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जल, थल और मल

Author: 
सोपान जोशी
Source: 
'जल थल मल' किताब, जुलाई 2016, गाँधी शांति प्रतिष्ठान से साभार

जीवन की यह रूपरेखा बहुत कामयाब हुई। ये जीव बहुत फले-फूले और पृथ्वी पर इनका राज बीसियों करोड़ साल चला। फिर इनका राज मिटने लगा, कोई ढाई अरब साल पहले, जहाँ से हमारी बात शुरू हुई। इनकी संख्या बहुत बढ़ गई थी। उस विषैली गैस का उत्सर्जन भी बढ़ा था जो इनकी साँस से बाहर आती थी। वह अब धरती के तत्वों से प्रतिक्रिया करके ठिकाने नहीं लग पा रही थी। उसकी मात्रा पृथ्वी के वायुमण्डल से लगातार बढ़ती गई, इतनी कि प्रलय आ गया। बात पुराने जमाने की है। थोड़े ज्यादा पुराने जमाने की। कोई ढाई अरब साल पुरानी। या ऐसा कहिए कि 2,50,00,00,000 साल। तब पृथ्वी करीब दो अरब साल पुरानी थी। हमारे ग्रह पर जीवन शुरू हुए एक अरब साल तो बीत ही चुके थे। तब बैक्टीरिया जैसे केवल एक कोशिका वाले आदि-जीव पनपते थे।

पृथ्वी पर जन्मे शुरुआती जीवों को अपना खाना बनाना नहीं आता था। धरती की ऊष्मा से रसायनों को खदका कर ये अपना पोषण करते थे। कुछ वैसे ही जैसे आज कुछ बैक्टीरिया दूध जमाकर दही बना लेते हैं या खमीर उठा कर डबलरोटी, सिरका या शराब तैयार कर लेते हैं। ‘फरमेंटेशन’ या किण्वन से।

उस सरल जीवन के लिये जो कुछ भी जरूरी था, वह या तो धरती से मिल जाता या हवा से खींच लिया जाता था। फिर जीवन की लीला में एक क्रान्ति आई, आज से कोई साढ़े-तीन अरब साल पहले। इसके नायक थे साएनोबैक्टीरिया, यानी हरे-नीले रंग के बैक्टीरिया। ये अपनी रसोई खुद बनाते थे। बस सूरज से प्रकाश और हवा से कार्बन गैंस खींच लेते थे। न जाने कितने हजार एकड़ भूमि पर फैलकर इन जीवों ने विशाल सौर पटलों का रूप धर लिया था। आज हमारे पेड़-पौधे भी ठीक ऐसे ही जीते हैं।

जीवन का प्राण, का ईंधन ऐसा ही था। इस ईंधन को जलाने से कुछ धुआँ सा भी निकलता था। एक विषैली गैस निकलती थी। हमारे पूर्वज बैक्टीरिया इस गैस को साँस के रास्ते बाहर निकाल देते थे, ठीक उस तरह जिस तरह हमारे फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं, या हमारी आँत मल त्यागती है और गुर्दे मूत्र त्यागते हैं। यह विषैली गैस बहुत ही प्रतिक्रियाशील थी।

धरती के हर हिस्से पर इसका रासायनिक प्रभाव पड़ता था, हर वस्तु की इस गैस के साथ प्रतिक्रिया होती थी, जिससे यह सोख ली जाती थी। यानी इस कचरे का निपटारा सरल ढंग से हो जाता।

जीवन की यह रूपरेखा बहुत कामयाब हुई। ये जीव बहुत फले-फूले और पृथ्वी पर इनका राज बीसियों करोड़ साल चला। फिर इनका राज मिटने लगा, कोई ढाई अरब साल पहले, जहाँ से हमारी बात शुरू हुई। इनकी संख्या बहुत बढ़ गई थी। उस विषैली गैस का उत्सर्जन भी बढ़ा था जो इनकी साँस से बाहर आती थी। वह अब धरती के तत्वों से प्रतिक्रिया करके ठिकाने नहीं लग पा रही थी। उसकी मात्रा पृथ्वी के वायुमण्डल से लगातार बढ़ती गई, इतनी कि प्रलय आ गया।

