ओजोन में छिद्र प्रकृति की चेतावनी

Submitted by UrbanWater on Thu, 09/15/2016 - 11:48
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ओजोन परतओजोन परतप्राकृतिक चीजों से मानव का खिलवाड़ लम्बे समय से चल रहा है। एक समय यह माना जाता था कि हम प्रकृति का चाहे जितना दोहन करें उसकी कोई सीमा नहीं है। पूरे विश्व में आबादी के बढ़ने से उसकी जरूरतें भी बढ़ीं। जिसके फलस्वरूप औद्योगीकरण शुरू हुआ।

एक समय तक मानव समाज यह सोचता था कि प्रकृति हर तरह से खतरनाक गैसों, रासायनिक अपशिष्ट आदि को अपने दामन में पचा लेती है। इसके साथ ही यह धारणा भी थी कि हम अपने आसपास के वातावरण को ठीक रखेंगे तो हमारे देश में सब कुछ ठीक रहेगा। लेकिन बात इतनी नहीं है। विकसित देशों के उद्योग और कल-कारखानों से एक दिन में जितना खतरनाक गैस और रासायनिक अपशिष्ट निकलता है वह हमारे वायुमण्डल एवं भूजल को तबाह करने के लिये पर्याप्त है।

यह बात सही है कि इसका असर तुरन्त दूसरे जगह नहीं होगी। लेकिन यदि हम प्रकृति के संकेत को समझ कर नहीं चेते तो प्रकृति के साथ किये जा रहे छेड़छाड़ की कीमत पूरे मानवता को चुकानी होगी। ओजोन के परत में छेद ने इसका संकेत दे दिया है। एक अनुमान के मुताबिक ओजोन परत में छिद्र का आकार यूरोप के आकार के बराबर हो गया है। ओजोन परत के संरक्षण को लेकर विश्व स्तर पर शुरू हुई पहल का असर भी हो रहा है। लेकिन यह काफी नहीं है।

विश्व ओजोन दिवस या ओजोन परत संरक्षण दिवस 16 सितम्बर को पूरे दुनिया में मनाई जाती है। मनुष्य को धरती पर अपने अस्तित्व के लिये प्रकृति के साथ काफी संघर्ष करना पड़ा है। हजारों साल बाद वह प्रकृति से सामंजस्य बनाकर अपने जीवन की रक्षा करता रहा है।

विकास की इस प्रक्रिया में धरती पर जीवन की उत्पत्ति के बाद इस रूप में आने के लिये लम्बा समय तय करना पड़ा है। लेकिन जो चीज इंसान को कड़ी मेहनत और प्रकृति से फल स्वरूप मिली है उसे आज खुद इंसान ही मिटाने पर लगा हुआ है। लगातार प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप कर इंसान ने खुद को प्रकृति के सामने ला खड़ा किया है।

मनुष्य अपनी असीमित वासना की पूर्ति के लिये प्रकृति का दोहन करके पूरे तंत्र को असन्तुलित बना दिया है। जंगलों, वनों की कटाई, पहाड़ों के चट्टानों को डायनामाइट लगाकर उड़ाना आम बात है। प्रकृति के लगातार दोहन ने मनुष्य और प्रकृति, वायुमण्डल के बीच एक असन्तुलन पैदा कर दिया है। गाड़ियों ने हवा को प्रदूषित कर दिया है तो वहीं उस जल को भी इंसान ने नहीं बख्शा जिसकी वजह से धरती पर जीवन संचालित होता है।

प्रौद्योगिकी के इस युग में इंसान हर उस चीज का हरण कर रहा है जो उसकी प्रगति की राह में रोड़ा बन रही है। ओजोन परत के इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए पिछले दो दशक से इसे बचाने के लिये कार्य किये जा रहे हैं।

23 जनवरी 1995 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में पूरे विश्व में इसके प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिये 16 सितम्बर को अन्तरराष्ट्रीय ओजोन दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। उस समय यह लक्ष्य रखा गया कि 2010 तक हम पूरे विश्व ओजोन फ्रेंडली वातावरण के रूप में परिवर्तित कर देंगे। लेकिन लक्ष्य के छह वर्ष बीत जाने के बाद भी हम उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकें हैं। फिर भी विश्व स्तर पर ओजोन के संरक्षण के लिये उल्लेखनीय काम किया गया है। आज पूरा विश्व ओजोन के संरक्षण के लिये संवेदनशील है।

पूरे विश्व में इतने हो-हल्ला के बाद भी आज आम आदमी यह नहीं जानता की ओजोन क्या है। दरअसल, ओजोन एक हल्के नीले रंग की गैस होती है। जो ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनती है। यह गैस वातावरण में बहुत कम मात्रा में पाई जाती है। ओजोन परत सामान्यत: धरातल से 10 किलोमीटर से 50 किलोमीटर की ऊँचाई के बीच पाई जाती है।

