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पेड़ न कटे तो मैं साथ हूँ - इन्दिरा गाँधी

Author: 
डेरेल डीमोंटे
Source: 
डाउन टू अर्थ, नवम्बर 2017

जन आन्दोलनों से उदासीन रहने वाली इन्दिरा पर्यावरण के मामलों में गम्भीरता दिखाती थीं। हालाँकि कई बार उनका अहंकार यहाँ भी आड़े आया।

पर्यावरण और वास्तविक विकास एक-दूसरे के साथ ही चलकर सफल हो सकते हैं, यही कारण है कि दिल्ली-बम्बई औद्योगिक कॉरिडोर अथवा भारत-जापान के सहयोग से बम्बई- अहमदाबाद के बीच चलाई जाने वाली बुलेट ट्रेन जिसे प्रगति का मानक समझा जा रहा, लेकिन वास्तविकता यही है कि उसमें लगने वाले सारे संसाधन जरूरतमन्दों की जरूरतों को पूरी करने में लगाना चाहिए था।

1970 के दशक की एक घटना का हवाला देना चाहूँगा जिससे मैं भी जुड़ा था। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बैंक मैनेजमेंट, बम्बई (वर्तमान में मुम्बई) ने 6 करोड़ रुपए की लागत से बान्द्रा उपनगर के कार्टर रोड पर पथरीली समुद्र तट पर बैंकर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट स्थापित करने का निर्णय लिया। जमीन की जाँच के लिये खुदाई शुरू हो चुकी थी। भवन का ढाँचा ऊपर उठे हुए चबूतरे पर बनना तय हुआ, जिसमें सामुद्रिक ज्वार-भाटा के स्वच्छंद आवागमन के लिये फाटक लगाया जाना था। प्रशिक्षणार्थियों के लिये षटकोणीय छात्रावास बनाने की परियोजना बनी ताकि समुद्र के प्राकृतिक सौन्दर्य को आसानी से देख सकें।

शहर के मानद शेरिफ महबूब नसरुल्लाह व ‘ब्लिट्ज’ अखबार के शक्तिशाली सम्पादक रूसी करंजिया के नेतृत्व में स्थानीय निवासियों ने इसके विरोध में ऐतिहासिक बैठक की। उसी घटनाक्रम में ‘बिजनेस इंडिया’ के सम्पादक अशोक अडवानी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी की नजदीकी सहकर्मी उषा भगत से सम्पर्क किया। उन्होंने प्रधानमंत्री को इस घटना की सूचना दी और प्रधानमंत्री ने तुरन्त सख्त आदेश जारी कर दिया। परियोजना को पुणे स्थानान्तरित कर दिया गया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक, शहर के पर्यावरणविदों की यह पहली विजय थी।

यह घटना उनके निर्णय लेने की उसी शैली की तरफ इंगित करता है जिस पर जयराम रमेश ने अपनी पुस्तक ‘इन्दिरा गाँधी : ए लाइफ इन नेचर’ में प्रकाश डाला है। वह अत्यन्त शालीन, भद्र व व्यक्तिगत सम्बन्धों की कद्रदान, देशी-विदेशी प्रभावशाली व्यक्तियों तथा संस्थाओं के साथ नियमित पत्राचार के माध्यम से सम्पर्क बनाए रखती थीं। ऐसा भी देखा गया कि दबाव में कभी घुटने भी नहीं टेके, विशेषकर विदेशी संस्थाओं के सामने।

