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इन्दिरा का पर्यावरण प्रेम (Indira Gandhi, a life in Nature)

Author: 
जयराम रमेश
Source: 
डाउन टू अर्थ, नवम्बर 2017

क्या इन्दिरा गाँधी पहली पर्यावरणविद प्रधानमंत्री थीं? 1984 में जब उनकी हत्या की गई तब करीब 40 प्रतिशत भारतीय पैदा भी नहीं हुए होंगे, इसके बाद भी वह राजनीतिक विमर्शों के केन्द्र में बनी हुई हैं। उनकी जिन्दगी के हर पहलू पर विस्तार से चर्चा और बहस की गई है, सिर्फ पर्यावरण के प्रति उनके प्रेम और इसके लिये निर्णय लेने की क्षमता को छोड़कर। इन्दिरा गाँधी की जन्मशती के मौके पर डाउन टू अर्थ उन्हें नजदीक से जानने वाले उनकी जीवनी लेखक और एक वरिष्ठ पत्रकार की मदद से उनके इस पहलू पर रोशनी डाल रहा है।

वक्त के साथ उन्हें यह विश्वास होने लगा कि स्थानीय समुदायों की सहभागिता के बिना न वन्यजीवों का और न ही जंगलों का दीर्घकालिक संरक्षण सम्भव है, जबकि शुरुआती दौर में उनकी सोच शुद्धतावादी थी।

मैं यह लेख इन्दिरा गाँधी का मूल्यांकन या उनका आकलन करने की चाहत में नहीं लिख रहा। यह कोशिश उस व्यक्तित्व की नई तस्वीर को लोक समक्ष रखने की है जिन पर लिखा बहुतों ने पर उसे समझने की कोशिश शायद ही किसी ने की। एक नेत्री जिसे किसी ने उसके जटिल व विरोधाभासी व्यक्तित्व के लिये जाना तो किसी की निगाह में एक बेहद करिश्माई और सम्मोहक व्यक्तित्व के रूप में समाईं। कौन थीं इन्दिरा? क्या थे उनके महत्त्वपूर्ण कार्य? यह लेख एक यात्रा है उनके इन आयामों को खोज की और उन पर प्रकाश डालने की जिसने उनके जीवन व कार्यों के मूल्यांकन करने वालों का ध्यान कभी आकृष्ट नहीं किया।

इन्दिरा गाँधी की संस्थागत शैक्षिक यात्रा अत्यधिक सर्पिल-पथ पर चली थी। उन्होंने विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण अवश्य की लेकिन परिस्थितिवश औपचारिक शैक्षिक उपाधि से वंचित रहीं। व्यवहारिक अनुभवों ने उन्हें जीवन के विश्वविद्यालय द्वारा सर्वोच्च सम्मान के साथ प्रतिष्ठित किया।

इन्दिरा गाँधी असल में कौन थीं? इतिहासकार हमेशा इस प्रश्न के उत्तर की खोज में मानसिक मल्लयुद्ध करते रहे और सम्भवतः भविष्य में भी करते रहेंगे! प्रभावशाली उपलब्धियों से मुग्ध उनके विश्वव्यापी गुणग्राही थे। भारी संख्या में उनके ऐसे आलोचक भी थे जो उनके गलत निर्णय या त्रुटिपूर्ण कार्यों से आगे देखने में असमर्थ थे। कई उनकी स्वयं की गलतियाँ थीं, तो कई उन पर थोपी गईं।

यह निर्विवादित सत्य है कि उनके व्यक्तित्व में एक तीक्ष्ण विरोधाभास था। लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी वचनबद्धता समस्त सन्देह से परे थी, यह सत्य इस कालखंड के लिखित दस्तावेज (जयराम रमेश की किताब, इन्दिरा गाँधी: ए लाइफ इन नेचर) से प्रमाणित होती है। उनके उथलपुथल भरे सम्पूर्ण राजनीतिक व व्यक्तिगत जीवन में, पर्यावरण के प्रति उनके व्यक्तिगत प्रेम ने हमेशा उन्हें प्रेरित एवं उद्दीप्त किया है। उनका पर्यावरण के हर पक्ष से प्रेम वंशानुगत विरासत ही नहीं, उनकी अपनी प्रकृति का अटूट अंग था, जिसका उन्होंने चिरस्थायी अनुराग की तरह लालन किया।

