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प्रकृति और परम्परागत इल्म को बचा रहे हैं टेरो

Author: 
उमेश कुमार राय

पुरस्कार लेते टेरो मस्टोनेनपुरस्कार लेते टेरो मस्टोनेनस्नोचेंज कोअॉपरेटिव के टेरो मस्टोनेन को इंटरनेशनल रीवर फाउंडेशन की ओर से इस वर्ष का ‘इमर्जिंग रीवर प्रोफेशनल अवार्ड’ दिया गया है।

टेरो को यह पुरस्कार नई दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय 19वें इंटरनेशनल रीवर सिम्पोजियम में प्रदान किया गया। टेरो उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में नदियों और देशज लोगों के पारम्परिक इल्म और उनकी लोककलाओं को सहेजने का काम करते हैं। उन्होंने भूगोल में डाक्टरेट किया और इस्टर्न फिनलैंड यूनिवर्सिटी में शोध कर रहे हैं। वे फिनलैंड के एक बेहद छोटे गाँव में अपनी पत्नी, बच्चे, दो बकरियाँ और एक दर्जन मुर्गे-मुर्गियों के साथ रहते हैं।

इस अनूठी मुहिम के लिये उन्हें अब तक कई अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी) ने टेरो के साथ विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश-


आपका संगठन कितने वर्षों से काम कर रहा है और क्यों?
आर्कटिक (उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र) में जलवायु परिवर्तन का बहुत असर देखा जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों और मानव समाज का अस्तित्व खतरे में है। जलवायु परिवर्तन के बीच नदियों को संरक्षित रखने और देशज लोगों के पर्यावरण से जुड़े परम्परागत इल्म को संजोने के लिये इस संगठन की स्थापना की गई और इसी पर हम काम कर रहे हैं। इस संगठन की स्थापना वर्ष 2000 में की गई थी। हम परम्परागत जानकारियों के जरिए जलवायु परिवर्तन से जैवविविधता और पर्यावरण में आ रहे बदलावों का अध्ययन कर रहे हैं। साथ ही इन परम्परागत जानकारियों के जरिए जैवविविधता को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

जुकाजोकी नदी

इस संगठन को बनाने का विचार कैसे आया?
मैं फिनलैंड के सुदूर गाँव में रहता हूँ। इस गाँव में मछुआरे रहते हैं। मैं भी मछुआरे का बेटा हूँ। हमारे गाँव में रहने वाले लोग पर्यावरण को लेकर अपने परम्परागत इल्मों को सहेजकर रखे हुए हैं। मैं एकदिन कुछ बुजुर्ग मछुआरों के पास गया तो उन्होंने मुझे बताया कि कैसे वे परम्परागत इल्मों से पर्यावरण, नदियों और आसपास की आबोहवा की जानकारी रखते थे। बुजुर्गों ने बातचीत में इस बात पर दुःख जताया कि युवा वर्ग इस इल्म की कद्र नहीं करता है। बुुजुर्गों ने बताया था कि ये इल्म उन्हें किसी ने नहीं सिखाया। उनसे बातचीत करने के बाद ही मैंने सोचा कि परम्परागत इल्मों को सहेजकर रखना चाहिए और युवा वर्ग को इससे अवगत करवाया जाना चाहिए, इसलिये इस संगठन की स्थापना की। मुझे लगता है कि परम्परागत इल्मों को हमें गम्भीरता से लेना चाहिए। देशज लोगों से मिलकर मैंने यह महसूस किया कि उनका पर्यावरण से आत्मीय लगाव होता है और पर्यावरण को लेकर वे गम्भीर होते हैं। इसके विपरीत अत्याधुनिक सुविधाअों के बीच पले-बढ़े लोग पर्यावरण को लेकर बहुत अहंकारी होते हैं।

