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ग्लेशियरों पर मँडरा रहा अस्तित्व का संकट (Crisis on the glaciers)


दरकते हिमालयीन ग्लेशियरदरकते हिमालयीन ग्लेशियरआज दुनिया के ग्लेशियरों पर संकट मँडरा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है ग्लोबल वार्मिंग जिसके चलते बढ़ रहे तापमान का बुरा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है।

परिणामस्वरूप वे पिघल रहे हैं। उनके पिघलने की यदि यही रफ्तार जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब 21वीं सदी के आखिर तक एशिया और 2035 तक हिमालय के ग्लेशियर गायब हो जाएँगे। उनका नाम केवल किताबों में ही शेष रह जाएगा।

यह ग्लोबल वार्मिंग का ही असर है कि आर्कटिक में लाल बर्फ तेजी से बन रही है और उसके परिणामस्वरूप वहाँ ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार और तेज हो गई है। वहीं ग्लोबल वार्मिंग के चलते हमारे उच्च हिमालयी इलाके में जहाँ पर एक समय केवल बर्फ गिरा करती थी वहाँ अब बारिश हो रही है। यह स्थिति भयावह खतरे का संकेत है। देखा जाये तो सन 1850 के आसपास औद्योगिक क्रान्ति से पहले की तुलना में धरती एक डिग्री गर्म हुई है।

वैज्ञानिकों की मानें तो उनको इस बात का भय सता रहा है कि उनके द्वारा निर्धारित तापमान में बढ़ोत्तरी की 2 डिग्री की सीमा को 2100 तक बचा पाना सम्भव नहीं है। उनका मानना है कि यदि ऐसा होता है तो एशिया में ग्लेशियरों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

नीदरलैंड और हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भू-भौतिकी अनुसन्धान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने का सबसे बड़ा और अहम कारण ग्लोबल वार्मिंग है। उनके शोध के अनुसार ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से समुद्री जलस्तर में एक से 1.2 फीट तक की वृद्धि हो सकती है। इसका असर मुम्बई, न्यूयार्क, लंदन और पेरिस जैसे शहरों पर पड़ेगा। यही नहीं कृत्रिम झीलों के बनने से सन 2013 में उत्तराखण्ड में आई केदारनाथ जैसी आपदा के खतरे भी बढ़ेंगे।

जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि आर्कटिक में बन रही लाल बर्फ से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार में 20 फीसदी से अधिक बढ़ोत्तरी हो जाती है। शोधकर्ता और वैज्ञानिकों के अनुसार वहाँ मौजूद शैवाल क्लैमिडोमोनॉस नैवलिस और उसमें पाये जाने वाले जीवाणु वहाँ की बर्फीली सतह का रंग बदल कर लाल कर दे रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने की क्षमता दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। इससे लाल बर्फ में ज्यादा सूर्य की रोशनी और ऊष्मा अवशोषित होती है।

इसका दुष्परिणाम यह होता है कि बर्फ के पिघलने की रफ्तार तेजी से बढ़ती जाती है। यहाँ ग्लेशियरों के पिघलने का नतीजा यह होगा कि आर्कटिक की कार्बन सोखने की क्षमता प्रभावित होगी, वह दिनोंदिन कम होती चली जाएगी और यदि यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा आएगा कि कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता आर्कटिक पूरी तरह खो देगा और कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में रहकर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने के कारक के रूप में काम करेगी। इसका दुष्प्रभाव यह होगा कि समूचा वैश्विक कार्बन चक्र प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। यह समूची दुनिया के लिये खतरे की घंटी है।

जहाँ तक हिमालयी क्षेत्र का सवाल है, इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि विश्व की सर्वोच्च पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट तक ग्लोबल वार्मिंग के चलते पिछले पचास सालों से लगातार गर्म हो रही है। यह खतरनाक संकेत है। इसका दुष्परिणाम यह है कि दुनिया की 8844 मीटर ऊँची चोटी के आसपास के हिमखण्ड दिन-ब-दिन पिघलते जा रहे हैं। इसरो की मानें तो हिमालय पर्वत शृंखला में कुल 9600 ग्लेशियर हैं। इनमें से 75 फीसदी के पिघलने की गति तेजी से जारी है।

ज्यादातर ग्लेशियर झील और झरने के रूप में तब्दील हो चुके हैं। जो शेष बचे हैं, उसमें तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। चिन्ता की बात यह है कि यदि इस पर अंकुश नहीं लगा तो आने वाले समय में हिमालय की यह पर्वत शृंखला पूरी तरह बर्फ विहीन हो जाएगी। इसमें दो राय नहीं कि यह सब तापमान में बढ़ोत्तरी के चलते मौसम में आये बदलाव का ही दुष्परिणाम है जिसके कारण ग्लेशियर लगातार सिकुड़ते चले जा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि कर चुकी है। हालात की गम्भीरता का पता इससे चल जाता है कि समूची दुनिया में वह चाहे आर्कटिक हो, आइसलैंड हो, हिमालय हो, तिब्बत हो, चीन हो, भूटान हो या फिर नेपाल हो, या फिर कहीं और, हरेक जगह ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेजी से बढ़ती ही जा रही है। दुनिया के वैज्ञानिकों के शोध और अध्ययन इसके जीते-जागते सबूत हैं।