उनकी शासकीय विश्वसनीयता पर कुछ लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि जन आन्दोलनों से अप्रभावित उनके अधिकांश निर्णय अमूमन सही होते थे, जबकि वही पर्यावरणीय सक्रियतावाद की वास्तविक आत्मा हैं। यह उनके चरित्र के द्योतक थे। इस प्रवृत्ति की व्याख्या करते दो विचारणीय विषय हैं। पहला था ‘नेचर’ पत्रिका के लिये अनिल अग्रवाल को ‘चिपको आन्दोलन’ पर 1980 में दिए गए एक साक्षात्कार के दौरान उनकी टिप्पणी। जब 1973 में आरम्भ हुए लोकप्रिय ‘चिपको आन्दोलन’ के शुरू होने के पूरे 7 साल बाद उनसे इस पर जब राय पूछी गई तो उन्होंने स्पष्ट कहा था “ईमानदारी से मुझे नहीं पता कि इस आन्दोलन का उद्देश्य क्या है। अगर पेड़ों को न काटने देना इनका उद्देश्य है तो मैं इनके साथ हूँ।” चिपको के सम्बन्ध में उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया आन्दोलन के नेता सुन्दरलाल बहुगुणा, एक अंशकालिक पत्रकार जो देश-विदेश के लोगों का ध्यान आन्दोलन के प्रति आकर्षित कर रहे थे, के बहिष्कार से था।

साथ ही चंडीप्रसाद भट्ट को भी नजरअन्दाज किया जिन्होंने रोजगार के लिये पहाड़ से शहर को पलायन करते लोगों को अपने इलाकों में ही काम मुहैया करने की कोशिश में गोपेश्वर, गढ़वाल में दसोहली ग्राम स्वराज्य मण्डल 1964 की स्थापना की थी। इस संस्था ने पहाड़ों पर भारी मात्रा में जंगल उत्पादों के पैदावार को बढ़ावा देने के लिये चीड़ के पेड़ों से निकलने वाली प्राकृतिक गोंद का कारखाना लगाने की कोशिश की थी। यह पहाड़ों में वहाँ के लोगों को रोजगार प्राप्त कराने और लोगों को रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों में पलायन रोकने का कारगर उपाय था। जैसा कि रामचंद्र गुहा ने 1989 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द यूनीक वुड्स’ में कहा, इन्दिरा गाँधी और उनके सहयोगी इस बात से अनभिज्ञ थे कि चिपको आन्दोलन संसाधनों के उपनिवेशीय उपयोग के विरुद्ध कृषक प्रतिरोध आन्दोलन की ही कड़ी थी।

केरल के साइलेंट वैली जलविद्युत परियोजना को रोकने में उनकी भूमिका दूसरा विचारणीय विषय है। जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक ‘टेम्पल्स और टॉम्ब? इंडस्ट्री वर्सेज एनवायरनमेंट : थ्री कंट्रोवर्सीज’ में विस्तार से वर्णन किया है कि किस प्रकार उन्होंने समर्पित नागरिकों के विज्ञान आन्दोलन केरल शास्त्र साहित्य परिषद के विरोध को दरकिनार किया था। परिषद का झुकाव वामपंथ की ओर था। इसके बावजूद उसने कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्ववाली सरकार व केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के इच्छा के विरुद्ध उक्त परियोजना का विरोध किया था। इन्दिरा गाँधी विख्यात पक्षी विज्ञानी व प्रकृतिविद डॉ. सलीम अली और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ), इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) जिन्होंने उक्त परियोजना के विरुद्ध प्रस्ताव ग्रहण किया था, जैसी संस्थाओं से प्रभावित थीं।