हाइड्रो प्रोजेक्ट का आप खुले तौर पर विरोध करते हैं, ऐसा क्यों?
हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट नदियों और पर्यावरण के लिये अभिशाप है। हमें किसी भी कीमत पर हाइड्रो प्रोजेक्ट स्थापित नहीं होने देना चाहिए। हाइड्रो प्रोजेक्ट न केवल पर्यावरण और जैवविविधता को खत्म करता है बल्कि इससे देशज यानी मूल निवासियों को विस्थापित भी होना पड़ता है। फिनलैंड और अन्य क्षेत्रों में हाइड्रो प्रोजेक्ट के चलते 100 से अधिक समुदाय बर्बाद हो गए जिस कारण उनके पास जो परम्परागत ज्ञान थे वे भी विलुप्त हो गए।

आपके संगठन के कामकाज के बारे में विस्तार से बताइए।
हमारे संगठन के कार्यकर्ता विभिन्न गाँवों में जाते हैं और वहाँ रहने वाले लोगों से पूछते हैं कि उनकी जरूरतें क्या हैं; वहाँ कृषि और जलवायु में किस तरह का बदलाव आया है; भौगोलिक स्तर पर किस तरह का बदलाव देखने को मिला रहा है और इसी तरह की दूसरी जानकारियाँ इकट्ठा कर हम रिपोर्ट बनाते हैं इस रिपोर्ट को सरकार को सौंपकर उचित कदम उठाने की अपील करते हैं। यही नहीं, हम गाँवों के बुजुर्गों से परम्परागत जानकारियों के सम्बन्ध में भी विस्तृत ब्यौरा लेते हैं और स्कूलों में जाकर बच्चों को इन जानकारियों से अवगत करवाते हैं।

अब तक कितने गाँवों के बारे में जानकारियाँ इकट्ठी की जा चुकी हैं?
अब तक हम लोग उत्तरी ध्रुव के 200 गाँवों की विस्तृत जानकारी इकट्ठी कर उनकी रिपोर्ट तैयार कर चुके हैं। हम लोग कई एनजीओ के साथ मिलकर काम करते हैं और अगर किसी गाँव में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट लाने की योजना बनती है तो हम ये रिपोर्ट दिखाकर बताने का प्रयास करते हैं कि इस प्रोजेक्ट से गाँव को कितना नुकसान होगा। कई बार हमें प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन भी करना पड़ता है।

पुरुवेसी झील से मछली पकड़ते मछुआरेजब आपने संगठन की स्थापना कर काम शुरू किया था तो किस तरह की दिक्कतें आईं?
शुरू में बहुत विरोध हुआ था। वैसे विरोध अब भी है लेकिन कहते हैं कि 100 लोग आपको रास्ते में ही छोड़ देंगे लेकिन आप अपने लक्ष्य से मत हटो, तो मैं भी लक्ष्य से पीछे नहीं हटा और आगे बढ़ा। खुद भी भरोसा और लक्ष्य को लेकर स्पष्ट नजरिए के चलते ही 100 और लोग मेरे साथ जुड़े।

भारत में भी आपका संगठन काम कर रहा है?
राजस्थान के बेयरफुट कॉलेज के प्रोफेसर बंकर रॉय हमारे संगठन के साथ जुड़े हुए हैं। वे राजस्थान में काम कर रहे हैं। हम चाहते हैं भारत से और भी लोग हमारे संगठन से जुड़ें और यहाँ के परम्परागत ज्ञान को संरक्षित करें।

आपकी भविष्य की योजना क्या है?
जिन गाँवों का सर्वेक्षण नहीं हुआ है, उन गाँवों का सर्वेक्षण करेंगे। इन गाँवों से हम पारम्परिक जानकारियाँ इकट्ठी करेंगी और उनका इस्तेमाल नदियों के संरक्षण में करेंगे। इस सिलसिले में दूसरे साझेदारों से शीघ्र ही मुलाकात करेंगे और उनकी राय लेंगे।

अन्तरराष्ट्रीय रीवर फाउंडेशन द्वारा पुरस्कृत संगठनों के प्रतिनिधि


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