हमारे ग्रह और वायुमण्डल पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। कई तरह के जीव लुप्त होने लगे। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जीवन के इतिहास में यह सबसे विनाशक अध्याय था। शायद आज तक का सबसे बड़ा प्रलय, पृथ्वी का सबसे विशाल प्रदूषण।

लेकिन पृथ्वी पर जीवन खत्म नहीं हुआ। उसका रूप बदल गया। अब वे ही जीव पनप पाये जो वायुमण्डल में मौजूद इस विषैली गैस को सहन करना जानते थे। जो नहीं सीख पाये वे कुछ विशेष जगहों पर सीमित रह गए, जैसे दलदलों और समुद्र की गहराइयों में। हम जैसे प्राणियों की आँतों के भीतर ऐसे जीव अब भी मौजूद हैं।

दूसरे सभी जीवों ने कालान्तर में इस विषैली गैस का इस्तेमाल करना सीख लिया। उनकी हर कोशिका में इस विष को बुझाने वाले तत्व बनने लगे। हरे-नीले बैक्टीरिया के भी जिन प्रकारों ने इस विष को सहन करना सीख लिया वे आज भी जीवित हैं। आगे चलकर यही विषैली गैस जीवन का स्रोत बन गई।

यह विषैली गैस थी ऑक्सीजन।

इसे हम अब प्राणवायु कहते हैं। किसी भी ग्रह पर जीवन होने का असली प्रमाण तो उसके वायुमण्डल में मुक्त ऑक्सीजन ही माना जाता है। पानी होने के संकेत तो अन्तरिक्ष के दूसरे हिस्सों में भी मिलते हैं, पर मुक्त ऑक्सीजन पृथ्वी के वायुमण्डल की खासियत है। वैसे तो हमारे ब्रह्माण्ड के रासायनिक तत्वों में ऑक्सीजन बहुतायत में है और इसका मूल रूप गैस का है। पर इसका स्वभाव चंचल है, प्रतिक्रियाशील है। ऑक्सीजन के बिना आग नहीं लगती। लोहे में भी इससे जंग लग जाता है।

इसी स्वभाव की वजह से यह गैस हमारे शरीर की कोशिकाओं को चलाती तो है ही, लेकिन इसके कुछ बागी अंश उत्पात भी मचाते हैं। इन्हें अंग्रेजी में ‘फ्री रैडिकल्स’ कहा जाता है। इस उत्पात से बचने के लिये जीवों ने ‘एंटी-ऑक्सीडेंट’ बनाना सीख लिया है, जो इन बागियों पर काबू करते हैं, प्रत्येक कोशिका में झाड़ू लगाते हैं। हर तरह के प्राणी की हर जीवित कोशिका में ऑक्सीजन के बागी ‘फ्री रैडिकल्स’ और सैनिक-रूपी ‘एंटी-ऑक्सीडेंट’ के बीच देवासुर संग्राम सा चलता रहता है।

अगर हम जीवित हैं तो इसका कारण है इन बागियों पर हमारे सैनिक भारी पड़ते हैं। लेकिन आखिर में हर शरीर यह लड़ाई हार ही जाता है। बुढ़ापे के कई रोगों और फिर मृत्यु का एक कारण ऑक्सीजन में भी देखा जाता है। इसे ‘ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस’ कहते हैं। मृत्यु भी जीवन की ही तरह ऑक्सीजन की लीला की एक कड़ी है।

कचरे की उपयोगिता समझने के लिये इतना दूर जाने की जरूरत नहीं है। हमारे शरीर में ही कई उदाहरण हैं, जैसे कैल्शियम, यानी चूना। हड्डी और दाँत तो इस पदार्थ से बनते ही हैं, कैल्शियम और शरीर के डाक विभाग की तरह भी काम करता है। यह मांसपेशियों के काम में अनिवार्य है, रक्तचाप पर काबू रखता है, घावों को सुखाता है और कोशिकाओं की दीवारों को मजबूत बनाए रखता है। अगर किसी व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम की कमी हो तो उसकी कोशिकाएँ जीवन के रस बाँधकर नहीं रख पातीं। उसका रक्तचाप बढ़ने लगता है।मुक्त ऑक्सीजन वायुमण्डल में बहुत समय टिकती नहीं है। हम जैसे प्राणी इसे अपनी साँस में इस्तेमाल करते हैं। फिर भी हमारे वायुमण्डल का पाँचवाँ हिस्सा मुक्त ऑक्सीजन ही है। इसका कारण है वो वनस्पति जो इसे अपनी श्वास में छोड़ देते हैं।

