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वनस्पति जीवनाशियों का महत्त्व

Source: 
ग्राविस, जोधपुर, 2006

नीम के वृक्ष का प्रत्येक भाग जड़, छाल, फूल, पत्ते तथा फल अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं, परन्तु औषधीय एवं व्यावसायिक दृष्टि से नीम का जो भाग सर्वाधिक मूल्यवान सिद्ध हो चुका है वह है इसका फल अथवा फल से प्राप्त होने वाला बीज। नीम का बीज न केवल औषधीय दृष्टि से उपयोगी है बल्कि यह उच्च श्रेणी के कीटनाशक का भी स्रोत है तथा बहुमूल्य उर्वरक का भी। भारतवर्ष में वनस्पतियों का इस्तेमाल प्राचीनकाल से ही हो रहा है। इनका उपयोग घाव, फोड़े, दर्द, सूजन अमीर निवारण और भण्डारण में अन्न फल और फूल के रख-रखाव हेतु किया जाता था। वनस्पति के किसी भाग यानि जड़, तना, पत्ता, छाल, फल, फूल और बीज को इस्तेमाल करके हानिप्रद जीवों की रोकथाम की जाती है। इन भागों में रासायनिक तत्व होते हैं जो कीट, रोग और खरपतवार आदि का नियंत्रण करते हैं। इसे वनस्पति जीवनाशी या जैविक जीवनाशी भी कहते हैं जो फसलों स्तरधारियों, अनाज, मिट्टी, पानी और पर्यावरण के लिये पूर्व सुरक्षित होता है।

हमारे देश में कई पौधे जैसे नीम, करंज, तम्बाकू, सीताफल, वकायन, क्राइसेन्थीमन आदि पौधे विस्तृत रूप से पाये जाते है। जिनके विभिन्न उत्पादों के कीट व्याधियों का नियंत्रण आसानी से किया जाता है।

नीम


यद्यपि नीम के वृक्ष का प्रत्येक भाग- जड़, छाल, फूल, पत्ते तथा फल अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं, परन्तु औषधीय एवं व्यावसायिक दृष्टि से नीम का जो भाग सर्वाधिक मूल्यवान सिद्ध हो चुका है वह है इसका फल अथवा फल से प्राप्त होने वाला बीज। नीम का बीज न केवल औषधीय दृष्टि से उपयोगी है बल्कि यह उच्च श्रेणी के कीटनाशक का भी स्रोत है तथा बहुमूल्य उर्वरक का भी। “आम के आम गुठलियो के दाम’’ वाली कहावत यदि किसी वृक्ष/फल के बारे में अक्षरशः सत्य प्रतीत होती है तो इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है- नीम।

नीम के बीजों से तेल निकालने के लिये कुटीर या लघु उद्योग इकाई लगाई जा सकती है। यद्यपि इसी इकाई में अनेक अन्य अखाद्य बीजों जैसे करंज, महुआ, पलास, कुसुम, अरंडी, तुम्बा आदि का भी प्रक्रियाकरण किया जा सकता है तथा एक्सपेलर को धोकर/साफ करके इसमें खाद्य तेल भी निकाले जा सकते हैं परन्तु प्रस्तुत इकाई में केवल नीम के बीजों को ही प्रक्रियाकृत किया जाना प्रस्तावित है।

नीम एवं नीम उत्पादों का कीट व्याधि नाशक के रूप में उपयोग नया नहीं है। पूर्व काल से ही हमारे देश के कृषक यह जानते थे कि नीम एक मात्र ऐसा वृक्ष है जो असंख्य टिड्डियों के आक्रमण से बचा रहता है। नीम की पत्तियों का प्रयोग अनादि काल से सुरक्षित अन्न भण्डारण में किया जा रहा है। विगत कई वर्षों से नीम वृक्ष की गुणवत्ता परखने के लिये अनुसन्धान होते आ रहे हैं। परन्तु इसका उपयोग सीमित ही रहा है।