वायुमण्डल के समताप मण्डल क्षेत्र में ओजोन गैस का एक झीना सा आवरण है। वायुमंडल के आयतन के सन्दर्भ में ओजोन परत की सान्द्रता लगभग 10 पीपीएम है। यह ओजोन परत पर्यावरण का रक्षक है। ऊपरी वायुमण्डल में इसकी उपस्थिति परमावश्यक है। इसकी सघनता 10 लाख में 10वाँ हिस्सा है।

यह गैस प्राकृतिक रूप से बनती है। जब सूर्य की किरणें वायुमण्डल से ऊपरी सतह पर ऑक्सीजन से टकराती हैं तो उच्च ऊर्जा विकिरण से इसका कुछ हिस्सा ओजोन में परिवर्तित हो जाता है। साथ ही विद्युत विकास क्रिया, बादल, आकाशीय विद्युत एवं मोटरों के विद्युत स्पार्क से भी ऑक्सीजन ओजोन में बदल जाती है। यह गैस सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों से मनुष्य और जीव-जन्तुओं की रक्षा करने का काम करती है।

यदि सूर्य से आने वाली सभी पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँच जाएँ तो पृथ्वी पर सभी प्राणी कैंसर से पीड़ित हो जाएँ और पृथ्वी के सभी पेड़ पौधे नष्ट हो जाएँ। लेकिन सूर्य विकिरण के साथ आने वाली पराबैगनी किरणों का लगभग 99 फीसदी भाग ओजोन मण्डल द्वारा सोख लिया जाता है। जिससे पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी वनस्पति तीव्र ताप व विकिरण से सुरक्षित बचे हुए हैं। इसीलिये ओजोन मण्डल या ओजोन परत को सुरक्षा कवच कहते हैं।

ओाजोन की परत को नुकसान पहुँचाने में मनुष्य की सुविधाभोगी चीजें मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। ओजोन को नुकसान पहुँचाने में मुख्य रूप से रेफ्रिजरेटर व वातानुकूलित उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली गैस, क्लोरोफ्लोरो कार्बन और हैलोन हैं। यह गैसें ऐरोसोल में तथा फोम की वस्तुओं को फुलाने और आधुनिक अग्निशमन उपकरणों में प्रयोग की जाती हैं। यही नहीं, सुपर सोनिक जेट विमानों से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड भी ओजोन की मात्रा को कम करने में मदद करती है।

मनुष्य यदि समय रहते नहीं चेता तो ओजोन परत में क्षरण की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह मानव जीवन को तबाह करके रख देगा। ओजोन के कारण मनुष्य और जीव-जन्तुओं में त्वचा-कैंसर की दर बढ़ने के साथ-ही-साथ त्वचा में रुखापन, झुर्रियों से भरा चेहरा और असमय बूढ़ा भी कर सकता है। यह मनुष्य तथा जन्तुओं में नेत्र-विकार विशेषकर मोतियाबिन्द को बढ़ा सकती है।

यह मनुष्य तथा जन्तुओं की रोगों की लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर सकता है। सिर्फ मानव जीवन ही नहीं यह हमारे पेड़-पौधों के साथ ही वनस्पतियों पर भी व्यापक असर डालेगा। सूर्य के पराबैंगनी विकिरण वृद्धि से पत्तियों का आकार छोटा हो सकता है। बीजों के अंकुरण का समय बढ़ा सकती हैं। यह मक्का, चावल, सोयाबीन, मटर गेहूँ, जैसी फसलों से प्राप्त अनाज की मात्रा कम कर सकती है।

फिलहाल, पूरे विश्व में ओजोन परत के संरक्षण को लेकर जागरुकता बढ़ रही है। रसायनों एवं खतरनाक गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोशिश जारी है। यदि विश्व समुदाय इस खतरे पर वैज्ञानिक ढंग से निपटने का तरीका नहीं अपनाता है तो आने वाले दिन हमारे लिये खतरनाक साबित होंगे। फिर भी वैज्ञानिकों को अनुमान है कि यदि हम ओजोन पर संरक्षण की प्रतिबद्धता पर इसी तरह काम करते रहें तो 2050 तक हम इस समस्या को हल कर सकते हैं।

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About the author

.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

वर्तमान में यथावत पाक्षिक पत्रिका में बतौर प्रमुख संवाददाता कार्यरत हैं। प्रदीप सिंह का जन्म 13 जुलाई 1976 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। प्राथमिक से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा प्रतापगढ़ में हुई।

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