आधी से ज्यादा प्राणवायु तो समुद्री काई और हरे-नीले बैक्टीरिया ही पैदा करते हैं। कुछ अनुमान इस हिस्से को तीन-चौथाई पर रखते हैं। ठीक भाषा में कहें तो ऑक्सीजन वनस्पति का मल है जिसे वे त्याग देते हैं। यह उनका कूड़ा-करकट है, उनका जूठन। लेकिन हमारे लिये यही प्राणवायु है।

हम हर पल प्राणवायु अपने फेफड़ों से होते हुए शरीर के हर पोर तक खींचते हैं। यही प्राणायाम और इसके लिये किसी योग गुरू की जरूरत नहीं होती। साँस टूटते ही जीवन का अन्त हो जाता है। प्रकृति में हमेशा ही किसी एक जीव का कूड़ा किसी दूसरे जीव के लिये ‘संसाधन’ का रूप ले लेता है। हर किस्म के जीव किसी भी तरह के साधन का एक हिस्सा भर इस्तेमाल कर पाते हैं। जो नहीं पुसाता उसे त्याग देते हैं। वही किसी और के काम आता है। इस सृष्टि में कुछ भी बेकार नहीं जाता। जीवन का कोई भी रूप दूसरे जीवों से लेन-देन किये बिना पनप ही नहीं सकता है।

जिधर जितना जीवन, उधर उतना ही आपसी व्यवहार। जीवन का जैसा अपार वैभव भूमध्य रेखा के इर्द-गिर्द के वर्षावनों में होता है उतना जमीन पर और कहीं नहीं मिलता। समुद्र के भीतर प्रवालों में भी ऐसा ही सजीव मेला सदा लगा रहता है। दोनों के पीछे जीवों के बीच यही व्यवहार, यही व्यापार है। इन विलक्षण स्थितियों में जीवन के अनगिनत रूप एक-दूसरे से सटकर रहते हैं, एक दूसरे के विष को अमृत बनाने का काम सतत करते रहते हैं। कुछ भी बर्बाद नहीं जाता।

वैसे कचरे की उपयोगिता समझने के लिये इतना दूर जाने की जरूरत नहीं है। हमारे शरीर में ही कई उदाहरण हैं, जैसे कैल्शियम, यानी चूना। हड्डी और दाँत तो इस पदार्थ से बनते ही हैं, कैल्शियम और शरीर के डाक विभाग की तरह भी काम करता है।

यह मांसपेशियों के काम में अनिवार्य है, रक्तचाप पर काबू रखता है, घावों को सुखाता है और कोशिकाओं की दीवारों को मजबूत बनाए रखता है। अगर किसी व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम की कमी हो तो उसकी कोशिकाएँ जीवन के रस बाँधकर नहीं रख पातीं। उसका रक्तचाप बढ़ने लगता है।

हर जीवित कोशिका से कैल्शियम का कचरा भी निकलता है। आज से कोई 50 करोड़ साल के पहले ही छोटे-छोटे, पानी में रहने वाले प्राणियों ने इस कूड़े को संजोकर इससे अपने शरीर के लिये कवच बनाना सीख लिया था। इस काल के जीवों के अवशेष जमीन और समुद्र के गर्भ से मिलते हैं। उनमें सीपीनुमा कवच के प्रमाण मिलते हैं। आज भी घोंघे जैसे जीव सीपी और शंख इसी तरीके से बनाते हैं।