इन्दिरा गाँधी ने 1972 में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रतिनिधि से मिलने के एक दिन बाद ही डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहयोग से ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू करने का निर्णय लिया था जो बेहद कामयाब हुआ था। परियोजना के शुरुआती दौर और सम्भवतः आपातकाल के दौरान अभ्यारण्य के रेखांकित इलाकों से ग्रामीण नागरिकों को स्थानान्तरित किया गया था। यह कदम उनके अन्दर छुपे तानाशाह का प्रकाश था। उनका नीदरलैंड के राजकुमार बर्नहार्ड से तादात्म्य रहा जो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहसंस्थापक भी थे और जिन्हें वन्यजीवन के संरक्षण की चिन्ता तो थी पर उस परियोजना के शिकार हुए आदिवासी के दुःख दर्द की नहीं। जैसा जयराम रमेश याद दिला रहे हैं, 1972 में स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित प्रथम पर्यावरण सम्मेलन में थोड़े अलग ढंग से उनके द्वारा कहे गए वाक्य “गरीबी प्रदूषण की सबसे निकृष्ट अवस्था है” के कारण इन्दिरा को विश्वव्यापी सम्मान मिला। यह वाक्य आज भी, सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विकासशील देश में पर्यावरण संरक्षण से पहले अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश को न्यायसंगत और उचित प्रमाणित करने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। नेहरू के वक्त से अब तक पूरी की गईं कई विकास परियोजनाएँ गरीबी उन्मूलन के स्थान पर इसकी वृद्धि ही की है। ऐसा नर्मदा बाँध परियोजना के विस्थापित कह सकते हैं। पर्यावरण और वास्तविक विकास एक-दूसरे के साथ ही चलकर सफल हो सकते हैं, यही कारण है कि दिल्ली-बम्बई औद्योगिक कॉरिडोर अथवा भारत-जापान के सहयोग से बम्बई- अहमदाबाद के बीच चलाई जाने वाली बुलेट ट्रेन जिसे प्रगति का मानक समझा जा रहा, लेकिन वास्तविकता यही है कि उसमें लगने वाले सारे संसाधन जरूरतमन्दों की जरूरतों को पूरी करने में लगाना चाहिए था।

दूसरा उदाहरण जिसका जिक्र मैंने अपनी पुस्तक में किया, वह है मथुरा स्थित इंडियन ऑयल रिफाइनरी। मथुरा से 40 किमी दूर आगरा का ताजमहल सम्भ्रान्त वर्ग के पर्यावरण सक्रियतावाद का एक विशिष्ट उदाहरण है, जहाँ इन्दिरा गाँधी ने कोई कदम नहीं उठाए। एस. वरदराजन- इंडियन पेट्रोकेमिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष के नेतृत्व में बनी समिति (ताजमहल पर पड़ने वाले खतरों के सिलसिले में उनकी जाँच रिपोर्ट उस काल खंड की किसी भी धरोहर पर पड़ने वाले वायु प्रदूषण के खतरों के मामलों में सर्वाधिक व्यापक है), आईएनटीएसीएच, इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ दि प्रिजर्वेशन एंड रेस्टोरेशन ऑफ कल्चरल प्रॉपर्टी इन रोम इत्यादि के माध्यम से शामिल सभी उपक्रम व संस्थाएँ अधिकारी अथवा पेशेवरों ने बिना किसी जमीनी आन्दोलन के परियोजना को बन्द करने की सलाह दी थी।

1983 में एम.एस. स्वामीनाथन, जो उन दिनों आईयूसीएन के अध्यक्ष थे, के उस वक्तव्य से कोई भी असहमत होगा जब उन्होंने कहा कि इन्दिरा “हमारे जमाने की सबसे बड़ी पर्यावरणविद थीं।” वास्तविकता में, इतिहास में वह इस विशेषण की अधिकारी के रूप नहीं जानी जाएँगी। पर साथ ही, यह सत्य है कि वह अपने जमाने के किसी भी व्यक्ति से बड़ी राजनीतिक नेता थीं जो किसी भी कीमत पर आर्थिक विकास के उन्माद के खिलाफ गईं। पर्यावरण पर पड़ने वाले परिणामों की चिन्ता किये बगैर पर्यावरण सम्बन्धी कानून की धज्जियाँ उड़ाने, नदियों को आपस में जोड़ने और बिना सोचे विशाल परियोजनाओं का बुनियादी ढाँचा बनाने में व्यस्त वर्तमान शासकों की तुलना में इन्दिरा गाँधी का व्यक्तित्व उत्कृष्ट था।

(लेखक वरिष्ठ पर्यावरण पत्रकार हैं)

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