उनके आलोचक यह कह सकते हैं, “इन्दिरा की पर्यावरण चिन्ता और उसके प्रति सहानुभूति से क्या फर्क पड़ेगा?” ऐसी प्रतिक्रियाएँ अभद्रता की सूचक हैं। उनके सत्ता काल में पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनका सदा जागृत अनुराग व्यक्तिगत कहकर अप्रासंगिक करार नहीं दिया जा सकता। उनका यह अनुराग भारतीय नागरिकों के लिये आह्वान बन गया था, जिसने यह परिभाषित कर दिया था कि वह कौन हैं और मुल्क के प्रधानमंत्री के रूप कौन सी दिशा वह तय कर रहीं थीं। अतः उनके कार्यों के मूल्यांकन करते वक्त पर्यावरण संरक्षण के प्रखर समर्थक के रूप में उन्होंने क्या हासिल किया, इसका आकलन अत्यावश्यक है।

एक राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में वह लगातार संकटों से जूझती रहीं और हर परिस्थिति में पर्यावरण संरक्षण के प्रति वचनबद्ध अनुराग के माध्यम से इन्दिरा गाँधी ने अपना यथार्थ रूप पेश किया। आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास के सर्वाधिक मुश्किल काल खंड में राष्ट्राध्यक्ष के रूप में, सरकारी कामकाज के बावजूद पर्यावरण सम्बन्धी मसलों पर पूरा ध्यान देते रहना उन्हें और आकर्षक व मोहक बनाता है। जैसे-जैसे राजनीतिक दबाव उन पर बढ़ते रहे, इन्दिरा प्रकृति के और नजदीक जाती रहीं। शायद वह राजनीति को अपने जीवन में क्षणिक और प्रकृति को अटल, महत्त्वपूर्ण व नित्य मानती रहीं। यह सुप्रसिद्ध है कि वह अक्सर अपने मिलने वालों के साथ अथवा बैठकों में उदासीन व अनमनी दिखती थीं, अपनी फाइलें पढ़तीं या अपने प्रिय शगल तस्वीर बनाने में लिप्त रहती थीं। पर, पर्यावरणविदों से मिलते वक्त अथवा वन्यजीवों, जंगलों या पर्यावरण संरक्षण की बैठकों में निःसन्देह ऐसा नहीं था। ऐसे मौकों पर वह पूरे मनोयोग, एकाग्रचित्त संलिप्त तथा स्थिति का प्रभार लिये रहती थीं।

वर्तमान परिदृश्य में जलवायु परिवर्तन एवं दीर्घकालिक विकास के मुद्दों पर आज के अधिकतर राष्ट्राध्यक्ष अथवा सरकारें अपने चिकनी चुपड़ी भाषण पटुता में व्यस्त दिखते हैं, परन्तु, आज से चार दशक पहले इन्दिरा गाँधी उन चुनिन्दा राजनैतिक व्यक्तित्वों में थीं जिन्होंने पर्यावरण विषयक मसलों को गम्भीरता से लिया और दैनंदिन शासन प्रणाली में स्थान दिया। स्मरणार्थ याद दिलाना उचित होगा कि जून 1972 को स्टॉकहोम में आयोजित प्रथम संयुक्त राष्ट्र के मानवीय पर्यावरण सम्मेलन में आयोजक राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष के अलावा वह एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष थीं, जिन्होंने अपनी बात रखी थी। इसी प्रकार, वह उन पाँच राष्ट्राध्यक्षों में थीं जिन्होंने अगस्त 1976 में नैरोबी में आयोजित प्रथम नवीन एवं अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन को सम्बोधित किया था। 1992 में विख्यात रियो अर्थ समिट कॉन्फ्रेंस से इसकी तुलना कीजिए, जहाँ सौ से अधिक राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे।