कालान्तर में जीवन का क्रमिक विकास हुआ। बड़े-बड़े जीव अवतरित होने लगे। इन जीवों ने सीपियों और शंखों को अपने शरीर के भीतर ढाल लिया, अस्थिपंजर बनाना शुरू कर दिया। कैल्शियम से हड्डी और दाँत भी बनने लगे। मनुष्य भी ऐसे ही जीवों की सन्तति हैं, फिर चाहे हम हर बार सीधे खड़े होने पर अपने उन अनाम पूर्वजों को उनकी कैल्शियम की साधना के लिये श्रद्धांजलि दें, या न दें। चाहे हम अपने पुरखों के प्रति कृतज्ञ हों या कृतघ्न, उनकी चूने से भवन बनाने की योग्यता हमें सहज ही मिल गई है। कोशिकाओं का मैला ही धीरे-धीरे उनकी शरीर-रूपी इमारत का गारा-चूना बन गया, सीमेंट बन गया।

आज बाजार में बिकने वाली सीमेंट जिस चूने के पत्थर से बनती है वह असल में करोड़ों साल पुराने समुद्री जीवों के जीवाश्म ही हैं, जैसे कोयला और पेट्रोलियम लाखों साल पहले भूगर्भ में समा गए पेड़-पौधों के अवशेष हैं। चूने से भरे ये पत्थर भूचाल के कारण समुद्र तल से ऊपर उठ आये। ताजमहल में लगा संगमरमर इन जीवाश्मों से बने चूने के पत्थर का ही एक प्रकार है। विशाल भवन और गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ भी उसी कैल्शियम की मजबूती पर खड़ी होती हैं जिस कैल्शियम से मनुष्य की रीढ़ की हड्डी बनती है। एक ऐसा पदार्थ जो हर कोशिका मैले की तरह निकाल देती है।

हमारा भोजन भी कचरे और साधन के इसी लेन-देन से आता है। हर जीव का शरीर पृथ्वी के उर्वरकों का एक छोटा सा संग्रह है। मृत्यु होने पर यह रचना जब टूटती है तब ये उर्वरक किसी और जीव के आकार में फिर जन्म लेते हैं। धरती से उगे गेहूँ की रोटी हमारे पेट में जाती है। हमारे मरने के बाद चाहे हमें दफनाया जाये या आग के हवाले किया जाय, उर्वरक घूम के फिर वहीं पहुँचते हैं जहाँ से कभी वे निकले थे। जीवन इसी पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर चलता है।

मैल को साधन बनाने वाली यह जीवनलीला अनन्त नहीं है। उसकी एक सीमा होती है। प्राणी को ठीक पता नहीं होता कि यह हद कहाँ है। जो जीव यह दायरा लाँघ जाते हैं उनकी पूरी-की-पूरी प्रजाति अपने ही कूड़े के ढेर में दबकर समाप्त भी हुई है। जीवन की शुरुआत करने वाले बैक्टीरिया जैसे जीवों को ही ले लीजिए, जो अपनी बनाई ऑक्सीजन के शिकार हुए। पृथ्वी पर आज तक जितनी भी जीव प्रजातियाँ हुई हैं उनमें से 99 प्रतिशत से ज्यादा काल के गाल में समा चुकी हैं।

इस ग्रह के इतिहास में मनुष्य को आये जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए हैं। आधुनिक मनुष्य का कोई भी अवशेष दो-ढाई लाख साल से पुराना नहीं मिला है। जबकि पत्थरों की उम्र नापकर पृथ्वी की आयु साढ़े चार अरब साल आँकी गई है। यानी अगर पृथ्वी का सारा इतिहास एक साल में पलट दिया जाये तो मनुष्य प्रजाति का पदार्पण 31 दिसम्बर की रात साढ़े-ग्यारह बजे ही हुआ है, आज से पाँच मिनट पहले। हमें न अपनी सीमाओं का ठीक अन्दाजा है, न हमारे ज्ञान की सीमा का ही।

पिछले दस हजार साल से ही पृथ्वी की जलवायु इतनी अनुकूल बनी हुई है कि हमारी प्रजाति फल-फूल सकी है, खेती कर सकी है। इसी दौरान हमने घनी बस्तियाँ, गाँव और शहर बसाए हैं। उसमें भी पिछले सौ सालों में ही कुछ वैज्ञानिक खोजों की मदद से हमने ढेर सारा भोजन पैदा करना सीख लिया है। कई बीमारियों का उपचार करना भी पिछली शताब्दी में ही सम्भव हुआ है, जिसके बारे में आप इस किताब के छठवें खण्ड में पढ़ेंगे। इससे दुनिया भर में हमारी आबादी सौ साल में चौगुनी बढ़ी है। आज पृथ्वी पर लगभग साढ़े सात अरब से ज्यादा लोग हैं।

