौतिया में तो गाँव दो मोहल्लों में बँटा है और एक मोहल्ले से दूसरे की दूरी लगभग 3 किमी है यह तीन किमी भी यूँ तो आसान सा आँकड़ा है पर बच्चों की दृष्टि से देखें तो 3-6 वर्ष के बच्चों को रोज आँगनबाड़ी जाना या 6 साल से कुछ बड़े बच्चों को प्राथमिक विद्यालय जाना हो, जो कि दूसरे मोहल्ले में है, वहाँ पैदल जाना तो सम्भव ही नहीं हैं नाव का भी कोई ठिकाना नहीं कब मिले और रोज नाव से जाने व आने के लिये 3-3 रुपए अर्थात रोज 6 रुपया व्यय कर पाना किस परिवार के लिये सम्भव होगा। वह भी उस स्थिति में जब कि उनके स्वयं के पास भी कोई रोजगार का जरिया न हो।

कठौतिया पहुँचने पर एक बात की और जानकारी मिली कि आँगनबाड़ी कार्यकर्ता छोटे बच्चों व महिलाओं के लिये टेक होम राशन के पैकेट तो हर सप्ताह पहुँचा देती है परन्तु कभी उसने इन परिवारों से मिलकर इन आहारों को पकाने का तरीका बताने की जहमत नहीं उठाई। नतीजतन जब हम वहाँ पहुँचे तो एक महिला उसके पोते को दिये राशन में पैकेट (पौष्टिक खिचड़ी) को खोलकर सूपड़े में फटककर साफ कर रही थी व इस सफाई में उसने सारे मसाले फटककर निकाल दिये थे। महिलाओं के लिये पौष्टिक खिचड़ी के पैकेट में 750 ग्राम व बच्चों के लिये 625 ग्राम का सामग्री होती है जो कि पाँच दिन के लिये होती है इसमें मूँग की दाल की मात्रा किसी भी स्थिति में 20-25 ग्राम से अधिक नहीं थी। इस महिला ने यह नगण्य दाल भी कंकर समझ कर बीनकर निकाल दी थी।

यदि इस आहार का विश्लेषण किया जाये तो हम आसानी से समझ सकेंगे कि बच्चों को जिस पोषण आहार से एक दिन में 10-12 ग्राम प्रोटीन व 300 कैलोरी ऊर्जा व महिलाओं को 16-20 ग्राम प्रोटीन व 600-800 कैलोरी ऊर्जा दी जाने की बात कही जाती है। इस पौष्टिक खिचड़ी से बच्चों को 9.4 ग्राम व महिलाओं को 11 ग्राम प्रोटीन व बच्चों को 431 कैलोरी ऊर्जा व महिलाओं को 518 कैलोरी ऊर्जा प्रतिदिन मिल पाती है। परन्तु इसमें से यदि हम मूँगदाल, जो कि प्रोटीन का एक मुख्य स्रोत है, को अलग कर देंगे तो बच्चों को केवल 8.1 ग्राम व महिलाओं को 9.9 ग्राम प्रोटीन और बच्चों को 414 कैलोरी व महिलाओं को 500 कैलोरी ऊउर्जा ही मिल पाएगी।

मसाले, जिनकी पौष्टिकता गणना में तो शामिल नहीं की जा सकती है परन्तु उन में सूक्ष्म तत्व, विटामिन व खनिज लवण भरपूर होते हैं वह भी यदि हितग्राहियों को उपलब्ध नहीं हो पाएँगे तो बच्चों व महिलाओं को पौष्टिक आहार किस प्रकार मिल सकेगा। अतः आवश्यकता इस बात की है कि टेक होम राशन के साथ ही महिलाओं को उसे पकाने की विधि भी बताई जाये।

 

बरगी की कहानी

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

बरगी की कहानी पुस्तक की प्रस्तावना

2

बरगी बाँध की मानवीय कीमत

3

कौन तय करेगा इस बलिदान की सीमाएँ

4

सोने के दाँतों को निवाला नहीं

5

विकास के विनाश का टापू

6

काली चाय का गणित

7

हाथ कटाने को तैयार

8

कैसे कहें यह राष्ट्रीय तीर्थ है

9

बरगी के गाँवों में आइसीडीएस और मध्यान्ह भोजन - एक विश्लेषण

 


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