कुछ वर्षों पूर्व ही इसकी गुणवत्ता की परख विभिन्न क्षेत्रों में की गई व उपयोग वृहद रूप से बढ़ा है। नीम के सभी भाग, जड़, तना, पत्ती, फूल व फलों में कीटनाशक गुण पाये जाते हैं निंबौली में सबसे अधिक यह गुण पाया जाता है।

वर्तमान में नीम आधारित बहुत से उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं। देश में 40 ऐसी प्रौद्योगिक इकाइयाँ है जो 37 विभिन्न उत्पादों का उत्पादन कर रही है। एवं जिनका बाजार मूल्य रु. 300-400 मिलियन रहा है। अब हमारी यह नितान्त आवश्यकता है कि हम इन्हीं उत्पादों का उपयोग दिनों-दिन अनुसन्धानों द्वारा बढ़ाए एवं कृषकों को इनकी उपयोगिता के बारे में विस्तार एवं प्रसार के द्वारा विस्तृत जानकारी दें। ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा दें जिनके द्वारा कृषक भाई इन नीम एवं नीम के उत्पादों को अपनी खेती की तकनीक में पूर्ण रूपेण सम्मिलित करें। इसमे समेकित नाशीजीव प्रबन्धन, जैविक खेती एवं पर्यावरण सन्तुलन के मूलभूत सिद्धान्तों को बल मिलेगा।

नीम का कीटों पर प्रभाव


अनुसन्धानों के बढ़ते क्रम में यह निष्कर्ष निकाला जा चुका है कि नीम के उत्पाद कीटों की 200 से अधिक प्रजातियों को विभिन्न अवस्थाओं पर प्रभावित करते हैं। नीम के वृक्ष से तैयार किये जाने वाले विभिन्न उत्पाद कीटों के लिये बहुउपयोगी हार्मोंस का आकार-प्रकार पर निर्धारण करते है। कीटों का शरीर इन नीम के तत्वों को सोख लेता है।

ये हार्मोंस अन्तः प्रणाली को सुचारु रूप से चलाने में व्यवधान उत्पन्न करते है तथा कीटों के स्वभाव एवं शरीर कार्यिकी में परिवर्तन पैदा करते हैं। जिससे कीटों का मस्तिष्क एवं शीरी प्रजनन कार्य करने के लिये अस्थिर हो जाता है एवं उनकी संख्या सीमित रह जाती है।

नीम का रोग पर प्रभाव


आज तक जितने भी अनुसन्धान एवं उपयोग हुए हैं सभी में नीम कीटनाशक के रूप में ज्यादा उपयोग हुआ है। नीम की निंबोली के सत से सीमोनाइड नामक तत्व निकाला जाता है जिसमे कीटनाशक गुण होते हैं नीम के तेल के उपयोग का उल्लेख कहीं-कहीं पर किया गया है। इसके तेल में भी अन्य तेलों के समान समानता पाई जाती है परन्तु कृषि विभाग, अमेरिका के अनुसन्धानकर्ताओं ने यह परिणाम निकाला है कि नीम के तेल में भी जीवनाशीय गुण पाये जाते हैं और इसका उपयोग पौध रोग नियंत्रण में भी किया जा सकता है। उन्होंने इसका उपयोग प्रमुख विनाशकारी रोग जैसे भभूतिया, चूर्णिल, आसिता एवं गेरुआ के नियंत्रण के लिये सफलतापूर्वक किया और यह प्रमाणित किया कि नीम के तेल के उपयोग से पौधों पर किसी भी प्रकार का कोई भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।

सर्वप्रथम पौध-रोग वैज्ञानिक, जेम्स लूक ने नीम के तेल एवं जल के मिश्रण का उपयोग सुगंधित एवं शोभा के लिये लगाए जाने वाले पौधों में गेरुआ एवं भभूतिया रोग का नियंत्रण कम (0.25 प्रतिशत) सान्द्रता का उपयोग, प्रभावी रूप से किया। उन्होंने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि नीम के तेल में फफूंदनाशक एवं कीटनाशक दोनों ही प्रकार के गुण होते हैं जबकि इसमे अजेडिरेचटिन नामक तत्व नहीं होता। इसके बाद, एक अन्य वैज्ञानिक जेरिनि स्आवेली ने अपने अनुसन्धानों द्वारा यह सिद्ध किया है कि दलहनी वर्गीय सब्जियों में लगने वाले गेरुआ रोग के नियंत्रण के लिये नीम का तेल उपयोग 100 प्रतिशत प्रभावकारी होता है। निम्नलिखित विभिन्न रूपों में इनका उपयोग किया जा रहा है एवं भविष्य में इनके विस्तार की सम्भावनाएँ प्रबल है।