इन्दिरा गाँधी पर्यावरण सम्बन्धित मसलों पर, मात्र भारत में ही नहीं, अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में भी अग्रणी रहीं। अक्सर इन्दिरा गाँधी को एक तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति के रूप में पेश किया जाता है। प्रकृति में उनके जीवन ने अक्सर यह साबित किया था कि हर अधिकार रहने पर भी उनका कहा नहीं हुआ। असंदिग्ध रूप से ऐसा कई बार हुआ कि उन्होंने किसी विशेष कार्य को करने के लिये दृढ़तापूर्वक कहा हो। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उनका जीवन सुझावों और अनुनयों की एक लम्बी यात्रा थी। यह पद्धति दो तथ्यों से निर्देशित थी। प्रथमतः भारतीय परिदृश्य में जीवन यापन के स्तर को सुधारना व आर्थिक विकास के माध्यम से जीवन शैली की गुणवत्ता को बेहतर बनाना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। दूसरा पर्यावरण का संरक्षण व वातावरण की सुरक्षा सम्बन्धित अधिकांश निर्णय जो वह लेना चाहती थीं, राज्य सरकारों की मूल जिम्मेदारी है। अगर उनमें तथाकथित तानाशाही रवैया मौजूद होता तो एक पर्यावरणविद के रूप में उन्होंने जो कुछ हासिल किया, उससे कहीं अधिक कर चुकी होतीं।

उसी प्रकार, इन्दिरा गाँधी का जीवन हमें उनके द्वारा लिये गए निर्णयों के कारण हुए उनके मानसिक सन्ताप की याद भी दिलाता है। उदाहरणार्थ, साइलेंट वैली को हाइडेल प्रोजेक्ट से बचाना आवश्यक था, यह उन्हें मालूम था पर इस मुद्दे पर तीन साल चली चर्चा के उपरान्त ही उन्होंने अन्तिम निर्णय लिया था। कई मौकों पर, अपने पर्यावरणीय दृढ़ निश्चय के विरुद्ध कोई विशेष निर्णय, वृहत्तर आर्थिक व राजनीतिक लाभ के निमित्त, लेने के लिये खुद को मनाया भी। कभी ऐसा भी हुआ कि निर्णय लेने से पूर्व उन्होंने अपने विश्वस्त व विख्यात पर्यावरणविद सलीम अली, पीटर स्कॉट और पीटर जैक्सन जैसे व्यक्तियों से राय मशविरा किया हो। उनका नजरिया हर नई परिस्थिति से सामना होते हुए विकसित हुआ। वक्त के साथ उन्हें यह विश्वास होने लगा कि स्थानीय समुदायों की सहभागिता के बिना न वन्यजीवों का और न ही जंगलों का दीर्घकालिक संरक्षण सम्भव है, जबकि शुरुआती दौर में उनकी सोच शुद्धतावादी थी।

इसमें सन्देह नहीं कि तिलिस्मों से घिरा था उनका व्यक्तित्व, पर मौलिक इन्दिरा गाँधी सम्पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ एक संरक्षणकर्त्री थीं जिन्होंने समृद्ध प्राकृतिक विरासत को मुल्क की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परम्परा के संरक्षण को आर्थिक गतिशीलता के मूल आधार के रूप में देखा। वास्तविकता यही थी कि उनके लिये संरक्षण के अभाव में विकास अल्पकालिक व क्षणभंगुर था, अविकसित संरक्षण अग्राह्य था। उनके लिये संरक्षण, जैविक विविधता के प्रति सम्मान एवं पर्यावरणीय सन्तुलन का प्रयोजन इत्यादि हमारे सांस्कृतिक चरित्र से ही उत्पन्न हुआ है। वह प्रायः हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों की मूल शिक्षा ‘प्रकृति के प्रति आदरभाव व उसके सामंजस्य में जिओ’ का सन्दर्भ देती रहीं। उनकी पर्यावरणीय विरासत किसी विशेषज्ञ अथवा चेतावनी के रूप में नहीं दिखती। यह विरासत हमेशा के लिये एक निरन्तर गुंजन है।

(पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की 2017 में प्रकाशित पुस्तक ‘इन्दिरा गाँधी : ए लाइफ इन नेचर’ से साभार)

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