असलियत में ग्लोबल वार्मिंग के कारण जिस तेजी से मौसम का मिजाज बदल रहा है, उसी तेजी से हिमरेखा पीछे की ओर खिसकती जा रही है। शोध प्रमाण हैं कि यहाँ हिमरेखा तकरीब 50 मीटर पीछे खिसकी है। नतीजतन बर्फ के इलाके में दिनोंदिन कमी आती जा रही है। इससे जैवविविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। हिमरेखा के पीछे खिसकने से टिंबर लाइन यानी जहाँ तक पेड़ होते थे और हिमरेखा यानी जहाँ तक स्थायी तौर पर बर्फ जमी रहती थी, के बीच का अन्तर बढ़ता जा रहा है।

हिमालयन बेसिन में इस अन्तर से वनस्पतियों में भी फर्क आ रहा है। हिम रेखा पीछे खिसकने से खाली हुई जमीन पर वनस्पतियाँ उगती जा रहीं हैं। ये वनस्पतियाँ, पेड़ और झाड़ियाँ जिस तेजी से ऊपर की ओर बढ़ती जाएँगी, उतनी ही तेजी से ग्लेशियरों के लिये खतरा बढ़ता चला जाएगा।

नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने अनुमान व्यक्त किया है कि आने वाले 33 सालों यानी 2050 तक ऐसे समूचे हिमनद पिघल जाएँगे। इससे इस इलाके में बाढ़ और फिर अकाल का खतरा बढ़ जाएगा। गौरतलब है कि हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कुल मानवता का लगभग पाँचवाँ हिस्सा निर्भर है। जाहिर है पानी का संकट और गहराएगा। कृत्रिम झीलें बनेंगी। तापमान तेजी से बढ़ेगा। बिजली परियोजनाओं पर संकट मँडराएगा और खेती पर खतरा बढ़ जाएगा।

इस बारे में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान का मानना है कि यह ग्लोबल वार्मिंग का ही नतीजा है कि हिमालयी क्षेत्र में जहाँ पहले बारह महीने बर्फ गिरती थी, अब वहाँ बर्फ गिरने के महीनों में कमी आई है। वहाँ बर्फ गिरने के महीने घट गए हैं जबकि बारिश भी होने लगी है। तात्पर्य यह कि अब इस इलाके में बारिश होने वाला इलाका 4000 से 4500 मीटर तक बढ़ गया है। दरअसल यह वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान द्वारा बीते एक दशक में किये गए एक शोध का नतीजा है।

असलियत में हिमालय का उच्च पहाड़ी क्षेत्र 3500 से लेकर 4000 मीटर हाई एल्टीट्यूड में आता है। शोध के मुताबिक तकरीब एक दशक पहले तक चार हजार मीटर की ऊँचाई तक बारह महीने सीधे बर्फ ही गिरती थी, लेकिन अब वहाँ केवल कुछ ही महीने बर्फ गिरती है जबकि बाकी महीनों में बारिश होती है। इससे हिमालय में एक नया बारिश वाला इलाका विकसित हुआ है। तापमान में बढ़ोत्तरी से उपजी गर्म हवाएँ जैवविविधता के लिये गम्भीर खतरा बन रही है। ये जैवविविधता के विनाश का कारण है।

जाहिर है कि यह शोध ग्लोबल वार्मिंग के गम्भीर दुष्परिणामों का संकेत कर रहा है कि अब समय आ गया है कि अब कुछ किये बिना इस समस्या से छुटकारा सम्भव नहीं है। इसलिये तापमान में वृद्धि को रोकना समय की सबसे बड़ी माँग है। यह समूची दुनिया के लिये सबसे बड़ी गम्भीर चुनौती है। वैश्विक स्तर पर इस पर लगाम लगाने के प्रयास तो किये जा रहे हैं। लेकिन हमें भी कुछ करना होगा। जीवनशैली में बदलाव और भौतिक सुख-संसाधनों के अन्धाधुन्ध प्रयोग पर अंकुश इसका बेहतर समाधान हो सकता है। यदि इस पर अंकुश लगाने में हम नाकाम रहे तो वह दिन दूर नहीं जब मानव का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

Global warming

नदी, वन को जब तक जनमानस से जोड़ने का काम नहीं होगा तबसे तक सरकारी प्रयासों से सफलता दूर रहेगी ।

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