1. फफूंदनाश के रूप में


विश्व भर में नीम का उपयोग वृहद रूप से फफूँदनाशक के रूप में हो रहा है। चाहे फसल हो या वृक्ष हो यह सर्वविदित है कि फफूंद/कवक अनेकानेक प्रकार से फसल को हानि पहुँचाते हैं। जिनकी गणना उग्र रूप में की जाती है इनमें से कुछ एक प्रमुख पौध रोगों को फफूंदनाशकों एवं रसायनों द्वारा कम किया जा सकता है। देश की मुख्य खाद्यान्न जैसे गेहूँ धान मक्का पर भी इन रोगों का प्रकोप होता है।

नीम के तेल का उपयोग, चने के लगने वाले उगरा के प्रमुख रोग जनक जैसे राइजोक्ट्रोनिया सोलेनाई, स्केलेरोशियम रोल्फसाई एवं फ्यूजोरियम ऑक्सीस्पोरम की रोकथाम के लिये सफलतापूर्वक किया जा चुका है एवं उनके परिणाम भी अच्छे मिले हैं। नीम की खली का उपयोग भूमि जनक बहुत से हानिकारक रोगों के नियंत्रण में भी प्रमाणित किया गया है जो कि फसल की अनुपस्थिति में अपना जीवनयापन भूमि में या फसल अवशेषों पर करते हैं।

नीम के उत्पादों का एक अन्य उत्पाद है जिसे निम्बोली के नाम से जाना जाता है। इसका भी उपयोग दिनों दिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि यह सरलता से उपलब्ध हो जाती है व पर्णों पर लगने वाले विभिन्न रोग जैसे चूर्णिल आसिता का सफल नियंत्रक भी है।

सामान्यतः यह देखा गया है कि अगर निंबोली के सत का छिड़काव समय अन्तराल पर किया जाता है तो 90 प्रतिशत फसल को पर्ण-रोगों से बचाया जा सकता है। यह उसी समय सम्भव है जबकि इसका रोग आने से पूर्व किया गया हो।

विषाणुनाशक के रूप में


आधुनिक कृषि में विषाणु रोग फसलों को नए-नए रूपों से क्षति पहुँचा रहे हैं एवं जिनका त्वरित निदान सम्भव ही नहीं हो पा रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि विषाणु सामान्यतः पौधों की अन्तः कोशिकाओं में उपस्थित रहते हैं एवं पौधों में होने वाली सामान्य पादप कार्यिकी को प्रभावित करते हैं। विषाणु जनित रोगों का नियंत्रण एक जटिल प्रक्रिया है जबकि ऐसा रोग अन्य रोगजनक जैसे- जीवाणु, कवक सूत्रकृमि इत्यादि में नहीं है। वर्तमान में अपनाई जा रही नियंत्रण की प्रक्रियाओं से हम केवल विषाणुओं के फैलाव को रोक रहे हैं न कि शत-प्रतिशत नियंत्रण कर रहे हैं।

इन हानिकारक विषाणुओं का फैलाव का प्रकीर्णन कीटों, धूल के कणों या अनावश्यक रूप से भारी पानी द्वारा होता है अनुसन्धान द्वारा ऐसे कई रसायनों को खोजा गया है जिनमें पशुओं व मनुष्यों में होने वाले विषाणुजनिक रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है। परन्तु ऐसा कोई भी रसायन नहीं खोजा गया जिससे कि पौधो में विषाणु द्वारा हो रही क्षति को रोका जा सके।