आधुनिक शौचालय और सीवर व्यवस्था पानी की घोर बर्बादी तो करती ही है, जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण भी यही है। एक अध्ययन बताता है कि दुनिया भर में आधे से ज्यादा नदियाँ और तालाब सीवर के मैले पानी से दूषित हैं, तटवर्ती समुद्र भी। घनी आबादी वाले हमारे देश में जलस्रोतों के हाल तो बहुत ही खराब हैं, चाहे फिर वह गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियाँ हों, तालाब हों या भूजल। हमारी आबादी चौगुनी हुई है तो हमारा कुल मल-मूत्र भी चौगुना बढ़ा है। लेकिन उसे ठिकाने लगाने के तरीके चौगुने नहीं हुए हैं। कोई चार अरब लोगों के पास शौचालय की सुविधा है ही नहीं और अगर है भी तो उनके मैले पानी का सुरक्षित निकास नहीं होता है। यानी औसतन दस लोगों में से छह लोगों के मल-मूत्र का ठीक निस्तार नहीं होता।

खुले में फैले मल के रास्ते कई तरह के रोग फैलते हैं जो करोड़ों को बीमार करते हैं, लाखों को मारते हैं। सन 2013 का एक अध्ययन बताता है कि ठीक-ठाक शौचालय तो दुनिया की कुल आबादी में से केवल 110 करोड़ लोगों के पास ही है। यानी छह लोगों में से केवल एक व्यक्ति के पास।

अच्छे-बुरे हर तरह के मैले पानी को साफ करने के कारखानों से जुड़े शौचालयों को एक साथ गिन लें, तब भी केवल 280 करोड़ लोगों के शौचालय ठीक माने जा सकते हैं। इस समस्या का सबसे विकराल रूप हमारे देश में है, जिसके बारे में आप पहले अध्याय में पढ़ेंगे ही।

केवल शौचालय होना या न होना इस किताब का विषय नहीं है। यह तो केवल एक कड़ी भर है, शुचिता के तिकोने विचार में, जिसका एक कोण है पानी, दूसरा मिट्टी और तीसरा हमारा शरीर। जल, थल और मल। पानी और मिट्टी के संस्कार से जो भोजन उगता है उसे हमारा शरीर कुछ घंटों के भीतर ही मल-मूत्र बना देता है। उसमें मिट्टी से निकले बेशकीमती उर्वरक होते हैं।

प्रकृति का नियम है कि जमीन से निकले उर्वरक जमीन में वापस जाने चाहिए। यह खाद फिर खाद्य में बदल जाती है। लेकिन आजकल विकास का मानदण्ड पानी से चलने वाले फ्लश कमोड में ही पाया जाता है। थल से निकले उर्वरक वापस मिट्टी में जाने के बजाय आजकल जल में बहाए जाते हैं।

इससे मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही है। खेती की जमीन को आज बहुत महंगे बनावटी उर्वरक डाल कर उपजाऊ रखा जा रहा है। हमारे यहाँ तो यह सौदा बहुत ही भारी पड़ता है। कुछ बनावटी उर्वरक तो ऐसे हैं जो यहाँ मिलते ही नहीं हैं। इनके आयात पर बहुत खर्चा होता है। भारत सरकार अनुदान देकर इन्हें कम दाम पर किसानों को मुहैया कराने की कोशिश करती है। लेकिन ये सस्ते उर्वरक असल में बहुत महंगे पड़ते हैं।

सन 2009 में सरकार का उर्वरकों पर सालाना अनुदान 1,00,000 करोड़ रुपए के पास पहुँच गया था, जिसके बाद से सरकार इसे घटाने की भरसक कोशिश कर रही है। फिर भी सरकारी खजाने में बनावटी उर्वरक की सेंध हर साल कोई 70,000 करोड़ रुपए की तो लगती ही है। किताब का सातवाँ खण्ड इसकी और जानकारी आपको देगा।