नीम के सत में ऐसा गुण पाया जाता है, जिससे कि नीम के उत्पाद, कीटों द्वारा विषाणुओं के प्रसारण को सीमित करते हैं, इसके विभिन्न सफल प्रायोगिक उदाहरण निम्नलिखित हैं। धान की फसल में लगने वाले प्रमुख टंगरु वायरस रोग की तीव्रता को नीम के तेल के छिड़काव से कम किया जा सकता है। जो कि धान में भूरा पुदका द्वारा पैदा होता है नीम एवं सीताफल के तेल के मिश्रण द्वारा धान के टंगरों विषाणु द्वारा उत्पन्न रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।

हमारे देश में नीम की पत्ती के सत द्वारा तम्बाकू मोजेक वायरस की रोकथाम सफलतापूर्वक की गई, जो कि कद्दूवर्गीय साग सब्जी में लगने वाला प्रमुख रोग है। अगर धान की रोपणी भूमि में पूर्व में उपयोग की गई नीम की खली पर लगाई जाती है तो विषाणु रोग का प्रकोप कम होता है जैसे धान की टुंगरो वायरस रोग।

3. सूत्र कृमिनाशक के रूप में


नीम के उत्पादों का भूमि उपचार के रूप में उपयोग सूक्ष्म जीवों के अलावा विभिन्न सूत्रकृमियों को भी प्रभावित करता है, जो अपना जीवनयापन भूमि में या पौधों की जड़ों के आस-पास करते हैं। सूत्र कृमि एक प्रकार के विनाशकारी सूक्ष्म जीव है जिनका कि स्वरूप सूत्र के समान होता है। इस गुण के कारण इनका नियंत्रण भी कठिन है एवं जिन रसायनों द्वारा इनका नियंत्रण सम्भव है उनका बाजार मूल्य अधिक होता है इस कारण उपयोग कम है।

बाजार में दिनों दिन बढ़ रही सूत्रकृमी नाशकों की माँग को इनके अत्यधिक विषैले प्रभाव एवं पर्यावरण के लिये असुरक्षा ने इनके उपयोग को और भी कम कर दिया है। नीम के उत्पादों का उपयोग इस दिशा में एक प्रभावकारी कदम है। नीम में निहित लीमोनोइड़ के यौगिक जो कि निंबोली से निकाले गए हैं जड़गाँठ सूत्रकृमी के लिये अत्यन्त ही प्रभावकारी हैं जिनके प्रकोप से लगभग सभी वर्ग की फसलें व पौधे प्रभावित होते हैं।

लीमोनोइड के तत्व सूत्रकृमी की इल्ली की वृद्धि एवं उसके अंडों के वृद्धि एवं विकास पर रोक लगाते है। यह बहुत ही कम सान्द्रता पर सूत्रकृमियों पर नियंत्रण कर सकता है। नीम का तेल निकालने के बाद तो भी अवशेष रह जाता है।

अगर उसका भी पानी से घोल बनाकर उपयोग किया जाये तो भी सूत्रकृमियों के प्रकोप को कम किया जा सकता है। अनुसन्धानों की इसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए हमारे देश के कृषि वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि यदि लकड़ी के बुरादे एवं नीम की खली का उपयोग भूमि उपचार के लिये किया जाता है। तो टमाटर के जडगाँठ सूत्रकृमियों की संख्या प्रकोपित भूमि मे शून्य तक की जा सकती है। उनके उपयोग से वैज्ञानिकों ने टमाटर के पौधों में अच्छी पौधे वृद्धि भी पाई। दक्षिण भारत के कृषक नीम की खली का उपयोग मसालों की खेती में भी करते आ रहे हैं वहाँ पर प्रतिवर्ष 100-300 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की खली का उपयोग होता है।

जैविक कीट नियंत्रक


जैविक कीट नियंत्रक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैंः-

1. वनस्पति आधारितः


इसमें मुख्यतः नीम, करंज, आक के रत्तों का रस या बीजों का तेल को छिड़काव में प्रयोग किया जाता है। प्राचीन ज्ञान के आधार पर इसमें गो मूत्र मिलाने से इसकी क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। इस प्रकार के कीट नियंत्रक एकल किसान या स्वयं सहायता समूह द्वारा बनाए जा सकते हैं। गौशालाओं से सहयोग लेकर इनका बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सकता है।

1. 100 लीटर गोमूत्र में 10 किलो नीम की पत्ती + 10 किलो आक की पत्ती + 10 किलो कुटा हुआ लहसुन मिलाकर मिट्टी या प्लास्टिक के पात्र में भूमि के अन्दर या छाया में ढँककर रख देते हैं। 10-15 दिन बाद इस मिश्रण को छानकर 1.5 या 50 लीटर की बोतल/जरीकेन में पैककर बेचते है। यह कीट नियंत्रक 3 माह तक प्रयोग के लिये ठीक रहता है। इसकी एक लीटर मात्रा 15-20 लीटर पानी में मिलाकर प्रत्येक 10-15 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए। एक लीटर की लागत 4-5 रुपए आती है और 10 रुपए/लीटर में बिक जाती है।
2. नीम के बीजों से तेल उत्पादित करने हेतु इकाई योजनाः- नीम आधारित कीट नियंत्रक हेतु कच्चे माल व तेल/खल उत्पादन की जानकारी निम्न प्रकार हैः-

नीम का तेल तथा खली


(अ) नीम के तेल के उपयोग


नीम के तेल के लिये विशाल बाजार उपलब्ध है। नीम तेल के अनेक उपयोग हैं जिनमें से कुछ प्रमुख उपयोग निम्नानुसार हैः- समन्वित कीट प्रबन्धन में नीम के उपयोग

1. नीम के तेल का उपयोग कीट नियंत्रक के रूप में
2. मच्छर भगाने में नीम के तेल का उपयोग
3. नीम तेल से औषधियों का निर्माण
4. नीम तेल का साबुन निर्माण में उपयोग
5. कॉस्मेटिक्स में उपयोग
6. लुब्रीकेंट के रूप में
7. नीम तेल का निर्यात

नीम के तेल की बिक्री के लिये सम्भावित बाजार


उपरोक्तानुसार देखा जा सकता है कि नीम के तेल के बहुपयोगी होने के कारण इसके लिये पर्याप्त बाजार उपलब्ध हो सकता है। मुख्यतया इसके विक्रय के लिये निम्नानुसार सम्पर्क किये जा सकते हैंः-

1. खादी ग्रामोद्योग आयोग/बोर्ड की विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत साबुन निर्माण करने वाली विभिन्न इकाइयाँ।
2. उच्च गुणवत्ता का धुलाई/टॉयलेट सोप का निर्माण करने वाली संस्थाएँ।
3. नीम तेल पर आधारित विभिन्न औषधियाँ-कॉस्मेटिक्स का निर्माण करने वाली इकाइयाँ।
4. फसल सुरक्षा हेतु बनाए जाने वाले पेस्टीसाइड्स/इंसेक्टीसाइड्स के निर्माता तथा कीट नियंत्रकों के उत्पादक।
5. नीम तेल से खाद्य तेल का निर्माण करने वाली इकाइयाँ।
6. नीम के तेल को अन्य औद्योगिक उपयोगों हेतु प्रयुक्त करने वाली इकाइयाँ जैसे- मच्छर भगाने से सम्बन्धित उत्पाद बनाने वाली इकाइयाँ, लुब्रीकेंट्स बनाने वाली इकाइयाँ तथा अन्य विविध उत्पाद।

नीम की खली के उपयोग


1. भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने हेतु एक उर्वरक के रूप में।


नीम की खली का उपयोग मुख्यतया खेती तथा बागवानी में मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने हेतु किया जाता है। इसके साथ-साथ कृमियों को समाप्त करने में भी यह काफी प्रभावी है, उदाहरणार्थ कोल्हू विधि से तेल निकाले जाने पर तेल की काफी मात्रा बीजों में रह जाती है।