इतने उर्वरक डालने पर भी हर साल हमारी मिट्टी बंजर होती जा रही है। दस साल पुराना एक अनुमान कहता है कि फसलों के कटने के साथ हर साल एक करोड़ टन उर्वरक का घाटा हमारी मिट्टी को हो रहा है। फसलें भोजन के रास्ते हमारे शरीर के भीतर पहुँचती हैं। फिर शरीर से निकलने के बाद सीवर से जुड़े शौचालयों के रास्ते ये उर्वरक नालियों में बहाए जाते हैं।

आधुनिक शौचालय और सीवर व्यवस्था पानी की घोर बर्बादी तो करती ही है, जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण भी यही है। एक अध्ययन बताता है कि दुनिया भर में आधे से ज्यादा नदियाँ और तालाब सीवर के मैले पानी से दूषित हैं, तटवर्ती समुद्र भी। घनी आबादी वाले हमारे देश में जलस्रोतों के हाल तो बहुत ही खराब हैं, चाहे फिर वह गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियाँ हों, तालाब हों या भूजल। इस पुस्तक का चौथा अध्याय इसका वर्णन करता है।

शहरों के मैले पानी को साफ करने का एकमात्र तरीका है ‘सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट,’ जो बनाने में बहुत महंगे और चलाने में कठिन होते हैं। किताब का तीसरा खण्ड बताएगा कि कई विकसित कहे जाने वाले देशों के शहरों में भी ये ठीक से काम नहीं करते। इसलिये ढेर सा धन खर्च करने के बाद भी इनके जलस्रोत दूषित ही रहते हैं।

मल-मूत्र का बोझा केवल नदियाँ और तालाब ही नहीं उठाते हैं। इसे हटाने का काम लोगों पर भी डाला जाता रहा है। ऐसे लोगों पर जिनके जन्मजात दुर्भाग्य का फायदा दूसरे उठाते हैं। हमारे यहाँ पूरी-की-पूरी जातियों को मैला ढोने के काम में झोंके जाने का वर्णन आप दूसरे खण्ड में पढ़ सकते हैं। ऐसा दुनिया के कई दूसरे हिस्सों में भी हुआ है, पर एक हमारा ही देश है जहाँ यह अभी भी होता है। इन जातियों के कुछ लाख लोग आज भी इस काम को करने के लिये अभिशप्त हैं। आजाद भारत में ये आज भी गुलाम हैं, स्वच्छता के नाम पर।

आज पृथ्वी को बचाने की जरूरत है। इस ग्रह पर जीवन हमारे किये-धरे से नहीं आया है, न हमारे मिटाए यह मिट सकेगा। चाहे हम कितनी भी कोशिश कर लें, चाहें हम जाने-अनजाने कितनी ही जीव प्रजातियों का सफाया कर दें। होगा तो यही कि जीवन का रूप बदल जाएगा। ऐसे जीव उभर आएँगे जिनके लिये हमारा मैला, हमारा कचरा ही संसाधन होंगे। ऐसे कीड़े जो हमारे बनाए विष से मरेंगे नहीं, ऐसे रोगाणु जिन पर हमारी बनाई कोई दवा काम नहीं करेगी। गाजर घास और विदेशी बबूल जैसे खरपतवार जो मिटाए नहीं मिटेंगे।ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ गलत ही हो रहा है। कई लोग ठीक काम करने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ प्रयोगों का नतीजा अच्छा निकला है। आठवाँ खण्ड ऐसे कुछ प्रयासों की जानकारी देगा। कुछ ऐसे लोगों से आपका परिचय कराएगा जो जाने-अनजाने, बिना प्रचार के कई सालों से विलक्षण काम चुपचाप करते आ रहे हैं। उसके पहले किताब का पाँचवाँ हिस्सा आपको एक विलक्षण प्रयोग दिखाने कोलकाता ले जाएगा। ऐसे कई तरह के लोग मल-मूत्र से सनी अपनी-अपनी दुनिया में सोना बनाने में जुटे हुए हैं। उनकी कहानी उनके आसपास सिमटी हुई है, क्योंकि ये लोग अपने काम का ढोल नहीं बजाते हैं। पर हम सब उनसे बहुत कुछ समझ सकते हैं।

जो कार्यकर्ता हर किसी को शौचालय का अधिकार दिलाने में लगे हैं, उनकी बातचीत उनसे कम ही होती है जो जल प्रदूषण रोकने में लगे हैं। दोनों हलकों का संवाद उनसे और भी कम है जो मिट्टी में उर्वरता लौटाना चाहते हैं। और जो लोग मैला ढोने वाली जातियों को मुक्ति दिलाना चाहते हैं वे तो बिल्कुल ही अकेले पड़े हैं।

यह किताब ऐसे सभी लोगों में परिचय और सम्बन्ध बढ़ाने का एक छोटा सा प्रयास है। आशा है कि सन्दर्भ में दिये लोगों के नाम और पते देखकर पाठक आपसदारी बढ़ाएँगे। जल, थल और मल का सम्बन्ध शाश्वत है। अगर इसे सामाजिक व्यवहार में ठीक से निभाया जाये तो सबके लिये जीवन थोड़ा सरल हो जाएगा। अगर न निभाया जा सका तो बेशकीमती जमीन उजड़ेगी, नदियाँ दूषित होंगी, लाखों लोग बीमार पड़ते रहेंगे। मैला ढोने का शाप हर रोज ढो रहे लोगों को गरिमा नहीं मिलेगी।

अपने-अपने जीवन में आँख बन्द कर लगे रहने वाले लोग एक भीड़ बन जाते हैं। इस भीड़ की भगदड़ में वही दुर्दशा होने की आशंका है जो ऑक्सीजन बनाने वाले प्रागैतिहासिक जीवाणुओं की हुई। वे अपनी साँस से निकले मैल के इकट्ठा होने से लुप्त हो गए। लेकिन उनके मिटने से जीवन नहीं मिटा। केवल उसका रूप बदल गया।

क्या पता, अगर हमने भी अपने मल को ठिकाने लगाना नहीं सीखा तो हम भी लुप्त हो जाएँ? आज नहीं तो कल? सौ साल नहीं तो दौ सौ, चार सौ साल में? अगर ऐसा हुआ तो हमारी सन्तति प्रलय के कगार पर अपने पूर्वजों की बेवकूफी को कोसेगी। हमारी प्रजाति के मिटने का डर किसी परमाणु प्रलय या युद्ध की बजाय उसके अपने कचरे से ज्यादा है। यह अचानक नहीं, धीरे-धीरे होगा।

ऐसा मानना बहुत भारी भूल होगी कि आज पृथ्वी को बचाने की जरूरत है। इस ग्रह पर जीवन हमारे किये-धरे से नहीं आया है, न हमारे मिटाए यह मिट सकेगा। चाहे हम कितनी भी कोशिश कर लें, चाहें हम जाने-अनजाने कितनी ही जीव प्रजातियों का सफाया कर दें। होगा तो यही कि जीवन का रूप बदल जाएगा। ऐसे जीव उभर आएँगे जिनके लिये हमारा मैला, हमारा कचरा ही संसाधन होंगे। ऐसे कीड़े जो हमारे बनाए विष से मरेंगे नहीं, ऐसे रोगाणु जिन पर हमारी बनाई कोई दवा काम नहीं करेगी। गाजर घास और विदेशी बबूल जैसे खरपतवार जो मिटाए नहीं मिटेंगे।

तो मसला पृथ्वी को बचाने का नहीं है। मनुष्य की जात को खुद अपने आप को बचाना है, अपने आप ही से। पुराना किस्सा बताता है कि समुद्र मंथन से विष भी निकलता है और अमृत भी। यह जैसे समुद्र के जल पर लागू होता है वैसे ही थल पर भी होता है और हमारे मल पर भी। हमारा मल-मूत्र या तो विष का रूप ले सकता है या अमृत का। इसका परिणाम किसी सरकार या राजनीतिक पार्टी या किसी नगर निगम की नीति-अनीति भर से तय नहीं होगा।

यह विषय सामाजिक शुचिता का है। जल, थल और मल के सम्बन्ध का है।

यह आलेख 'जल थल मल' से लिया गया है। किताब खरीदने के लिये यहाँ सम्पर्क करें


मूल्य - तीन सौ रुपए
प्रकाशक - गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, 221 दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली 110002


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