इस खली का उपयोग सब्जी –फल के बागानों आदि में डालने के लिये किया जाता है, दूसरा इसका उपयोग नाइट्रोजन संरक्षण (उर्वरक के रूप में) हेतु किया जाता है, वर्तमान में इसका काफी मात्रा में उपयोग गन्ना तथा धान की खेती में किया जा रहा है इसके अतिरिक्त कई अन्य फूलों, फलों तथा सब्जियों की खेती में भी नीम आवश्यक रूप से प्रयुक्त होता है। प्रायः नीम की खली की बिक्री दर 350 से 450 रुपए प्रति क्विटंल तक होती है।

2. यूरिया के उपयोग से अधिकाधिक लाभ लेने में (नीम कोटेड यूरिया तैयार करने में)


हालांकि जैविक खेती में संश्लेषित उर्वरक जैसे यूरिया, डी.ए.पी. आदि का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता है किन्तु यदि किसी उपाय से यूरिया का उपयोग कम हो जाये तब इसे जैविक खेती की दिशा में बढ़ता हुआ कदम ही कहा जा सकता है। यह उन किसान भाइयों के लिये उचित उपाय है जो धीरे-धीरे जैविक खेती की ओर बढ़ना चाहते हैं।

सम्भवतया विभिन्न देशों के अधिकांश किसानों को यह जानकारी न हो कि पौधों को दिये जाने वाले यूरिया का अधिकांश भाग (65-70 प्रतिशत) बेकार चला जाता है तथा पौधे को मात्र 30-35 प्रतिशत यूरिया ही मिल पाता है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि कुछ यूरिया तो पानी में घुलकर जमीन के नीचे चला जाता है, जबकि कुछ वाष्पीकृत हो जाता है। इसके अतिरिक्त इसका एक बड़ा भाग जमीन में स्थित बैक्टीरिया से नाइट्रीफिकेशन द्वारा नाइट्रेट में बदल कर बेकार हो जाता है। यदि इस यूरिया का नाइट्रीफिकेशन रोक दिया जाये तो यह पौधे का अधिक मात्रा में अधिक दिनों के लिये उपलब्ध रहता है तथा नीम में यह सब करने की पूरी क्षमता है।

3. सूक्ष्म जीव अथवा कीट आधारित कीट नियंत्रकः-


(अ) कई कीट नियंत्रक में सूक्ष्मजीव जैसे वायरस, बैक्टीरिया, फफूंद आदि का प्रयोग कर कीट/फफूंद को नष्ट करने में प्रयोग किया जाता है। इनमें कुछ इस प्रकार हैः-

नाम प्रजाति उपयोग एन.पी.वी. बी.टी. मैट्रीजियम ट्राइकोडर्मा वायरस जीवाणु फफूंद फफूंद लट/इल्ली के मारने में लट को मारने मे दीमक/सफेद लट के नियंत्रक में दीमक/सफेद लट के नियंत्रण में भूमि से होने वाले फंफूद रोगों के नियंत्रण में जीवाणु खाद की तरह इन सभी जीवों के उत्पादन में प्रयोगशालाओं का होना आवश्यक है और कृषि स्नातक इसे प्रशिक्षण के बाद आसानी से प्रयोगशालाओं में बना सकते हैं।

(ब) दूसरे प्रकार के कीट नियंत्रक जिनमें परभक्षी कीटों का प्रयोग होता है जैसे ट्राईकोग्रामा, क्राइसोपारला आदि को प्रशिक्षण के बाद स्वयं सहायता समूह द्वारा बनाया जा सकता है।

इस प्रकार जैविक खेती में एकल किसान, स्वयं सहायता समूह, जैविक कृषि सहकारी समिति, कृषि स्नातक आदि सभी के लिये गाँव में ही रोजगार की अच्छी सम्भावनाएँ हैं। इसके लिये प्रशिक्षण व ऋण के लिये निम्न संस्थाओं से सम्पर्क किया जा सकता हैः-

1. क्षेत्रीय कार्यालय – खादी व ग्रामोद्योग आयोग- मार्जिन मनी स्कीम
2. क्षेत्रीय कार्यालय – नाबार्ड बैंक- किसान क्लब/स्वयं सहायता समूह
3. जिला उद्योग केन्द्र/डी.आर.डी.ए.

प्रधानमंत्री ग्राम स्वरोजगार व ग्रामीण मंत्रालय की अन्य रोजगार योजनाएँ


इनमें से अधिकांश योजनाओं में 20-30 प्रतिशत तक सब्सिडी का भी प्रावधान है। इस प्रकार विकेन्द्रित उत्पादन से गाँव में ही जैविक खेती के आदानों के उत्पादन से न केवल रोजगार पैदा होंगे वरन जैविक आदानों की क्षमता भी बढ़ेगी क्योंकि जैविक आदान तभी सबसे अधिक उपयोगी होते हैं जब उन्हें स्थानीय स्तर पर बनाकर तुरन्त उपयोग किया जाये।

खरपतवार नियंत्रण में रोजगार


परम्परागत रूप से खरपतवार नियंत्रण सामूहिक तौर पर हाथ से निराई-गुड़ाई करके किया जाता था। इसमें बहुत रोजगार पैदा होता था। आज खरपतवारनाशी रसायनों के उपयोग करने के कारण न केवल रोजगार समाप्त हुआ वरन भूमि व वातावरण भी जहरीला हो गया है। जैविक खेती में साफ बीज का प्रयोग, फसल चक्र तथा हाथ के चलने वाले औजारों से खरपतवार नियंत्रण किया जाता है जिसमें न केवल खेत में वरन इस छोटे औजारों व यंत्रों को बनाने वाले कारीगरों को रोजगार मिलता है पुरानी साइकिल से खरपतवार साफ करने का हैरो मात्र 500/- में बन सकता है जिससे 3-4 दिन में एक हेक्टेयर में निराई-गुड़ाई हो सकती है।

इस प्रकार जैविक खेती मे न केवल आदानो के उत्पादन में वरन इनमें काम आने वाले छोटे-छोटे औजारों उपकरणों को बनाने या ठीक करने वाले कारीगरों के लिये भी रोजगार की असीम सम्भावनाएँ हैं।

तम्बाकू


तम्बाकू के रस व धूल का रोगजनक कीड़ों के नियंत्रण हेतु 300 वर्ष पूर्व उपयोग किया जाता था। तम्बाकू में पाया जाने वाला निकोटिन तत्व कीटनाशक रूप में कार्य करता है। तम्बाकू का रस सरसों के माहू कपास की सफेद मक्खी, थ्रिप्स व वालवोर्म के भी प्रभावी ढंग से नियंत्रित करता है। धान से भूरा व हरा फुदला, बैंगन, आलू, पत्तगोभी के ग्रब्ज, चने की इल्ली, ल्यूटेरा पर भी प्रभावी पाया गया है तम्बाकू इल्ली की 10 प्रतिशत पत्ती रस छिड़काव मे प्रभाव पाया गया है।

करंज


करंज अतिप्राचीन भारतीय पौधा है। इस पौधे में करंजीनिन/फ्यूरा फ्लोविन नाम सक्रिय तत्व पाया जाता है। करंज को 1 प्रतिशत तेल से दलहनों को उपचारित कर रखने पर 5 से 6 महीने तक सुरक्षित रहती है तथा स्वाद व सुगन्ध पर कोई अन्तर नहीं पड़ता है। करंज की खाली तम्बाकू को जमीन के वीटल्स से सुरक्षा करती है। इसका भूमि पर कोई विपरीत असर नहीं होता है बल्कि पौध को ल्यूटरा से बचाव करती है। करंज के तेल पत्ती सर से धान के कई कीट नियंत्रित किये जा रहे हैं।

सीताफल


सीताफल के तना व पत्ते के कई तरह के उल्कोलाइड पाये जाते हैं इसका रस दीमक, जड़, ग्रब्ज व अन्य कीटों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करते हैं। दाल बीजों में सीताफल के तेल से उपचारित कर भण्डारित करने पर अधिक समय तक सुरक्षित रहती है। कुसुम में लगने वाले माहूँ पर बीज के 2 तथा 5 प्रतिशत छिड़काव प्रभावी पाया गया है।

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